संजय कुमार सिंह
इंडियन एक्सप्रेस ने आज कर्नाटक के अलंद विधानसभा क्षेत्र में मतदाताओं के नाम कटवाने की कोशिश से संबंधित खुलासे में भाजपा नेता सुभाष गुट्टेदार के यहां छापे का उल्लेख किया है। पत्रकारिता के सिद्धांतों के अनुरूप उनका पक्ष लिया और उसे भी प्रकाशित किया है। इसमें नामुमकिन मुमकिन यह हुआ कि संबंधित भाजपा नेता ने अपना पक्ष रखा जबकि भाजपा नेता अमूमन पक्ष रखने के लिए उपलब्ध नहीं होते हैं। प्रेस कांफ्रेंस तो करते ही नहीं हैं और करते हैं तो वैसा ही जैसा सरकार के प्रभाव में आने के बाद चुनाव आयोग ने किया था। मुझे ऐसा लगा था जैसे किसी तनाशाह के मन की बात हो। वोट कटवाने की कोशिश से संबंधित इस खुलासे से यह भी साफ हो गया है कि भाजपा चुनाव जीतने के लिए जो कुछ करती है उसमें पैसे खर्च करके (सरकारी या पार्टी का, अभी पता नहीं चला है) मतदाता नहीं रहने देना शामिल हैं। जो वोटर हैं उनके वोट खरीदे भी जाते हैं। मुंबई में पैसे बांटते भाजपा नेता पकड़े गए थे और हाल में बिहार की लाखों महिलाओं को 10,000 रुपए का अग्रिम भुगतान किया जाना शामिल है। वोट चोरी का मामला है ही। राहुल गांधी विस्तार से आरोप लगा चुके हैं और इसमें मतदाता बढ़ाना तथा घटाना दोनों शामिल है। यह सब बहुत ही बड़ी और सोची समझी साजिश के तहत किया जाता लगता है और भाजपा के सत्ता में रहते न तो इसकी जांच होगी न पुष्टि होगी। कहा जा सकता है कि जांच हो भी गई तो पुष्टि नहीं होगी लेकिन जांच ही नहीं होने देना खास ‘लोया’ शैली है और कई मामलों में दोहराई जा चुकी है।
दूसरी ओर, सरकार समर्थकों के दिमाग में बैठा दिया गया है कि सुप्रीम कोर्ट के रहते सरकार ऐसा कैसे कर सकती है। इसमें दिल्ली में आतिशबाजी की छूट दिलाने का मुख्य मंत्री रेखा गुप्ता और दिल्ली भाजपा का दावा शामिल है। इसे अखबारों ने उन्हीं की वीरता की तरह प्रचारित किया और खबर यह नहीं बनाई कि सरकार का दबाव इसी को कहते हैं। सरकार ने दबाव नहीं भी डाला हो तो जो हुआ उसके बाद किया गया दावा दबाव डालना और उसका सफल होना साबित करता है। जाहिर है, इसके लिखित आदेश नहीं हो सकते और फोन पर कहा गया हो तो पेगासस आम आदमी या मीडिया संस्थान नहीं खरीद सकता है। यह अलग बात है लेकिन ऐसी घटना का खबर न होना और खबर से जुड़ा सच नहीं बताया जाना भाजपा के ढेर सारे समर्थकों के ज्ञान को व्हाट्सऐप्प विश्वविद्यालय के स्तर से बढ़ने नहीं दे रहा है। हालांकि यह सब अलग मामला है। आज की खबर के अनुसार, मतदाताओं के नाम काटने की जांच कर रही कर्नाटक एसआईटी ने भाजपा नेता सुभाष गुट्टेदार से जुड़ी संपत्तियों पर छापा मारा। आप 2023 के विधानसभा चुनाव में अलंद का चुनाव कांग्रेस के बीआर पाटिल से हार गए थे। अलंद से चार बार विधायक रहे गुट्टेदार ने दावा किया है कि मतदाता सूची से नाम हटाने के प्रयास से उनका कोई संबंध नहीं है और 2023 में इस सीट से कांग्रेस के विजेता बी आर पाटिल ने निजी लाभ के लिए ये आरोप लगाए हैं। यह खबर पर्याप्त दिलचस्प और मौजूं हैं लेकिन आज मेरे किसी अन्य अखबार में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस ने आज एक और खोजी रिपोर्ट छापी है। इसका शीर्षक है, एक देश और कुछ परिवार।
एक तरफ वोट चोरी से चुनाव जीतने का आरोप है, उसपर चुनाव आयोग का पक्षपाती रवैया, सुप्रीम कोर्ट का कोई कार्रवाई नहीं करना और अब टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर लीड कि चुनाव आयोग देश भर में एसआईआर कराने की योजना बना रहा है। हरेक चरण के लिए तीन महीने होंगे। यह सब तब जब 2021 में होने वाली जनगणना अभी नहीं हो पाई है और अगले साल शुरू होनी है। दूसरी ओर, कल लोकपाल के सात सदस्यों के लिए सात बीएमडब्ल्यू के लिए टेंडर की खबरों के बाद यह जांच करने पर कि लोकपाल के सात सदस्य कौन हैं – पता चला कि एक सदस्य सुशील चंद्र 24वें मुख्य निर्वाचन आयुक्त थे। लोकपाल के रूप में नियुक्ति मार्च 2024 में हुई है। चुनाव आयुक्त के रूप में 15 फरवरी 2019 से 12 अप्रैल 2021 तक। मुख्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में 13 अप्रैल 2021 को पदभार ग्रहण किया। तथा उन्होंने 14 मई 2022 को मुख्य निर्वाचन आयुक्त का पद छोड़ दिया। ऐन चुनाव से पहले इनका इस्तीफा देना, मंजूर कर लिया जाना और फिर नए नियम के तहत नए चुनाव आयुक्त की नियुक्ति उसपर सुप्रीम कोर्ट में फेट अकम्पली के बीच इन्हें लोकपाल बनाए जाने की खबर मुझे नहीं मिली थी। अव्वल तो एक इस्तीफे के बाद दूसरी नियुक्ति इस्तीफे का कारण बता ही देती है पर अब इसका लाभ उन्हें सरकारी बीएमडब्ल्यू कार के रूप में भी मिलने वाला है। ऐसे में चुनाव आयोग कितना निष्पक्ष और स्वतंत्र है तथा एसआईआर क्यों जरूरी है समझना मुश्किल नहीं है। पर यह सब खबर नहीं होती है। हो भी क्यों जब लोकपाल भी खाना पूर्ति ही है।
इन दो खबरों के अलावा, आज अमर उजाला और ज्यादातर अखबार में ट्र्म्प-मोदी वार्ता की खबर है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह वैसे ही है जैसे सरकार चाहती होगी या सरकार को अच्छी लगे। पिछली बार जब ट्रम्प ने दावा किया था कि मोदी ने उनसे कहा कि रूस से तेल का आयात बंद कर देंगे तो भारत सरकार की ओर से जो सब कहा किया गया उसकी जगह अगर मोदी ने एक्स पर ही लिख दिया होता कि मेरी ट्रम्प से कोई बात नहीं हुई तो बात कुछ और होती। इस बार भी खबर में यह नहीं दिखा कि प्रधानमंत्री ने ट्रम्प के पिछले दावे पर कुछ कहा है। नवोदय टाइम्स का तो शीर्षक ही है, मोदी को दीवाली शुभकामना में ट्रम्प ने किया तेल का खेल। उपशीर्षक है, अमेरिकी राष्ट्रपति ने फिर कहा, भारत रूसी तेल खरीद में कटौती करने को राजी। इस खबर के साथ छपी एक खबर का शीर्षक है, मोदी ने कहा – आतंकवाद के खिलाफ एकजुट रहें। आप जानते हैं कि ट्रम्प और मोदी एक दूसरे को फ्रेंड बताते हैं पर भारत के मामले में ट्रम्प अपने मन की बात करते रहे हैं। मोदी उसपर चुप्पी साध लेते हैं और राहुल गांधी की चुनौती के बाद भी मुंह नहीं खोले। अखबारों को आम तौर पर इससे मतलब नहीं होता है। ऐसे में मोदी का यह कहना कि आतंकवाद के विरुद्ध एकजुट रहें और तालिबान से फिर दोस्ती (कारण चाहे जो हो), कश्मीर में आतंकियों के साथ पकड़े गए पुलिस अफसर पर सन्नाटा, 2019 के पुलवमा का खुलासा न होना और चुनाव के समय आतंकवाद खत्म हो जाने का दावा। इसके बावजूद पहलगाम हो जाना। बहुत सारी बातें हैं जो अखबारों में नहीं होती हैं। इसलिए उसे रहने देता हूं।
हालांकि, द टेलीग्राफ ने ट्रम्प मोदी वार्ता को रूसी तेल पर अमेरिका के ठंडे पड़ने के संकेत के रूप में देखा है और क्रोनोलॉजी पेश करते हुए बताया है कि ट्रम्प पहली बार रूसी तेल पर बोले तो भारत की ओर से इनकार किया गया। इसके बावजूद 19 अक्तूबर और 21 अक्तूबर को भी इसकी बात की। 22 को नरेन्द्र मोदी ने एक्स पर ट्रम्प को दीवाली की शुभकामनाओं के लिए शुक्रिया कहा। हिन्दुस्तान टाइम्स ने लिखा है कि दीवाली पर कॉल के दौरान मोदी ट्रम्प ने व्यापार संपर्कों पर बात की। दि एशियन एज ने बिहार चुनाव में इंडिया गठबंधन के कथित अंतरविरोध के मनमुटाव या टकराव को दूर करने की कोशिश की खबर को लीड बनाया है और शीर्षक है, टकराव खत्म करने के लिए अशोक गहलोत लालू से मिले। मुझे नहीं पता यह कितना बड़ा मामला या कितनी बड़ी खबर है। मुझे यह जरूर पता है कि इंडिया गठबंधन बिहार चुनाव में एक ही पक्ष है और कम से कम तीन मजबूत पक्ष चुनाव में होना माना जा रहा है। बाकी की खबरें नहीं के बराबर हैं। जो होती हैं वह प्रचार वाली और इंडिया गठबंधन के बारे में जो भी खबर होती है वह यही बताती है कि उसमें मतभेद है। सच यह है कि भाजपा जनता दल यू के साथ मिलकर और कांग्रेस राजद या राष्ट्रीय जनता दल से मिलकर चुनाव लड़ रही है। बिहार में राहुल गांधी की दिलचस्पी ज्यादा नहीं है और तेजस्वी की कितनी भी कम हो, इनकमबेंसी फैक्टर के साथ पलटू राम का लेबल नहीं है। फिर भी लोग यही दिखाने में लगे हैं कि भाजपा गठबंधन (मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार कौन है, नहीं बताने के बावजूद) बहुत मजबूत है। वहां कोई सिर फुटैव्वल नहीं है और मोदी (या शाह) जी ने जो कर दिया वही मास्टर स्ट्रोक है। संपादकों का हाल यह है कि एक वरिष्ठ और गरिष्ठ संपादक ने लिखा है, अशोक गहलोत अपना किला तो बचा न सके। अब वे तेजस्वी की ताजपोशी कराएंगे! इसपर मेरा मानना है कि तेजस्वी के साथ जो हैं वही कराएंगे ताजपोशी या उन्हीं के भरोसे रहना होगा। नाकाम रहेंगे या कामयाब होंगे। जब बाकी सब वोट चोरी पर मुंह सिले बैठे हैं तो चुनाव लड़ने वालों के पास विकल्प क्या है। सरकार के विरोध में वैसे भी कौन आता है और ईडीस सीबीआई शाखा वाली यह सरकार तो और खतरनाक है। नीतिश कुमार को पल्टू राम बना दिया है। बाकी की क्या बिसात।
ये सब पढ़कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का दावा याद करने लायक है। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने कहा था, मोदी है तो मुमकिन है। राजस्थान के टोंक में आयोजित एक रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, “साढ़े चार साल पहले अनेक कामों पर सिर्फ चर्चा होती थी, अब इन कामों के जमीन पर उतरने से विश्वास जगा है … क्योंकि ‘मोदी है तो मुमकिन है’।” इसके पहले इसी तरह के टैगलाइन में पार्टी ने “नामुमकिन अब मुमकिन है” जैसा नारा भी पेश किया था। इसके आलावा मोहन भागवत (संघ प्रमुख) ने भी इस नारे का उल्लेख करते हुए कहा था कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के संदर्भ में “मोदी हैं तो मुमकिन हैं” कहा जा सकता है। कुल मिलाकर 2019 के चुनाव-परिदृश्य में यह भाजपा/मोदी ब्रांडिंग का हिस्सा बन गया था, और प्रचार रणनीति में उभरा था। पर लोगों को मिला क्या? मध्य-प्रदेश के भोपाल में एक मस्जिद (हैदरी मस्जिद, अलीगंज) में भाजपा प्रत्याशी के कार्यक्रम के दौरान बोहरा समुदाय के कुछ लोगों ने नारे लगाए “मोदी है तो मुमकिन है” के। राजस्थान में भाजपा नेता राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने कहा कि कांग्रेस के लोग जब घर-घर जाते हैं तो सुनते हैं, “मोदी हैं तो मुमकिन है”। विपक्षी दलों के नेताओं ने इस नारे को पलटते हुए कहा कि “मोदी हैं तो मुमकिन है” से जुड़ी छवि वास्तविकता में पूरे नहीं उतरी। उदाहरण के लिए, पप्पू यादव ने कहा कि यह नारा अब खत्म हो चुका है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल–चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


