मोदी जी पर चक्रवर्ती राजा के रूप में स्वयं को विभूषित कराने का अरमान इस कदर तारी है कि उन्हें किसी राज्य में इतर पार्टी की सरकार मंजूर नहीं है। चक्रवर्ती सम्राट के दर्जे को हासिल करने के लिए जरूरी है कि उनके कार्यकाल में पूरा देश भाजपामय हो जाये…

केपी सिंह-
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पौराणिक रूपक और मुहावरे बहुत सम्मोहित करते हैं। अव्यवहारिक महत्वाकांक्षाओं में उन्होंने अपने को उलझा लिया है। उनका मनोविलास लोकतांत्रिक प्रवृत्तियों के लिए बहुत भारी साबित हो रहा है। हाल में सुप्रीमकोर्ट और राष्ट्रपति को उन्होंने अपनी चेतना पर हावी इसी फंतासी के चलते आमने-सामने कर दिया। जिसे देश की प्रतिष्ठा और गरिमा के लिए बेहद नुकसानदेह माना जा रहा है।
भारतीय सभ्यता और संस्कृति की दुहाई देकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आधुनिक विक्रमादित्य के रूप में अपने को स्थापित करने के लिए अटपटे नटखट करते रहते हैं। नये संसद भवन के उद्घाटन के मौके पर उनकी यही भावुकता उन्हें संसद भवन में राजदण्ड को स्थापित कराने के लिए प्रेरित करने वाली सिद्ध हुई। स्पष्ट है कि इससे कोई उद्देश्य हल नहीं हुआ। लोग भूल भी चुके हैं कि कोई राजदण्ड संसद भवन में रखा भी हुआ है। प्रधानमंत्री ऐसे प्रतीक स्थापित करने की धुन दिखाते हैं जिनके संदेश आज की व्यवस्था में न केवल अप्रासंगिक हैं बल्कि वर्तमान मान्यताओं के अर्थ को भ्रमित करने वाले भी हैं।
जहां तक देश की सांस्कृतिक विशिष्टता को फिर से केंद्र बिंदु में स्थापित करने की चुनौती है इसके लिए प्रधानमंत्री के उपक्रम कोई करिश्मा नहीं दिखा पा रहे। सच्चाई तो यह है कि बाजारवाद के मूल्य और लक्ष्य हमारी सांस्कृतिक विशिष्टता के लिए अत्यंत आघातकारी हैं लेकिन स्वयं प्रधानमंत्री मोदी बाजारवादी चकाचौंध की गिरफ्त में इस कदर हैं कि उनकी इच्छाशक्ति इसके विरुद्ध हस्तक्षेप के मामले में जबाव दे जाती है। सादगी और सयंम भारतीय संस्कृति के सर्वाधिक मूल तत्वों में शामिल हैं। लेकिन इसका निर्वाह तो स्वयं प्रधानमंत्री नहीं कर पा रहे।

व्यक्तिगत जीवन में उनकी छवि शौकीन सुल्तानों जैसी बन चुकी है जो गलत भी नहीं है। उनकी देखा-देखी लोगों में भी तड़क-भड़क और दिखावे के लिए फिजूलखर्ची का उन्माद सा व्याप्त हो गया है। नतीजतन अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वे किसी नैतिकता को आड़े नहीं आने देते। व्यक्तिगत भ्रष्टाचार मोदी दौर में इसीलिए चरमसीमा पर पहुंच चुका है। मोदी की सरकार भी इसे पराक्रम के रूप में मान्य करती प्रतीत होती है। सत्तारूढ़ पार्टी के छुटभैये नेता तक अपने यहां होने वाले मांगलिक कार्यक्रमों या त्रयोदशी जैसे आयोजनों में हजारों लोगों की दावत की व्यवस्था करते हैं। आखिर उनके पास इतने संसाधन आते कहां से हैं। जिससे उनमें बेदर्दी से पैसे लुटाने का साहस पैदा होता है।
जाहिर है कि जब मोदी जी वीर भोग्या वसुंधरा के सिद्धांत को मान्यता दे चुके हैं तो न तो सरकारी तंत्र और न ही सत्तारूढ़ पार्टी में इसको लेकर सवाल पूछे जाने की आशंका बची है। क्या तृष्णा, लोलुपता के विस्फोट को प्रोत्साहित करने वाली वर्तमान की रीति-नीति भारतीय संस्कृति की महानता को बनाये रखने वाली कही जा सकती है।
क्रिकेट के खेल को दुनिया के सभी स्वाभिमानी देश अपने यहां बंद किये हुए हैं। यह खेल भी हमारी सांस्कृतिक मान्यताओं के साथ खिलवाड़ करने वाला उपक्रम है। इस खेल का एक अंग चीयर्स गर्ल भी बन गई हैं। क्रिकेट में जितना खेल मैदान में प्रत्यक्ष नहीं होता उससे ज्यादा पृष्ठभूमि में सट्टे का खेल चलता है। इससे होने वाली कमाई से दाउद इब्राहिम जैसों के देश विरोधी साम्राज्य खड़े होते हैं। यह खेल सिर्फ उन देशों में खेला जाता है जो कभी इंग्लैंड के उपनिवेश रहे हैं तो गुलामी के इस स्मारक को अपने सीने से चिपकाये रखने की क्या तुक है।
फिल्मों और वेब सीरीज में पहले जितनी अश्लीलता और अंग प्रदर्शन नहीं था उससे ज्यादा आज इनको बढ़ावा मिल रहा है। अंग प्रदर्शन की प्रतीक कंगना रनौत को तो प्रधानमंत्री ने देश की गरिमा के प्रतीक लोकसभा में विराजित करा दिया। भारतीय जनता पार्टी को ऐसा सेंसर बोर्ड बनाने की सूझ दिमाग में क्यों नहीं आती जो फिल्म क्षेत्र में भारत की मर्यादा पूर्ण संस्कृति के अनुरूप मॉडल तैयार कर सके। भारतीय संस्कृति में कन्याओं को लेकर विकृत दृष्टि और मानसिकता के परिहार के लिए अनुष्ठान गढ़ने में बहुत श्रम किया गया है।
कन्या पूजन की इस दृष्टि से परंपरा अनुपम है। होना यह चाहिए कि भारत का बाजार संस्कृति के इस तत्व को ध्यान में रखकर अपना कार्य करे लेकिन हर प्रतिबद्धता को हवा में उड़ा देने में माहिर बाजार ने लोगों को कन्याओं से खिलवाड़ के रास्ते पर उतार दिया है। विवाह समारोह में लिपीपुती फ्राक पहने कन्यायें मेहमानों को चाय, कोल्डड्रिंक, सूप सर्व करने के लिए मेजबान की सहमति से लगाई जाती हैं। कम से कम राष्ट्रवादी मेजबानों को तो अपने कैटर से कहना चाहिए कि इस काम में उनके यहां लड़कियां नहीं लड़के लगायें। आखिर विवाह समारोह में बहुत सारे मेहमान पी कर आते है जिनकी नजर जब खाना-पीना सर्व कर रहीं लड़कियों पर पड़ती है तो उनमें से कई के आंखों में वासना के डोरे उभरने लगते हैं। क्या यह होना चाहिए।
अब बात मूल प्रसंग की। भारत जैसे देश को उपमहाद्वीप कहा जाता है क्योंकि इसमें शामिल अलग-अलग राज्यों की भाषा, पहरावा, ऋतु, सामाजिक व्यवस्थायें, इतिहास और तदनुरूप राजनीतिक सोच अलग-अलग है इसलिए देश की अखण्डता के मददेनजर कई राज्यों में केंद्र से इतर सरकारों के साथ व्यवस्था के संचालन का समन्जन विकसित करने पर जोर रहता है। लेकिन मोदी जी पर, चक्रवर्ती राजा के रूप में स्वयं को विभूषित कराने का अरमान इस कदर तारी है कि उन्हें किसी राज्य में इतर पार्टी की सरकार मंजूर नहीं है।
चक्रवर्ती सम्राट के दर्जे को हासिल करने के लिए जरूरी है कि उनके कार्यकाल में पूरा देश भाजपामय हो जाये। इस सनक में भिन्नता वाले राज्यों के जनादेश को विफल करने का उनका रिकार्ड बहुत कुख्यात हो चुका है। दिल्ली में उन्होंने सरकार से स्थानांतरण से लेकर नीति संबंधी फैसले करने तक की ताकत अपने एलजी में समेट दी थी। इसके चलते जब लोगों ने समझ लिया कि दूसरी पार्टी को चुनेंगे तो सरकार को काम नहीं करने दिया जायेगा जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ेगा। नतीजतन मजबूरी में उन्होंने भाजपा का ही वरण करने के लिए अपने को बाध्य समझा। दिल्ली का इस बार का जनादेश ब्लैकमेलिंग का जनादेश कहा जाये तो अन्यथा नहीं होगा।
तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, पंजाब, कर्नाटक, तेलंगाना, झारखण्ड आदि राज्य इसी बिडम्बना के शिकार हैं। तमिलनाडु में प्रकाश में आया कि वहां के राज्यपाल महोदय विधानसभा में पारित कराये गये बिल पर कुंडली मारकर बैठ जाते हैं ताकि उन पर अमल न किया जा सके। अगर बिल दोबारा पारित होकर आ गया तो राष्ट्रपति भवन भेज देते हैं। इसके बाद वह बिल राष्ट्रपति भवन में डंप हो जाता है। एक बिल तो ऐसा है जिसे पिछले विधानसभा में पारित किया गया था और चुनाव के बाद नई विधानसभा गठित हो गयी तब भी राज्यपाल उस पर निर्णय नहीं ले सके।
जाहिर है कि इस तरह से तो कोई राज्य सरकार जनादेश के अनुरूप कार्य कर ही नहीं पायेगी। यह संघीय सिद्धांतों के विरुद्ध है। दूसरे अर्थों में संवैधानिक मंशा के साथ खिलवाड़ है। व्यवस्था के संरक्षण के लिए इसमें किसी न किसी को तो हस्तक्षेप करना पड़ेगा। जिन तकनीकी नुक्तों के आधार पर राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट के सामने खड़ा किया गया है उनका कोई औचित्य नहीं है। अगर व्यवस्था को संकट से बचाने का प्रश्न आ जाये। भाजपा की सर्व सत्ता के कीर्तिमान को अपने हाथ से रचने के निश्चय की सफलता के लिए अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संविधान, सुप्रीमकोर्ट आदि किसी की भी सीमा रेखा की परवाह नहीं करना चाहते तो यह देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा।


