एक पाती पीएम के नाम : ऐसी क्यों मति मारी गई, मजीठिया पर कुछ तो बोलो महराज !

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, आपको ठीक एक वर्ष पहले जनता जनार्दन का आशीर्वाद नहीं, ईश्‍वर की ओर से अवसर मिला, जिसे आप विदेश यात्राओं पर गंवा रहे हैं। आपके पास भावना नहीं, भाव प्रवण अभिनय है, जिसके मायाजाल में जनता को भटका रहे हैं। आशीर्वाद तो दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल को मिला है, जो अपनी सिंगिल हड्डी पर केंद्र सरकार से कबड्डी खेल रहे हैं और आपके मंझे खिलाडि़यों को आउट भी करते जा रहे हैं। आपके अंदर कोई भावना होती तो आप एक बयान ही जारी कर देते कि मजीठिया वेतनमान न देकर बड़े-बड़े अखबार मालिक गलत कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री जी, आप तो इतने डरपोक निकले कि आप में गलत को गलत कहने तक का साहस नहीं है, तो फिर गलत को रोकेंगे कैसे ? यही नहीं, आपको सही-गलत की पहचान तक नहीं है। यदि होती तो आप मजीठिया वेतनमान न देने वाले अखबार मालिकों के साथ गलबहियां डाल कर नहीं खड़े होते। भावुक तो अरविंद केजरीवाल जी हैं, जिन्‍होंने अपने राजनैतिक कैरियर की परवाह न करते हुए एक झटके में अखबार मालिकों से पंगा ले लिया। दोबारा प्रधान सेवक बनने के लिए इतना विंदास बनना होगा आपको। नहीं तो—ये पब्लिक है। सब जानती है।

प्रधानमंत्री जी, आपको इस बात की गलतफहमी है कि असली पत्रकार अखबार मालिक हैं। असली पत्रकारों को तो अखबार मालिकों ने अपने-अपने संस्‍थानों से बाहर कर दिया है। याद रहे, समाज के चितेरे, समाज के प्रतिनिधि और समाज के भविष्‍य वही असली पत्रकार हैं, जिन्‍होंने मजीठिया वेतनमान के लिए संघर्ष में अपनी नौकरियां गंवाई हैं। वे आज भी सक्रिय हैं। उनके विचारों को प्रसारित करने के लिए आज न तो किसी टीवी चैनल की जरूरत है और न किसी अखबार की। उन्‍हीं के लिए ईश्‍वर ने नया मीडिया भेज दिया है। भगवान बड़ा कारसाज है। वह आपको प्रधान सेवक बना सकता है तो आपको प्रमाद फैलाने के लिए दंडित भी कर सकता है। ये असली पत्रकार जो हैं, वही इस देश में जागरूकता ला सकते हैं। चाटुकार पत्रकारों से आप कोई उम्‍मीद न ही करें तो अच्‍छा। वे तो आप से संबंध बना कर निजी हित साधने के अलावा और कुछ जानते ही नहीं। 

प्रधानमंत्री जी, आपकी मति इतनी मारी गई है कि आपको असली और नकली पत्रकारों में भेद ही नजर नहीं आ रहा है। तभी तो आप ऐसे पत्रकारों से घिर गए हैं, जिनसे देश का कोई भला नहीं होने वाला है। आप एक भी असली पत्रकार से मिले होते तो वह आपको इतने अच्‍छे सुझाव देता कि जनता में आपकी इतनी छीछालेदर होने की नौबत तक नहीं आती। नकली पत्रकारों से आपको सुविधा हो सकती है, लेकिन सहयोग नहीं। अच्‍छा प्रधान सेवक बनने में तो कतई नहीं। पर असली पत्रकार जनता के वास्‍तविक प्रतिनिधि हैं, उन्‍हें कम संख्‍या होने के कारण वोट बैंक के तराजू में न तोलें। देश में जनमत वही तैयार करेंगे। न्‍यूज चैनलों की चमक-दमक और अखबारों की धमक के चक्‍कर में आप शीघ्र ही वह सब खो देंगे, जिसे हाल ही में क्रांग्रेस को खोना पड़ा।

प्रधानमंत्री जी, आपकी गलतियां गिनाने के लिए मेरे पास समय नहीं है, फिर भी कुछ संकेत पर्याप्‍त हैं। विदेश से काला धन लाने के बजाय आपने जन धन के नाम पर देश भर के गरीबों से पैसा जमा करा लिया। और भी न जाने किन-किन योजनाओं के जरिये धन जमा कराते जा रहे हैं। कभी आपने सोचा कि गरीबों में धन बांटा जाता है, उनसे धन नहीं लिया जाता। यकीन मानिए, दरिद्र नारायण आप से नाराज हो गए हैं। इस जन्‍म में आप उन्‍हें प्रसन्‍न नहीं कर पाएंगे। आपकी नीति भ्रष्‍टाचार से मुक्‍त होती तो आपकी सरकार दिल्‍ली की चुनी हुई सरकार के काम में इतने अड़ंगे नहीं लगाती। दिल्‍ली हाईकोर्ट के फैसले से भी आप कुछ नहीं सीखेंगे तो जनता के पास फोकट में आशीर्वाद का बखार (अनाज भंडार को कहते हैं) नहीं है।

प्रधानमंत्री जी, सुदृढ़ अर्थव्‍यवस्‍था के लिए आप पर भरोसा करने का एक भी कारण नजर नहीं आ रहा है। ऐसा भी नहीं है कि आपको यह बात मालूम नहीं कि कितने पत्रकार मजीठिया वेतनमान न मिलने से घनघोर आर्थिक संकट में हैं और उनके लिए आपने कुछ नहीं किया। उलटे अखबार मालिकों के साथ खड़े होकर पत्रकारों का मनोबल ही तोड़ा है। यह समूह आपको कभी भी माफ नहीं करेगा। कैसे मान लूं कि विश्‍व स्‍तर पर भारत की प्रतिष्‍ठा बढ़ी है। जिस देश का पत्रकार ही दो जून की रोटी के लिए तरसे, उस देश की आम जनता का क्‍या हाल होगा, सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। प्रतिष्‍ठा उसे नहीं कहते कि सूट-बूट पहन कर विश्‍व के बड़े-बड़े नेताओं के साथ खड़े हो जाएं। महात्‍मा गांधी तो एक धोती में अंग्रेजो के सूट-बूट को मात दे देते थे। देश की प्रतिष्‍ठा तब होती है, जब प्रति व्‍यक्ति आय अधिक हो। इस दिशा में आपने कुछ किया है तो जनता को जरूर बताएं।

प्रधानमंत्री जी, स्‍वच्‍छ भारत अभियान की आपकी सोच अच्‍छी है, लेकिन स्‍वच्‍छ सोच अभियान आप कब चलाएंगे। अमीरों को कब बताएंगे कि गरीबों का हक मारना अच्‍छा नहीं, अपितु पाप होता है। आपने जोड़ने का काम तो किया ही नहीं है। श्रम कानून जो बदल रहे हैं, उससे गरीबों और अमीरों में तकरार ही बढ़ेगी, जैसा कि पत्रकारों और अखबार मालिकों के बीच चल रहा है। गरीबों की भूमि लेने का लालच तो छोड़ ही दें। लालच बुरी बलाय। आपके प्रयास जिंदगी को छू नहीं रहे हैं, छू मंतर कर दे रहे हैं। अभी भी समय है, संभल जाइए। नहीं तो जनता आपको सत्‍ता से छू मंतर कर देगी। आइए संकल्‍प लें कि किसी भी गरीब का हक न मारा जाए। जय हिंद।

आशा है कि वाल्‍मीकि रामायण की इन पंक्तियों पर आप जरूर ध्‍यान देंगे।

सुलभा: पुरुषा: राजन्, सततं प्रियवादिन:….. अर्थात् हमेशा प्रिय बोलने वाले सुलभ होते हैं, लेकिन अप्रिय और गुणकारी वचन बोलने वाले लोग कम ही होते हैं।

आपका ही शुभ चिंतक, श्रीकांत सिंह

श्रीकांत सिंह के एफबी वॉल से 



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Comments on “एक पाती पीएम के नाम : ऐसी क्यों मति मारी गई, मजीठिया पर कुछ तो बोलो महराज !

  • Dear media friends don’t disheart. Ball is in our hand. We to write letters to the president of India to make pressure on the Labour department of states so that they make partial reports on Majithia.

    And yes we have to send letters to the leaders of opposition also.

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  • jeet singhal says:

    श्रीमान आपके लच्छेदार भाषण से कुछ नहीं हो सकता…आप केजरीवाल के प्रवक्ता की भाषा बोल रहे हैं….प्रधानमंत्री को पत्र लिखने का इतना ही शौक है तो निवेदन भेजो…समस्या बताओ..व्यंग लेखन तो बाद में भी हो सकतासकता है…

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  • KASHINATH MATALE says:

    WAH SHRIKANT SHINGH JEE MAJA AA GAYA.
    CONGRATULATION TO YOU AND CONGRATULATIONO ALSO BHADAS4MEDIA.COM, IS TARAH KI KHABRE PRAKASHIT KARTA HAI.
    BHADAS NE SURU SE HI MAJITHIA WAGE BOARD KE BAREME JAGRUKATA NIRMAN KI HAI.

    THANKS COM. BHAI YASHWANT SHINGH JEE.
    JAY HIND

    Reply

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