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सियासत

आरएसएस का संपूर्ण बायोडाटा 15 दिन के भीतर सार्वजनिक करने की मांग!

शुक्रवार 15 अगस्त (Independence Day) 2025 को नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री रहते 12वीं बार लाल किले (Red Fourt) पर झंडा फहराया और अब तक का सबसे लंबा भाषण (103 मिनट) दिया। भाषण में सबसे ज्यादा इस वक्त विवाद का जो विषय बना हुआ है, वह मोदी द्वारा RSS (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) का महिमामंडन करना रहा। सोशल मीडिया मोदी सपोर्ट और विरोध की लहर है। अब आज इसे लेकर आरएसएस की संपूर्ण लाइफ साइकिल के कागज़ पत्तर सार्वजनिक किए जाने की मांग उठ गई है वो भी 15 दिन के भीतर।

किसने क्या कहा/लिखा है? नीचे पढ़ें…


लखनऊ- आजाद अधिकार सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमिताभ ठाकुर ने आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले को पत्र भेज कर संघ से जुड़ी बुनियादी जानकारियों को सार्वजनिक किए जाने की मांग की है.

अपने पत्र में उन्होंने लिखा है कि संघ (RSS) देश के प्रमुख सामाजिक, सांस्कृतिक संगठनों में एक है किंतु इससे जुड़ी तमाम बुनियादी जानकारियां सार्वजनिक नहीं है. यहां तक कि संघ के पंजीकरण तथा उसके वित्तीय मामलों से जुड़े अभिलेख भी सार्वजनिक नहीं हैं.

अमिताभ ठाकुर ने कहा कि पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के लिए यह जरूरी है कि संघ अपने पंजीकरण, बैंक अकाउंट, पैन नंबर, इनकम टैक्स छूट, एफसीआरए, वार्षिक वित्तीय रिपोर्ट, केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा प्रदत्त भूमि आवंटन आदि से जुड़ी जानकारियां सार्वजनिक करें.

अतः उन्होंने दत्तात्रेय होसबोले से 15 दिनों में इन बुनियादी जानकारियों को अपने वेबसाइट पर सार्वजनिक किए जाने का अनुरोध किया है.


RSS को लेकर प्रधानमंत्री ने जो कहा पहले वो सुने/देखें


श्याम मीरा सिंह-

अपने पुरखों की मेहनत को याद करने के लिए स्वतंत्रता दिवस उचित दिन है। लेकिन इसमें स्वतंत्रता जैसा कुछ नहीं। अगर आज के थानों, राजस्व दफ्तरों, प्रशासनिक कार्यालयों और कचहरी के बाहर खड़े गरीबों को देखता हूँ तो स्वतंत्रता जैसा कुछ नहीं है। भारत में सिर्फ़ पावरफुल लोगों को स्वतंत्रता है। ग़रीब और जातीय तौर पर कुचले लोगों को अभी भी उतनी ही स्वतंत्रता है जितनी औपनिवेशिक समय में।

स्वतंत्रता दिवस हमें हर साल इस भ्रम में धकेलती है कि हम स्वतंत्र हैं। और अधिक श्रम की हमें जरूरत नहीं। मगर हमें अभी उतना ही चलना है जितना हमारे पुरखे 1857 से 1947 की इस तारीख तक चले थे। हम स्वतंत्र हैं, समान नहीं।


आलोक शर्मा-

देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही है कि आज़ादी के इतने सालों बाद भी प्रधानमंत्री लाल किले से राष्ट्र की बात करने के बजाय RSS की चर्चा करने पर मजबूर हैं। मोदी जी की मजबूरी साफ है, न देश की जनता का भरोसा है, न लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास बचा है। इलेक्शन कमीशन सवालों के घेरे में है, जनता जवाब मांग रही है, और प्रधानमंत्री भागकर RSS की शरण में पहुंचे हैं।

सच्चाई यही है कि मोदी जी की कुर्सी अब मोहन भागवत की कृपा पर टिकी है। लाल किले से RSS का नाम लेना सिर्फ़ यह स्वीकारोक्ति है कि देश के प्रधानमंत्री जनता के नेता नहीं, बल्कि नागपुर के आदेशपाल हैं।

बात RSS की थी, जो संगठन सौ साल में भी अपना रजिस्ट्रेशन नहीं करा पाया, वो दूसरों में हिम्मत क्या भरेगा? मोदी जी NGO कह रहे थे, तो याद रखिए, NGO का रजिस्ट्रेशन होता है, PAN-आधार लगता है, वे छुपते नहीं, भागते नहीं।

लेकिन एक संस्थान, जिसका सौ साल में कहीं कोई वैधानिक उल्लेख तक नहीं, उसका नाम लेना भी अपने आप में कंट्रोवर्सी है।

भाजपा कहती है, जब जागो तब सवेरा, हम भी कहते हैं, पर याद दिला दें, RSS – 52 साल बाद जागी थी और तिरंगा अपने कार्यालय पर फहराया। इतना ही नहीं, नागपुर में उन बच्चों को जेल भेज दिया गया, जिन्होंने RSS मुख्यालय पर तिरंगा फहराने की कोशिश की थी।

जो संस्था अपनी पहचान दर्ज कराने से डरती हो, वह देश को साहस सिखाने चली है, यही असली विडंबना है।


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