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सियासत

मोदीजी की गलतफहमियां बनाम मनमोहन सिंह!

विश्व दीपक-

जब-जब मोदी की अक्षमता उजागर होती है तब-तब मनमोहन सिंह याद आते हैं. 2014 में मोदी ने जब सत्ता संभाली थी तब उनको अमरीका के साथ मज़बूत संबंधों की विरासत मिली थी. भारत में मनमोहन सिंह थे तो अमरीका में बराक ओबामा. दोनों पढ़े-लिखे, बुद्धिमान. एक स्टेट्समैनशिप थी दोनों के अंदर.

याद कीजिए ओबामा 2015 में गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि बनकर आये थे. यह मोदी का करिश्मा नहीं था. यह मनमोहन सिंह की छोड़ी हुई विरासत का असर था.

आज भारत-अमरीका संबंध जिस रसातल [structural damage] में पहुंच चुके हैं उसकी वजह क्या है? अमरीकी बिल्डर डोनाल्ड ट्रंप जो दुर्भाग्य से वहां का राष्ट्रपति भी है केवल उसकी सनक या मोदी जी की अमरीका भक्ति में कमी?

सबसे अहम है अमरीकन डीप स्टेट की भूमिका जिसे आमतौर पर नजरंदाज कर दिया जाता है.

अमरीका की प्रभुत्वशाली भारतीय एनआरआई लॉबी के प्रचंड समर्थन और भारतीय मीडिया की अंधभक्ति के बावजूद मोदी जी मनमोहन सिंह की विरासत बचा नहीं सके. आगे बढ़ाने की बात छोड़िए.

मोदी जी ने भारत-अमरीका संबंधों का इस्तेमाल अपनी छवि चमकाने के लिए किया. विदेश नीति को उन्होंने घरेलू राजनीति की दासी बनाकर रखा. लेकिन जब उन्होंने ‘अबकी बार ट्रंप सरकार’ का नारा दिया तो डीप स्टेट चौकन्ना हो गया. इसे अमरीकी राजनीति में विदेशी हस्तक्षेप के तौर पर लिया गया.

रूस भी इसी वजह से अमरीकी सिस्टम के निशाने पर रहता है.

मोदी भक्त, भारत में ट्रंप के लिये पूजा हवन करते थे और मोदी जी ट्रंप के लिये अमरीका में रैली. यह बात डीप स्टेट को हजम नहीं होनी थी. नहीं हुई. यही टर्निंग प्वाइंट था. आज ट्रंप जो भी कर रहा है उसकी बुनियाद बाइडन के दौर में रख दी गई थी.

दूसरी बात है गलतफहमी. मोदी जी को अपने बारे में भयंकर गलतफहमी है. अगर ऐसा नहीं होता तो वो अपने आप को नॉन बॉयोलॉजिकल नहीं कहते. चूंकि उनको अपने बारे में गलतफहमी है इसीलिये उन्हें अपने नेतृत्व, भारत की क्षमताओं और उसकी वैश्विक स्थिति के बारे में भी गलतफहमी है.

भारत दुनिया को क्या दे रहा है या दे सकता है? सब कुछ इसी से तय होगा.

हालांकि भारत-अमरीका संबंध जहां पहुंच चुके हैं वहां से जल्द रिकवरी की कोई गुंजाइश नज़र नहीं आती. फिर कह रहा हूं कि संबंधों में structural damage हुआ है. इसे सामान्य बनाने में अगले कई सााल लग सकते हैं. लेकिन फिर भी अगर मोदी जी कोशिश करें तो उन्हें पहला काम यह करना होगा कि गलतफहमियां छोड़नी होंगी. भक्त चाहें तो मोदी जी की गलतफहमियां दूर करने के लिये हवन-पूजन कर सकते हैं.

चूंकि मनमोहन सिंह को अपने बारे में, भारत के बारे में कोई गलतफहमी नहीं थी इसीलिए जब-जब मोदी जी अक्षमता उजागर होती है, मुझे मनमोहन सिंह याद आते हैं. यह तस्वीर भारत-अमरीकी संबंधों की केमिस्ट्री के बारे में बहुत कुछ बयां करती है.

The Prime Minister Dr Manmohan Singh and the President Barack Obama of the United States at their summit meeting at the White House in Washington DC on September 27 2013

मोदी जी की गलतफहमियां… मोदी जी को अपने बारे में बहुत गलतफहमियां हैं. फिर कह रहा हूं, आज दुनिया के मंच पर भारत की भद पिटवाने के लिये मोदी जी की गलतफहमियां ही जिम्मेदार हैं जबकि उन्हें ठीक-ठाक, बेहतर विदेश संबंधों की विरासत मिली थी.

प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी जी सीधे नवाज़ शरीफ से मिलने उनके घर जा पहुंचे. यह उन्होंने तब किया जब उनकी पार्टी, उनकी पार्टी का पितृ संगठन, वृहद हिंदुत्व परिवार के शीर्ष नेता से लेकर विचारक और दुमछल्ले तक दिन भर पाकिस्तान को मन भर गालियां देते हैं. सारे प्रोटोकॉल ध्वस्त करते हुए पाकिस्तान जाने का दुस्साहस भला कौन भारतीय प्रधानमंत्री करेगा? वही जिसको अपने बारे में भयानक गलतफहमी होगी.

मोदी जी रूस से S-400 से लेकर सस्ता तेल तक खरीदते हैं. पुतिन को दोस्त बताते हैं लेकिन अचानक युद्ध के बीच यूक्रेन की राजधानी कीव पहुंच गये. क्या सोचकर गये थे कि पुतिन शाबासी देगा? फिर वहां जाकर ज्ञान वर्षा कर दी कि युद्ध का दौर नहीं है.

ऐसा भला कौन कर सकता है? वही जिसे अपने बारे में भयंकर गलतफहमी होगी.

‘अबकी बार ट्रंप सरकार’ नाम की बेहूदगी का जिक्र पिछली पोस्ट में कर चुका हूं.अमरीका जैसे ताकतवर देश की आंतरिक राजनीति में खुलेआम हस्तक्षेप करने की जुर्रत तो पुतिन भी नहीं करता. लेकिन मोदी जी ने किया. क्यों? क्योंकि उन्हें अपने बारे में भयानक गलतफहमी है.

मालदीव, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल और बाकी देशों के बारे में अलग से लिखने की ज़रूरत नहीं. इन सबसे हमारे संबंध पहले के मुकाबले खराब हुये हैं.

भक्तों को लगता है कि वो यहूद हैं.भारत इजराइल और मोदी जी नेतन्याहू. इसीलिए कई बार वो भारत को इज़राइल बनाने की भी कोशिश करते हैं. खासतौर से पाकिस्तान के संदर्भ में. ऐसा कौन कर सकता है? वही जो अपने साथ गलतफहमी नहीं,गलतफहमियों का भंडार लेकर चलता होगा.

मोदी जी 2014 में किस उम्मीद से शी जिनपिंग को झूला झुला रहे थे? मैं आज तक नहीं समझ सका. माओवादी, साम्राज्यवादी चीन के चरित्र को समझना इतना मुश्किल है क्या? उस आव भगत और आउट रीच के पीछे क्या वजह हो सकती है सिवाय इसके कि उन्हें अपने बारे में भयंकर गलतफहमी है.

चीन के बारे में मोदी जी और उनकी मंडली की सोच-समझ और क्रिया कलापों के बीच वही विरोधाभास देखने को मिलता है जो पाकिस्तान के संदर्भ में दिखाई पड़ता है. यह अंतर क्यों है? सिर्फ इसीलिए क्योंकि मोदी जी को अपने बारे में भयंकर गलतफहमी है.

इतनी सारी गलतफहमियों के बीच एक अच्छी बात सिर्फ यह है कि मोदी जी ने अपना मुंह नहीं खोला है. न चीन के बारे में. न अमरीका के बारे में. उन्हें पता है कि मुंह खोलेंगे तो फंस जाएंगे. इस मामले में उन्हें कोई गलतफहमी नहीं है. इसके लिए मैं उनकी तारीफ करता हूं.

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