
डॉ मुकेश कुमार-
ये हैरानी पैदा करने वाली बात है कि हिंदुत्ववादियों का एक वर्ग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मोहन भागवत पर टूट पड़ा है….वह उनकी निंदा-भर्त्सना कर रहा है….उन्हें उनकी हैसियत बता रहा है।
यही नहीं, वह उन्हें चुनौती दे रहा है और धमका भी रहा है कि अगर उन्होंने रवैया नहीं बदला तो उन्हें दरकिनार कर दिया जाएगा…..

दरअसल, मोहन भागवत ने पुणे के एक कार्यक्रम में कह दिया था कि राम मंदिर से भावनाएं जुड़ी हुई थीं, वह आस्था का प्रश्न था इसलिए वहां तक तो ठीक था मगर अब नए विवाद नहीं खड़े किए जाने चाहिए। उन्होंने ये भी कह दिया था कि कुछ लोग हिंदुओं के नेता बनने के लिए ये सब कर रहे हैं।
एक बड़ी बात उन्होंने ये भी कह दी कि देशहित में विभिन्न मतों के बीच समन्वय ज़रूरी है और जो ऐसा नहीं कर रहे वे अधर्म के रास्ते पर है। यानी उन्होंने एक तरह से उग्रपंथियों को अधर्मी कह दिया और ये उन्हें बुरी तरह से चुभ गया।
भागवत के इन वचनों के बाद ही उग्रपंथी हिंदू उन पर टूट पड़े, उन्होने उनके ख़िलाफ मुहिम चला दी। सोशल मीडिया में उनकी लानत मलामत शुरू कर दी।
उन्हें लगा कि भागवत संभल की मस्जिद पर विवाद खड़ा करने वालों के साथ-साथ मोदी और योगी पर भी निशाना साध रहे हैं।
उन्हें ये भी लगा कि मंदिर-मस्जिद विवाद खड़े होने से हिंदू-मुसलमान की खाई बढ़ रही है और ये हिंदुत्व के लिए अच्छा है तो ऐसे में भागवत टांग क्यों अड़ा रहे हैं। उन्हें इनका समर्थन करना चाहिए।
वे भागवत के विचारों को मोदी पर हमले से जोड़कर भी देख रहे हैं। उन्हें लगता है कि लोकसभा चुनाव के बाद भागवत ने जिस तरह के हमले करके उन्हें कमज़ोर किया, ये भी उसी की नई कड़ी है।

बहरहाल, इस प्रसंग से साफ़ दिख रहा है कि हिंदुत्ववादी आम तौर पर आरएसएस को अपना नेता मानते हैं, उसे वैचारिक और राजनैतिक प्रेरणा का श्रोत मानते हैं।
लेकिन उसका एक तबका उग्रपंथी हो गया है और वह अब नफ़रत और हिंसा को बढ़ाना चाहता है। उसे लगता है कि इसी रास्ते से मोदी मज़बूत होंगे और हिंदू राष्ट्र का सपना भी साकार होगा।
अब सवाल उठता है कि क्या उग्र हिंदुत्व की लहर आरएसएस और भागवत को किनारे फेंक देगी या फिर उन्हें उग्रपंथियों के सामने सरेंडर करना पड़ेगा…..
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