मोलिटिक्स एप एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है, जिसमें कई वर्कर से काम लिया लिया गया लेकिन जब पेमेंट मांगा जा रहा है तो इस एप के प्रबंधन द्वारा दिया नहीं जा रहा है।
मोलिटिक्स एप को बेहतर बनाने के लिए बिहार में एक टीम का गठन किया गया। उस टीम से तीन महीनों तक वीडियो कंटेंट अपलोड करवाया गया। बिहार टीम के लोग हर संभव आपराधिक, राजनीतिक और सामाजिक वीडियो कंटेंट अपलोड करते थे। लेकिन जब अपना मेहनताना मांगा जाता है तो एप के निदेशक नीरज झा आग बबूला हो गए और टीम के मेंबर से बदतमीजी से बात करने लगे।
एक दिन बिहार टीम के मेंबर ने ग्रुप में ही एप के निदेशक नीरज झा के विरुद्ध लिखना शुरू कर दिया। इसके बाद अपने साथियों और कर्मियों का मेहनताना देने की बजाय एप के निदेशक नीरज झा खुद से ही व्हाट्सप्प ग्रुप से लेफ्ट हो गए। इस ग्रुप का निर्माण भी नीरज झा द्वारा किया गया था।
आरोप है कि मोलिटिक्स एप के निदेशक नीरज झा बिहार टीम के मेंबर्स पर कई किस्म के अनैतिक दबाव बनाते हैं। रेवेन्यू के लिए काम करने का दबाव बनाते हैं। हर महीने पैसा लाने का टारगेट देते हैं। इसी बात से टीम के मेंबर गुस्सा में आ गए। कुछ स्क्रीनशॉट यहां साझा कर रहा हूँ-









एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.
इस मुद्दे पर मॉलिटिक्स की तरफ़ से नीरज झा द्वारा जो पक्ष भेजा गया है वह इस प्रकार है-
Molitics एप्लीकेशन एक स्वतंत्र प्लेटफार्म है। किसी अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म की तरह ये भी कार्य करता है। आलोक नाम के एक व्यक्ति ने मुझसे संपर्क साधा और कहा की मुझे कोई भी काम दे दीजिए, बड़ा परेशान हूं। बकौल आलोक, बिहार में उसके पास टीम थी। संस्थान ने बिहार में एप्लीकेशन के विस्तार के लिए आलोक को हायर किया।


आलोक के ऑफर लेटर में उनके काम और उनकी पेमेंट की डिटेल थी। टीम मेंबर्स की पेमेंट की शर्तों का काग़ज़ भी आलोक के साथ गूगल ड्राइव पर शेयर किया गया। आलोक का काम उस टीम को मैनेज करना और शर्तों को पूर्ण कराना था। ये प्रोजेक्ट दो महीनों का था। मिड-जून से शुरू होकर ये मिड-अगस्त तक चलना था। पाक्षिक पेमेंट होनी थीं। लेकिन नियम और शर्तें पूर्ण नहीं की गईं।
कागजों के मुताबिक टीम या आलोक मानदेय के हकदार नहीं थे। फिर भी हमने सबसे बात की। और आलोक को मिड-जून से मिड-जुलाई तक की सैलरी भी दी और बाकी टीम मेंबर्स को भी। टीम ने और आलोक ने ये भरोसा दिया कि अगले महीने सारी शर्तें पूर्ण होंगी। वो फिर नहीं हुईं। लेकिन फिर भी टीम मेंबर्स को पेमेंट किया गया।
आलोक को आंशिक पेमेंट किया गया और एक उनके मानदेय के संबंध में मीटिंग के लिए कहा गया – मौखिक तौर पर भी और लिखित तौर पर भी। लेकिन इस बात का कोई जवाब वो देते नहीं। इसका मुख्य कारण ये हो सकता है कि झूठ बोल देना आसान है। लेकिन उसे डिफेंड करना बहुत मुश्किल।
आपके द्वारा ज्ञापित ख़बर में दो अलग-अलग व्हाट्सएप ग्रुप्स के स्क्रीनशॉट हैं। एक ग्रुप जो आलोक ने बनाया था और दूसरा जो बिहार के एक अन्य पत्रकार ने बाद में बनाया था। नए ग्रुप में आलोक को नहीं जोड़ा गया। ये बताने का प्रयोजन ये था कि मैंने ग्रुप का निर्माण नहीं किया था, जैसा कि आपकी ख़बर में लिखा है। न ही मैंने ग्रुप लीव की है।





