संजय कुमार सिंह
द हिन्दू और द टेलीग्राफ की खबरों के अनुसार, वाणिज्य मंत्रालय ने कहा है, भारत अमेरिकी टैरिफ से संबंधित कदमों का ‘अध्ययन’ कर रहा है। देशबन्धु में छपी खबर के अनुसार राहुल गांधी ने कहा है, अमेरिका से दोबारा बात-चीत नहीं कर सकते हैं (नरेन्द्र) मोदी। इसके बावजूद आज कई अखबारों की लीड का शीर्षक है, ट्रम्प ने और बढ़ाया टैरिफ, 15% किया। संपादकों को पता है कि ट्रम्प ने मनमाने टैरिफ की घोषणा की थी, भारत पर रूस से तेल नहीं खरीदने का बेजा शर्त लगाया था और भारत ने अमेरिका के साथ जल्दबाजी में करार किया था। इस करार के कारण (या इसके बाद में) राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कंप्रोमाइज्ड हैं। ट्रम्प के टैरिफ बढ़ाने के बाद कहा है, नरेन्द्र मोदी अमेरिका से दोबारा बात नहीं करेंगे। द हिन्दू की खबर के अनुसार वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने शनिवार को बयान जारी करके कहा है कि उसने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नोट कर लिया है। अखबार ने यह नहीं लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर ट्रम्प की प्रतिक्रिया को भी नोट कर लिया है लेकिन बहुत संभावना है कि यह विज्ञप्ति इसी खबर के कारण जारी की गई होगी। फिर भी, खबर के अनुसार, बयान में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि अमेरिका के साथ भारत के अंतरिम करार का क्या होगा। खबर के अनुसार, सरकार ने कहा है कि टैरिफ पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के कल के फैसले को नोट किया है और कहा है कि (भारत पर) इनके प्रभावों के लिए हम इस पर नजर रख रहे हैं। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भारत में कोई भी यही कह और सोच रहा होगा कि अमेरिका के साथ भारत को करार करने की जल्दी क्या थी और अगर थी तो क्यों? सरकार इसका जवाब नहीं देना चाहे तो न दे लेकिन राहुल गांधी का आरोप संपादकों को पता है। इसके बावजूद आज मेरे 10 में से चार अखबारों ने कहा है, ट्रम्प पलटे; भारत समेत सभी देशों पर 15 प्रतिशत टैरिफ लगाया। इनमें पहले वाला नवोदय टाइम्स का शीर्षक है और दूसरा वाला दैनिक भास्कर का। बाकी के अखबारों में हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस हैं। यहां यही खबर लगभग एक जैसे शीर्षक के साथ लीड हैं।
हम जानते हैं कि अमेरिका में ट्रम्प जितने लोकप्रिय और प्रभावशाली हों, राजा नहीं हैं। मनमानी नहीं कर सकते हैं और सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से उनके फैसले को खारिज कर दिया है। इसके बावजूद डोनल्ड ट्रम्प अपनी पर अड़े हैं और पहले 10 फीसदी फिर 15 प्रतिशत टैरिफ की घोषणा की। इसमें घोषित करार का क्या होगा – यह न तो सरकार बता रही है ना मीडिया के लोग जानने की कोशिश करते दिख रहे हैं। जो बताया जा रहा है वही लिख दे रहे हैं और इसमें विपक्ष के नेता राहुल गांधी के (बेहद गंभीर) आरोपों का कोई मतलब नहीं है। दूसरी ओर, सरकार राहुल गांधी को बदनाम और देश विरोधी आदि साबित करने के लिए अपनी ओर से प्रयास कर रही है। अखबारों की भूमिका न तो निष्पक्ष है और ना सत्ता के खिलाफ जैसा अपेक्षित है। इनमें से कई सीधे-सीधे सत्ता की सेवा में लगे हैं और यह इनकी खबरों से दिख रहा है। एबीपी लाइव डॉट कॉम की खबर के अनुसार, ‘पीएम मोदी फिर से करेंगे सरेंडर…’। आप समझ सकते हैं कि सरकार शक के घेरे में है। कंप्रोमाइज्ड होने के आरोप के साथ देश हित में काम करती नहीं दिख रही है। उल्टे विपक्ष के नेता को न सिर्फ बदनाम किया जा रहा है सरकार समर्थकों की ओर से गोली मारने की धमकी दी गई है और सिर्फ विपक्ष के नेता को नहीं, निष्पक्ष भूमिका निभाने वाले पद पर बैठे ओम बिरला की पक्षपात का विरोध करने वाले विपक्ष के सभी सांसदों को। सत्तारूढ़ दल की ओर से हिंसा, हत्या की धमकी वाली इस राजनीति को रोकने के लिए कुछ नहीं किया गया। मीडिया (यानी समाज) में चिन्ता भी नहीं दिखी। उल्टे, एआई सम्मलेन का विरोध करने की युवक कांग्रेस की कार्रवाई को देश को बदनाम करने वाला करार दिया गया और इसे राहुल गांधी के घर पर रची गई साजिश करार दिया गया। कायदे से इसकी सूचना नहीं होने और होने पर भी रोकने के लिए कार्रवाई नहीं करने पर किसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। उसके बाद ही प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। इसका कारण यही है कि प्रदर्शन करना तो हक है, खुफिया जानकारी नहीं मिलना या मिलने पर कार्रवाई नहीं करना गंभीर मामला है।
दूसरी ओर, युवक कांग्रेस, और राहुल गांधी पर आरोप लगाए जाने का असर (अगर जो हुआ वह योजना का भाग नहीं था तो) यह हुआ कि सरकार और उसकी नीति के विरोध को सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी का विरोध बना दिया गया और राहुल गांधी को बदनाम और अयोग्य साबित करने के प्रयासों के साथ उनके खिलाफ हिंसा की कार्रवाई भी शुरू कर दी गई। जवाबी कार्रवाई या बचाव में लगी चोट के लिए फिर कांग्रेस को बदनाम करने की कोशिश की गई। लेकिन खबरें कायदे से नहीं छपीं। विपक्ष का बात तो पहले पन्ने पर होती ही नहीं है। आज भी नहीं के बराबर है। अमेरिका में जो हो रहा है उसके जवाब में भारत को क्या करना है उसे तुरंत तय कर पाना संभव नहीं भी हो तो इसे स्वीकार करने, बताने में क्या दिक्कत है और अगर सरकार नहीं बता रही है तो अखबार क्यों नहीं बता रहे हैं और सरकार के पास कहने के लिए कुछ नहीं है तो विपक्ष के नेता के आरोप को क्यों छिपाया जा रहा है। अमर उजाला की सेकेंड लीड का (उप) शीर्षक तो यही है कि ट्रम्प ने 10 फीसदी टैरिफ की घोषणा एक दिन बाद बदली …. 150 दिन तक लागू रहेगा। जाहिर है, भारत के अखबार भारत में लोगों को अमेरिका की बात और चाल बता रहे हैं। भारत के लोग जो जानना चाहेंगे या उन्हें जो बताया जाना चाहिए उसे होते हुए छिपा रहे हैं। होते हुए से मेरा मतलब है कि है तभी तो द हिन्दू ने छापा है। लेकिन मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए अमर उजाला ने नरेन्द्र मोदी की कही एक अलग बात को लीड बनाया है। शीर्षक है, विकसित भारत के लिए देश में बनी चिप होना बेहद अहम।
कहने की जरूरत नहीं है कि एआई समिट में गलगोटियापने के कारण जो सब हुआ उससे आगे बढ़कर या उसे छोड़कर अब प्रधानमंत्री यह कहने, दिखाने प्रचारित करने की कोशिश कर रहे हैं कि वे देश में चिप बनाने की कोशिश कर रहे हैं, उसपर उनका ध्यान है आदि आदि। लेकिन हाल में स्क्रॉल डॉट इन की जांच के आधार पर केंद्र सरकार द्वारा टाटा ग्रुप के सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट्स के लिए ₹44,000 करोड़ से अधिक की सब्सिडी को मंजूरी दिए जाने के कुछ ही हफ्तों बाद, टाटा समूह ने भारतीय जनता पार्टी को ₹758 करोड़ का चंदा दिया। यह चंदा इलेक्टोरल ट्रस्ट के माध्यम से अप्रैल 2024 में दिया गया था जो 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले दिया गया सबसे बड़ा कॉर्पोरेट चंदा था। ना खाउंगा, ना खाने दूंगा के बाद यह सब हो रहा है, आरोप लग रहे हैं उसपर सुनवाई नहीं कार्रवाई नहीं, 272 विशिष्ट नागरिक से लेकर भारतीय जनता पार्टी के लोग भी इसपर मुंह सिल लेते हैं और राहुल गांधी को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। अब तो मामला हिंसा की ओर भी बढ़ रहा है। उन्हें देशद्रोही कहकर न सिर्फ अपमानित किया जा रहा है उनके खिलाफ मुकदमे चलाकर उन्हें परेशान भी किए जाने के उदाहरण हैं। अगर राहुल गांधी को छोड़ भी दिया जाए तो सोनम वांगचुक, कन्हैया और जेएनयू के दूसरे प्रतिभाशाली छात्रों के साथ सरकार और अदालतें जो कर रही है वह कम चिन्ताजनक नहीं है। फिर भी इस या ऐसी सरकार का समर्थन मीडिया कर रहा है जिसे वाच डॉग माना जाता है या जिसकी भूमिक वाचडॉग की होनी चाहिए।
मुझे लगता है कि रोज बदलती अमेरिकी स्थिति में अभी जल्दबाजी में कुछ करने की जरूरत नहीं है और सरकार कुछ कहने की स्थिति में नहीं है लेकिन यह खबर नहीं है। खबरें ऐसी दी जा रही हैं जैसे सिर्फ ट्रम्प मनमानी कर रहे हैं हम तो उनके आगे मजबूर हैं और इसीलिए राहुल गांधी कंप्रोमाइज्ड कह रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री अपना काम करने की बजाय चुनाव जीतने में ही व्यस्त रहते हैं और अखबारों में ज्यादातर अनुकूल खबरें ही छपती हैं। निशिकांत दुबे और किरेन रिजिजू जैसे सांसद देश और सरकार के लिए काम कर सकते हैं या नहीं और कर रहे हैं कि नहीं मैं नहीं जानता, पर वे सत्तारूढ़ पार्टी के लिए काम कर रहे हैं। विपक्ष के नेता के बारे में जो सब कह रहें हैं वह सच हो तो सरकार को कार्रवाई करनी चाहिए लेकिन कार्रवाई नहीं हो रही है आरोप लग रहे हैं। दिलचस्प यह है कि सरकार कांग्रेस को भ्रष्ट तो कहती है और अभी भी बोफर्स सौदे की बात करती है लेकिन कांग्रेस के किसी नेता को सजा नहीं दिला पाई। राहुल गांधी के मामले में कार्रवाई कितनी तेजी से और किस मामले में हुई हम सब देख चुके हैं।
लीड और सेकेंड लीड की इन खबरों के अलावा आज जो खबरें बात करने लायक हैं उनमें दि एशियन एज की लीड अलग है। शीर्षक है, भारत और ब्राजील ने रेयर अर्थ डील पर दस्तखत किए; 30 बिलियन के वार्षिक व्यापार पर नजर। मोटे तौर पर मामला यह है कि भारत करार पर करार किए जा रहा है। अमेरिका वाले को छोड़ भी दें तो ईयू के साथ करार हुआ, फिर फ्रांस के साथ हुआ अब ब्राजील के साथ खबर है। इतने करार हो ही रहे हैं तो अमेरिका के साथ जल्दी क्यों थी और ये करार पहले क्यों नहीं हुए। और अब क्यों लगातार हुए जा रहे हैं इस पर कोई खबर नहीं है। स्पष्ट है कि अखबारों में खबरों को प्राथमिकता हेडलाइन मैनेजमेंट के लिहाज से मिलती या दी जाती हैं। इसलिए आज के अखबारों में इंदौर में कांग्रेस और भारतीय जनता युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं द्वारा एक दूसरे पर पत्थर फेंकने की खबर को कम महत्व मिला है। नवोदय टाइम्स में यह खबर तीन कॉलम की है। चार कॉलम का बॉटम बताता है कि भारत के एक मंत्री के दावे के अनुसार, 86 देशों ने एआई समिट में भारत के दृष्टिकोण का समर्थन किया। मुझे लगता है कि भारत का कोई दृष्टिकोण है ही नहीं, और है तो उन सबका होगा ही जिनके साथ हाथ उठाए प्रधानमंत्री की फोटो छपी थी। जो भी हो, खबर तो सरकारी ही है। आज द हिन्दू और टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर एक महत्वपूर्ण खबर है। इसके अनुसार 9 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश में एसआईआर के बाद आठ प्रतिशत मतदाता हटा दिए गए हैं। यह कोई वोटर छूटे ना के चुनाव आयोग के प्रचार के बावजूद है। चुनाव आयोग ने एसआईआर को मुश्किल बनाने के पीछे यह तर्क दिया था कि वह किसी विदेशी को मतदाता नहीं बना सकता है। अब अगर आठ प्रतिशत मतदाता रह गए तो जाहिर है सब विदेशी नहीं होंगे और बहुत सारे लोग किसी न किसी कारण से छूटे हैं जो नहीं छूटने चाहिए थे। इससे साबित होता है कि मामला शर्तों का नहीं, प्रक्रिया का भी है और विदेशी को मतदाता बनाने से बचने के लिए नागरिकों को भी मतदाता बनने से रोक दिया गया है। एसआईआर का यही मकसद शुरू से कहा जाता रहा है। एक खबर यह भी है कि इसके बावजूद देश के बाकी बचे राज्यों में भी एसआईआर कराने की खबर आ चुकी है। इधर गैर भाजपा सरकार वाले बंगाल में एसआईआर का मामला उलझा हुआ है। नवोदय टाइम्स की खबर के अनुसार, बंगाल के न्यायिक अधिकारियों की छुट्टियां रद्द हो चुकी हैं। कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने बैठक की। इससे पहले खबर थी, सर्वोच्च न्यायालय ने कलकत्ता उच्च न्यायालय को पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया को क्रियान्वित करने में सहायता के लिए न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति का निर्देश दिया। तब अदालत ने यह महसूस किया था कि कोई विकल्प नहीं बचा।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


