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एक प्रिंट क्रांति के 200 साल

विमल मिश्र

हॉर्निमन सर्किल की अपोलो स्ट्रीट बहुत सालों से ‘मुंबई समाचार’ मार्ग के नाम से जानी जाती है। इसके पीछे एक रोचक दास्तान तो है ही, पत्रकारिता की गौरवशाली परंपरा और एक संघर्षपूर्ण इतिहास भी है। ‘मुंबई समाचार’ भारत का सबसे पुराना अखबार है, जो अब भी निकल रहा है। अखबार इन दिनों अपनी दोहरी शताब्दी का जश्न मना रहा है।

फोर्ट के हॉर्निमन सर्कल पर गुजराती दैनिक ‘मुंबई समाचार’ की औपनिवेशिक शैली की लाल ईंटों वाली दोमंजिली इमारत आस -पास की भव्य और बुलंद इमारतों के बीच सबसे अलग दिखाई देती है। आने वाले दिनों में इसकी सज – धज और निराली होगी, क्योंकि यहां से निकलने वाले अखबार ने पिछली 1 जुलाई को अपने दोहरी शताब्दी वर्ष में कदम रख दिया है। दो सदी बाद भी अखबार के तेवर भी वहीं हैं और पत्रकारिता की शैली भी और यह उसी जगह से निकल रहा है, जहां शुरू हुआ था। ‘मुंबई समाचार’ (पहले ‘बॉम्बे समाचार’) 1 जुलाई, 1822 में शुरू हुआ था और आज तक निकलते रहने वाला भारत ही नहीं, कदाचित समूचे एशिया का सबसे पुराना अखबार है। गुजराती के सबसे लोकप्रिय दैनिकों में एक। गुजरातियों और पारसियों की जुबान पर चढ़ा इसका लाड का नाम है ‘मुंबई ना समाचार’।

फोर्ट में पसरी ऐतिहासिक इमारतों के बीच ‘मुंबई समाचार’ की इमारत ‘रेड हाउस’ के नाम से जानी जाती है और उन्हीं की तरह हेरिटेज इमारत भी। खुद हॉर्निमन सर्किल अपने नामकरण के लिए रेड हाउस से ही निकले अंग्रेजी अखबार ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ के संपादक बेंजामिन गई हॉर्निमन का ऋणी है।

गुजराती भाषा में पत्रकारिता की नीव रखने का श्रेय ‘मुंबई समाचार’ को ही जाता है, जो 19वीं सदी के शुरुआती दशकों में निकला मुंबई का पहला भाषाई अखबार था। निकाला था पारसी विद्वान और धर्मगुरु फर्दून्जी मर्जबान ने, जिन्हें हम सहज ही पश्चिमी भारत में देसी पत्रकारिता का जनक होने का दर्जा दे सकते हैं। गुजराती भाषा के संवर्धन के लिए फर्दून्जी ने 1812 में देसी प्रिंटिंग प्रेस लगाया था, जिसमें वे गुजराती भाषा का साहित्य प्रकाशित करते रहे। 1814 में पहली बार यहीं से गुजराती में ही एक कैलेंडर भी छपा। पर प्रेस लगाने के पीछे फर्दून्जी का मुख्य उद्देश्य था अखबार निकालना। मुंबई उन दिनों तेजी से देश की कारोबारी राजधानी बनने की ओर चल पड़ा थी। फर्दून्जी उन पहले लोगों में से थे, जिन्होंने उद्याग – धंधे के विस्तार में देसी भाषाओं का महत्व समझा।

संघर्षों से बनाया मुकाम

10 इंच लंबा, आठ इंच चौड़ा क्वार्टो साइज और 14 पन्ने – ‘बॉम्बे समाचार’ सबसे पहले निकला एक साप्ताहिक पत्र के रूप में। पहले पन्ने पर संपत्ति की खरीद – फरोख्त की जानकारियां, खो गए हुए माल की सूचना और छोटे-छोटे विज्ञापन। भीतरी पन्ने पॉवर ऑफ एटॉर्नी, सरकारी और अदालती नियुक्तियों, बंदरगाह पर जहाजों के आवागमन और उनमें भराई व उतराई की सूचनाओं के साथ यूरोपीय नागरिकों की मृत्यु, शंघाई में पारसियों के अफीम के व्यापार की रपट और कोलकाता और मद्रास से आने वाली खबरों से भरे होते थे। साथ में एक ‘संपादकीय’ भी होता था। अखबार की पहली प्रसार संख्या थी महज डेढ़ सौ। 1832 तक यह साप्ताहिक और 1855 तक पाक्षिक के रूप में छपा। फिर दैनिक हो गया। टैग लाइन थी ‘अवाल दैनिक, निष्पक्ष दैनिक’।

स्थापना काल के बाद 80 वर्षों तक ‘मुंबई समाचार’ का संचालन पारसी पुरोहितों के हाथ में रहा। इस दौरान अखबार कई बार भीषण आर्थिक संकट से गुजरा। महानगर के मशहूर कामा घराने की कामा नॉर्टन ऐंड कंपनी इसे अखबारी कागज और छपाई की स्याही की आपूर्ति किया करती थी। 1933 में दीवाला पिटने की नौबत आ गई और लगने लगा लगा कि अब तो बंद होना तय है। अखबार पर आश्रित पत्रकारों व अन्य कर्मचारियों की रोजी – रोटी खतरे में पड़ गई। तब अदालती दखल पर मंचेरजी कामा के नेतृत्व में कामा घराने ने ही खरीदकर इसे नया जीवन दिया। अखबार का स्वामित्व कई हाथों से होकर गुजरने के बावजूद आज तक इस पर पारसी समुदाय का ही प्रभुत्व है। कोई 40 वर्ष पहले निदेशक के रूप में इसकी कमान संभालने वाले होरमुसजी कामा को ‌विश्वास है कि दोहरी शताब्दी की तरह ‘मुबई समाचार’ अपनी तिहरी शताब्दी का जश्न भी मनाएगा – तब, जब शायद नई तकनीकों के सामने ने प्रिंट मीडिया ही अपना अस्तित्व गंवा बैठेगा। अखबार के मौजूदा संपादक हैं नीलेश एम. दवे।

परंपरा और नवीनता का संगम

दैनिक 8 पृष्ठों का और रविवार को 12 पृष्ठों का परिशिष्ट। आज मुंबई, गुजरात, बंगलुरू और नयी दिल्ली सहित विभिन्न कार्यालयों में ‘मुंबई समाचार’ के 200 से अधिक कर्मचारी हैं। स्थापना के समय से ही इसकी संपादन नीति सनसनीखेज समाचार के बजाय निष्पक्ष, ईमानदार और संतुलित ढंग से घटनाओं के प्रस्तुतिकरण की रही है। भारत के मुक्ति संग्राम में उसकी अहम भूमिका रही है और महात्मा गांधी और वल्लभ भाई पटेल जैसे नेताओं से विशेष संबंध। अखबार की सामग्री में परंपरा है तो नवीनता भी। निष्ठावान पाठकों को इस बात का श्रेय जाता है कि आर्थिक संकट से जहां बड़े अखबार भी अस्तित्व के संकट के जूझ रहे हैं महंगी कीमत के बावजूद ‘मुंबई समाचार’ मुनाफा कमा रहा है। इसकी एक वजह है अखबार की कल्पनाशील योजनाओं को भी है, जिनमें शामिल हैं साहित्यकारों व पाठकों के बीच सीधे संवाद, पाठकों के लिए कथा, काव्य और गायन की प्रतियोगिताएं, पुस्तकों की वार्षिक प्रदर्शनी (जिसमें एक से डेढ़ करोड़ रुपये की पुस्तकें नि:शुल्क वितरित की जाती हैं) और प्रायोगिक तौर पर गुजराती सामग्री के पहले पृष्ठ का देवनागरी में मुद्रण जैसे कार्यक्रम। ‘मुंबई समाचार’ का पंचांग गुजराती का सबसे लोकप्रिय पंचांग है, उसी तरह जैसे ‘कालनिर्णय’ मराठी और अन्य भाषाओं में है। मुद्रण की आधुनिकतम टेक्नलॅजी के साथ अखबार के मैनेजमेंट ने नई मशीनों के साथ डेढ़ सदी पुरानी छपाई मशीनों को भी इमारत के अंतरंग हिस्सों में बहुत प्यार से उसी रूप में संजो कर रखा हुआ है। बिल्डिंग के बाहर पार्किंग में आपको मालिकों की विंटेज कारें दिखाई देंगी।

विमल मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार
मुंबई
[email protected]

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