मुसलमानों को आप नामसमझ समझते हैं क्या?

प्रभात रंजन दीन

तहज़ीब-ओ-तमद्दुन का शहर लखनऊ… अरे छोड़िए सब बेकार बातें हैं। देश, संविधान और शहर का जब अपने स्वार्थ में इस्तेमाल करना हो तो सारे अच्छे-अच्छे शब्द और संबोधन… लेकिन जब स्वार्थ नहीं सधे, तब देखिए लखनऊ को बदतमीजी और असभ्यता का शहर बनाने में थोड़ी भी देर नहीं लगती। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ हिंसा के जरिए देश को जिस विद्रूप स्थिति में बदलने की कोशिशें हो रही हैं, उसके लिए विकृत-दिग्भ्रमित मानसिकता का मुसलमान, मक्कार दिमाग के नेता, एकपक्षीय-धर्मनिरपेक्षता की मनोवैज्ञानिक आत्मरति के लती (एडिक्ट) लोग और मूर्ख-मीडिया जिम्मेदार है।

मैं पूरी जिम्मेदारी, जानकारी, अनुभव और हिंसा फैलाने वाली भीड़ में घुस कर उनकी आपसी बातें सुन-समझ कर लिख रहा हूं। इसमें मैं धर्मनिरपेक्षता की आत्मरति के ‘एडिक्ट’ लोगों को थोड़ा अलग इसलिए रखता हूं, क्योंकि ये बीमार हैं, रोग-ग्रस्त हैं, ‘हैलूसिनेशन’ (hallucination) में जीने वाले लोग हैं… ये अलग एक ‘मेडिकल-केस’ हैं। इन्हें पता ही नहीं कि ये देश-समाज का कितना नुकसान कर रहे हैं। इन्हें न पढ़ने से मतलब है न समझने से। इनसे बातें करिए, इनकी प्रतिक्रियाएं देखिए, आपको साफ-साफ लगेगा कि इनकी अपनी कोई मौलिकता नहीं है। इनकी आंख बस देख रही है… देखने का इनके दिमाग से कोई लेना-देना नहीं। दृश्य को सामने रख कर उसे समझने और उसका सिरा और छोर तलाशने की इनकी क्षमता नष्ट हो चुकी है। छद्म धर्मनिरपेक्ष, छद्म प्रगतिशील, छद्म बुद्धिजीवी और छद्म मानवाधिकारवादी जमात असलियत में आदमखोरों (Cannibal Apocalypse) की जमात में तब्दील हो चुकी है।

यह मानसिक तौर पर बीमार और विकृत लोगों की भीड़ है जो अपने ही देश को खा रही है। यह प्रजाति खुद को राजनीति से अलग बताती है, लेकिन एक खास राजनीतिक दिशा में ही जाती दिखती है। ‘धर्मनिरपेक्ष-प्रगतिशील-बुद्धिजीवी-कलाकार’ जैसी शब्दावलियां रच कर राजनीतिक दलों के मक्कार नेता 70 साल से अपने हित में इनका इस्तेमाल कर रहे हैं। Zombies का यह जत्था एक खास राजनीतिक दिशा की तरफ जाता दिखता है… लेकिन यह केवल जाता हुआ दिखता है। इनके विचार नहीं होते। विचार से ये वामपंथी दिखने की कोशिश करते हैं, लेकिन असल में ये होते हैं पोंगापंथी जो कभी कांग्रेस तो कभी समाजवादियों के झुंड में भी दिख जाते हैं। आप बताइए न कौन सा वामपंथी देश है जिसने बेहूदा (रैडिकल) तत्वों के लिए अपने देश को बिखरने दिया..? चीन इसका सबसे तगड़ा उदाहरण है।

चीन के नाम पर हमारे देश में माओवादी-परजीवी-बुद्धिजीवी पलते हैं और जंगल से लेकर शहर तक वैचारिक प्रदूषण फैलाते हैं। जिस चीन का तमगा टांग कर अति-वामपंथी या वामपंथी अपनी दुकान चला रहे हैं, उस चीन ने अपने देश में बेहूदा धार्मिक तत्वों और बेहूदा धर्मनिरपेक्षों की हरकतें क्या चलने दीं..? चीन के शिनजियांग प्रांत में क्या उइगुर मुसलमानों की अलगाववादी-आतंकवादी गतिविधियां चलने दी गईं..? बेहूदा धार्मिक और बेहूदा धर्मनिरपेक्षी तत्वों ने अलग-अलग देशों से चीन पर भारी दबाव डालने की कोशिश की, लेकिन क्या वे सफल हुए..? चीन में उइगुर मुसलमानों की अलगाववादी-आतंकवादी हरकतों को सख्ती से कुचले जाने पर क्या भारत के किसी वामपंथी नेता ने कभी आवाज उठाई..? एक भी वामपंथी नेता का नाम बताएं जिसने चीन के मुसलमानों की धार्मिक गतिविधियों को घर की चारदीवारी के अंदर पाबंद कर दिए जाने के खिलाफ एक शब्द भी बोला हो..?

ये नेता जब कश्मीरी पंडितों और लद्दाखी बौद्धों पर हुए अत्याचार पर कुछ नहीं बोले तो अपने फंडदाता आका चीन के खिलाफ मुंह खोलने की उनकी क्या औकात है..! पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में वहां के अल्पसंख्यकों पर हुए सिलसिलेवार अत्याचार पर इन तथाकथित वामपंथियों ने आज तक एक शब्द नहीं बोला। ऐसे ही दोगले नेता आज भारत में हिंसा फैलाने वाले मुसलमानों के पीछे खड़े हैं और उन्हें उकसा रहे हैं। या फिर सोनिया गांधी या राहुल गांधी जैसे नेता इनके पीछे हैं जिनकी खुद की नागरिकता सवालों के घेरे में है। वे यह जानते हैं कि एनआरसी से सबसे अधिक खतरा उन्हें ही है। …तो क्यों न मुसलमानों को भड़काया जाए..! आपको स्मरण दिलाता चलूं कि इसी साल अप्रैल महीने में गृह मंत्रालय ने राहुल गांधी को नोटिस जारी कर उनसे उनकी नागरिकता पूछी थी।

आठ महीने पहले जारी हुई नोटिस का राहुल गांधी ने अब तक कोई जवाब नहीं दिया है। अब राहुल क्या जवाब देंगे..! क्या वे बता देंगे कि वे ब्रिटेन के नागरिक हैं..? तब उनकी राजनीतिक दुकान का क्या होगा..? वास्तविकता यही है कि राहुल गांधी ब्रिटिश कंपनी ‘बैकोप्स लिमिटेड’ के डायरेक्टर हैं और कंपनी के वर्ष 2006 के एनुअल रिटर्न में राहुल गांधी ने खुद को ब्रिटिश नागरिक बता रखा है। वर्ष 2009 में राहुल ने ‘बैकोप्स लिमिटेड’ के निदेशक पद से खुद को अलग करने का आवेदन दिया, उस आवेदन में भी उन्होंने खुद को ब्रिटिश नागरिक ही बताया। वैसे, आपको यह भी बता दूं कि संसद की आचार-समिति (एथिक्स कमेटी) ब्रिटिश नागरिकता के सवाल पर वर्ष 2016 में ही राहुल गांधी को नोटिस जारी कर चुकी है। राहुल ने अब तक कोई जवाब नहीं दिया है। संसद की ‘एथिक्स कमेटी’ के समक्ष दो ही मामले लंबित हैं… एक राहुल गांधी का और दूसरा विजय माल्या का। है न रोचक तथ्य..!

अब राहुल अधर में हैं कि भारत की नागरिकता बताई तो विदेश की अकूत सम्पत्ति हाथ से गई। अगर विदेश की नागरिकता बताई तो राजनीति और सांसदी गई। इसके अलावा राहुल को यह भी बताना होगा कि विदेश का धन उन्होंने किन स्रोतों से हासिल किया..? अब ये दोनों तरफ से गए। राहुल और सोनिया की सांस इसी कानूनी नुक्ते पर अंटकी हुई है… इसका एक ही समाधान इन्हें दिखता है, वह है ‘केऑस’… पूरा देश भीषण अराजकता में घिर जाए, देश रसातल में चला जाए, किसी तरह से वे बचे रहें। …और भारत के बेहूदा रैडिकल तत्व पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और बर्मा (म्यांमार) से यहां आकर गैर कानूनी रूप से रह रहे करोड़ों मुसलमानों को बचाने के लिए इस अराजकता का फायदा उठाना चाह रहे हैं। मुसलमानों का लक्ष्य नागरिकता संशोधन कानून उतना नहीं, जितना राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस) है। नागरिकता संशोधन कानून तो बस एक जरिया है। इस पर इतना बवाल कर दो कि एनआरसी का मसला अपने आप शिथिल हो जाए।

दरअसल, विक्षिप्त मुसलमानों के कंधे पर बंदूक रख कर एक साथ कई निशाने साधे जा रहे हैं। राहुल-सोनिया की बेचैनी के बारे में आपको बताया। आप जानते ही हैं कि पी. चिदम्बरम को दिल्ली हाईकोर्ट मनी लॉन्ड्रिंग के धंधे का सरगना बता चुकी है। इसके अलावा कई वामपंथी नेताओं ने विदेश की दहलीज थाम रखी है। हवाला और मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए कई वामपंथी नेताओं के बड़े-बड़े बिजनेस में पैसे लगे हैं। उनके बच्चे दक्षिणपंथी पूंजीपति देशों में आलीशान खर्चीले शिक्षण संस्थानों में पढ़ रहे हैं या नौकरी कर रहे हैं। कश्मीर के अलगाववादी नेताओं का भी यही हाल है। कई बड़े चैनल कांग्रेस-वाम नेताओं के संदेहास्पद धन-स्रोतों से चल रहे हैं। कई चैनलों में धनी इस्लामिक देशों का पैसा लगा है। इस ‘कला’ में कांग्रेसी और वामपंथी माहिर हैं, उनका सत्तर सालाना अनुभव है।

इन सब नेताओं को अपने बचने की फिक्र है। समाजवादी पार्टी भी इन्हीं पार्टियों का ‘बगलबच्चा’ है। परिवार-केंद्रित और स्वार्थ-केंद्रित पार्टी का स्वयंभू अध्यक्ष अपने घर की टोटियां तक उखाड़ ले जाता हो, कभी कांग्रेस की गोद तो कभी बसपा की गोद तलाशता हो, भ्रष्टाचार के मामलों में कानूनी कार्रवाई से बचे रहें इसके लिए अपने पिता से भाजपाई सत्ताधीशों की खुशामदें कराता हो, तो ऐसे विचारहीन अवसरवादी नेता से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं कि वह जनता के व्यापक हितों के प्रति संवेदनशील और भावुक होगा..? ऐसा नेता समाजवाद के सिद्धांतों के बारे में कोई गंभीर और सार्थक समझ रखता होगा..? इसे लेकर मुसलमान भी किसी गलतफहमी में नहीं हैं। एक-दूसरे के कंधे का इस्तेमाल कर दोनों अपना-अपना फायदा उठाने की जुगत में हैं। इसीलिए मुसलमानों और सपाइयों के प्रभाव वाले इलाकों में हिंसा फैलाने का साझा कार्यक्रम चल रहा है। आप जरा गौर तो करिए..!

आप मूर्ख-मीडिया के चक्कर में न पड़ें। आप यह कतई न समझें कि मुसलमान नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) का फर्क नहीं जानता। वह बिना समझे-बूझे हिंसा पर उतारू है। ऐसा नहीं है। वह ‘इन्नोसेंट’ नहीं है। वह ‘सीएए’ और ‘एनआरसी’ का फर्क बखूबी जानता है। मुसलमान यह बखूबी जानता है कि ‘सीएए’ भारत के लोगों के लिए नहीं बल्कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में सताए गए अल्पसंख्यकों मसलन; हिन्दू, सिख, बौद्ध, पारसी, ईसाई और जैनियों को नागरिकता देने से सम्बन्धित है।

आप इस गलतफहमी में न रहें कि नागरिकता संशोधन कानून के जरिए महज 31,313 गैर-मुस्लिमों को भारत की नागरिकता दिए जाने से मुसलमान बौखलाए हुए हैं। मुसलमान यह अच्छी तरह जानते हैं कि इससे कहीं अधिक, बहुत बड़ी तादाद में पाकिस्तानी, बांग्लादेशी, अफगानी और रोहिंगिया मुसलमान भारतवर्ष में रह रहे हैं। आधिकारिक तथ्यों पर गौर फरमाते चलें, ताकि आपको सारी स्थिति साफ-साफ दिखने लगे। वर्ष 2011 की जनगणना में यह तथ्य आधिकारिक तौर पर सामने आया कि 55 लाख बांग्लादेशी और पाकिस्तानी भारत में रह रहे हैं। इस संख्या का 42 प्रतिशत हिस्सा बांग्लादेशी मुसलमानों का है और 12.7 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तानी मुसलमानों का। शेष अफगानिस्तान के मुसलमान हैं। यह आधिकारिक संख्या उन पाकिस्तानियों और बांग्लादेशियों की है, जो वर्ष 2011 के थोड़ा पहले भारत में दाखिल हुए।

सिर्फ 2011 में बांग्लादेश के करीब 25 हजार लोग भारत में घुसे और पाकिस्तान से करीब 10 हजार लोग भारत में घुसे। यह तो बात हुई आधिकारिक आंकड़े की। जबकि जमीनी वास्तविकता यह है कि अनधिकृत तौर पर करोड़ों बांग्लादेशी और पाकिस्तानी मुसलमान भारत में अवैध रूप से रह रहे हैं। वर्ष 2000 में ही यह आकलन था कि भारत में 12.5 करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठिए रह रहे हैं। हर साल तीन लाख बांग्लादेशियों की देश में आमद हो रही थी। घुसपैठियों को धड़ल्ले से वोटर बनाया जा रहा था। बंगाल में सत्ताधारी वामपंथी दल कर रहे थे और शेष भारत में कांग्रेस। कांग्रेस शासन के समय 14 जुलाई 2004 को तत्कालीन गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने संसद में बयान दिया था कि भारत में दो करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठिए अवैध रूप से रह रहे हैं, जिसमें 50 लाख 70 हजार बांग्लादेशी अकेले पश्चिम बंगाल में रह रहे हैं।

जब केंद्र में भाजपा की सरकार आई तब केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने संसद में कहा कि अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों की तादाद दो करोड़ 40 लाख है। यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं है। आधिकारिक तथ्य है कि वर्ष 2001 की जनगणना में 30 लाख, 84 हजार 826 अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों के भारत में रहने की जानकारी मिली थी। आप हैरत करेंगे कि 1981-1991 के दशक का इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट का पुराना आधिकारिक रिकॉर्ड है कि उन 10 वर्षों में हर साल करीब एक लाख बांग्लादेशी घुसपैठिए भारत में दाखिल होते रहे। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और बांग्लादेश के निर्माण के दरम्यान जिन एक करोड़ बांग्लादेशियों को भारतवर्ष में घुसने दिया गया, वह संख्या इसके अलग है। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आज इनकी संख्या कहां पहुंच चुकी होगी और यह भारत की मूल आबादी में कितना इजाफा कर रही होगी। इस संख्या में अवैध पाकिस्तानियों, अफगानियों और रोहिंगियाओं की तादाद भी जोड़ कर देखें तो आपको भयावह दृश्य दिखेगा…

बर्मा से भाग कर आए रोहिंगिया मुसलमानों को भी भारतवर्ष में मुसलमानों ने घुसाया। जहां-जहां घनी मुस्लिम आबादी है, आप वहां जाकर देखें आपको बांग्लादेशी और रोहिंगिया मुसलमान मिलेंगे। धीरे-धीरे रोहिंगिया मुसलमान कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक फैल गए। कश्मीर में तो संवेदनशील सीमा क्षेत्र में पूरी रणनीति से रोहिंगियाओं को बसाया गया है, ताकि समय पर ये पाकिस्तान की मदद में खड़े हो सकें। देश के बड़े-बड़े शहरों में रोहिंगिया मुसलमान रिक्शा चला रहे हैं, मजदूरी कर रहे हैं, कूड़ा-कचरा बीन रहे हैं, उनकी महिलाएं घरों में नौकरानी का काम कर रही हैं और सड़कों-चौराहों पर बच्चा टांगे भीख भी मांग रही हैं। यह सब खुलेआम हो रहा है, लेकिन प्रशासन चुप है। हम-आप भी चुप हैं… हमें घर में काम करने के लिए नौकरानी मिल गई है।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में ही करीब 10 लाख अवैध बांग्लादेशियों और रोहिंगियाओं के रहने की शिनाख्त हुई है। यही रोहिंगिया चोरी-चकारी से लेकर नशीली दवाओं के धंधे के पेडलर का काम कर रहे हैं और आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त हैं। रोहिंगिया महिलाएं दूसरे जरायम धंधों में भी खूब मुब्तिला हैं। दि सेंटर फॉर वोमेन एंड चिल्ड्रेन स्टडीज़ की रिपोर्ट है कि भारतवर्ष में वेश्यावृत्ति का धंधा करने वाली 10 फीसदी महिलाएं बांग्लादेशी घुसपैठिया हैं। सीईडीएडब्लू की रिपोर्ट है कि अकेले कोलकाता में 27 प्रतिशत वेश्याएं बांग्लादेशी घुसपैठिया हैं।

इस धंधे में रोहिंगियाओं के शामिल हो जाने से यह प्रतिशत और बढ़ गया है। ऐसे रोहिंगियाओं को भारतवर्ष में आधार-कार्ड, वोटर आइडेंटिटि कार्ड और पासपोर्ट तक दिलवा दिया गया है। भारतवर्ष के मुसलमान रोहिंगियाओं को पाल-पोस रहे हैं और उन्हें संरक्षण दे रहा है प्रशासन और पुलिस। नरेंद्र मोदी और अमित शाह अपनी राजनीति में लगे रहें। प्रशासन और पुलिस पैसे के लिए वेश्या बन चुकी है। यह एक कठोर असलियत है। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों में कोई गैरत नहीं। धन चाहे देश को तबाह करने के लिए मिल रहा हो, प्रशासन और पुलिस को धन मिलना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता तो क्या इस तरह गेट खोल कर अपने देश में घुसपैठियों को घुसाया जाता..? आप सोचिए कि उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के नगर निगम में हजारों सफाई कर्मी अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं।

इस बारे में यूपी के एंटी टेररिस्ट स्क्वैड (एटीएस) ने बाकायदा नगर निगम से पूछा, लेकिन एटीएस की चिट्ठी भी भारतवर्ष की भ्रष्टाचार की मुख्यधारा में कहीं बह गई। जबकि इसी साल यूपी पुलिस के मुखिया डीजीपी ओपी सिंह अवैध बांग्लादेशियों और रोहिंगियाओं को आने वाले दिनों का बड़ा खतरा बता चुके हैं। लखनऊ के पॉश इलाके गोमती नगर में बांग्लादेशी और रोहिंगिया घुसपैठियों ने कई भीषण डकैतियां डालीं। यह तथ्य ऑन-रिकॉर्ड हैं, लेकिन कुछ नहीं हुआ। लखनऊ नगर निगम को सफाईकर्मी मुहैया कराने वाले ठेकेदार सस्ते में बांग्लादेशी घुसपैठियों से काम कराते हैं और इसके लिए सरकार से मिलने वाले धन का बड़ा हिस्सा खुद खा जाते हैं। इन्हें एहसास ही नहीं कि वे धन नहीं, देश खा रहे हैं। मुसलमान इसके लिए चिंतित नहीं हैं कि आप किसे नागरिक बनाने जा रहे हैं।

मुसलमान इसलिए आग बबूला हैं कि करोड़ों अवैध मुसलमान भारत से बेदखल न हो जाएं। उनके लिए देश कोई प्राथमिकता नहीं। उन्हें धर्म के नाम पर बढ़ती कीड़े-मकोड़ों की संख्या से मतलब है, जिसके बूते वे फिर देश को तोड़ने का तानाबाना बुन रहे हैं। हैरत होती है कि भारत में घुसे रोहिंगियाओं को अवैध बताने पर सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल हो जाती है। मोहम्मद सलीमुल्ला याचिका दाखिल कर अदालत से कहता है, रोहिंगियाओं को वापस न भेजा जाए। कहां बर्मा में रोहिंगियाओं पर अत्याचार हुआ तो भारत में मुसलमानों ने मुंबई में शहीद स्मारक तोड़ डाला और लखनऊ में भगवान महावीर की मूर्ति ध्वस्त कर दी। वही मुसलमान जम्मू कश्मीर में कश्मीरी पंडितों और लद्दाखी बौद्धों के नरसंहार पर चुप्पी साध कर धार्मिक-पुण्य का मनोवैज्ञानिक-सुख लेता है और पड़ोसी देशों में वहां के अल्पसंख्यकों पर हो रहे जुल्म पर शातिराना चुप्पी साधे रहता है। उन लोगों को जब भारत में राहत देने की बात होती है तो यह बिलबिला उठता है और सड़क पर उत्पात मचाने लगता है। बेहूदा बुद्धिजीवी और फर्जी धर्मनिरपेक्ष तत्व इस नियोजित उत्पात को छात्र आंदोलन और जन आंदोलन करार देने का शातिराना षडयंत्र करता है। अब ताजा फैशन आया है बॉलीवुड के कुछ कलाकारों के भी ऐसी हरकतों में शामिल होने का।

पिछली बार ‘लिंचिंग’ पर प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर सुर्खियां बटोर लीं और इस बार देशभर की सड़कों पर हो रहे मुसलमानों द्वारा किए जा रहे उत्पात पर फिर गोलबंद होकर पुलिस को ही उल्टा अत्याचारी साबित करने लगे। कभी सम्मान लौटाने तो कभी पत्र लिखने वाले लफंगे लोग ‘लिंचिंग’ पर ‘लिम्पिंग’ करते हैं, लेकिन उन्हें कश्मीर में सुरक्षा बलों की ‘लिंचिंग’ नहीं दिखती। उन्हें पश्चिम बंगाल की ‘लिंचिंग’ नहीं दिखती, उन्हें केरल, तमिलनाडु या देश के अन्य हिस्सों में इतर-धर्मियों की ‘लिंचिंग’ नहीं दिखती। उन्हें कभी कश्मीरी पंडितों और लद्दाखी बौद्धों की ‘लिंचिंग’ नहीं दिखी। आप सोचिए कैसे दोगले हैं ये… मूर्ख मीडिया जिन्हें कलाकार या बुद्धिजीवी कह कर ‘परोसता’ रहता है, उनका नाम लेना भी अधःपतन है। एक फिल्म निदेशक अपराध और क्रिमिनल गैंग्स पर फिल्में बना-बना कर अपनी असली मनोवृत्ति अभिव्यक्त करता रहता है।

फिल्मों में ऐसी गालियां इस्तेमाल करता है, जिसे आम जिंदगी में लोग मुंह पर लाने से हिचकते हैं। ऐसा आदमी कलाकार और बुद्धिजीवी..! और मीडिया द्वारा महिमामंडित..! ऐसे कलाकार जिनकी पिछली जिंदगी में झांकें तो आपको यौन-उत्तेजना भड़काने वाले उनके फिल्मी और गैर-फिल्मी कृत्यों की भरमार दिखेगी, मीडिया उसे समाज का आईकॉन बना कर पेश करता है। ऐसे इतिहासकार जिन्होंने जीवनभर भारतीय इतिहास के अध्यायों पर कालिख पोतने का काम किया, ऐसे समाजविरोधी-देशविरोधी तत्व मीडिया की निगाह में ‘इंटलेक्चुअल’ होते हैं। इन्हें ‘स्यूडो-इंटलेक्चुअल’ या छद्मी-बुद्धिजीवी कहना भी उचित नहीं। ये असलियत में समाज के सफेदपोश अपराधी (व्हाइट कॉलर्ड क्रिमिनल्स) हैं।

यह मूल बात समझ में नहीं आती कि क्या मानवीय करुणा धर्म का भेद करके आती है..? सिखों पर बर्बरता और दोगलेपन की देश में इंतिहा कर दी गई। किस ‘लफंगे-बौद्धिक‘ ने अपना अवॉर्ड लौटाया या प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी..? तत्कालीन कश्मीर के हिन्दुओं-सिखों-बौद्धों का कत्लेआम मचाया गया और उन्हें अपने ही घर से भगाया गया, इसके खिलाफ किस ‘प्रगतिशील-लफंगे’ ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी थी..? कश्मीरी पंडितों को उनके घर वापस दिए जाएं, इसके लिए किस ‘प्रायोजित-प्रगतिशील-जमात’ ने प्रधानमंत्री से गुहार लगाई..?

पूर्वोत्तर राज्यों में बांग्लादेशियों द्वारा मचाए गए हिंसक-उत्पात के खिलाफ किस ‘कलाकार-बुद्धिजीवी’ ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा या सार्वजनिक रुदाली की..? इन ‘लफंगों’ की आंखों पर केवल एक चश्मा लगा है… इस चश्मे को उतारें तो इसमें आपको अरब की आंख दिखेगी, आपको चीन की आंख दिखेगी, आपको पाकिस्तान की आंख दिखेगी। आपको उन ताकतों की आंख दिखेगी जो भारतवर्ष में अस्थिरता (unrest) का भयानक मंजर खड़ा करना चाहते हैं। इनकी जेबों में देखें, आपको उन्हीं देशों और उन्हीं ताकतों का धन मिलेगा। जरा झांकिए तो, किन ताकतों के बूते बॉलीवुड चलता है और उन ताकतों के आगे किस तरह फिल्मी कलाकार भड़ुए बने फिरते हैं। जरा झांकिए तो, पाकिस्तानी आईएसआई का धन किस तरह भारत के वर्णसंकरों को पाकिस्तान-परस्त बना रहा है। जरा झांकिए तो, अरब का धन किस तरह पढ़े-अधपढ़े लोगों को ‘अति-इस्लामिक-व्याख्यावादी’ (Extremist-Islamist-Interpreterist) जमात में कनवर्ट कर रहा है। जरा झांकिए तो, चीन का धन किस तरह भारत में ‘कुलीनतावादी-माओवादी’ (एलिटिस्ट-माओइस्ट) पैदा कर रहा है, जो भोले-भाले अनपढ़ खेतिहर और शहरी मजदूरों के बीच ‘सर्वहारा के अधिनायकवाद’ का प्रवचन ठेलता है, समाज में जहर फैलाता है, अपने बच्चों को पश्चिमी देशों में आलीशान पूंजीवादी शैक्षणिक प्रतिष्ठानों में पढ़वाता है और वसूला गया धन विदेश के चोर-बैंकों में जमा कराता है। कश्मीरी अलगाववादियों की असलियत तो आप जान चुके हैं। उनके अकूत धन के स्रोत वही पश्चिमी देश हैं, जहां उनके बच्चे पढ़ते हैं या नौकरी करते हैं और उन्हीं देशों में वे बम फोड़ने की साजिश भी करते हैं।

भारत को भारत के लोगों ने ही सड़ाया है। इसका क्रमिक विश्लेषण हम जरूर करेंगे, इतिहास के पन्नों से होते हुए हम आपस में विचार-विमर्श करेंगे। हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन या पारसी हित की बात कहने वाले को संघी बता कर उसे खारिज करने और मुस्लिम हित की बात कहने वाले को धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील बताने के बेहूदा चलन के खिलाफ समवेत खड़ा होना होगा। जो मुस्लिम-हित की बात करता है वह मुस्लिम लीग का सदस्य क्यों नहीं..? तो Alienation की ऐसी टैक्टिस अपनाने या किसी को दरकिनार कर मतलब साधने की धूर्तता से बाज आएं। सभी धर्म-सम्प्रदाय का हित हो, तभी समेकित रूप से देश का हित होगा। धर्म और राजनीतिक-वैचारिक पूर्वाग्रह से अलग होकर भारत के एक सामान्य नागरिक की तरह सोचें, फौरन महसूस होगा कि संविधान का अनुच्छेद 370 देश के लिए कितना घातक था, बांग्लादेश-पाकिस्तान-अफगानिस्तान जैसे पड़ोसी देशों में वहां के अल्पसंख्यकों पर हो रहे त्रासद अत्याचार के खिलाफ खड़ा होना मानवीय दृष्टिकोण से कितना जरूरी था और बांग्लादेशी-पाकिस्तानी-रोहिंगियाई घुसपैठियों की भारी भीड़ से मुक्त होना अपने देश और समाज के लिए कितना जरूरी है…

लेखक प्रभात रंजन दीन वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे पटना, लखनऊ, दिल्ली में कई अखबारों के संपादक रह चुके हैं. प्रभात अपनी बेबाक लेखनी के लिए जाने जाते हैं.

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