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मुसलमानों का मुग़लों से पहले वाला इतिहास मिटा दिया गया या था ही नहीं.. पढ़ें!

सिद्धार्थ ताबिश-

न 1200 में भारत की कुल आबादी (87500000) आठ करोड़ पिछत्तर लाख थी.. जिनमे से मुसलामानों की आबादी कुल (400000) चार लाख थी. चार लाख से (320000) बत्तीस लाख मुसलमान हो गए सन 1400 में और फिर सन 1535 में (12000000) एक करोड़ बीस लाख के लगभग हो गए.. और सन 1800 तक (50000000) पांच करोड़ हो गए.

ये आंकड़े मैं सिर्फ़ इसलिए दे रहा हूँ यहाँ क्यूंकि जो ये कहते हैं कि सातवीं शताब्दी में ही यहाँ भारत में लोग धड़ाधड़ मुसलमान होने लगे थे या अरब देशों से लाखों करोड़ों की तादाद में मुसलमान आये और यहाँ के मुसलमान उन्हीं के वंशज हैं, उन्हें ये आंकड़े देखने चाहिए. 1526 में जब बाबर ने मुग़ल साम्राज्य की नींव रखी तब भारत की कुल आबादी का अनुमान (150000000) पंद्रह करोड़ के आसपास थी. उसमे मुसलमान लगभग 35 से 40 लाख के आसपास थे. और मुग़ल साम्राज्य की नींव के बाद 1535 तक एक करोड़ बीस लाख पहुँच गए.

मुग़ल साम्राज्य के आने के बाद करोड़ों मुसलमान बाबर के साथ भारत नहीं आये. जो आये वो बस कुछ सौ और हज़ार थे. बाबर की कुल सेना (1500) पंद्रह हज़ार के आसपास थी. और उन सेना में भी जो आ रहे थे उनके पूर्वज भी सन 700 के पहले सब या तो मूर्तिपूजक थे, ईसाई थे, पारसी थे या किसी अन्य धर्म के थे.

तो जब सन 1200 में आठ करोड़ पिछत्तर लाख भारतियों के बीच महज़ चार लाख मुसलमान थे तो सोचिये सन 800 या 900 में क्या हाल रहा होगा. और ये सब कोई बहुत पुरानी बातें थोड़े ही हैं. महज़ कुछ सौ सालों की बातें हैं.

अगर आप किसी भी भारतीय उच्च वर्ग के मुसलमान के घरों में पाए जाने वाला शजरा (वंशावली) देखेंगे तो पायेंगे कि ज़्यादातर वो वंशावली आपको सन 1600 से 1700 के आसपास की मिलेगी. वहीँ से भारतीय और पाकिस्तानी मुसलमानों के पुरखों के नाम और उनके बारे में जानने को मिलेगा. उस के पहले का जितना कुछ भी है, वो सब मुसलामानों के शजरों से गायब होता है. क्यूंकि उसके पहले के सब लोग हिन्दू ही थे. जहाँ तक हिन्दू वंशावली है वहां से हर उच्च वर्ग के मुसलमान की वंशावली मिटा दी गयी. ये बिलकुल वैसे ही हुआ जैसे पाकिस्तान ने अपनी किताबों में महमूद गज़नवी को अपना पूर्वज बता कर राजा दाहिर जैसों को किताबों से मिटा दिया. और इसीलिए मुझे जब भी कोई मुसलमान अपना शजरा दिखाता है तो मैं उस से मुगलों के समय के पहले वाले परदादा का नाम पूछता हूँ, तो वो कहते हैं कि उसके आगे का नहीं है. वो गायब हो गया, लिखा नहीं गया, मिट गया, चूहा खा गया, बिल्ली नोच ले गयी. इत्यादि इत्यादि.

जिस कौम के पुरखे ही उस से छीन कर, जिन्होंने उन पर हमला किया, मारा पीटा, सताया उन्हें उनका हीरो बता कर पकड़ा दिया गया, तो सोचिये वो कौम किस तरह की “आइडेंटिटी क्राईसेस” से जूझ रही होगी. जिस बाबर ने “लाहौर” जैसे शहर को आग लगा दी थी और किस तरह का ज़ुल्म वहां रहने वालों पर किया था, आज वही लाहौर वाले अपनी वंशावली से अपने पुरखों का नाम मिटा कर बाबर के साथ आये सैनिकों, गाज़ियों और लुटेरों से अपनी वंशावली शुरू करने में “गर्व” महसूस करते हैं.

कभी बाबा नानक की गुरुवाणी से “बाबरवाणी” पढ़िए… पढ़िए तो पता चलेगा कि बाबर और उन जैसे किस तरह से आपके पुरखों का कत्ले आम कर रहे थे. ऐसे नहीं सिर्फ़ कुछ ही सालों में यहाँ करोड़ों करोड़ों मुसलमान हो गए थे. इसलिए अपने पुरखों द्वारा इस्लाम अपनाने की घटना को जब कोई मुझ से बहुत इतरा के और गर्व से बताता है, तो मुझे उस पर इतनी तरस आती है कि न पूछिए. किस परिस्थिति और किस मुसीबत में उन बेचारों ने इस्लाम अपनाया होगा, ये उनकी आत्मा ही जानती होगी. आप “स्टाकहोम सिंड्रोम” वाले इसे क्या समझेंगे.

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