
संजय कुमार सिंह
आज के ज्यादातर अखबारों में राहुल गांधी को संभल जाने से रोकने की खबर तो पहले पन्ने पर है लेकिन इससे मेरठ जाने वाला एक्सप्रेस वे जाम हो गया और नाराज यात्रियों ने इसकी निन्दा की – यह खबर सिर्फ हिन्दुस्तान टाइम्स और अमर उजाला में है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने राहुल की संभल यात्रा रोके जाने की खबर तीन कॉलम में फोटो के साथ छापी है। इसका शीर्षक है, राहुल का संभल दौरा रोके जाने से दिल्ली में ड्रामा। कहने की जरूरत नहीं है कि राहुल गांधी के संभल जाने की इच्छा और कोशिश को भी ड्रामा कहा जा सकता है लेकिन किसी को स्वतंत्रता पूर्वक काम करने से रोकना ड्रामा या नाटक कैसे होगा मैं नहीं समझ पाया। और किसी की आजादी में खलल से अगर ड्रामा हो भी जाये तो खबर ड्रामा नहीं, आजादी में खलल है। खबरों की इतनी तमीज तो आम आदमी को भी होती है जो खबरों का काम कर रहा है उसे न हो – यह मानना मुश्किल है। कहा जा सकता है कि यह चाटुकारिता या जबरन विरोध न भी हो तो पत्रकारीय प्रतिभा का दुरुपयोग है। इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि हिन्दुस्तान टाइम्स ने अपनी इस मूल खबर के साथ दो कॉलम में एक खबर छापी है जिसका शीर्षक है, ई-वे पर भारी जाम से नाराज यात्रियों ने इसकी निन्दा की। कहने की जरूरत नहीं है कि जाम राहुल गांधी की कोशिश से नहीं हुआ होगा पर उन्हें आगे बढ़ने से रोकने के कारण लगा होगा। उसे अखबार ने ड्रामा लिखा है और फिर यात्रियों की नाराजगी या आलोचना को खबर बना रहा है। सड़क पर ड्रामा होगा तो जाम लगेगा ही। इसलिए, कहा जा सकता है कि हिन्दुस्तान टाइम्स ने जो हुआ उसे सही ढंग से प्रस्तुत किया है पर ऐसा किसी और अखबार ने आज पहले पन्ने पर नहीं किया है। एएनआई के हवाले से इस खबर में यह भी कहा गया है कि कुछ लोगों ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं से हाथा-पाई की। यह अमर उजाला में भी है।
यह दिलचस्प है कि यही यात्री किसानों के लिए रास्ता रोके जाने और दूसरे कारणों से जाम लगने पर नाराज नहीं होते हैं, पुलिस या किसानों से हाथापाई नहीं करते हैं लेकिन कांग्रेस कार्यकर्ताओं से करते हैं। निश्चित रूप से यह बड़ी और महत्वपूर्ण खबर है लेकिन यह मुझे आज किस अन्य अखबार में पहले पन्ने पर इतनी प्रमुखता से नहीं दिखी। वैसे तो आज की दो बड़ी खबरें सभी अखबारों में पहले पन्ने पर हैं और मैं उनकी चर्चा नहीं कर रहा हूं क्योंकि वही लीड या सेकेंड लीड है। मैं आज की तीसरी खबर की बात कर रहा हूं अखबारों में यह दिखाने की कोशिश चल रह है कि राहुल गांधी भी हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए संभल घूमने निकल जाते हैं। मेरे कहने का मतलब यह है कि राहुल गांधी संभल क्यों जा रहे थे और उन्हें क्यों दिल्ली सीमा पर या उत्तर प्रदेश में घुसने से पहले ही रोक दिया गया यह मुद्दा नहीं है। मुद्दा यह बना दिया गया है कि राहुल गांधी के संभल जाने की कोशिश से सड़क जाम हो गई। ऐसे जैसे सड़कें जाम होती ही नहीं हैं और होती हैं तो राहुल गांधी या कांग्रेस जिम्मेदार होती है। काश! इन्हीं अखबारों ने एक्सप्रेस वे जाम होने पर खबर लिखी होती। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर और इस प्रस्तुति के मुकाबले टाइम्स ऑफ इंडिया में इस खबर का शीर्षक है, संभल जा रहे राहुल और प्रियंका को यूप गेट पर रोका गया, वापस जाने के लिए मजबूर किया गया। खबर के अनुसार दिल्ली में गाजियाबाद सीमा से छह किलोमीटर दूर मयूर विहार तक जाम लग गया था। इसकी शुरुआत लगभग नौ बजे हुई थी और यह एक बजे तक चला। मुझे लगता है कि किसी को अपनी इच्छा के अनुसार कहीं (किसी शहर में) जाने से रोका जायेगा तो उसे विरोध, करने, आंदोलन करने और धरना देने का अधिकार तो है ही और इसमें अगर सड़क जाम होती है और यात्रियों को परेशानी से बचाना है तो सरकार को कुछ उपाय सोचना होगा। मीडिया वालों को भी यह बात समझनी होगी। यह संभव नहीं है कि दूसरे कारणों पर तो चुप रहें लेकिन कांग्रेस का विरोध या उसे बदनाम करने का मौका मिले तो कोई कसर नहीं छोड़ें। यहां मेरी चिन्ता कांग्रेस या भाजपा का प्रचार या दुष्प्रचार नहीं, पत्रकारिता के स्तर या पत्रकारीय नीचता का मामला है। वरना सरकार को इस मामले में राहुल गांधी को उनके घर पर ही रोकना चाहिये था। अगर ऐसा नहीं किया जा सकता है तो एक्सप्रेस वे पर गाड़ी किसी की हो, काफिला कैसा भी हो, जाम लगना तो आम है और बैलगाड़ी से लेकर खराब और आम गाड़ियों से भी लगता है और उससे बचने के लिए सरकार क्या कर रही है, ऐसी कोई खबर नहीं दिखी है।
द हिन्दू में आज पहले पन्ने पर विज्ञापन है और दो ही बड़ी खबर हैं। राहुल गांधी की खबर अंदर होने की सूचना पहले पन्ने पर है। शीर्षक है, राहुल के रास्ते में रोके गये, वापस लौटने को मजबूर किये गये। अंदर शीर्षक में प्रियंका गांधी का भी नाम है और यह खबर लखनऊ डेटलाइन से है। उपशीर्षक है, पीड़ितों से मिलने के लिए अकेले जाने की उनकी योजना भी खारिज कर दी गई तो राहुल गांधी ने उनके संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए पुलिस की निन्दा की। कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल के मार्ग में पुलिस की बैरिकेडिंग से भारी ट्रैफिक जाम लगा। टाइम्स ऑफ इंडिया ने बताया है कि जेल में बंद आरोपियों से समाजवादी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की मुलाकात कराने के लिए जेलर और डिप्टी जेलर को निलंबित किया जा चुका है। कहने की जरूरत नहीं है कि जेलर और डिप्टी जेलर ने मुलाकात करवाई तो यह उनके अधिकार क्षेत्र में रहा होगा और नहीं था तो मुलाकात करवाई ही क्यों। अगर अधिकारियों को अपने अधिकार ही नहीं पता हैं तो सरकार अभी तक क्या कर रही थी और अधिकार है तो निलंबन की कार्रवाई क्यों की गई? जो भी हो, खबर इस बारे में शांत है। अगर मामला अधिकारी के विवेक का है तो वह जेल अधिकारी से ऊपर का अधिकारी क्यों हो?
दि एशियन एज में भी यह खबर फोटो के साथ चार कॉलम में है। मुख्य शीर्षक है, राहुल संभल जाते हुए रोके गये। इसका फ्लाइंग शीर्षक है, कांग्रेस ने पुलिस की कार्रवाई को असंवैधानिक कहा, भाजपा ने इसे ड्राम कहा। हिन्दुस्तान टाइम्स ने शीर्षक में ड्राम तो कहा है लेकिन अंसवैधानिक अभी तक किसी ने नहीं कहा था। इंडियन एक्सप्रेस ने जरूर लिखा है कि राहुल गांधी ने कहा कि विपक्ष के नेता के रूप में उन्हें संभल जाने का अधिकार है। यहां भी यह खबर फोटो के साथ दो कॉलम में है। मुख्य शीर्षक का पहला हिस्सा है, राहुल संभल जाते हुए रोके गये। इंडियन एक्सप्रेस में और भी खबरें हैं जो दूसरे अखबारों में नहीं हैं और एक्सप्रेस ऐसी खबरें खासतौर से करता है। आज की इस खबर का शीर्षक है, अस्पताल में आग के 5 साल और 107 मौतें, हर बार किसी की कोई जिम्मेदारी नहीं होने की की एक ही कहानी। अखबार ने बताया है कि उसने कम से कम 5 मौत वाले अस्पताल में आग के मामलों को देखा और पाया कि सबमें एक पैटर्न है, सजा की कार्रवाई नहीं हुई है और मामले घिसटते रहते हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि दूसरे अखबार अब ऐसी खबरें नहीं के बराबर करते हैं।
यह तो हुई विशेष खबर की बात लेकिन आज इंडियन एक्सप्रेस में एक और खबर है जो टाइम्स ऑफ इंडिया में तीन कॉलम में है लेकिन कई अन्य अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। खबर के अनुसार दिल्ली पुलिस ने आम आदमी पार्टी के विधायक नरेश बलियान को वसूली के मामले में जमानत मिलने के बाद मकोका के मामले में गिरफ्तार कर लिया है। आप जानते हैं, अमर उजाला ने इस खबर को लीड बनाया था और तब मैंने लिखा था कि जिस ऑडियो के आधार पर बलियान के खिलाफ कार्रवाई हुई थी वह उनके अनुसार पुराना और फर्जी है। कोर्ट उसे सोशल मीडिया से हटाने का आदेश दे चुका है। अब खबर है कि अदालत ने बलियान को उस मामले में जमानत दे दी पर दिल्ली पुलिस ने अब उन्हें मकोका में गिरफ्तार कर लिया है। आज यह खबर अमर उजाला में पहले या दूसरे पहले पन्ने पर नहीं है। आम आदमी पार्टी का कहना है कि दिल्ली में कानून व्यवस्था की खराब हालत के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ आरोप लगाये के बाद पुलिस ने यह कार्रवाई की है जो भी हो, अमर उजाला में पहली खबर लीड थी और आज पहले पन्ने पर नहीं है यह रेखांकित करने वाली बात तो है ही। जहां तक अमर उजाला की बात है, तृणमूल नेता पार्थ चर्जी को सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्ट कहा है और यह दूसरे पहले पन्ने पर लीड है। राहुल गांधी को संभल जाने से रोकने की खबर टॉप पर फोटो के साथ चार कॉलम में है। मुख्य शीर्षक तो सामान्य है लेकिन इसका उपशीर्षक है, एनएच 9 पर लगा भीषण जाम, जनता परेशान, अब छह को जायेंगे। यहां सिगल कॉलम क खबर अलग से हैं, जाम में फंसे लोगों क कांग्रेस कार्यकर्ता से झड़प। मूल खबर तो ब्यूरो की है लेकिन इसपर स्रोत नहीं लिखा है।
नवोदय टाइम्स में यह खबर तीन कॉलम की फोटो और तीन ही कॉलम के शीर्षक के साथ तीन कॉलम में है। शीर्षक है, संभल जाने से रोके गये राहुल; उपशीर्षक है – कांग्रेस नेता बोले यह लोकतंत्र के खिलाफ है। इसके साथ सिंगल कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, “अल्पसंख्यक वोटों के लिए सपा से होड़ में कांग्रेस : भाजपा”। वैसे तो यह भाजपा नेता का बयान है और इसे कहां कैसे छापना है वह संपादकीय विवेक व आजादी का मामला है और उसपर कोई टिप्पणी बेमतलब है। लेकिन अब जब कांग्रेस भाजपा और संघ परिवार के खिलाफ बोले तो वह नहीं छपता है और भाजपा के लोग कांग्रेस के खिलाफ या उसे नुकसान पहुंचाने लायक कुछ भी बोलें उसे पूरा प्रचार दिया जाता है और चुनाव आयोग भी चुप्पी साधे बैठा रहता है तो यह याद दिलाना बनता है कि कांग्रेस अपने लिये और सपा अपने लिये काम कर रही हो सकती है। भाजपा इससे परेशान है या इसी से निपटने में लगी है उसमें दूसरे काम प्रभावित हो रहे हैं – यह सब भी खबर है और अगर भाजपा व सपा मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं तो यह होड़ नहीं है अपने-अपने क्षेत्रों या उम्मीदवारों के लिए काम करना है। अगर भाजपा ने हिन्दू वोटों पर एकाधिकार जमा ही लिया है तो होड़ अल्पसंख्यकों वोटों के लिए ही होगी और इसमें ना कुछ नया है ना अनूठा। एक साथ मिलकर चुनाव लड़ने वालों के लिए होड़ शब्द का प्रयोग भी अनुपयुक्त है लेकिन …यही आजकल की पत्रकारिता है। वैसे भी वोट पाने वाले काम करने की जरूरत उसी को नहीं होती है जिसे बहुसंख्यक हिन्दुओं के वोट के साथ ईवीएम पर भी भरोसा हो।
अमर उजाला ने अगर पार्थ चटर्जी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को (दूसरे) पहले पन्ने पर लीड बनाया है तो नवोदय टाइम्स का एक शीर्षक है, उच्चतम न्यायालय ने पूछा, क्या हो अगर पुरुषों को भी पीरियड्स हों। उपशीर्षक है, दीवानी न्यायाधीशों की बर्खास्तगी के आधार के बारे में उच्च न्यायालय ने मांगा स्पष्टीकरण। कहने की जरूरत नहीं है कि जज अगर अपने ही मामलों में स्पष्ट नहीं हैं तो भगवान से पूछकर क्या फैसला देंगे और जब भगवान (या उनका मंदिर) ही मुद्दा हो तो वे मामले से अलग क्यों नहीं हो जाते हैं और जब यह सब नहीं होता है तो 1991 के पूजा स्थल कानून की उपेक्षा करके हर पूजा स्थल का सर्वेक्षण कराने की क्या जरूरत है और जो एक बार तय हो चुका है कि 1947 की स्थिति को नहीं बदला जायेगा तो उसपर अमल करने में क्या दिक्कत है और अगर दिक्कत है तो उसे बताया जाना चाहिये नहीं तो ना जेल अधिकारी अपना काम कर सकेंगे और ना जज। जब लोया मामले में कुछ नहीं हो पाया और और क्या उम्मीद की जाये और किस दम पर?
द टेलीग्राफ में आज की दोनों खबरें तो हैं पर तीसरी, राहुल गांधी वाली सिंगल कॉलम में है। कोलकाता के अखबार के लिए शेख हसीना की खबर और राष्ट्रीय अंग्रेजी अखबार के लिए सियोल की खबर जरूरी या सामान्य हो सकती है पर मेरी पसंद का मुद्दा नहीं है। हो भी क्यों जब हिन्दुस्तान टाइम्स भी शेख हसीना का प्रचार कर रहा है या उन्हें अपना मंच दे रहा है। बांग्लादेश के मामले में भारत का रुख (दरअसल राजनीति) मुझे समझ में नहीं आ रही है। खबर छप रही है कि वहां हिन्दू प्रताड़ित हैं, प्रधानमंत्री कह रहे थे कि ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले घुसपैठ कर रहे हैं और संघ प्रमुख ने कहा है कि ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले यहां जरूरी हैं। घुसपैठ रोकना केंद्र सरकार का काम है, घुसपैठ हो रहा है के आरोप के बावजूद उसके सबूत नहीं है, वहां हिन्दू प्रताड़ित हैं पर वे घुसपैठ (या विधिवत) भारत नहीं आ रहे हैं या कितने आये इसकी जानकारी नहीं दी जा रही है। केंद्र की भाजपा सरकार महाराष्ट्र में सरकार और मुख्यमंत्री बनाने में व्यस्त है। फिर दिल्ली के चुनाव की तैयारियों में लगना है। सरकार के काम के बारे में जानना हो तो मेर तरह रोज कई अखबार बढ़ना शुरू कीजिये। हिन्दुस्तान टाइम्स की एक खबर के अनुसार आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जब विपक्ष में थे तो चंद्र बाबू नायडू के खिलाफ जांच की कार्रवाई करने वाले आईपीएस अधिकारी के खिलाफ जांच की कार्रवाई चल रही है। स्पष्ट तौर पर यह बदले की कार्रवाई है और ऐसा नहीं होना चाहिये पर हो रहा है तो छोटी सी खबर दिख रही है बाकी सब सन्नाटा है। और यही आज की पत्रकारिता है।


