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नामवर सिंह कठोर वैचारिक जकड़न के खिलाफ थे और नए विचारों को आत्मसात करने के लिए हमेशा तैयार रहते थे!

हिन्दू कालेज में प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह जी की जन्म शताब्दी पर राष्ट्रीय संगोष्ठी!

दिल्ली। हिंदू कॉलेज के हिंदी विभाग द्वारा प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह की जन्मशताब्दी के अवसर पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य नामवर सिंह के आलोचनात्मक योगदान और उनके वैचारिक सफर पर चर्चा करना था।

संगोष्ठी का उद्घाटन प्रसिद्ध कवि अरुण कमल ने किया। अपने बीज वक्तव्य में अरुण कमल ने कहा कि आलोचक सर्वश्रेष्ठ को पहचान कर रेखांकित करता है, जो यह नहीं कर सकता वह आलोचक नहीं हो सकता। कविता के नये प्रतिमान इस बात का सर्वोत्तम उदाहरण है कि अच्छी कविता को किस तरह पहचाना जाए।

अरुण कमल ने उद्घाटन सत्र में कहा कि नामवर जी अपनी आलोचना को भारतीय काव्य शास्त्र और पश्चिमी कविता विचार से तैयार करते हैं। अरुण कमल ने कहा कि नामवर सिंह बीसवीं शताब्दी के विश्व के बड़े आलोचकों में अग्रगण्य हैं। बिना विचारों के शब्द नहीं आते, कुछ खास विचार कुछ खास शब्दों को जन्म देते हैं।

उन्होंने नामवर सिंह की कृतियों इतिहास और आलोचना, हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योगदान का विस्तार से उल्लेख किया।कमल ने कहा कि श्रेष्ठ कृति वह है जो अपने समय की चेतना को सर्वाधिक तीव्रता को दर्शाए जैसे वाल्मीकि रामायण और महाभारत। आगे उन्होंने कहा कि नामवर जी अपनी आलोचना में साहित्य और समाज को इसी तरह जोड़कर देखते थे इसलिए वे अपने समय के सबसे महान आलोचक माने गए।

उद्घाटन सत्र में प्राचार्य प्रो अंजू श्रीवास्तव ने हिन्दू कालेज से प्रो नामवर सिंह के जुड़ाव की स्मृतियाँ साझा करते हुए कहा कि नामवर जी हिंदी और भारतीय साहित्य की एक शताब्दी की सबसे बड़ी उपस्थिति हैं। भले ही वे भौतिक रूप से हमारे साथ न हों लेकिन उनका विपुल लेखन और वाचिक हमारा मार्ग प्रशस्त कर रहा है। मैं जानती हूं कि वे बहुत महान अध्यापक भी थे जिनके विद्यार्थी आज भाषा और संस्कृति के क्षेत्र में अपना योगदान कर रहे हैं। प्रो श्रीवास्तव ने कहा कि नामवर जी ने अपना पूरा जीवन संस्कृति के सारस्वत कार्य को समर्पित कर दिया था।

उन्होंने हार्दिक हार्दिक प्रसन्नता व्यक्त की कि नामवर जी की जन्म शताब्दी के समारोहों की शुरुआत हिंदू कालेज से हो रही है जिसे वे अपना ही संस्थान मानते थे। उद्घाटन सत्र में विभाग के प्रभारी प्रो बिमलेन्दु तीर्थंकर ने सेमिनार की रूपरेखा रखी और अतिथियों का स्वागत किया। इस सत्र का संयोजन डॉ पल्लव ने किया।

दूसरे सत्र ‘आलोचना का सौंदर्यशास्त्र और नामवर सिंह’ में दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो गोपेश्वर सिंह और भोपाल से आए प्रो सुधीर रंजन सिंह ने विचार व्यक्त किये। प्रो गोपेश्वर सिंह ने आलोचना के क्षेत्र में नामवर के प्रदाय को विस्तार से रेखांकित करते हुए उनके मौलिक चिंतन को भी बताया वहीँ प्रो सुधीर रंजन सिंह ने नामवर जी की प्रसिद्ध कृतियों के साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए आलोचना चिंतन में नामवर के अवदान को स्पष्ट किया। पहले दिन के तीसरे सत्र में कविता, कहानी बजरिये नामवर सिंह विषय पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रो आशीष त्रिपाठी और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो शम्भु गुप्त ने नामवर सिंह की कहानी और कविता सम्बन्धी मान्यताओं का विवेचन किया।

प्रो त्रिपाठी ने कहा कि हिंदी की साहित्य सर्जना को समुचित विचार और दृष्टि के साथ शिक्षित जनों के बीच स्वीकृति दिलाने का काम नामवर जी ने किया। “कविता के नये प्रतिमान” और “कविता की जमीन” और “जमीन की कविता” जैसी आलोचना कृतियों के माध्यम से उन्होंने कविता की जनपक्षधरता को भी स्थापित किया। प्रो शम्भु गुप्त ने नामवर सिंह की आलोचना कृति कहानी नयी कहानी को नयी कहानी के सम्बन्ध में ही नहीं अपितु समूची हिंदी कहानी के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण आलोचना कृति बताया।

संगोष्ठी के दूसरे दिन के पहले सत्र में बीसवीं सदी की वैचारिकी और नामवर सिंह विषय पर प्रो. संजीव कुमार, डॉ. वैभव सिंह और प्रो. रामेश्वर राय ने सारगर्भित संवाद किया। इस सत्र के केंद्र में बीसवीं सदी की वैचारिकी और नामवर जी के आलोचनात्मक सरोकार रहे। प्रसिद्ध आलोचक डॉ. वैभव सिंह ने ऐतिहासिक नवीनता की अवधारणा को प्रस्तुत करते हुए कहा कि नामवर जी का आलोचनात्मक दृष्टिकोण केवल साहित्य तक सीमित नहीं था, बल्कि वह सामाजिक मुद्दों के मूल्यांकन का एक अनूठा तरीका था।

नया पथ के सम्पादक और चर्चित आलोचक प्रो. संजीव कुमार ने नामवर जी के मार्क्सवाद के प्रति खुले दृष्टिकोण को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि नामवर जी किसी भी प्रकार की कठोर वैचारिक जकड़न के खिलाफ थे और नए विचारों को आत्मसात करने के लिए हमेशा तैयार रहते थे।

प्रो संजीव ने कहा कि नामवर जी ने भाषा को संचार से पहले संवेदना के माध्यम के रूप में समझा। प्रो रामेश्वर राय ने अपने वक्तव्य में साहित्य, तकनीक और मानवीय संवेदना के अंतर्संबंधों पर विस्तार से चर्चा में कहा कि नामवर जी से हम सीख सकते हैं कि साहित्यकार को तकनीक और राजनीति से मुँह नहीं फेरना चाहिए, क्योंकि ये हमारे सोचने के तरीके को प्रभावित करते हैं। उनका जोर इस बात पर था कि तकनीक के शोर में भी हमें अपनी एकाग्रता और मानवीय करुणा को बचाए रखना चाहिए।

दूसरे दिन के द्वितीय सत्र में शिक्षक, संपादक और अन्वेषक नामवर सिंह विषय पर डॉ सुमन केशरी, प्रो मधुप कुमार और प्रो अनिल राय ने नामवर जी के बहुआयामी व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। प्रो मधुप कुमार ने नामवर जी की शिक्षण शैली को कठोर लेकिन व्यावहारिक बताया। उन्होंने साझा किया कि नामवर जी का ज्ञान भारतीय दार्शनिक परंपराओं में गहराई से रचा-बसा था जिसके कारण वे जटिल साहित्यिक सिद्धांतों (जैसे अभिनवगुप्त का सौंदर्यशास्त्र और मार्क्सवादी आलोचना) को विद्यार्थियों के लिए अत्यंत सरल बना देते थे।

डॉ. सुमन केशरी ने जेएनयू के अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने नामवर जी को एक ऐसा मार्गदर्शक बताया जो स्वतंत्र सोच को बढ़ावा देते थे। उन्होंने बताया कि नामवर जी ने हमेशा विद्यार्थियों को किसी एक सिद्धांत से बंधने के बजाय स्वयं के निष्कर्ष निकालने के लिए प्रेरित किया।

समापन सत्र के मुख्य वक्ता नामवर जी शिष्य और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर महेंद्र पाल शर्मा थे। प्रो शर्मा ने अपने विद्यार्थी जीवन के अनेक संस्मरण सुनाए और नामवर जी स्मृतियों को साझा किया। उन्होंने कहा कि श्रेष्ठ शिक्षक होने के साथ नामवर जी मानवीय गुणों से भरे साहित्यकार थे। इस सत्र में हिन्दू कालेज की वरिष्ठ आचार्य डॉ रचना सिंह ने अपने बचपन में नामवर सिंह के साथ व्यतीत समय को रेखांकित किया। उन्होंने नामवर जी सहज, सरल और प्रसन्न व्यक्तित्व को कभी न भूलने वाला बताया।

संगोष्ठी की संयोजक डॉ नीलम सिंह ने दो दिवसीय आयोजन के लिए सभी वक्ताओं, विषय विशेषज्ञों और श्रोताओं का आभार ज्ञापन किया। उन्होंने आयोजन में सहयोगी रहे सभी लोगों के प्रति भी कृतज्ञता प्रदर्शित की। अंत में नामवर सिंह के जीवन और कार्यों पर आधारित एक फिल्म का प्रदर्शन किया गया। हिन्दू कालेज के सुशीला देवी सभागार के भूतल में दोनों दिन एक विशेष पुस्तक प्रदर्शनी का आयोजन भी किया गया जिसमें नामवर जी द्वारा लिखित अनेक पुस्तकें थीं। आयोजन स्थल पर नामवर जी के वक्तव्यों के अनेक सुन्दर पोस्टर और चित्र भी प्रदर्शित किये गए। दो दिनों की इस संगोष्ठी में बड़ी संख्या में विद्यार्थी, शोधार्थी, शिक्षक और साहित्य प्रेमी सम्मिलित हुए।

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