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सुख-दुख

नेचरोपैथी का हेडक्वार्टर भागलपुर : (पार्ट-4)

अनिल शुक्ल-

अब फिर गंभीर रूप से बीमार हूँ। डायलिसिस शुरू हो गयी है लेकिन साथ ही नेचरोपैथी भी चालू करवाई है ताकि निकट भविष्य में डायलिसिस से मुक्ति मिल सके। बीच के 8-9 साल यद्यपि सुखमय गुज़रे। सन 2012 में ‘तपोवर्द्धन चिकित्सा केंद्र’ में 3 महीना रहकर अपनी किडनी का प्राकृतिक इलाज करवाना जैसा जीवनदायी अनुभव था, उससे कम विराट अनुभव उस शहर का दीदार करना नहीं था, बिहार के जिस शहर में यह केंद्र बसा है।

महाभारत गाथा के प्रमुख पात्रों में एक धनुर्धारी कर्ण के अंग प्रदेश के रूप में विख्यात है भागलपुर की धरती। गंगा किनारे बसे भागलपुर को जैसे प्रकृति ने अपनी गोद ले रखा हो। भागलपुर कुल मिलाकर इन अर्थों में एक सुन्दर शहर है कि एक तो प्रकृति ने इस पर जी जान से अपना सौंदर्य लुटाया है, दूसरे यहां के लोग प्रकृति की इस संरचना का सम्मान करना जानते भी हैं। प्रकृति की अभ्यर्थना को उन्होंने अपनी संस्कृति का हिस्सा बना लिया है। समूचे उत्तर भारत में ऐसी प्राकृतिक हरियाली मैंने और कहीं नहीं देखी। घरों के बाहर तो है ही, बाज़ारों में भी थोड़ी-थोड़ी दूरी पर दुकानों के सामने छोटे-बड़े पेड़ लगे हैं। दुकानदार जब अपनी दुकान खोलेगा तो उसके तत्काल बाद जाकर पेड़ में पानी देगा और उसके सामने खड़ा होकर उसके सम्मान में हाथ जोड़ेगा। हिन्दू-मुसलमान कोई इसका अपवाद नहीं। प्रकृति से प्रेम उनका सांस्कृतिक धर्म है और पेड़ों को पानी देना उनके लिए एक धार्मिक परिघटना। यही वजह है कि आम, अमरुद, रसबेरी, केले, नारियल, पीपल, नीम, पाकड़, बबूल, महुआ और न जाने किन-किन अनगिनत वृक्षों से आच्छादित है समूचा भागलपुर।

बांग्ला भाषा के उपन्यास सम्राट शरतचंद चटोपाध्याय की युवा अवस्था की कर्मभूमि रहा है भागलपुर। यहां अपने ननिहाल में उनका बचपन और यौवन बीता और यहीं से उन्होंने प्रवेशिका (हाई स्कूल के समकक्ष) की परीक्षा पूरी की । इसी शहर की छाँव में बैठकर उन्होंने ‘देवदास’ जैसे अप्रतिम उपन्यास की रचना की जिस पर हिंदी और बांग्ला की 3-3 फ़िल्मों सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं की 27 फिल्में बनी हैं। शरत के उपन्यासों और कहानियों में प्रकृति का शानदार वर्णन भागलपुर की उनकी बालपन की स्मृतियों के अलावा और क्या हो सकता है? यह भागलपुर से प्राप्त सांस्कृतिक विरासत ही है जो वसीयत बतौर उनकी कालजयी कृतियों के एक-एक शब्द रूप में प्रस्फुटित हुई है।

हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु प्रभाकर ने शरतचंद चट्टोपाध्याय की जीवनी ‘आवारा मसीहा’ के रूप में लिखी है। कैसी विडंबना है और हिंदी के लिए कैसे गौरव की बात है कि बांगला के कथा सम्राट की हिंदी में लिखी गयी जीवनी ही आज भी बांगला भाषा की भी अकेली ‘मानक’ जीवनी है। कथा शिल्पी की जीवनी के शोध के लिए विष्णु जी ने देश और दुनिया के जिन-जिन शहरों की धूल फांकी थी, भागलपुर भी उनमें शामिल है। अपनी टीवी श्रंखला के निर्माण के दौरान सन 2001 में मैंने विष्णु जी पर डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया था। फ़िल्म में अपने इंटरव्यू में उन्होंने भागलपुर के नैसर्गिक सौंदर्य का वर्णन किया है। आधे शतक से ज़्यादा का वक़्त बीत चुका था लेकिन विष्णु जी की आँखों में जैसे भागलपुर का भूगोल तब भी नाच रहा था।

भागलपुर ‘सिल्क सिटी’ कहलाता है। सैकड़ों सालों से यहाँ रेशम के कीड़ों की खेती होती रही है। कल तक यहाँ घर-घर में रेशम के करघे हुआ करते थे लेकिन आज परिदृश्य बदल गया है। अब चीन से काफी कुछ ‘आर्टीफीशियल सिल्क’ का धागा आने लगा है। भागलपुर के बाज़ारों में हर तरफ समा गया है यही कृत्रिम रेशम। चीन से शुरू होकर बरास्ता नेपाल, आंध्र और सुदूर दक्षिण भारत को पहुंचने वाला सिल्क रुट आज भी भागलपुर से होकर ही गुज़रता है।

तिलका मांझी को भागलपुर ने ही जन्म दिया था। आदिवासी विद्रोहों की श्रंखला में तिलका मांझी पहले आदिवासी नेता थे जिन्होंने ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’ के विरुद्ध विद्रोह किया। सन 1771 में तिलका मांझी ने तीर-कमान और अपने संथाल साथियों को लेकर बग़ावत का झंडा बुलंद किया था। यह हिंसक संघर्ष 14 वर्ष तक चला। तिलका मांझी को पकड़ कर जिस जगह सूली पर चढ़ाया गया, वहाँ आज उनकी स्मृति में ‘तिलका मांझी चौक’ है। यद्यपि अंग्रेज़ों और भारतीय सामंतों के गठबंधन के विरुद्ध संथालों का यह पहला विद्रोह कुचल दिया गया लेकिन आनेवाले समय में इसने आदिवासी विद्रोहों की जो झड़ी लगाई वह उन्नीसवीं शताब्दी के आख़िरी दशकों में हुए वीरसा मुण्डा के विद्रोह से लेकर बीसवीं सदी के आज़ादी बाद के झारखंडियों के स्वतंत्र राज के आंदोलन तक जारी रही।

‘तपोवर्द्धन’ में पहुँचने के बाद डॉ० जेता सिंह ने मेरी एक बार नए सिरे से जाँच की। किडनी रोग के बारे में उनकी राय और आत्मविश्वास लाजवाब था! उन्होंने अपनी कई ‘सक्सेस्ज़ स्टोरीज़’ की बाबत मुझे बताया। उस समय वहां आसपास के एक दो मरीज़ आपने किडनी का इलाज करवाने आते-जाते भी रहते थे। मैंने इन मरीज़ों से लम्बी बातचीत की। मुझे और मनीषा दोनों को आहिस्ता-आहिस्ता इस बात का भरोसा होने लगा कि यहाँ आने का हमारा फ़ैसला ग़लत नहीं था। इस भरोसे से न सिर्फ मेरा बल्कि मेरी अटेंडेंट (मनीषा )का भी नेचरोपैथी और हमारे चिकित्सक में विश्वास परिपक्व होता चला गया। यह एक निहायत आवश्यक प्रक्रिया थी जिससे हम दोनों पति-पत्नी के भीतर पुरानी लाइफ़ स्टाइल को तोड़ कर एक नयी जीवन पद्धति के प्रति आस्था जन्मी। इस नयी आस्था ने ही आगे चलकर मुझे निरोग होने में बड़ी मदद की।

यहां आकर मेरा परम्परागत खान-पान रोक दिया गया। मुझे जो ‘डाइट चार्ट’ दिया गया, उसमें सिर्फ़ तीन टाइम भरपेट पके आम और 5 बार नींबू डालकर एक गिलास शहद पानी पीना था। मुझे नमक और चीनी छोड़ने का हुक़्म हुआ। कोई 3 हफ्ते बाद ‘एम्स’ से सुझाई गयी मेरी ‘स्टेरॉयड’ दवा को किश्तों में बंद किया गया। पहले प्रतिदिन से हटाकर एक दिन छोड़कर, फिर दो दिन छोड़कर, इसके बाद तीन दिन बाद, चार दिन बाद और फिर अंततः दवा बंद कर दी गयी। ‘ब्लडप्रेशर’ मेरा पुराना मर्ज़ था (और इसीके चलते मुझे किडनी रोग हुआ था) इसकी दवा मैं 11-12 साल से खा रहा था। ‘तपोवर्धन’के शुरुआती हफ्तों के इलाज में ही मेरा ब्लडप्रेशर सामान्य से नीचे आ चुका था। जब ऐसा हुआ तो मेरी ब्लडप्रेशर की टेबलेट छुड़ा दी गयी। अब ब्लडप्रेशर 110/75 पर स्थिर हो गया। यह एक श्रेष्ठ स्थिति थी। यह सिलसिला आज 9 साल बाद भी जारी है। इसके बाद मुझे दी जाने वाली आयरन टेबलेट भी बंद कर दी गयी। हर सप्ताह मेरी खून की जाँच होती। चीज़ें तेज़ी से सुधर रही थीं।

मनीषा को लम्बे समय से यूरिक एसिड वृद्धि की बीमारी थी जिसके चलते उन्हें जोड़ों में दर्द रहता था। डॉ जेता सिंह ने उनसे भी ट्रीटमेंट लेने को कहा। मनीषा का कहना था कि एक बार उनके पति का स्वास्थ्य सुधरे तो वह भी अपना इलाज शुरू करें। इस पर डॉक्टर ने उनसे ‘केंद्र’ की रोगियों वाली ‘डाइट’ खाने और इसके सिवा कुछ भी न खाने को कहा। 2 हफ़्ते बाद मनीषा की यूरिक एसिड का ग्राफ गिरना शुरू हुआ और महीने भर में सामान्य स्तर पर आ गया। हम लोग वहां 3 महीने रुक कर इलाज कराते रहे। हम पति-पत्नी के जीवन में ‘नेचरोपैथी’ एक जादुई कला की मानिंद उभर रही थी। हम हैरान भी थे और खुश भी भी। दिल्ली लौटकर जब बेटों की डिमांड पर उनकी प्रिय ‘लाल पैथोलॉजी’ लैब’ में हमने जाँच करवाई और नतीजे लगभग भागलपुर लैब के आसपास के ही निकले तो हलाकान और परेशान बेटे भी खुशियों में भरकर सीटिया बजाने लग गए। सवाल यह उठता है कि तब 9 साल बाद कैसे मेरी किडनी दोबारा बिगड़ी?

( जारी……… ।)

आगरा के मूल निवासी अनिल शुक्ल हिंदी मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार, हिंदी जगत के जाने माने रंगकर्मी और चर्चित सोशल एक्टिविस्ट हैं.

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