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इस पत्रकार को डॉक्टर ने 90% ब्लॉकेज बताकर एंजियोप्लास्टी कर दी, जबकि दिक्कत कुछ नहीं थी

नवीन देवांगन-

मुझे कुछ दिक्कत नहीं थी आज से ठीक तीन महिने पहले डेली रुटिन में बॉडी चेकअप कराने गया था, डाक्टर ने 90 प्रतिशत ब्लाकेज बता तुरंत एंजियोप्लास्टी कर दी थी पैकेज में, पैकेज की कीमत 3 लाख थी, आज तक मुझे यह पता नहीं चल पाया है कि क्या वास्तव में 90% ब्लाकेज थी। गर हां तो मुझे किसी प्रकार की कोई दिक्कत क्यों नहीं हो रही थी, अब हर महिने 6 हजार की सिर्फ दवा खा रहा हूं।

जीवन में कई चीजें ऐसी हो जाती है कि क्या सच क्या झूठ क्या इमानदारी क्या बेईमानी फैसला करना बहुत मुश्किल हो जाता है।


इस पोस्ट पर आए कुछ कमेंट भी पढ़ें…

ब्रह्मवीर सिंह-

जब तुमने यह खबर दी कि 90 फीसदी ब्लाकेज के बाद एंजियो किया गया, तब बात हाथ से निकल गई। जो हो चुका उस पर सवाल उठाकर मरीज को टेंशन देने का कोई लाभ नहीं। सो तुमसे मैंने कुछ नहीं कहा।

दूसरा तुम मुझे जानकार और समझदार दोनों लगते रहे तो सवाल क्यों उठाना। बाकी जितना मेरा अध्ययन है उस लिहाज से 90 फीसदी ब्लाकेज के बाद दस पंद्रह सीढ़ियां लगातार नहीं चढ़ सकते। दौड़ने का प्रयास नहीं कर सकते। हांफने लगोगे।

अगर ऐसा नहीं था तो दूसरे डाक्टर से सलाह लेनी थी। खासतौर पर अगर इमरजेंसी न हो तो एक बार सरकारी अस्पताल में जाकर बिना कुछ बताए जांच करानी चाहिए। या दूसरी जगह यह बताए कि मुझे क्या प्रोब्लम है।

यह दौर ऐसा है कि इंसान पैसे के लिए कुछ भी कर रहा है। और डाक्टर तो लाशों को रखकर पैसे कमा रहे हैं। क्या ही कहें।

नवीन देवांगन-

मुझे कुछ मालूम ही नहीं चला था हास्पिटल में देर रात मात्र पत्नी थी, डाक्टरों ने उससे बात कर सीधे मुझे कैथ लैब ले गए और सीधे ऑपरेशन ही कर दिया मुझे सोचने समझने सलाह लेने का मौका ही नहीं मिला…अब क्या कहे

ब्रह्मवीर सिंह-

मैं ऐसा नहीं कहता है कि गलत हुआ। लेकिन कुछ डॉक्टर मेरे बेहद करीबी हैं और सज्जन टाइप हैं। वे ऐसी ऐसी हकीकत बयां करते हैं कि रूह कांप जाएगी सुनकर। इस वक्त समाज का सबसे गन्दा धंधा मेडिकल का है। उस लिहाज से मन में सवाल तो उठते ही हैं। लेकिन जो बीत गई सो बात गई। अब भविष्य में बेहतर क्या कर सकते हो, इस पर मंथन करना चाहिए।

विनोद दुबे-

डॉक्टर गलत हैं या उन्होंने गलत सर्जरी किया, ये कहना अब ठीक नहीं है। लेकिन मौजूदा दौर में हर प्रोफेशन में बड़ा काला धब्बा लग चुका है, मेडिकल भी इस से दूर नहीं है। बल्कि सब से ज्यादा सड़ांध वाले धंधों में से एक बन गयाहै। ये डर का धंधा है।

हमेशा सेकंड ओपिनियन जरूर लेना चाहिए, ये अपने परिवार के लोगों को भी जरूर बताना चाहिए, कि कभी ऐसी स्थिति उत्पन्न हो तो वे सेकंड ओपिनियन जरूर लें। सबसे बेहतर आयुर्वेद है, वहां जाते तो ऐसी नौबत नहीं आती। बल्कि अभी भी देर नहीं हुई है, आप आयुर्वेद भी देख सकते हैं।

प्रकाश अग्रवाल-

जो हुआ सो हुआ भले अच्छा हो या बुरा लेकिन ये बात भविष्य में आपके लिए एक अच्छा सबक है डर से ऊपर जाकर फैसला करने के लिए।

खबरीलाल-

मेरी सलाह है एक बार बेंगलुरु जाकर हार्ट के मशहूर डॉक्टर देवी शेट्टी को दिखवाते। उनका ही है नारायणा हृदयालय NH जिन्होंने रायपुर के MMI के साथ टाई अप किया है।

चाहे तो रायपुर के MMI से ओपिनियन ले सकते हो। या रायपुर के एडवांस्ड कार्डियक इंस्टीटूट जो मेकाहारा के बाजू में माँ मरही माता मंदिर के बाजू में स्थित है और इस इंस्टीटूट के हेड हैं कार्डियक सर्जन डॉ कृष्णकांत साहू।

देवेंद्र गुप्ता-

मेरे साथ भी एक घटना हुई। आज से 10 साल पहले गोल चौक डीडी नगर से मैं गुजर रहा था। सामने देखा एक बोर्ड लगा हुआ था 999 में फुल बॉडी चैकअप। ₹6000 का टेस्ट 999 में। यह स्कीम प्रतिष्ठित लाल पैथलैब की थी।

मैंने 999 में जितने टेस्ट होने से सारे टेस्ट करवाएं। उक्त टेस्ट के बाद आए रिपोर्ट में पता चला कि मेरी किडनी में समस्या है। मैने रिपोर्ट डाक्टर को दिखाया। उन्होंने महंगी महंगी दवाई लिख दी। और कई तरह के और टेस्ट लिख दिए जो मुंबई से होने थे। निजी समस्याओं का अंबार था सो किसी को यह बात बताया भी नहीं।

उस वक्त में मंत्री जी के बतौर निजी pro के रूप में कार्यरत था। पर जेब में इतने पैसे नहीं थे की महंगा ईलाज करा पाता सो मैने सबकुछ ईश्वर पर छोड़ दिया। बाकी डॉक्टर ने जो दवाई दी थी उसे पूरा खाया पर दोबारा डॉक्टर के पास नहीं गया।

मैं जानता हूं मुझे ऐसा नहीं करना था परंतु परिस्थितिजन्य ऐसा निर्णय हो जाता है। आज 10 वर्षों तक ईश्वर की कृपा बनी हुई है। बाकी कल किसने देखा है।

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