ओम थानवी-
अख़बार में छपी नीचे जो शब्दसूची है, उसे हिंदी दिवस पर मित्रवर Tribhuvan ने ‘नवज्योति’ में प्रकाशित किया है। इन पर अमल होना चाहिए। ऐसे सुझाव जब-तब पहले भी सामने आते रहे हैं। पर त्रुटियाँ दूर होतीं नहीं।
हालाँकि ‘दंपति’ वर्तनी में दिक़्क़त नहीं होनी चाहिए। तालिका की टिप्पणी में त्रिभुवनजी ने भी ‘दंपति’ को चुना है। तद्भव प्रयोग है। भाषाविद Suresh Pant बताते हैं कि होगा संस्कृत में ‘दम्पती’ शुद्ध है, पर हिंदी में द्विवचन नहीं होता इसलिए ‘दंपति’ ठीक है। आचार्य किशोरीदास वाजपेयी भी पिछली सदी में यही कह गए हैं।
त्रुटियों के मामले में मैं अपने कुछ सुझाव फिर साझा कर सकता हूँ, जो अपने कामकाज के दौरान जानता आया हूँ —
- ब्योरा सही है, ब्यौरा नहीं। न्योता, न्योछावर, त्योहार जैसे शब्दों में भी अतिरिक्त मात्रा का बोझ लादना ठीक नहीं। तबीयत वर्तनी सही है, तबियत नहीं।
- ‘वो’ हिंदी में कोई शब्द नहीं, वह/वे लिखना चाहिए। क्यूँ-क्यूँकि या यूँ-ज्यूँ शायरी में अच्छे लगते हैं, सहज हिंदी में क्यों-यों-ज्यों-त्यों लिखना बेहतर है।
- मैंने श्रेष्ठ लेखकों के लिखे में ‘यानी’ पढ़ा है, ‘याने’ नहीं।
- चार खिलाड़ी होने “चाहिएँ” — इसमें चंद्रानुस्वार ग़ैर-ज़रूरी है। चाहिए सदा चाहिए रहता है, उसका रूप नहीं बदलता। पेंच, दुनियां, नन्हें, मानों, आँटा, चाँवल, घाँस, भींगना, दहीं आदि में भी अनुस्वार यों ही धँसे हुए हैं।
- दबंग सकारात्मक शब्द है, किसी से न दबने वाले के लिए। उसे गुंडे-बदमाशों के लिए प्रयोग किया जाने लगा है। पता नहीं किस डर से। कभी डाकुओं को भी बाग़ी कहा जाता था।
- आप क्या “सोचते हो”, आपके मम्मी कहाँ “गए हैं”, मैंने फ़ोन “करा” था — इस दौर के बेहद हास्यास्पद विचलन हैं। कहना चाहिए — आप क्या “सोचते हैं”; या तुम क्या सोचते हो। इसी तरह आपकी मम्मी कहाँ “गई हैं”, मैंने फ़ोन “किया” था सहज प्रयोग हैं।
- केंद्र में (विवादग्रस्त) साहित्य अकादेमी है। हम किसी का नाम तो नहीं बदल सकते। अकादेमी लिखना चाहिए। बाक़ी अकादमियाँ ज़रूर नाम में ‘अकादमी’ वर्तनी प्रयोग करती हैं।
- राजस्थान के सरकारी कामकाज में ‘कार्रवाई’ को बाबू-अफ़सर सब ‘कार्यवाही’ लिखते हैं। जबकि भारत सरकार का वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग अपनी प्रशासनिक शब्दावली में दोनों शब्दों के अर्थ स्पष्ट कर चुका है: कार्यवाही – ongoings, proceedings; कार्रवाई – action, कार्रवाई करना – take step, handling.
- विश्वविद्यालय के कामकाज के दौरान अक्सर फ़ाइल (जिसके लिए पत्रावली शब्द अपना लिया गया है) में ‘मध्यनजर’ प्रयोग देखा। यह शायद अरबी के ‘मद्देनज़र’ का भटका हुआ रूप है। मद्देनज़र ही लिखना चाहिए।
- प्रशासन में एक प्रयोग ‘सहवन’ तो बिलकुल निरर्थक है। यह अरबी का ‘सह्वन’ शब्द है, जिसके लिए हिंदी में अनेक आसान विकल्प उपलब्ध हैं, जैसे — भूलवश, ग़लती से, त्रुटिवश या अनजाने में।
- कार्य करने या जवाब देने का ‘श्रम’ या ‘कष्ट’ करें — सरकार में यह भी विचित्र प्रयोग है। किसी ज़िम्मेदारी के निर्वाह की अपेक्षा कर रहे हैं, पत्थर तोड़ने या दर्द से गुज़रने की तो नहीं! ‘उद्यम करें’ लिख सकते हैं। अन्य विकल्प भी गढ़े जा सकते हैं।
- कुलपति कुलगुरु हो गए। लेकिन सरकारी आदेशों आदि में ‘कुलगुरू’ लिखा जाता है। असल में लोग रु और रू का भेद नहीं देख पाते।
- अनेक त्रुटिपूर्ण शब्द बरसों से दुहराए जा रहे हैं — श्रीमति, अतिश्योक्ति, अत्याधिक, अनाधिकृत, रसायनिक, विशिष्ठ, घनिष्ट, अभ्यारण्य, व्यवहारिक, सशक्तिकरण, शुद्धिकरण, सन्यास, शैया, सहस्त्र, कैलाश, आशिर्वाद, जयंति, चारागाह, अंतर्राष्ट्रीय, अभिजात्य आदि। इनके सही रूप शब्दकोश में मिल जाएँगे। कोश देखने की आदत डालनी चाहिए। मैं अच्छे कोशों की एक लंबी सूची तैयार कर साझा कर चुका हूँ।
- कुछ रोज़ पहले लिखा था कि अनेक पुंलिंग शब्दों को नाहक स्त्रीलिंग कर देने का चलन बढ़ रहा है। जैसे सामर्थ्य, मज़ाक़, मज़ार, झाड़ू, सोच पुंलिंग शब्द हैं। पीठ शब्द भी आसन या संस्था के अर्थ में पुंलिंग है जो स्त्रीलिंग हो गया, मानो शरीर या किताब वाली पीठ हो!
अखबार की ये सूची देखना न भूलें।



