सत्तर बरस के नई दुनिया अखबार को अपना संपादकीय लेख बाहरी व्यक्ति से लिखवाना पड़ रहा है!

Anil Jain : नईदुनिया के सात दशक….. नईदुनिया आज 70 बरस का हो गया। बधाई। एक पाठक के नाते इस अखबार से अपना भी लगभग चार दशक पुराना नाता है। अपन ने दो पारियों में दो अलग-अलग प्रबंधन के तहत इस अखबार में दिल्ली में रहते हुए लगभग तीन साल तक काम भी किया है। मुझे गर्व है कि इस अखबार का जो महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित कॉलम (संपादकीय) एक जमाने में श्री राजेंद्र माथुर, श्री राहुल बारपुते और श्री रणवीर सक्सेना जैसे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ चिंतक-पत्रकार लिखते थे, वही कॉलम मैंने भी वरिष्ठ पत्रकार श्री मधुसूदन आनंद और श्री आलोक मेहता के साथ कोई साढे तीन साल तक (तीन साल नईदुनिया की सेवा में और सात महीने तक नईदुनिया से बाहर रहते हुए) लिखा है और अधिकतम आजादी के साथ लिखा है।

इसी गौरव बोध के साथ मुझे अफसोस इस बात का है कि जिस संस्थान में मुझे इतना प्रतिष्ठापूर्ण काम करने का अवसर मिला उसी संस्थान के मौजूदा प्रबंधन के खिलाफ इस समय मुझे न चाहते हुए भी अदालत में संघर्ष करना पड़ रहा है। हालांकि इस स्थिति के लिए सीधे तौर पर न तो मैं जिम्मेदार हूं और न ही प्रबंधन। यह अप्रिय स्थिति आई है डेढ़ साल पहले तक इसी अखबार के प्रधान संपादक रहे भ्रष्ट और लम्पट श्रवण गर्ग की बदमिजाजी, खुदगर्जी और उनके निहित स्वार्थों के चलते। हालांकि यह और बात है डेढ़ वर्ष पूर्व श्रवण गर्ग को भी बेआबरू होकर नईदुनिया से बाहर का रास्ता देखना पड़ा।

श्रवण गर्ग ने नईदुनिया में अपने तीन वर्ष के कार्यकाल में विभिन्न संस्करणों में कार्यरत लगभग दो सौ लोगों की नौकरी से खिलवाड़ किया या उन्हें अपनी परपीड़क मानसिकता के चलते तरह-तरह से परेशान किया, जिनमें से कुछ लोग तो मेरी ही तरह अदालती लडाई लड़ रहे हैं। नईदुनिया के पूर्व प्रबंधन के दौर में ऐसी नौबत कभी नहीं आई थी। बहरहाल, यह अखबार खबरों की गुणवत्ता, भाषा और विश्वसनीयता के मामले में तेज कदमों से पतन की दिशा में कुलांचें भर रहा है। सात संस्करणों वाले इस अखबार में लगभग साढे तीन सौ पत्रकार कार्यरत हैं लेकिन अखबार को अपना संपादकीय लेख बाहरी व्यक्ति से लिखवाना पड़ रहा है। किसी भी अखबार के लिए इससे अधिक शर्मनाक स्थिति और क्या हो सकती है! यह स्थिति इस बात का आभास कराने के लिए काफी है कि अखबार में कार्यरत पदनामधारी संपादक और उनके समकक्ष लोग कितने काबिल और पेशेवर हैं। इस अखबार की पतनगाथा से जुडे किस्से तो और भी हैं लेकिन उनका जिक्र फिर कभी।

कई अखबारों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके पत्रकार अनिल जैन के एफबी वॉल से.

उपरोक्त पोस्ट पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Ashok Wankhade सही पकड़े हैं

Kanak Tiwari मैं दुखी होकर आपसे सहमत हूँ। मैं रज्जू भैया का ज़बरदस्त फ़ैन हूँ। इस अख़बार को पढ़ना पढ़ने का संस्कार रचना होता था। रायपुर संस्करण शुरू होने पर मैंने खुद होकर एक कॉलम लिखना चाहा। श्रवण गर्ग ने अनसुनी कर दी। फ्रीप्रेस इंदौर में लिखा तब श्रवण वहीं थे। उन्होंने पत्र लिख कर मेरी तारीफ़ की थी। बाद में उनका स्वभाव पतन क्यों हो गया?

Anil Jain तिवारी जी, हकीकत यह है कि श्रवण गर्ग को न तो हिंदी की ठीक से समझ है और न ही अंग्रेजी की। बावजूद इसके वह हिंदी में लिखने वालों को तो लेखक ही नहीं मानते हैं। आपके फ्री प्रेस में लिखे हुए की तारीफ भी उन्होंने इसलिए की ताकि वे यह जाहिर कर सके कि वे अंग्रेजी की बेहतर समझ रखते हैं। उनकी अंग्रेजी कैसी है, यह फ्री प्रेस में उनके साथ कार्य कर चुके संजीव रतन सिंह, वीरेंद्र पंडित, अशोक वानखडे, निर्मल पाठक, राकेश जोशी, दीपक शिंदे, अशोक थपलियाल, टीके देवसिया आदि मित्र अच्छी तरह बता सकते हैं जो श्रवण गर्ग की लिखी हुई कॉपी को अक्सर कूडेदान के हवाले कर एजेंसी की कॉपी इस्तेमाल करते थे।

Jaikishan Borasi अफसोस कुछ लोग अपने अहम की संतुष्टि के लिए योग्य प्रतिभाओं के दमन के साथ कार्यरत संस्थान का भी बड़ा नुकसान करते हैं।

Kumar Narendra Singh अनिल जी, अब मैं क्या कहूं, वैसे कहने का मन तो बहुत कुछ करता है।

Subhash Ranade जागरण द्वारा अधिग्रहित किए जाने के बाद इस अख़बार के सम्पादकीय पृष्ठ पर सरकारी पार्टी की भांडगिरी और भटैती के अतिरिक्त कुछ नहीं छपता।

Ravindra Dubey वह नई दुनिया जो कभी इंदौर की धड़कन हुआ करता था, जिसे पढ़े बिना मेरे जैसे कई लोगों को रोटी हजम नहीं होती थी, वह नई दुनिया जो किंग मेकर कहा जाता था, वह नई दुनिया जिसके कोटे से इंदौर में किसी जमाने में एक विधायक जरूर होता था, वह नई दुनिया जो इंदौर क्या मध्यप्रदेश की राजनीति में दखल रखता था, पोहे जलेबी की तरह लोगों की खुराक में था, उस नई दुनिया के ऐसे पतन पर तो सिर्फ अफसोस ही किया जा सकता है. रही बात भाट चरित्र की तो वह तो नई दुनिया का शुरू से ही रहा है जिधर बम उधर हम.

Anil Jain इतना और लिख देते कि कई लोगों के लिए तो नईदुनिया ईसबगोल या त्रिफला का काम भी करता था!

Ravindra Dubey हां. बिलकुल लिख सकता था लेकिन यह स्थिति मेरे साथ नहीं थी इसलिए नहीं लिखी.

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Comments on “सत्तर बरस के नई दुनिया अखबार को अपना संपादकीय लेख बाहरी व्यक्ति से लिखवाना पड़ रहा है!

  • santosh jain says:

    Nai Duniya ki apni pratishtha rahi he. mujhe bhi purv prabandhan ke sath kam karne ka mauka mila. purv prabandhan ne kabhi is paper ki garima ko kam nahi hone diya. iska andaja isi se lagaya ja sakta he ki aadrniya ABHAY CHAJLANI JI aur MAHENDRA SETHIYA tatha unke pitashree ka kabhi alag chembar nahi raha. jab tak Nai Duniya inke hatho me raha Editorial Teem ke sath hi baithte rahe. Aaj ka Nai Duniya Chajlani aur Sethiya ke sapno ka paper nahi raha.

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