श्रवण गर्ग की फ्री प्रेस से विदाई पर पत्रकार अनिल जैन ने फेसबुक पर लिखा एक विवादित पोस्ट

Anil Jain : श्रवण गर्ग की हकीकत… किसी भी व्यक्ति के नौकरी गंवाने की खबर से शायद ही किसी को सुकून मिलता हो! लेकिन श्रवण गर्ग की फ्री प्रेस से बिदाई की खबर जब परसों तीन मित्रों से एक के बाद एक करके मिली तो अपन को न तो जरा भी आश्चर्य हुआ और न ही कोई अफसोस। जिस बदमिजाज, बदजुबान, भ्रष्ट-निकृष्ट, न्यूनतम मानवीय गुणों से रहित और परम परपीडक व्यक्ति ने अपने पूरे करिअर के दौरान कई काबिल और ईमानदार लोगों की नौकरी खाई हो, दलालों-बेईमानों को प्रमोट किया हो, अपने सहकर्मियों के स्वाभिमान से खिलवाड करना जिसका प्रिय शगल रहा हो, जो महिला सहकर्मियों को बेहूदा टिप्पणियों से जलील करना अपनी शान समझता हो और जो अपने निजी स्वार्थ के लिए किसी को भी नुकसान पहुंचाने में किसी भी हद तक गिरने को तत्पर रहता हो, ऐसे व्यक्ति की नौकरी जाने पर किसी को अफसोस होना भी क्यों चाहिए?

अपनी परपीडक मानसिकता और व्यवहार के चलते यह व्यक्ति अपने कुछ सहकमिर्यों की असमय मौत का जिम्मेदार भी रहा है और कई लोग इसके द्वारा बेवजह दिए गए तनाव से गंभीर बीमारियों के शिकार भी हुए हैं। बेईमानों और चापलूसों को बढावा देना और ईमानदारी से काम करने वाले काबिल और स्वाभिमानी लोगों को किसी न किसी बहाने अपमानित और प्रताडित करना इस व्यक्ति का प्रिय शगल रहा है। दैनिक भास्कर (इंदौर) में नचिकेता देसाई, सुभाष रानडे, शाहिद मिर्जा, विजय गोयल, (दिल्ली में) हरिमोहन मिश्रा, अनिल सिन्हा, अजित व्दिवेदी, अनिरुध्द शर्मा, दिव्य भास्कर (दिल्ली) में प्रमोद कुमार, नईदुनिया (इंदौर) में ऋषि पांडे, विभूति शर्मा, दैनिक जागरण (रांची) में मुकेश भूषण आदि कई नामों की एक लंबी फेहरिस्त बनाई जा सकती है जो श्रवण गर्ग की परपीडक मानसिकता का शिकार हुए हैं। इन लोगों का गुनाह महज यही था कि ये चाटुकार नहीं थे और लिखने-पढने के मामले में श्रवण गर्ग से ज्यादा काबिल थे और काबिल हैं।

ऐसा नहीं है कि इन महाशय की बदतमीजी का किसी ने प्रतिकार नहीं किया हो। वर्षों पहले फ्री प्रेस में ही मेरे मित्र अशोक वानखडे और अशोक थपलियाल को भी अलग-अलग मौकों पर इन्होंने सार्वजनिक रूप से अपमानित करने की कोशिश की थी लेकिन उन दोनों ने बगैर देरी किए तत्काल ही इनकी बदतमीजी का हिसाब इनके ही अंदाज में चुकता कर कर दिया था। वानखडे ने तो उसी वक्त अपना इस्तीफा भी इनके मुंह पर दे मारा था। इनकी विकृत मानसिकता के चलते इंदौर में ही कई साल पहले इन पर लडकी से छेडछाड का प्रकरण भी दर्ज हुआ था। उस प्रकरण में इनका गिरफ्तारी वारंट भी जारी हुआ था, जिसके सिलसिले में मैं इन्हें अपने एडवोकेट मित्र सुरेशनारायण सक्सेना के पास लेकर गया था और उन्होंने इनकी जमानत कराई थी। ये महाशय उस वक्त भोपाल से निकलने वाले एमपी क्रानिकल में काम करते थे। उस प्रकरण को बाद में उन दिनों फ्री प्रेस में ही कार्यरत मेरे मित्र निर्मल पाठक ने इंदौर के तत्कालीन एसएसपी अनिल धस्माना से कहकर खत्म कराया था। मैंने और निर्मल ने यह सोचकर इनकी मदद की थी कि शायद इनके खिलाफ पुलिस ने दुर्भावना के चलते प्रकरण बना दिया है लेकिन बाद में इनकी घटिया मानसिकता और व्यवहार की निरंतरता देखकर हमें लगा कि हमारा सोचना गलत था।

भाग्य पर बहुत ज्यादा भरोसा न होने के बावजूद अपना यह मानना है कि कुदरत सबके साथ न्याय करती है। श्रवण गर्ग ने अपने पूरे करिअर में जो दूसरों के साथ किया वही अब उनके साथ हुआ है और हो रहा है। हालांकि इससे दूसरों को हुए उस नुकसान की भरपाई नहीं होगी, जो श्रवण गर्ग ने अपनी बदमिजाजी, खुदगर्जी और अहंकार के चलते उन्हें पहुंचाया है। फ्री प्रेस में श्रवण गर्ग की यह तीसरी पारी थी, जो उन्हें फ्री प्रेस में ही कार्यरत मेरे एक सह्रदय मित्र और उनके पुराने सहकर्मी मनोहर लिंबोदिया के प्रयत्नों और सदाशयता से हासिल हुई थी। पहली दो पारियों में उन्हें प्रबंधन ने इस्तीफा देने पर मजबूर किया था और तीसरी बार बाकायदा उनसे इस्तीफा मांग लिया गया। इससे पहले दैनिक भास्कर और नईदुनिया से भी इन्हें इसी तरह बेआबरू होकर बाहर होना पडा था। पिछले चार साल में तीन बडे संस्थानों से जलालत भरी बिदाई होना कुदरत का ही तो न्याय है।

कुछ लोगों के मन में यह सवाल उभर सकता है कि यह व्यक्ति इतना भ्रष्ट और दुष्ट है तो फिर इसे नौकरी कैसे हासिल होती रही? दरअसल, पिछले दो दशक के दौरान लगभग सभी बडे अखबारी संस्थानों का कारपोरेटीकरण हो चुका है और कारपोरेट संस्कृति में मानवीय संवेदना की कोई जगह नहीं होती। वहां होती है सिर्फ क्रूरता, निर्ममता और बेतहाशा मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति। वहां खुद्दार और ईमानदार लोगों को प्रबंधन हिकारत भरी नजरों से देखता है। ऐसे संस्थानों में संपादक का ज्यादा पढा-लिखा, समझदार और संवेदनशील होना कोई मायने नहीं रखता। प्रबंधन के लोग चूंकि आमतौर पर बेहद डरपोक होते हैं लिहाजा वे अपने यहां कार्यरत किसी पत्रकार से सीधे उलझने से बचते हैं। उन्हें संपादक के रूप में ऐसे व्यक्ति की दरकार होती है जो उसके इशारे पर या उसके इशारे के बगैर ही किसी भी उसूल पसंद और खुद्दारी के साथ काम करने वाले व्यक्ति की बिना झिझक गर्दन नाम सके, प्रबंधन के झुकने का कहने पर लेट जाए और प्रबंधन के कहने पर घटिया से घटिया काम करने को तत्पर रहे। इन सारी कसौटियों पर श्रवण गर्ग पूरी तरह खरे उतरते रहे हैं। लेकिन उनके साथ समस्या यह है कि यह सब करते हुए वे कभी-कभी खुद को उस अखबार का मालिक मानने लगते हैं और यह भूल जाते हैं कि उनकी औकात अखबार मालिक व्दारा भाडे पर रखे गए लठैत से ज्यादा नहीं है। उनकी यही समस्या उनकी नौकरी जाने का कारण बन जाती है।

दरअसल, यह व्यक्ति अपने पूरे जीवन में किसी के प्रति भी ईमानदार नहीं रहा, यहां तक कि अपने परिवार के प्रति भी नहीं। जो भी इसके संपर्क में आया, उसका इस व्यक्ति ने अपने निजी स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया, ठीक उसी तरह जैसे कि विभिन्न अखबारी संस्थान के संचालकों ने इसका इस्तेमाल किया। हालांकि दस साल पहले रिटायरमेंट की आयु पार कर चुके इस व्यक्ति की जो आर्थिक-पारिवारिक स्थिति है, उसके चलते इसे नौकरी की कतई जरुरत नहीं है लेकिन समाज में अपना नकली रुतबा बनाए रखने की ललक, रसूखदार लोगों से संपर्क बनाने का चस्का, पैसे की भूख और लोगों के साथ बदतमीजी और गाली-गलौच करने तथा उन्हें नौकरी से निकालने के शौक के चलते नौकरी इसकी आवश्यकता है।

और हां, जनाब ने राज्यसभा में जाने की हसरत भी पाल रखी है। चार साल पहले दिल्ली में रहते हुए खूब कोशिश की थी। कांग्रेसी नेताओं के घरों के चक्कर लगाया करते थे, उन्हें खुश करने के लिए उस दौर में भाजपा के खिलाफ टिप्पणियां भी खूब लिखी थी, लेकिन बात नहीं बनी। फिर नरेंद्र मोदी और भाजपा के कीर्तन भी खूब किए लेकिन वहां तो पहले से स्थाई कीर्तनकारों की ही लंबी कतार लगी है सो, वहां भी किसी ने घास नहीं डाली। इसकी चारित्रिक ‘विशेषताएं’ तो और भी कई हैं लेकिन उनका जिक्र यहां करना मुनासिब नहीं होगा, क्योंकि मेरे संस्कार मुझे किसी की कमर के नीचे वार करने की इजाजत नहीं देते।

यह सब पढने के बाद कोई यह सोचे कि मैंने यह सब अपनी निजी खुन्नस के चलते लिखा है तो उनकी इस सोच से सहमति जताते हुए मेरा सवाल है कि इसमें गलत क्या है? ईमानदारी से अपना काम करना, सच बोलना और अपने साथ धोखा और नाइंसाफी करने वाले का असली चेहरा लोगों के सामने लाना कोई अपराध नहीं है। अगर किसी को मेरी भाषा अमर्यादित या अशिष्ट लगती हो तो उस पर भी मुझे कोई आपत्ति नहीं। हर जगह भाषाई शालीनता और तथाकथित शिष्टाचार दिखाने के पाखंड में मेरा कोई भरोसा नहीं है।

वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन के इस फेसबुक पर पोस्ट पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Ashok Priyadarshi सर मैं भी तो इसी का मारा हुआ हूं… और आपने ठीक ही लिखा है कि पिछले दो दशक के दौरान लगभग सभी बडे अखबारी संस्थानों का कारपोरेटीकरण हो चुका है और कारपोरेट संस्कृति में मानवीय संवेदना की कोई जगह नहीं होती। वहां होती है सिर्फ क्रूरता, निर्ममता और बेतहाशा मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति। वहां खुद्दार और ईमानदार लोगों को प्रबंधन हिकारत भरी नजरों से देखता है। ऐसे संस्थानों में संपादक का ज्यादा पढा-लिखा, समझदार और संवेदनशील होना कोई मायने नहीं रखता। प्रबंधन के लोग चूंकि आमतौर पर बेहद डरपोक होते हैं लिहाजा वे अपने यहां कार्यरत किसी पत्रकार से सीधे उलझने से बचते हैं। उन्हें संपादक के रूप में ऐसे व्यक्ति की दरकार होती है जो उसके इशारे पर या उसके इशारे के बगैर ही किसी भी उसूल पसंद और खुद्दारी के साथ काम करने वाले व्यक्ति की बिना झिझक गर्दन नाम सके, प्रबंधन के झुकने का कहने पर लेट जाए और प्रबंधन के कहने पर घटिया से घटिया काम करने को तत्पर रहे। और श्रवण गर्ग इन सारी कसौटियों पर पूरी तरह खरे उतरते रहे हैं…

Anil Sinha व्यकिगत आरोप-प्रत्यारोप से बचता हूं। लेकिन आपकी टिप्पणी पर चुप रहा तो बेईमानी हेागी। आज के संपादकों का चित्रण एकदम सही है। श्रवण जी ने मुझे उस समय तकलीफ दी जब अपने जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा था। अगर बेईमानी और चाटुकारिता करता तो कठिनाई में नहीं होता। उन्होंने न्यूनतम सहृदयता भी न दिखाई। अफसोस है कि जेपी की जिस राजनीतिक विरासत से वह आए हैं, अपना ताल्लुक भी उसीसे रहा है। लेकिन उन्होंने उसका लिहाज भी नही रखा है। आपकी इस बात से सहमत हूं कि वह पत्रकारिता के पतनशील दौर में संपादक हुए। इस दौर में ऐसे ही संपादकों की जरूरत है।

Sandeep Kumar मैंने भी न्यूज रूम में उनकी वीरता (पढ़ें) क्रूरता के कई किस्से सुने हैं. मसलन, अपने कक्षा में डोसा खाते-खाते किसी सहकर्मी को इतना जलील करना कि वह बेहोश ही हो जाये. दिल्ली भास्कर को उनके कार्यकाल में कई मित्र कैंसर अस्पताल बुलाने लगे थे क्योंकि उनके आते ही वहां मुर्दनी छा जाती थी. आने के बाद किसी एक साथी क्लास लगाना और बाकी को औकात में ला देना उनकी टैक्टिस थी. शायद यही वजह थी कि भास्कर से उनकी विदायी के वक्त एक औपचारिक पार्टी तक नहीं दी गयी. किस्साकोताह यह कि बड़े बेआबरू होकर जनाब वहां से निकले. लेकिन इससे कोई सीख न लेते हुए नईदुनिया में नए सिरे से उपदेशक बन गए. व्यक्ति नहीं प्रवृत्ति है, जिससे दूरी ही बचाव की एकमात्र गारंटी है.

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Comments on “श्रवण गर्ग की फ्री प्रेस से विदाई पर पत्रकार अनिल जैन ने फेसबुक पर लिखा एक विवादित पोस्ट

  • अकदम सही लिखा है। अब एसे संपादक ही आपको हर अख़बार में मिल जायेंगे

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  • Ashok Joshi says:

    Naidunia me shri dinesh joshi gambhir bimari se pidit chal rahe the, us dauran bhi shrawan garg ne manawata dikhana uchit nahi samjha aur milne aaye joshiji se bura vyavhar kiya. wahi log jo naidunia me karyarat the we ab anya sansthano me karya kar rahe hain. yaha sampadako ko yah samjhna jaroori hai ki log ghum-firkar wahi hote hain lekin kam kaise karwana hai, ye sampadak ka jimma hota hai.

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  • manohar bhati says:

    anil jain , sharavn garg jaise ghatiya patrakar (?) ke liye bekhauf, belag, nirbhik tippani ke liye aapko kotishah badhai. jaane kyon iss hammal, pseudo intellectual garg se log darte hain aur khulkar nahi bolte hain.

    mana iske saath kaam karne wale patrakar apni naukri bachane ke liye iske khilaf bolne se darte the lekin un patrakaron ka kya jiska is nakara vyakti se koi sidha vasta nahi tha. kyon is indore shahar ke log isko hamesha befaltu toke rahe aur kabhi isko benakab nahi kiya. vaise aapne bhi yah dusahas abhi kiya jab is aadmi ko koi doosri naukri ab jeevan mein milne wali nahi. haan, kisi akhbar maalik ki mati mari jaye to baat alag hain.
    aapko punh badhai.

    manohar bhati,
    editor,
    illustrated news & views,
    indore.

    ps: kya aapki ijajat se aapki is tippani ko apne akhbar mein chhap sakta hun ?

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  • manohar bhati says:

    un akhbar malikon ke baare mein kya kaha jaay jo is jaise pseudo intellectual patrakar(?) ko bhataiti par rakh lete hai. ridiculous indeed.
    manohar bhati,
    editor
    illustrated news & views

    Reply
  • prakhar Mishra says:

    दैनिक जागरण नोएडा में भी सरवन गरग का ललचट्ट आके बैठा है, इस गधे का नाम है गंगेस मिश्रा

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  • Pradeep jain says:

    इस पोस्ट में विवादित क्या है? काश कि यह सब मैनें लिखा होता, खैर अनिल जी ने मेरे मन की बात ही लिखी है। मेरा लिखा तो और भी भदेस होता, परदेशीपुरा भी शामिल होता। वरिष्ठ पत्रकार स्व़ प्रहलादजी के उद्गार भी शामिल होते जो वे समय समय पर व्यक्त करते थे। अनिल जी को बधाईयां ।

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  • दैनिक भास्कर कोटा में भी ऐसे ही सम्पादक हैं विजय सिंह चौहान जो पिछले पांच साल से कोटा में ही जमे हैं , वे हमेशा चाटुकारों से घिरे रहते हैं। हमेशा उनकी तारीफ करते हैं जो उन्हें मकान या प्लाट दिलाये। बच्चों का स्कूल में एडमिशन कराएं , गैस कनेकशन दिलाये, दलालों और ठेकेदारों से दोस्ती रखे, उनकी ख़बरें छाप कर ब्लैकमेल से धन कमाए। बाकि लोगों की सबके सामने बेइज्जती करने में नहीं चूकते। उनके कारण ओम कटारा, संतोष श्रीवास्तव , राजीव सक्सेना को भास्कर छोड़ना पड़ा।

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