‘शुक्रवार’ मैग्जीन ने श्रवण गर्ग पर चापलूसी भरे लेख का प्रतिवाद नहीं छापा तो अनिल जैन ने एफबी पर किया सार्वजनिक

Anil Jain : ‘शुक्रवार’ पत्रिका ने अगस्त महीने के अपने प्रथम अंक में ‘कई बार, कई अखबार’ शीर्षक से एक लेख छापा था। यह लेख कई अखबारों में रिपोर्टर से लेकर संपादक के पद पर रह चुके श्रवण गर्ग पर केंद्रित था। अतिशय चापलूसी युक्त और तथ्यों से परे इस लेख पर प्रतिक्रियास्वरुप मैंने एक तथ्यपरक लेख ‘शुक्रवार’ के संपादक को भेजा था। उम्मीद थी कि स्वस्थ पत्रकारिता के तकाजों का सम्मान करते हुए वे मेरे लेख को भी अपनी पत्रिका में जगह देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। चूंकि यह पेड न्यूज या कि प्रायोजित खबरों का दौर है जिसमें सूचना और विज्ञापन का भेद खत्म सा हो गया है। ‘शुक्रवार’ भी चूंकि एक व्यावसायिक पत्रिका है, लिहाजा उसके संपादक/मालिक की व्यवसायगत मजबूरी समझी जा सकती है। बहरहाल मैं अपना लेख यहां दे रहा हूँ। मित्रों की सुविधा के लिए भी प्रस्तुत है।

एमपी में जिन लोगों ने भूखंड प्राप्त किए उनमें नवभारत, दैनिक जागरण, नईदुनिया और दैनिक स्वदेश के मालिक भी हैं!

अनिल जैन

Anil Jain : मध्य प्रदेश यानी ‘व्यापमं प्रदेश’ की सरकार ने पत्रकारों के नाम पर करीब तीन सौ लोगों को भोपाल में अत्यंत सस्ती दरों पर आवासीय भूखंड आबंटित किए है। सार्वजनिक हुई लाभार्थियों की सूची में सुपात्र भी हैं और वे कुपात्र भी जो बेशर्मी के साथ पत्रकारिता के नाम पर सत्ता की दलाली में लगे हुए हैं। बहरहाल, यह खबर कतई चौंकाती नहीं है बल्कि इस बात की तसदीक करती है मध्य प्रदेश में सत्ता और पत्रकारिता का आपराधिक गठजोड न सिर्फ कायम है बल्कि निरंतर फल-फूल रहा है।

एक अदद राज्यमंत्री का पद हासिल करने को कोई कितना गिर सकता है, एमजे अकबर इसकी मिसाल हैं

 अनिल जैन

अनिल जैन

दोयम दर्जे का एक अदद राज्यमंत्री का पद हासिल करने के लिए कोई व्यक्ति किस हद तक अपने आत्म सम्मान से समझौता कर सकता है, जाने-माने पत्रकार और संपादक एमजे अकबर इसकी मिसाल हैं। वर्षों तक पत्रकारिता में रहते हुए जो कुछ प्रतिष्ठा और पुण्याई अर्जित की थी वह तो दांव पर लगाई ही, साथ ही जिस शख्स को उन्होंने एक समय कांग्रेस में रहते हुए मौत का सौदागर कहा था, उसी की बल्कि उसके दूसरे कारिंदों की भी चापलूसी करनी पडी।

सत्तर बरस के नई दुनिया अखबार को अपना संपादकीय लेख बाहरी व्यक्ति से लिखवाना पड़ रहा है!

Anil Jain : नईदुनिया के सात दशक….. नईदुनिया आज 70 बरस का हो गया। बधाई। एक पाठक के नाते इस अखबार से अपना भी लगभग चार दशक पुराना नाता है। अपन ने दो पारियों में दो अलग-अलग प्रबंधन के तहत इस अखबार में दिल्ली में रहते हुए लगभग तीन साल तक काम भी किया है। मुझे गर्व है कि इस अखबार का जो महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित कॉलम (संपादकीय) एक जमाने में श्री राजेंद्र माथुर, श्री राहुल बारपुते और श्री रणवीर सक्सेना जैसे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ चिंतक-पत्रकार लिखते थे, वही कॉलम मैंने भी वरिष्ठ पत्रकार श्री मधुसूदन आनंद और श्री आलोक मेहता के साथ कोई साढे तीन साल तक (तीन साल नईदुनिया की सेवा में और सात महीने तक नईदुनिया से बाहर रहते हुए) लिखा है और अधिकतम आजादी के साथ लिखा है।

श्रवण गर्ग की फ्री प्रेस से विदाई पर पत्रकार अनिल जैन ने फेसबुक पर लिखा एक विवादित पोस्ट

Anil Jain : श्रवण गर्ग की हकीकत… किसी भी व्यक्ति के नौकरी गंवाने की खबर से शायद ही किसी को सुकून मिलता हो! लेकिन श्रवण गर्ग की फ्री प्रेस से बिदाई की खबर जब परसों तीन मित्रों से एक के बाद एक करके मिली तो अपन को न तो जरा भी आश्चर्य हुआ और न ही कोई अफसोस। जिस बदमिजाज, बदजुबान, भ्रष्ट-निकृष्ट, न्यूनतम मानवीय गुणों से रहित और परम परपीडक व्यक्ति ने अपने पूरे करिअर के दौरान कई काबिल और ईमानदार लोगों की नौकरी खाई हो, दलालों-बेईमानों को प्रमोट किया हो, अपने सहकर्मियों के स्वाभिमान से खिलवाड करना जिसका प्रिय शगल रहा हो, जो महिला सहकर्मियों को बेहूदा टिप्पणियों से जलील करना अपनी शान समझता हो और जो अपने निजी स्वार्थ के लिए किसी को भी नुकसान पहुंचाने में किसी भी हद तक गिरने को तत्पर रहता हो, ऐसे व्यक्ति की नौकरी जाने पर किसी को अफसोस होना भी क्यों चाहिए?