‘शुक्रवार’ मैग्जीन ने श्रवण गर्ग पर चापलूसी भरे लेख का प्रतिवाद नहीं छापा तो अनिल जैन ने एफबी पर किया सार्वजनिक

Anil Jain : ‘शुक्रवार’ पत्रिका ने अगस्त महीने के अपने प्रथम अंक में ‘कई बार, कई अखबार’ शीर्षक से एक लेख छापा था। यह लेख कई अखबारों में रिपोर्टर से लेकर संपादक के पद पर रह चुके श्रवण गर्ग पर केंद्रित था। अतिशय चापलूसी युक्त और तथ्यों से परे इस लेख पर प्रतिक्रियास्वरुप मैंने एक तथ्यपरक लेख ‘शुक्रवार’ के संपादक को भेजा था। उम्मीद थी कि स्वस्थ पत्रकारिता के तकाजों का सम्मान करते हुए वे मेरे लेख को भी अपनी पत्रिका में जगह देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। चूंकि यह पेड न्यूज या कि प्रायोजित खबरों का दौर है जिसमें सूचना और विज्ञापन का भेद खत्म सा हो गया है। ‘शुक्रवार’ भी चूंकि एक व्यावसायिक पत्रिका है, लिहाजा उसके संपादक/मालिक की व्यवसायगत मजबूरी समझी जा सकती है। बहरहाल मैं अपना लेख यहां दे रहा हूँ। मित्रों की सुविधा के लिए भी प्रस्तुत है।

उनके बहिरंग और अंतरंग का भेद

-अनिल जैन-

शुक्रवार (1-15 अगस्त) में ‘कई अखबार, कई बार’ शीर्षक से शरद गुप्ता का आलेख पढा। विभिन्न अखबारों में काम कर चुके औसत दर्जे के पत्रकार और निम्नतम स्तर के व्यक्ति श्रवण गर्ग को महिमा मंडित करता लेख छापने के पीछे शुक्रवार जैसी समृध्द सरोकारों वाली पत्रिका का क्या मकसद रहा होगा, यह तो समझ से परे है लेकिन अतिशयोक्ति से भरपूर इस लेख को पढकर मुझे और मेरे जैसे कई सचेत और पेशागत रूप से प्रतिबध्द पत्रकारों को हैरानी और निराशा हुई है।

श्रवण गर्ग और मैं एक-दूसरे को तब से जानते हैं जब वे इंदौर में फ्री प्रेस जर्नल में चीफ रिपोर्टर हुआ करते थे और मैंने उसी दौरान इंदौर में ही नवभारत में प्रशिक्षु के तौर पर अपने करिअर की शुरुआत की थी। तब से लेकर अब तक उन्होंने भी कई अखबार छोडे और पकडे हैं और मैंने भी इंदौर तथा दिल्ली में रहते हुए विभिन्न मीडिया संस्थानों में काम किया है। इस दौरान दैनिक भास्कर में आठ साल और नईदुनिया में एक साल तक हम अलग-अलग भूमिका में साथ-साथ भी रहे हैं। इतने पुराने परिचय के आधार पर मैं विनम्रतापूर्वक यह दावा करने की स्थिति में हूं कि मैं उन चंद लोगों में से हूं जो श्रवण गर्ग के बहिरंग और अंतरंग को बहुत अच्छी तरह जानते हैं।

कम से कम दैनिक भास्कर में उनकी हैसियत क्या थी यह तो मैं साधिकार बयान कर सकता हूं। भास्कर समूह में श्रवण गर्ग को समूह संपादक का पदनाम 2007 में मिला था, जो मार्च 2012 तक उनके नाम के साथ चस्पा रहा। शरद गुप्ता का यह दावा बिल्कुल निराधार है कि भास्कर अखबार में प्रबंधन का दखल श्रवण गर्ग को दिल्ली भेजे जाने के बाद शुरू हुआ। हकीकत यह है कि भास्कर में प्रबंधन के सूत्र जब से तीसरी यानी मौजूदा पीढी ने संभाले हैं तब से वहां संपादक की भूमिका एक कार्यालय प्रभारी या मैनेजर से ज्यादा की नहीं रही है। मैंने भास्कर में अपने आठ साल के कार्यकाल में सिर्फ तीन ही ऐसे संपादक (एनके सिंह, आलोक मेहता और राजकुमार केसवानी) देखे हैं, जिन्होंने अपने संपादकीय अधिकारों का संपूर्ण तो नहीं लेकिन संभव इस्तेमाल जरुर किया और अपने आत्म-सम्मान को बनाए रखा। यही वजह रही कि वे ज्यादा लंबे समय तक भास्कर में नहीं रह पाए।

भास्कर में 19 वर्षीय कार्यकाल के दौरान श्रवण गर्ग की एक दिन के लिए भी वह हैसियत नहीं रही जो आमतौर पर किसी अखबार में किसी संपादक की होती है या जैसी शरद गुप्ता ने अपने लेख में बताई है। अखबार के प्रथम पृष्ठ की हेडलाइन से लेकर संपादकीय पृष्ठ पर लिखने वाले लेखकों की सूची भी प्रबंधन के कार्यालय से तय होती थी और आज भी वहां ऐसा ही होता है। दरअसल, श्रवण गर्ग को उनके पूरे कार्यकाल के दौरान प्रबंधन ने अखबार के अलग-अलग संस्करणों में अपने लठैत के तौर पर इस्तेमाल किया, यानी संपादकीय सहकर्मियों को हडकाना, उनके तबादले करना, नौकरी से निकालना जैसे कामों के लिए। न्यूनतम मानवीय गुणों से रहित श्रवण गर्ग ने अपनी बदजुबानी और बदमिजाजी से इस भूमिका को बडी शिद्दत से निभाया और अपने न्यस्त स्वार्थों के चलते कई काबिल और ईमानदार लोगों के करिअर से खिलवाड किया और प्रकारांतर से उनके परिवारजनों के लिए भी मुश्किलें खडी कीं।

श्रवण गर्ग ने काबिल और स्वाभिमानी सहयोगियों को तरह-तरह से परेशान करने तथा नाकारा, भ्रष्ट और चुगलखोरों को प्रमोट करने का काम सिर्फ भास्कर में ही नहीं, बल्कि जहां-जहां भी वे रहे वहां-वहां किया। दैनिक भास्कर (इंदौर) में नचिकेता देसाई, सुभाष रानडे, शाहिद मिर्जा, (दिल्ली में) हरिमोहन मिश्रा, अनिल सिन्हा, अजित व्दिवेदी, (भोपाल में) रतनमणि लाल, देवप्रिय अवस्थी, राकेश दीवान, (रायपुर में) दिवाकर मुक्तिबोध, (जयपुर में) राजेंद्र बोडा, दिव्य भास्कर (दिल्ली) में प्रमोद कुमार, दैनिक जागरण (रांची) में मुकेश भूषण, नईदुनिया (ग्वालियर) में डॉ. राकेश पाठक, (इंदौर) में विभूति शर्मा, ओम व्दिवेदी आदि कई असंख्य नामों की एक लंबी फेहरिस्त बनाई जा सकती है जो श्रवण गर्ग के परपीडक व्यवहार के शिकार हुए हैं। इन लोगों का ‘गुनाह’ महज यही था कि इन्होंने श्रवण गर्ग को संपादक तो माना लेकिन अपना माई-बाप या अन्नदाता नहीं माना। इन लोगों का एक ‘संगीन गुनाह’ यह भी था कि ये सभी लिखने-पढने के मामले में श्रवण गर्ग से ज्यादा काबिल थे और काबिल हैं।

चूंकि श्रवण गर्ग जितने चापलूसी पसंद हैं, अपने खुद्दार सहकर्मियों से वे उतनी ही नफरत करते हैं। अपनी इसी नफरत के चलते ऐसे सहकर्मियों को बेवजह जलील करना, उनके खिलाफ साजिशें रचना, महिला सहकर्मियों को बेहूदा टिप्पणियों से अपमानित करना और अपने निजी स्वार्थ के लिए किसी को भी नुकसान पहुंचाने में किसी भी हद तक गिरने को तत्पर रहना श्रवण गर्ग की कार्यशैली में शुमार है। उनके साथ फ्री प्रेस जर्नल में काम कर चुके निर्मल पाठक और अशोक वानखेडे के मुताबिक फ्री प्रेस के न्यूज रूम में श्रवण गर्ग अक्सर बडे ‘गर्व’ से कहा करते थे- ‘मैं तो मालिकों का कुत्ता हूं, मालिक जिस पर भौंकने को कहेगा, मैं भौंकूंगा।’ अपनी परपीडक मानसिकता और अहंकारी व्यवहार के चलते यह व्यक्ति अपने कुछ सहकर्मियों की असमय मौत का जिम्मेदार भी रहा है और कई लोग इनके द्वारा बेवजह दिए गए तनाव से गंभीर बीमारियों के शिकार भी हुए हैं। इसलिए शरद गुप्ता का यह कहना सरासर हास्यास्पद और क्षोभजनक है कि श्रवण गर्ग ने भास्कर में रहते हुए पत्रकारों की दो पीढियां तैयार की। हकीकत तो यह है कि उन्होंने भास्कर में रहते हुए दलालों की एक बडी फौज तैयार की जिसमें से किसी को किसी संस्करण का संपादक तो किसी को स्थानीय संपादक और किसी को कार्यकारी संपादक और किसी को चीफ रिपोर्टर बनवाया और उनकी मदद से अपनी आर्थिक स्थिति को समृध्द किया।

कुल मिलाकर श्रवण गर्ग ने संपादक नाम की प्रजाति को बचाने का नहीं बल्कि नाकारा, चापलूस और बेईमान लोगों को, संपादक, स्थानीय संपादक और कार्यकारी संपादक जैसे पदों पर बैठाकर संपादक नाम की संस्था को भ्रष्ट से भ्रष्टतम बनाने का पाप किया है। श्रवण गर्ग के भास्कर में समूह संपादक रहते संपादक नाम की संस्था का किस कदर अवमूल्यन हुआ, इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि अखबार का अग्रलेख न तो वे खुद लिखते थे और न ही कोई अन्य वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी, बल्कि वह बाहरी व्यक्ति से रोजनदारी पर लिखवाया जाता था। अग्रलेख किस मुद्दे पर लिखा जाएगा इसका निर्धारण भी संपादक के नहीं बल्कि प्रबंधन के स्तर पर होता था।

शरद गुप्ता के लेख में श्रवण गर्ग को गांधीवादी और सर्वोदयकर्मी बताया गया है। इस बारे मं मेरा निवेदन है कि वे अपनी किसी वैचारिक प्रतिबध्दता की वजह से नहीं बल्कि अपने करिअर की संभावना तलाशने और बडे लोगों से संपर्क बनाने के मकसद से सर्वोदय के काफिले में शरीक हुए थे लेकिन आपातकाल लगते ही वहां से भाग खडे हुए थे। इस हकीकत को स्मृति शेष प्रभाष जोशी भी जानते थे। वे होते तो निश्चित ही इस बात की तसदीक करते। अगर इस व्यक्ति में सर्वोदय या जेपी आंदोलन के थोडे भी संस्कार होते तो यह अपने सहयोगियों के साथ वह सब न करता जो इसने जीवन भर किया है। शरद गुप्ता ने अपने लेख में ‘प्रजानीति’ से श्रवण गर्ग को निकाले जाने का जो जिक्र किया है वह बिल्कुल सही है। अपने साथियों के खिलाफ साजिशें रचने और चुगलखोरी की प्रवृत्ति के चलते ही उनको प्रभाष जी ने सेवा समाप्ति का पत्र थमाया था। यह बात खुद प्रभाष जी ने एक बार मुझे भी बताई थी और कहा था कि यह व्यक्ति अव्वल दर्जे का झूठा, नुगरा (एहसान फरामोश) और ओछी (टुच्ची) मानसिकता का है, इससे बचकर रहना।

कुछ लोगों के मन में यह सवाल उभर सकता है कि यह व्यक्ति इतना भ्रष्ट और दुष्ट है तो फिर इसे नौकरी कैसे हासिल होती रही? दरअसल, पिछले दो दशक के दौरान लगभग सभी बडे अखबारी संस्थानों का कारपोरेटीकरण हो चुका है और कारपोरेट संस्कृति में मानवीय संवेदना की कोई जगह नहीं होती। वहां होती है सिर्फ क्रूरता, निर्ममता और बेतहाशा मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति। वहां खुद्दार और ईमानदार लोगों को प्रबंधन हिकारत भरी नजरों से देखता है। ऐसे संस्थानों में संपादक का ज्यादा पढा-लिखा, समझदार और संवेदनशील होना कोई मायने नहीं रखता। प्रबंधन के लोग चूंकि आमतौर पर बेहद डरपोक होते हैं लिहाजा वे अपने यहां कार्यरत किसी पत्रकार से सीधे उलझने से बचते हैं। उन्हें संपादक के रूप में ऐसे व्यक्ति की दरकार होती है जो उनके इशारे पर या उनके इशारे के बगैर ही किसी भी उसूल पसंद और खुद्दारी के साथ काम करने वाले व्यक्ति की बिना झिझक गर्दन नाप सके, प्रबंधन के झुकने का कहने पर लेट जाए और प्रबंधन के कहने पर घटिया से घटिया काम करने को तत्पर रहे। इन सारी कसौटियों पर श्रवण गर्ग पूरी तरह खरे उतरते रहे हैं।

लेकिन उनके साथ समस्या यह है कि यह सब करते हुए वे कभी-कभी खुद को उस अखबार का मालिक मानने लगते हैं और यह भूल जाते हैं कि उनकी औकात अखबार मालिक द्वारा भाडे पर रखे गए लठैत से ज्यादा नहीं है। उनकी यही समस्या उनकी नौकरी जाने का कारण बनती रही है। इंदौर के साप्ताहिक शनिवार दर्पण को छोड दें तो प्रजानीति, फ्री प्रेस जर्नल, चौथा संसार, एमपी क्रानिकल, दैनिक भास्कर, नईदुनिया आदि सभी संस्थानों में बाकायदा उनसे इस्तीफा मांगा गया है या प्रबंधन की ओर से ऐसी स्थितियां निर्मित की गई कि वे खुद ही इस्तीफा देकर बाहर हो जाएं। यानी हर कूचे से बेआबरू होकर निकले।

दरअसल, यह महाशय अपने पूरे जीवन में किसी के प्रति भी ईमानदार नहीं रहे। जो भी इनके संपर्क में आया, उसका इस व्यक्ति ने अपने निजी स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया, ठीक उसी तरह जैसे कि विभिन्न अखबारी संस्थान के संचालकों ने इनका इस्तेमाल किया। हालांकि दस साल पहले रिटायरमेंट की आयु पार कर चुके इन महाशय की जो आर्थिक-पारिवारिक स्थिति है, उसके चलते इन्हें नौकरी की कतई जरुरत नहीं है लेकिन समाज में अपना नकली रुतबा बनाए रखने की ललक, रसूखदार लोगों से संपर्क बनाने का चस्का, पैसे की भूख और लोगों के साथ बदतमीजी और गाली-गलौच करने तथा उन्हें नौकरी से निकालने के शौक के चलते नौकरी इनकी आवश्यकता है। इनकी चारित्रिक ‘विशेषताएं’ तो और भी कई हैं लेकिन उनका जिक्र यहां करना मुनासिब नहीं होगा, क्योंकि मेरे संस्कार मुझे किसी की कमर के नीचे वार करने की इजाजत नहीं देते।

वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन की एफबी वॉल से.

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एमपी में जिन लोगों ने भूखंड प्राप्त किए उनमें नवभारत, दैनिक जागरण, नईदुनिया और दैनिक स्वदेश के मालिक भी हैं!

अनिल जैन

Anil Jain : मध्य प्रदेश यानी ‘व्यापमं प्रदेश’ की सरकार ने पत्रकारों के नाम पर करीब तीन सौ लोगों को भोपाल में अत्यंत सस्ती दरों पर आवासीय भूखंड आबंटित किए है। सार्वजनिक हुई लाभार्थियों की सूची में सुपात्र भी हैं और वे कुपात्र भी जो बेशर्मी के साथ पत्रकारिता के नाम पर सत्ता की दलाली में लगे हुए हैं। बहरहाल, यह खबर कतई चौंकाती नहीं है बल्कि इस बात की तसदीक करती है मध्य प्रदेश में सत्ता और पत्रकारिता का आपराधिक गठजोड न सिर्फ कायम है बल्कि निरंतर फल-फूल रहा है।

जिन लोगों ने ये भूखंड प्राप्त किए हैं उनमें नवभारत के मालिक सुमित माहेश्वरी, दैनिक जागरण के मालिक राजीव मोहन गुप्त, दैनिक नईदुनिया के मालिक त्रय राजेंद्र तिवारी, सुरेंद्र तिवारी, विश्वास तिवारी और दैनिक स्वदेश के मालिक राजेंद्र शर्मा के साथ ही कुछ अन्य अखबार मालिक तथा उमेश त्रिवेदी, श्रवण गर्ग, अरुण पटेल, अभिलाष खांडेकर और इसी तरह के कुछ अन्य लोगों के नाम भी शामिल हैं जो पत्रकारिता से ज्यादा दूसरे कामों के लिए जाने-पहचाने जाते हैं। (हालांकि प्राप्त सूचना के मुताबिक अभिलाष खांडेकर और कुछ अन्य लोगों का दावा है कि वे न तो संबंधित गृह निर्माण समिति के सदस्य हैं और न ही उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार से कोई भूखंड प्राप्त किया है। फिलहाल इस सूचना पर भरोसा करते हुए उन्हें इस चर्चा से अलग रखा जा रहा है)।

बहरहाल ये कुछ नाम, दलाली से सनी मध्य प्रदेश की अखबारी मंडी और पत्रकारिता के प्रतिनिधि चेहरे हैं, जो भ्रष्ट राजनेताओं और नाकाबिल नौकरशाहों के इर्द-गिर्द अपनी कलम के काले अक्षरों से अक्सर चंवर डुलाते रहते हैं। हालांकि इस जमात में कुछ ऐसे भी हैं जो पढने-लिखने के मामले में अत्यंत प्रतिभाविहीन हैं लेकिन दलाली के काम में इतने प्रतिभाशाली हैं कि कुछ बडे अखबारों ने उनकी इसी काबिलियत का कायल होकर उन्हें अपने यहां ऊंचे पदनाम और मोटी तनख्वाह पर रखा हुआ है।

वैसे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पत्रकारों के नाम पर इन दलालों को उपकृत कर कोई नया काम नहीं किया है। दरअसल अपने भ्रष्ट कारनामों पर परदा डालने के लिए जमीन के टुकडों और सरकारी मकानों से अखबार मालिकों और पत्रकारों का ईमान खरीदने के खेल की शुरुआत अस्सी के दशक में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह ने की थी। यही नहीं, उन्होंने तो मध्य प्रदेश में फर्जी पत्रकारों की एक नई जमात ही पैदा कर उसे सत्ता की दलाली में लगा दिया था। उस दौर में अर्जुनसिंह के दरबार में मुजरा करने वाली बेगैरत पत्रकारों की इस जमात ने अर्जुनसिंह को ‘संवेदनशील मुख्यमंत्री’ का खिताब अता किया था। इस ‘संवेदनशील मुख्यमंत्री’ ने अपनी ‘संवेदना’ के छींटे सिर्फ मध्य प्रदेश के पत्रकारों पर ही नहीं, बल्कि दिल्ली में रहकर सत्ता की दलाली करने वाले कुछ दोयम दर्जे के साहित्यकारों और पत्रकारों पर भी डाले थे और उन्हें इंदौर व भोपाल जैसे शहरों में जमीन के टुकडे आबंटित किए थे।

अपने राजनीतिक हरम की इन्हीं बांदियों की मदद से अर्जुनसिंह चुरहट लाटरी और आसवनी कांड जैसे कुख्यात कारनामों को दफनाने में कामयाब रहे थे। इतना ही नहीं, दस हजार से ज्यादा लोगों का हत्यारा भोपाल गैस कांड भी अर्जुनसिंह का बाल बांका नहीं कर पाया था। अर्जुनसिंह अपने इन कृपापात्रों का इस्तेमाल अपने राजनीतिक विरोधियों की छवि मलिन करने और उन्हें ठिकाने लगाने में भी किया करते थे।

अर्जुनसिंह के नक्श-ए-कदम पर चलते हुए शिवराज सिंह भी अखबार वालों को साधकर ‘व्यापमं’ जैसे खूंखार कांड तथा ऐसे ही कई अन्य मामलों को दफनाने में लगभग कामयाब रहे हैं। उनके द्वारा उपकृत किए गए पत्रकारों की सूची में कुछ नाम तो ऐसे भी हैं, जो निजी मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज के परोक्ष-अपरोक्ष रुप से संचालक हैं और इस नाते खुद भी ‘व्यापमं’ में भागीदार रहे हैं। कुछ नाम ऐसे भी हैं जिनका भूमि से अनुराग बहुत पुराना है। उन्होंने अपने इसी भूमि-प्रेम के चलते पिछले तीन-साढे तीन दशक के दौरान अपवाद स्वरुप एक-दो को छोडकर लगभग सभी मुख्यमंत्रियों से सरकारी मकान और जमीन के टुकडे ही नहीं बल्कि दूसरी तरह की और भी कई इनायतें हासिल की हैं।

अब चूंकि मीडिया संस्थानों में कारपोरेट संस्कृति के प्रवेश के बाद अहंकारी, मूर्ख, नाकारा, क्रूर और परपीडक संपादकों और संपादकनुमा दूसरे चापलूस कारकूनों के साथ किसी भी काबिल, ईमानदार और पेशेवर व्यक्ति का खुद्दारी के साथ काम करना आसान नहीं रह गया है, यानी नौकरी पर अनिश्चितता की तलवार हमेशा लटकी रहती है। लिहाजा मीडिया संस्थानों में साधारण वेतन पर ईमानदारी और प्रतिबध्दता के साथ काम रहे पत्रकारों को सरकार अगर रियायती दरों पर भूखंड देती है तो इस पर शायद ही किसी को ऐतराज होगा। होना भी नहीं चाहिए, लेकिन इन्हीं मीडिया संस्थानों में दो से तीन लाख तक की तनख्वाह पाने वालों, धंधेबाजों और प्रबंधन के आदेश पर घटिया से घटिया काम करने को तत्पर रहने वालों को सरकार से औने-पौने दामों पर भूखंड क्यों मिलना चाहिए?

मैं कुछ ऐसे भू-संपदा प्रेमी पत्रकारों को जानता हूं जिन्होंने अपने करिअर के दौरान मध्य प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में, जिस-जिस शहर में काम किया वहां-वहां पत्रकारिता से इतर अपनी दीगर प्रतिभा के दम पर अचल संपत्ति अर्जित की है और मध्य प्रदेश सरकार से भी लाखों की जमीन कौडियों के मोल लेने में कोई संकोच नहीं दिखाया है। ऐसे ‘महानुभाव’ जब किसी राजनीतिक व्यक्ति के घपले-घोटाले पर कुछ लिखते हुए या सार्वजनिक कार्यक्रम के मंच से नैतिकता और ईमानदारी की बात करते दिखते हैं तो सिर्फ और सिर्फ उस आसाराम बापू का चेहरा आंखों के सामने आ जाता है जो इन दिनों जेल में रहते हुए भी ईश्वर से अपना साक्षात्कार होने का पाखंड भरा दावा करता है।

हालांकि पत्रकारिता के इस पतन को सिर्फ मध्य प्रदेश के संदर्भ में ही नहीं देखा जाना चाहिए, यह अखिल भारतीय परिघटना है। नवउदारीकरण यानी बाजारवादी अर्थव्यवस्था ने हमारे सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों पर प्रतिकूल असर डाला है। पत्रकारिता भी उनमें से ऐसा ही एक क्षेत्र है। इसलिए ऐसी पतनशील प्रवृत्तियों को विकसित होते देखने के लिए हम अभिशप्त है। लेकिन इस अभिशाप के बावजूद पत्रकारिता अब भी एक संभावना है।

वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन की एफबी वॉल से.

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एक अदद राज्यमंत्री का पद हासिल करने को कोई कितना गिर सकता है, एमजे अकबर इसकी मिसाल हैं

 अनिल जैन

अनिल जैन

दोयम दर्जे का एक अदद राज्यमंत्री का पद हासिल करने के लिए कोई व्यक्ति किस हद तक अपने आत्म सम्मान से समझौता कर सकता है, जाने-माने पत्रकार और संपादक एमजे अकबर इसकी मिसाल हैं। वर्षों तक पत्रकारिता में रहते हुए जो कुछ प्रतिष्ठा और पुण्याई अर्जित की थी वह तो दांव पर लगाई ही, साथ ही जिस शख्स को उन्होंने एक समय कांग्रेस में रहते हुए मौत का सौदागर कहा था, उसी की बल्कि उसके दूसरे कारिंदों की भी चापलूसी करनी पडी।

और, बदले में मिला क्या… सिर्फ विदेश राज्यमंत्री का भूमिका विहीन पद जो कि उसी मंत्रालय में पहले से ही एक मूर्ख पूर्व सेनाध्यक्ष के पास भी है।

जब इस मंत्रालय की कैबिनेट मंत्री के पास ही करने को कुछ नहीं है तो उस मंत्रालय में अकबर साहब क्या कर लेंगे, सिवाय कुछेक मसलों पर बयान और संसद में प्रश्नों के लिखित उत्तर देने के? एमजे अकबर के साथ ही इस मंत्रिपरिषद में दो और भी मुस्लिम मंत्री है लेकिन उन्हें भी ऐसा कोई महत्वपूर्ण महकमा नहीं सौंपा गया है जिसका देश के आम आदमी से वास्ता हो।

कुल मिलाकर तीनों शो पीस है और तीनों की भूमिका भाजपाई धर्मनिरपेक्षता की मॉडलिंग करने तक ही सीमित है। तीनों की यह नियति इस बात को भी स्पष्ट करती है कि मौजूदा हुकूमत के मुखिया का देश के सबसे बडे अल्पसंख्यक तबके के प्रति क्या नजरिया है।

वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन की एफबी वॉल से.

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सत्तर बरस के नई दुनिया अखबार को अपना संपादकीय लेख बाहरी व्यक्ति से लिखवाना पड़ रहा है!

Anil Jain : नईदुनिया के सात दशक….. नईदुनिया आज 70 बरस का हो गया। बधाई। एक पाठक के नाते इस अखबार से अपना भी लगभग चार दशक पुराना नाता है। अपन ने दो पारियों में दो अलग-अलग प्रबंधन के तहत इस अखबार में दिल्ली में रहते हुए लगभग तीन साल तक काम भी किया है। मुझे गर्व है कि इस अखबार का जो महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित कॉलम (संपादकीय) एक जमाने में श्री राजेंद्र माथुर, श्री राहुल बारपुते और श्री रणवीर सक्सेना जैसे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ चिंतक-पत्रकार लिखते थे, वही कॉलम मैंने भी वरिष्ठ पत्रकार श्री मधुसूदन आनंद और श्री आलोक मेहता के साथ कोई साढे तीन साल तक (तीन साल नईदुनिया की सेवा में और सात महीने तक नईदुनिया से बाहर रहते हुए) लिखा है और अधिकतम आजादी के साथ लिखा है।

इसी गौरव बोध के साथ मुझे अफसोस इस बात का है कि जिस संस्थान में मुझे इतना प्रतिष्ठापूर्ण काम करने का अवसर मिला उसी संस्थान के मौजूदा प्रबंधन के खिलाफ इस समय मुझे न चाहते हुए भी अदालत में संघर्ष करना पड़ रहा है। हालांकि इस स्थिति के लिए सीधे तौर पर न तो मैं जिम्मेदार हूं और न ही प्रबंधन। यह अप्रिय स्थिति आई है डेढ़ साल पहले तक इसी अखबार के प्रधान संपादक रहे भ्रष्ट और लम्पट श्रवण गर्ग की बदमिजाजी, खुदगर्जी और उनके निहित स्वार्थों के चलते। हालांकि यह और बात है डेढ़ वर्ष पूर्व श्रवण गर्ग को भी बेआबरू होकर नईदुनिया से बाहर का रास्ता देखना पड़ा।

श्रवण गर्ग ने नईदुनिया में अपने तीन वर्ष के कार्यकाल में विभिन्न संस्करणों में कार्यरत लगभग दो सौ लोगों की नौकरी से खिलवाड़ किया या उन्हें अपनी परपीड़क मानसिकता के चलते तरह-तरह से परेशान किया, जिनमें से कुछ लोग तो मेरी ही तरह अदालती लडाई लड़ रहे हैं। नईदुनिया के पूर्व प्रबंधन के दौर में ऐसी नौबत कभी नहीं आई थी। बहरहाल, यह अखबार खबरों की गुणवत्ता, भाषा और विश्वसनीयता के मामले में तेज कदमों से पतन की दिशा में कुलांचें भर रहा है। सात संस्करणों वाले इस अखबार में लगभग साढे तीन सौ पत्रकार कार्यरत हैं लेकिन अखबार को अपना संपादकीय लेख बाहरी व्यक्ति से लिखवाना पड़ रहा है। किसी भी अखबार के लिए इससे अधिक शर्मनाक स्थिति और क्या हो सकती है! यह स्थिति इस बात का आभास कराने के लिए काफी है कि अखबार में कार्यरत पदनामधारी संपादक और उनके समकक्ष लोग कितने काबिल और पेशेवर हैं। इस अखबार की पतनगाथा से जुडे किस्से तो और भी हैं लेकिन उनका जिक्र फिर कभी।

कई अखबारों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके पत्रकार अनिल जैन के एफबी वॉल से.

उपरोक्त पोस्ट पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Ashok Wankhade सही पकड़े हैं

Kanak Tiwari मैं दुखी होकर आपसे सहमत हूँ। मैं रज्जू भैया का ज़बरदस्त फ़ैन हूँ। इस अख़बार को पढ़ना पढ़ने का संस्कार रचना होता था। रायपुर संस्करण शुरू होने पर मैंने खुद होकर एक कॉलम लिखना चाहा। श्रवण गर्ग ने अनसुनी कर दी। फ्रीप्रेस इंदौर में लिखा तब श्रवण वहीं थे। उन्होंने पत्र लिख कर मेरी तारीफ़ की थी। बाद में उनका स्वभाव पतन क्यों हो गया?

Anil Jain तिवारी जी, हकीकत यह है कि श्रवण गर्ग को न तो हिंदी की ठीक से समझ है और न ही अंग्रेजी की। बावजूद इसके वह हिंदी में लिखने वालों को तो लेखक ही नहीं मानते हैं। आपके फ्री प्रेस में लिखे हुए की तारीफ भी उन्होंने इसलिए की ताकि वे यह जाहिर कर सके कि वे अंग्रेजी की बेहतर समझ रखते हैं। उनकी अंग्रेजी कैसी है, यह फ्री प्रेस में उनके साथ कार्य कर चुके संजीव रतन सिंह, वीरेंद्र पंडित, अशोक वानखडे, निर्मल पाठक, राकेश जोशी, दीपक शिंदे, अशोक थपलियाल, टीके देवसिया आदि मित्र अच्छी तरह बता सकते हैं जो श्रवण गर्ग की लिखी हुई कॉपी को अक्सर कूडेदान के हवाले कर एजेंसी की कॉपी इस्तेमाल करते थे।

Jaikishan Borasi अफसोस कुछ लोग अपने अहम की संतुष्टि के लिए योग्य प्रतिभाओं के दमन के साथ कार्यरत संस्थान का भी बड़ा नुकसान करते हैं।

Kumar Narendra Singh अनिल जी, अब मैं क्या कहूं, वैसे कहने का मन तो बहुत कुछ करता है।

Subhash Ranade जागरण द्वारा अधिग्रहित किए जाने के बाद इस अख़बार के सम्पादकीय पृष्ठ पर सरकारी पार्टी की भांडगिरी और भटैती के अतिरिक्त कुछ नहीं छपता।

Ravindra Dubey वह नई दुनिया जो कभी इंदौर की धड़कन हुआ करता था, जिसे पढ़े बिना मेरे जैसे कई लोगों को रोटी हजम नहीं होती थी, वह नई दुनिया जो किंग मेकर कहा जाता था, वह नई दुनिया जिसके कोटे से इंदौर में किसी जमाने में एक विधायक जरूर होता था, वह नई दुनिया जो इंदौर क्या मध्यप्रदेश की राजनीति में दखल रखता था, पोहे जलेबी की तरह लोगों की खुराक में था, उस नई दुनिया के ऐसे पतन पर तो सिर्फ अफसोस ही किया जा सकता है. रही बात भाट चरित्र की तो वह तो नई दुनिया का शुरू से ही रहा है जिधर बम उधर हम.

Anil Jain इतना और लिख देते कि कई लोगों के लिए तो नईदुनिया ईसबगोल या त्रिफला का काम भी करता था!

Ravindra Dubey हां. बिलकुल लिख सकता था लेकिन यह स्थिति मेरे साथ नहीं थी इसलिए नहीं लिखी.

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श्रवण गर्ग की फ्री प्रेस से विदाई पर पत्रकार अनिल जैन ने फेसबुक पर लिखा एक विवादित पोस्ट

Anil Jain : श्रवण गर्ग की हकीकत… किसी भी व्यक्ति के नौकरी गंवाने की खबर से शायद ही किसी को सुकून मिलता हो! लेकिन श्रवण गर्ग की फ्री प्रेस से बिदाई की खबर जब परसों तीन मित्रों से एक के बाद एक करके मिली तो अपन को न तो जरा भी आश्चर्य हुआ और न ही कोई अफसोस। जिस बदमिजाज, बदजुबान, भ्रष्ट-निकृष्ट, न्यूनतम मानवीय गुणों से रहित और परम परपीडक व्यक्ति ने अपने पूरे करिअर के दौरान कई काबिल और ईमानदार लोगों की नौकरी खाई हो, दलालों-बेईमानों को प्रमोट किया हो, अपने सहकर्मियों के स्वाभिमान से खिलवाड करना जिसका प्रिय शगल रहा हो, जो महिला सहकर्मियों को बेहूदा टिप्पणियों से जलील करना अपनी शान समझता हो और जो अपने निजी स्वार्थ के लिए किसी को भी नुकसान पहुंचाने में किसी भी हद तक गिरने को तत्पर रहता हो, ऐसे व्यक्ति की नौकरी जाने पर किसी को अफसोस होना भी क्यों चाहिए?

अपनी परपीडक मानसिकता और व्यवहार के चलते यह व्यक्ति अपने कुछ सहकमिर्यों की असमय मौत का जिम्मेदार भी रहा है और कई लोग इसके द्वारा बेवजह दिए गए तनाव से गंभीर बीमारियों के शिकार भी हुए हैं। बेईमानों और चापलूसों को बढावा देना और ईमानदारी से काम करने वाले काबिल और स्वाभिमानी लोगों को किसी न किसी बहाने अपमानित और प्रताडित करना इस व्यक्ति का प्रिय शगल रहा है। दैनिक भास्कर (इंदौर) में नचिकेता देसाई, सुभाष रानडे, शाहिद मिर्जा, विजय गोयल, (दिल्ली में) हरिमोहन मिश्रा, अनिल सिन्हा, अजित व्दिवेदी, अनिरुध्द शर्मा, दिव्य भास्कर (दिल्ली) में प्रमोद कुमार, नईदुनिया (इंदौर) में ऋषि पांडे, विभूति शर्मा, दैनिक जागरण (रांची) में मुकेश भूषण आदि कई नामों की एक लंबी फेहरिस्त बनाई जा सकती है जो श्रवण गर्ग की परपीडक मानसिकता का शिकार हुए हैं। इन लोगों का गुनाह महज यही था कि ये चाटुकार नहीं थे और लिखने-पढने के मामले में श्रवण गर्ग से ज्यादा काबिल थे और काबिल हैं।

ऐसा नहीं है कि इन महाशय की बदतमीजी का किसी ने प्रतिकार नहीं किया हो। वर्षों पहले फ्री प्रेस में ही मेरे मित्र अशोक वानखडे और अशोक थपलियाल को भी अलग-अलग मौकों पर इन्होंने सार्वजनिक रूप से अपमानित करने की कोशिश की थी लेकिन उन दोनों ने बगैर देरी किए तत्काल ही इनकी बदतमीजी का हिसाब इनके ही अंदाज में चुकता कर कर दिया था। वानखडे ने तो उसी वक्त अपना इस्तीफा भी इनके मुंह पर दे मारा था। इनकी विकृत मानसिकता के चलते इंदौर में ही कई साल पहले इन पर लडकी से छेडछाड का प्रकरण भी दर्ज हुआ था। उस प्रकरण में इनका गिरफ्तारी वारंट भी जारी हुआ था, जिसके सिलसिले में मैं इन्हें अपने एडवोकेट मित्र सुरेशनारायण सक्सेना के पास लेकर गया था और उन्होंने इनकी जमानत कराई थी। ये महाशय उस वक्त भोपाल से निकलने वाले एमपी क्रानिकल में काम करते थे। उस प्रकरण को बाद में उन दिनों फ्री प्रेस में ही कार्यरत मेरे मित्र निर्मल पाठक ने इंदौर के तत्कालीन एसएसपी अनिल धस्माना से कहकर खत्म कराया था। मैंने और निर्मल ने यह सोचकर इनकी मदद की थी कि शायद इनके खिलाफ पुलिस ने दुर्भावना के चलते प्रकरण बना दिया है लेकिन बाद में इनकी घटिया मानसिकता और व्यवहार की निरंतरता देखकर हमें लगा कि हमारा सोचना गलत था।

भाग्य पर बहुत ज्यादा भरोसा न होने के बावजूद अपना यह मानना है कि कुदरत सबके साथ न्याय करती है। श्रवण गर्ग ने अपने पूरे करिअर में जो दूसरों के साथ किया वही अब उनके साथ हुआ है और हो रहा है। हालांकि इससे दूसरों को हुए उस नुकसान की भरपाई नहीं होगी, जो श्रवण गर्ग ने अपनी बदमिजाजी, खुदगर्जी और अहंकार के चलते उन्हें पहुंचाया है। फ्री प्रेस में श्रवण गर्ग की यह तीसरी पारी थी, जो उन्हें फ्री प्रेस में ही कार्यरत मेरे एक सह्रदय मित्र और उनके पुराने सहकर्मी मनोहर लिंबोदिया के प्रयत्नों और सदाशयता से हासिल हुई थी। पहली दो पारियों में उन्हें प्रबंधन ने इस्तीफा देने पर मजबूर किया था और तीसरी बार बाकायदा उनसे इस्तीफा मांग लिया गया। इससे पहले दैनिक भास्कर और नईदुनिया से भी इन्हें इसी तरह बेआबरू होकर बाहर होना पडा था। पिछले चार साल में तीन बडे संस्थानों से जलालत भरी बिदाई होना कुदरत का ही तो न्याय है।

कुछ लोगों के मन में यह सवाल उभर सकता है कि यह व्यक्ति इतना भ्रष्ट और दुष्ट है तो फिर इसे नौकरी कैसे हासिल होती रही? दरअसल, पिछले दो दशक के दौरान लगभग सभी बडे अखबारी संस्थानों का कारपोरेटीकरण हो चुका है और कारपोरेट संस्कृति में मानवीय संवेदना की कोई जगह नहीं होती। वहां होती है सिर्फ क्रूरता, निर्ममता और बेतहाशा मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति। वहां खुद्दार और ईमानदार लोगों को प्रबंधन हिकारत भरी नजरों से देखता है। ऐसे संस्थानों में संपादक का ज्यादा पढा-लिखा, समझदार और संवेदनशील होना कोई मायने नहीं रखता। प्रबंधन के लोग चूंकि आमतौर पर बेहद डरपोक होते हैं लिहाजा वे अपने यहां कार्यरत किसी पत्रकार से सीधे उलझने से बचते हैं। उन्हें संपादक के रूप में ऐसे व्यक्ति की दरकार होती है जो उसके इशारे पर या उसके इशारे के बगैर ही किसी भी उसूल पसंद और खुद्दारी के साथ काम करने वाले व्यक्ति की बिना झिझक गर्दन नाम सके, प्रबंधन के झुकने का कहने पर लेट जाए और प्रबंधन के कहने पर घटिया से घटिया काम करने को तत्पर रहे। इन सारी कसौटियों पर श्रवण गर्ग पूरी तरह खरे उतरते रहे हैं। लेकिन उनके साथ समस्या यह है कि यह सब करते हुए वे कभी-कभी खुद को उस अखबार का मालिक मानने लगते हैं और यह भूल जाते हैं कि उनकी औकात अखबार मालिक व्दारा भाडे पर रखे गए लठैत से ज्यादा नहीं है। उनकी यही समस्या उनकी नौकरी जाने का कारण बन जाती है।

दरअसल, यह व्यक्ति अपने पूरे जीवन में किसी के प्रति भी ईमानदार नहीं रहा, यहां तक कि अपने परिवार के प्रति भी नहीं। जो भी इसके संपर्क में आया, उसका इस व्यक्ति ने अपने निजी स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया, ठीक उसी तरह जैसे कि विभिन्न अखबारी संस्थान के संचालकों ने इसका इस्तेमाल किया। हालांकि दस साल पहले रिटायरमेंट की आयु पार कर चुके इस व्यक्ति की जो आर्थिक-पारिवारिक स्थिति है, उसके चलते इसे नौकरी की कतई जरुरत नहीं है लेकिन समाज में अपना नकली रुतबा बनाए रखने की ललक, रसूखदार लोगों से संपर्क बनाने का चस्का, पैसे की भूख और लोगों के साथ बदतमीजी और गाली-गलौच करने तथा उन्हें नौकरी से निकालने के शौक के चलते नौकरी इसकी आवश्यकता है।

और हां, जनाब ने राज्यसभा में जाने की हसरत भी पाल रखी है। चार साल पहले दिल्ली में रहते हुए खूब कोशिश की थी। कांग्रेसी नेताओं के घरों के चक्कर लगाया करते थे, उन्हें खुश करने के लिए उस दौर में भाजपा के खिलाफ टिप्पणियां भी खूब लिखी थी, लेकिन बात नहीं बनी। फिर नरेंद्र मोदी और भाजपा के कीर्तन भी खूब किए लेकिन वहां तो पहले से स्थाई कीर्तनकारों की ही लंबी कतार लगी है सो, वहां भी किसी ने घास नहीं डाली। इसकी चारित्रिक ‘विशेषताएं’ तो और भी कई हैं लेकिन उनका जिक्र यहां करना मुनासिब नहीं होगा, क्योंकि मेरे संस्कार मुझे किसी की कमर के नीचे वार करने की इजाजत नहीं देते।

यह सब पढने के बाद कोई यह सोचे कि मैंने यह सब अपनी निजी खुन्नस के चलते लिखा है तो उनकी इस सोच से सहमति जताते हुए मेरा सवाल है कि इसमें गलत क्या है? ईमानदारी से अपना काम करना, सच बोलना और अपने साथ धोखा और नाइंसाफी करने वाले का असली चेहरा लोगों के सामने लाना कोई अपराध नहीं है। अगर किसी को मेरी भाषा अमर्यादित या अशिष्ट लगती हो तो उस पर भी मुझे कोई आपत्ति नहीं। हर जगह भाषाई शालीनता और तथाकथित शिष्टाचार दिखाने के पाखंड में मेरा कोई भरोसा नहीं है।

वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन के इस फेसबुक पर पोस्ट पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Ashok Priyadarshi सर मैं भी तो इसी का मारा हुआ हूं… और आपने ठीक ही लिखा है कि पिछले दो दशक के दौरान लगभग सभी बडे अखबारी संस्थानों का कारपोरेटीकरण हो चुका है और कारपोरेट संस्कृति में मानवीय संवेदना की कोई जगह नहीं होती। वहां होती है सिर्फ क्रूरता, निर्ममता और बेतहाशा मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति। वहां खुद्दार और ईमानदार लोगों को प्रबंधन हिकारत भरी नजरों से देखता है। ऐसे संस्थानों में संपादक का ज्यादा पढा-लिखा, समझदार और संवेदनशील होना कोई मायने नहीं रखता। प्रबंधन के लोग चूंकि आमतौर पर बेहद डरपोक होते हैं लिहाजा वे अपने यहां कार्यरत किसी पत्रकार से सीधे उलझने से बचते हैं। उन्हें संपादक के रूप में ऐसे व्यक्ति की दरकार होती है जो उसके इशारे पर या उसके इशारे के बगैर ही किसी भी उसूल पसंद और खुद्दारी के साथ काम करने वाले व्यक्ति की बिना झिझक गर्दन नाम सके, प्रबंधन के झुकने का कहने पर लेट जाए और प्रबंधन के कहने पर घटिया से घटिया काम करने को तत्पर रहे। और श्रवण गर्ग इन सारी कसौटियों पर पूरी तरह खरे उतरते रहे हैं…

Anil Sinha व्यकिगत आरोप-प्रत्यारोप से बचता हूं। लेकिन आपकी टिप्पणी पर चुप रहा तो बेईमानी हेागी। आज के संपादकों का चित्रण एकदम सही है। श्रवण जी ने मुझे उस समय तकलीफ दी जब अपने जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा था। अगर बेईमानी और चाटुकारिता करता तो कठिनाई में नहीं होता। उन्होंने न्यूनतम सहृदयता भी न दिखाई। अफसोस है कि जेपी की जिस राजनीतिक विरासत से वह आए हैं, अपना ताल्लुक भी उसीसे रहा है। लेकिन उन्होंने उसका लिहाज भी नही रखा है। आपकी इस बात से सहमत हूं कि वह पत्रकारिता के पतनशील दौर में संपादक हुए। इस दौर में ऐसे ही संपादकों की जरूरत है।

Sandeep Kumar मैंने भी न्यूज रूम में उनकी वीरता (पढ़ें) क्रूरता के कई किस्से सुने हैं. मसलन, अपने कक्षा में डोसा खाते-खाते किसी सहकर्मी को इतना जलील करना कि वह बेहोश ही हो जाये. दिल्ली भास्कर को उनके कार्यकाल में कई मित्र कैंसर अस्पताल बुलाने लगे थे क्योंकि उनके आते ही वहां मुर्दनी छा जाती थी. आने के बाद किसी एक साथी क्लास लगाना और बाकी को औकात में ला देना उनकी टैक्टिस थी. शायद यही वजह थी कि भास्कर से उनकी विदायी के वक्त एक औपचारिक पार्टी तक नहीं दी गयी. किस्साकोताह यह कि बड़े बेआबरू होकर जनाब वहां से निकले. लेकिन इससे कोई सीख न लेते हुए नईदुनिया में नए सिरे से उपदेशक बन गए. व्यक्ति नहीं प्रवृत्ति है, जिससे दूरी ही बचाव की एकमात्र गारंटी है.

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