डरिए, दिल्ली-एनसीआर में बुरा हाल कर रखा है कोरोना ने, देखें वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त के रिश्तेदारों के साथ क्या हुआ!

जयशंकर गुप्त

मन बहुत दुखी और आक्रोशित है. दो दिन पहले 16 जून को कोरोना से संघर्ष में हमारे रिश्तेदार हरिनारायण राम बरनवाल ने एम्स में दम तोड़ दिया थी. आज उनकी बहू, हमारी भतीजी ललिता भी कोरोना से लड़ते हुए हम सबको अलविदा कह गई. उसकी उम्र 40 साल पूरा होने को थी.

उससे पहले 13 जून को हमारे रिश्तेदार, सेवानिवृत्त आईआरएस अधिकारी, मुंबई के मुख्य आचकर आयुक्त रहे, लेखक, साहित्यकार, अनुवादक, इतिहासकार और एक बहुत ही सहृदय इन्सान वुरेंद्र कुमार बरनवाल जी का निधन यहीं मैक्स सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में हुआ थी.

लेकिन हरिनारायण राम और उनकी बहू के निधन ने केंद्र हो अथवा दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य और चिकित्सा तथा कोरोना संकट से निबटने के उनके दावों और इंतजामों के सच को उजागर कर दिया है. हरिनारायण जी की बीमारी और अस्पतालों में उनके भटकने के बारे में हमने 6 जून को ही ट्वीट किया था. उसके दो तीन दिन पहले से ही उन्हें हल्के बुखार, खांसी और सांस लेने में परेशानी की शिकायत थी.

मेरे कहने पर उनके बच्चे उन्हें लेकर जीटीबी अस्पताल गये जहां कोरोनाग्रस्त मरीजों का इलाज हो रहा है. वहां डाक्टरों ने बिना किसी तरह की जांच किए, बातचीत के आधार पर कह दिया कि वह कोरोना पॉजिटिव नहीं हैं. उन्हें बगल के दीन दयाल अस्पताल में रेफर कर भेज दिया गया. वहां उनके कोरोना संक्रमित होने के लक्षण बताकर वापस जीटीबी अस्पताल भेज दिया गया.

वहां से एक बार फिर उन्हें राजीव गांधी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल भेजा गया. वहां से कहीं और.

कुल मिलाकर दिन भर इस अस्पताल से उस अस्पताल भटकने के बाद हमारे एक वरिष्ठ पत्रकार मित्र के जरिए अगली सुबह राममनोहर लोहिया अस्पताल में उन्हें देखा गया. वहां भी बिना जांच किए कहा गया कि उन्हें कोरोना संक्रमण नहीं है. लेकिन एक्सरे के आधार पर उन्हें सांस लेने में दिक्कत और ऑक्सीजन की कमी बताई गई और कहा गया कि उन्हें आईसीयू में भर्ती करना पड़ेगा. लेकिन इसके लिए उनके पास आईसीयू में बेड खाली नहीं है.

पत्रकार मित्र ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन के यहां से कहलवाकर सफदरजंग अस्पताल में बेड का इंतजाम होने की बात कही. वहां जिस डाक्टर का संपर्क मिला था, उन्होंने उनके लिए ‘स्पेशल बेड’ का इंतजाम करने की बात कही. बच्चे बाहर इंतजार करते रहे, लेकिन डा. वरुण बिना कुछ बताए घर चले गये. फिर किसी तरह हमारे पत्रकार मित्र शशिधर पाठक के सहयोग से एम्स में किसी संपर्क के जरिए रात को उन्हें वेंटिलेटर पर रखकर इलाज शुरू किया गया.

अगले दिन जांच में पता चला कि वह कोरोना संक्रमित हैं. उन्हें एम्स के ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कर लिया गया. इस बीच उनके परिवार के शेष आठ सदस्यों की सुध किसी ने भी नहीं ली. उनके घर सभी के मोबाइल फोन में आरोग्य सेतु नाम का एप डाउनलोडेड है. लेकिन कहीं से कोई पता-जांच करने नहीं आया और न ही उनके घर, गली को सैनिटाइज करने की आवश्यकता समझी गई.

परिवार के सदस्यों ने खुद ही जाकर पास के किसी सरकारी अस्पताल में जांच करवाई तो पता चला कि आठ में से सात सदस्य पॉजिटिव हैं. हमने 16 जून को उनके बारे में भी ट्वीट किया. लेकिन मंत्री, मुख्यमंत्री, कहीं से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली. अलबत्ता हमारे करीबी, आम आदमी पार्टी के विधायक सोमनाथ भारती ने हर तरह की मदद का आश्वासन दिया.

इस बीच 16 जून की शाम को हमारे रिश्तेदार हरिनारायण जी ने दम तोड़ दिया. इधर घर में उनकी बहू, हमारी भतीजी (साले, स्व. ओमप्रकाश बरनवाल की पुत्री) ललिता को भी खांसी और सांस लेने में तकलीफ बढ़ने लगी.

17 जून को अपने पिता की अंत्येष्टि कर लौटने के बाद ललिता की तकलीफ बढ़ने लगी. सोमनाथ भारती जी की मदद से उसे दिलशाद गार्डेन में स्थित राजीव गांधी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में ले जाया गया. हालांकि वह डरी हुई थी और अस्पताल जाने से मना कर रही थी लेकिन परिवार और हमारे दबाव पर वह वहां भर्ती हो गई.

अस्पताल से आधी रात में उसकी हालत और बिगड़ने और आईसीयू में ले जाने की सूचना दी गई. और आज 18 जून की सुबह उसके परिवार के लोगों को अस्पताल में बुलाकर ललिता के निधन की सूचना दी गई.

फोन पर मिली सूचना के बाद से ही मुझे ललिता के रो रो कर यह कहने की बात याद आ रही है, बुआ, फूफा जी मैं अस्पताल नहीं जाना चाहती!

परिवार के ऊपर टूटे दुखों के पहाड़ और मुश्किलों को पढ़ा जा सकता है, महसूस नहीं किया जा सकता. ललिता के ऊपर से उसके पिता-माता का साया पहले ही उठ गया था. सास भी नहीं थी और श्वसुर का निधन तीन दिन पहले हो गया.

परिवार में अब ललिता के पति श्रवण, दो बच्चे, देवर संतोष, देवरानी और उसके भी दो बच्चे बचे हैं. इनमें से भी छह लोग कोरोना से संक्रमित हैं. कोरोना जनित लॉकडाउन में हर तरह के संकट का सामना करना पड़ रहा है.

मेरे लिए सबसे बड़ा कष्ट सपरिवार करीब होते हुए भी उनके पास जा नहीं सकने, किसी तरह की मदद नहीं कर पाने और उनके दुख में शरीक भी नहीं हो पाने का है. लेकिन हमारी राजनीति और सरकारों को इस तरह की मुश्किलों और संवेदनाओं से क्या वास्ता.

आप इस परिवार की बेहतरी के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर सकें, इसीलिए निहायत निजी गम होने के बावजूद इसे साझा कर रहा हूं.

लेखक जयशंकर गुप्त देश के जाने माने वरिष्ठ पत्रकार हैं.



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