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सुख-दुख

अलविदा अर्चना कांप्लेक्स… : दिल्ली की इस इमारत में आज NDTV का आखिरी दिन है!

रवीश शुक्ला-

अलविदा अर्चना कांप्लेक्स… 19 नवंबर 2007 को पीले रंग के माँ के हाथ का आधी बांह का स्वीटर पहने..डरा..घबराया रवीश शुक्ला यहाँ पहुँचा था..पत्रकारिता के जिन बड़े लोगों को देखकर NDTV में काम करने का सपना पाला..अर्चना कांप्लेक्स ने उन सभी को यहाँ समेट रखा था…आज अर्चना कॉम्प्लेक्स को जी भर देखा इस आफिस के हर कोने में सैकड़ों यादें रची बसी लगी..मानों वो कह रही हो हमें कहाँ छोड़कर जा रहे हो..ज़िंदगी का नाम ठहरना नहीं है बदलना है..यहाँ की सबसे बड़ी सीख पत्रकार से पहले अच्छे नागरिक बनों..आज अर्चना कांप्लेक्स की पुरानी यादों को समेट कर NDTV के नए आफिस की ओर रवाना होते हुए..


विनीत कुमार-

दिल्ली के जिस अर्चना कॉम्प्लेक्स, जीके-1 से अब तक एनडीटीवी संचालित होता रहा, आज उसका आख़िरी दिन है. मैं महसूस कर सकता हूं कल से अर्चना कॉम्प्लेक्स और उसके आसपास कैसी वीरानगी छा जाएगी. मैंने वीडियोकॉन टॉवर, झंडेवालान से आजतक को नोएडा शिफ्ट होने के बाद, उस इलाके की वीरानगी देखी है. आज भी जाने पर महसूस होता है.

अर्चना कॉम्प्लेक्स से मेरा बहुत पुराना नाता रहा है. तक़रीबन बारह साल तक एनडीटीवी स्टूडियो जाते हुए न जाने कितनी बार इसकी सीढ़ियों से चढ़ा-उतरा. मैं अमूमन प्राइम टाइम शो के लिए आता. लौटते हुए बहुत देर हो जाती तो कई बार वहीं एम ब्लॉक में डिनर करने रूक जाता. शो ख़त्म होने के बाद जब मोबाईल ऑन करता तो दनादन इतने फोन आते कि कई बार घबराहट होने लग जाती.

पहली बार से लेकर आख़िरी बार कब-कब गया, क्रम से याद है जबकि जाने की संख्या पचास बार से ज़्यादा रही होगी. तब स्वामी अग्निवेश बिग बॉस में गए थे और काफी विवाद हो गया था. उन दिनों मैं टीवी पर तहलका में कॉलम लिखता. पहली बार एनडीटीवी से सुशील महापात्र का फोन आया कि प्राइम टाइम के लिए आना है. थोड़ी घबराहट और झिझक के साथ गया, उसके बाद तो सिलसिला शुरु हो गया.

एक बार कृष्ण जनमाष्टमी का दिन था. उड़ीसा की एक ख़बर आयी कि एक व्यक्ति अपनी पत्नी के मृत शरीर को अस्पताल से बीस किलोमीटर से भी ज़्यादा जैसे-तैसे कंधे पर लादकर ला रहा है. मेरी कॉलोनी में त्यौहार को लेकर तब काफी शोर था. नौ बजे के हिसाब से बहुत देर से कॉल आयी थी लेकिन चला गया. इस पर मैंने अपनी बात कही, मीडिया कवरेज को लेकर कहा. माँ तब थोड़ी उदास हो गयी- ई कैसा काम पकड़ लिया है मेरा बच्चा, सालभर के पर्व में इस तरह का समाचार पर एक सांस में बोलते गया तुम.

एक बार स्थिति ऐसी बनी कि मैं स्टूडियो जा नहीं पाया तो ओबी वैन आ गयी. आउट्रमलाइन में मेरे घर के आगे वैन लगी और दनादन उससे तार निकलकर कॉलोनी से मेरे घर आने लगे तो पड़ोसी एकदम से घबरा गए. आंटी हाँफते हुए आयीं- वनीत, वनीत! ये क्या कर लिया मेरा बच्चा? कुछ दुःख- तकलीफ थी तो अपनी आंटी से कहना, ये क्या कर लिया पुत्तर?

हड़बड़ाकर मैं बाहर निकला तो आंटी पर नज़र गयी. वो देखकर अवाक्. मेरा पुत्तर! बालकनी में झांका तो कई लोग जमा थे. कहानियां बन चुकी थी- सिंगल रहता था. होएगा कोई बंदी का लफड़ा..लेकिन इससे कोई सुसाइड थोड़े ही न कर लेता है.. आधे घंटे बाद मैं एनडीटीवी स्क्रीन पर लाइव था.

फ़ेक न्यूज को लेकर इतने विस्तार से पहली बार कोई चैनल शो करने जा रहा था. मैं उस दिन बहुत पहले चला गया. रविश सर से लंबी देर तक बात हुई और फिर हमने इस बातचीत को शो पर अगले दिन भी जारी रखा.

मैं दिन के शो में कभी एनडीटीवी नहीं गया. हमलोग के लिए जाता भी तो वीकेंड पर और जाने पर वो रौनक रहती नहीं लेकिन जब भी उधर से दिन में गुज़रता, गेट पर रुककर समोसे ज़रूर खाता. मेरे भीतर बारह साल में इस कॉम्प्लेक्स को लेकर, एनडीटीवी के बहाने कई सारी यादें जमती गयीं. बाद के दिनों में पीछे की सीढ़ियों से उतरकर पार्किंग होते हुए सड़क पर आना..वो सब यादवाली मोटी किताब के लिए. अभी बस इतना कि अर्चना कॉम्प्लेक्स से गुज़रते हुए एक हूक सी ज़रूर उठेगी.

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3 Comments

3 Comments

  1. Ajay

    July 27, 2024 at 9:38 pm

    नाम तो New delhi tele vision (ndtv) है और हो गए दिल्ली से ही बाहर

    क्या हालत हो गई बेचारे इस चैनल की

  2. Sanju Tripathi

    July 28, 2024 at 10:54 am

    Anyone can fathom the trauma experienced by NDTV’s entire staff due to parting with the Archana Complex in Greater Kailash. If I felt so emotional, imagine the condition of those who have a treasure of precious memories there.

  3. कुलदीप

    July 28, 2024 at 11:19 pm

    Ndtv के शेयर धारकों की वार्षिक सभा वायु सेना के सुबरओटे पार्क धोला कुआ दिल्ली में हो रही थीं इस बैठक में परणय राय के साथ infoysis के चेयरमैन नारायण मूर्ति भी थे । मीटिंग की कार्य वाही को देखकर लगा कि जो मीडिया प्रभारी दूसरों की खबर लेता है स्वयं मे दीपक तले अंधेरा के समान है । नारायण मूर्ति जी को माइक में आकर कहना चाहता था कि आप जैसें सत्य पुरष क्यों इस NDTV Company के बोर्ड में बने हुए हो ।लेकिन चाटुकारों ने माइक तक नहीं पहुंचने दिया । बरषो बाद ऱवीश कुमार के कारनामों से ईसका जो हाल बेहाल हुआ इसको होना ही था । ईसकी विश्वशनीयता अब एक सवाल बन गई है ।

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