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सियासत

लोग आत्महत्या कर सकते हैं पर गलत का विरोध नहीं कर सकते!

चरण सिंह-

से अंधभक्ति कहें, इसे किसी पार्टी के प्रति अंध आस्था कहें, इसे बेवकूफी कहें या फिर मीडिया का बरगलाना कि आज का समाज नेताओं के भ्रम जाल में पूरी तरह से फंस चुका है। चुपके से घरेलू गैस सिलेंडर की सब्सिडी खत्म कर दी, सरकारी स्कूल बंदी के कगार पर हैं। प्राइवेट स्कूल और अस्पताल में धंधे के अलावा कुछ नहीं हो रहा है। खाद्यान्न पदार्थों में इतनी मिलावट कि आदमी जो खा रहा है वह फायदा कम और नुकसान ज्यादा कर रहा है। नेता, ब्यूरोक्रेट्स और उद्योगपति मलाई चाट रहे हैं और आम आदमी बेचारा बेबसी की जिंदगी जी रहा है। इन सबके बावजूद किसी को कोई चिंता नहीं।

उत्तर प्रदेश में 50 से कम बच्चों वाले सरकारी स्कूलों को बंद करने की तैयारी कर ली गई थी। विरोध के चलते फ़िलहाल मामला अभी शांत है। इस पर कोई ध्यान देने को तैयार नहीं कि इन सरकारी स्कूलों में बच्चे लगातार कम क्यों हो रहे हैं?

उत्तर प्रदेश में ही 2014 में हाई कोर्ट के जज सुधीर अग्रवाल ने एक आदेश दिया था जिसमें सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के बच्चों की सरकारी स्कूलों में पढ़ने की अनिवार्यता थी। न तो अखिलेश सरकार इस आदेश को लागू करा पाई और न ही योगी सरकार। कोई पूछने वाला नहीं है। जरा सोचो यदि यह आदेश उत्तर प्रदेश में लागू हो जाता तो सरकारी स्कूलों की दुर्गति होती?

क्यों नहीं पूछा जाता कि सरकार से मोटी सेलरी लेने वाला व्यक्ति अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं पढ़ाता है? क्यों नहीं सरकारी अस्पतालों में अपने परिवार का इलाज कराता है? क्यों नहीं प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्री अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाते हैं? क्यों नहीं सरकारी अस्पतालों में इलाज कराते हैं? जिस दिन जिले के डीएम, एसएसपी, विधायक और सांसद के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ने लगे, सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने लगेंगे। उस दिन देश के सरकारी स्कूल और अस्पताल प्राइवेट स्कूलों और अस्पतालों को पीछे छोड़ देंगे। इसका मतलब साफ़ है कि सरकारें ही शिक्षा और चिकित्सा माफिया को बढ़ावा दे रहे हैं और लोगों को बेवकूफ बना रही हैं।

किसी को कोई चिंता नहीं कि शिक्षा पर लाखों खर्च करने वाले अधिकतर युवा 10-12 हजार की नौकरी पाने को मजबूर हैं। हो भी क्यों न? राजनीतिक दलों ने जाति और धर्म की चाशनी जो चाटने को दे रखी है। युवाओं को कोई चिंता नहीं कि उनके भविष्य का क्या होगा?

जमीनी हकीकत तो यह है कि आज के अधिकतर युवाओं के मां बाप, दादा दादी ने कुछ बचत कर रखी है जो आज की पीढ़ी का गुजारा हो रहा है। नहीं तो यदि ऐसे ही चलता रहा तो आने वाले समय में अधिकतर युवा अपना खर्च भी नहीं उठा पाएंगे। नेता इनके दिमाग में जाति और धर्म का इतना जहर घोल देंगे कि इन्हें न तो अपने भविष्य की चिंता होगी और न ही देश और समाज की। नेता इनका इस्तेमाल करते रहेंगे और ये मानसिक रूप से बीमार होकर रह जाएंगे।

आज का युवा अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है। जैसा नेता और गोदी मीडिया पढ़ा रहा है उसकी समझ में वही आ रहा है। नेताओं और ब्यूरोक्रेट्स के बच्चे क्या कर रहे हैं। इससे आज के आम युवा को कोई मतलब नहीं। बस नेता जो झंडा पकड़ा दे रहे हैं उसे लेकर चल दे रहा है।

देश की महिलाएं बड़ी जागरूक मानी जाती है। क्या उन्हें नहीं पता कि उनकी किचन पर डाका पड़ चुका है। किचन में आने वाले गैस सिलेंडर की सब्सिडी चुपके से खत्म कर दी गई है। सरकार की मक्कारी देखिये कि पहले कहा गया कि सब्सिडी ग्राहक के बैंक खाते में आती रहेगी। कुछ दिन आई और चुपके से बंद कर दी। कोई पूछने वाला नहीं। भाई मोदी पीएम हैं। उनके होते हुए कुछ गलत हो नहीं सकता है। जानकारी मिल रही है कि किसानों के कृषि कार्ड के साथ ही इसी तरह का खेल होने लगा है।

सत्ता की तारीफ करने वाले क्या बताएंगे कि देश में रोजगार की स्थिति क्या है? सरकारी नौकरी कितनी है? प्राइवेट कंपनियों में कितनी सैलरी और कितनी छुट्टी हैं। स्थिति यह है कि लोग आत्महत्या कर सकते हैं पर गलत का विरोध नहीं कर सकते। उल्टे दो चार प्रतिशत जो लोग सब कुछ झेलकर अन्याय के खिलाफ लड़ रहे हैं। उनको भी बेवकूफ समझ रहे हैं। मजबूती देने के बजाय कमजोर कर रहे हैं। कुछ तो समझो। ऐसा न हो कि जब सब कुछ बर्बाद हो तब समझ में आये।

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