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सियासत

तो पिछले 15 साल तक न्यूज चैनलों ने भारत के इस सपूत के साथ क्या किया?

विनीत कुमार-

एक न्यूज चैनल के पुरुष और महिला एंकर यह कहते हुए कि भारत ने एक सच्चे सपूत को खो दिया, भारत का एक ऐसा बेटा जिसने बहुत मन से अपनी माँ की सेवा की, लगा अब रो देंगे. दोनों एंकर ने साथ में यह भी जोड़ा कि डॉ. मनमोहन सिंह ने ऐसी नीतियाँ बनायीं जिनसे कि समाज के अंतिम व्यक्ति को, हाशिए के लोगों को राहत मिली, बल मिला. आज भी सरकार कहीं न कहीं उन्हीं नीतियों को बनाए रखने की कोशिश करती नज़र आती है.

यह अंदाज़ अकेले किसी एक न्यूज चैनल का नहीं है. आप एक के बाद एक चैनल का रूख़ करेंगे तो पाएंगे कि हमारे बीच से विदा हुए भारत के प्रधानमंत्री-अर्थशास्त्री के डॉ. मनमोहन सिंह के बारे में वो सब बोल रहे हैं, बता रहे हैं जिनके वो लाभार्थी रहे हैं और जिन बातों को सालों से अपने भीतर दबाए रखा. किन कारणों से, इसके जवाब में पहले से दर्जनों पुस्तकें और आलेख मौज़ूद हैं. इन एंकरों की आवाज़ और बात में एक प्रायश्चित (confession) जैसा कि हमें “भारतमाता के इस सपूत” को समझने में चूक हुई है. वो इनके लिए बार-बार महानायक शब्द का प्रयोग कर रहे हैं.

आज देश के उन तमाम दर्शकों को बाक़ी सारे ज़रूरी काम से समझौते करके न्यूज चैनल देखने चाहिए जिससे कि वो बेहतर ढंग से समझ सकें कि कारोबारी मीडिया अपना चोला कैसे बदलता है ? कैसे वो टिपिकल मिडिल क्लास के चरित्र के साथ दुनिया के सामने आता है ! जिस मनमोहन सिंह के लिए इसने मौन मोहन सिंह और गांधी परिवार की इच्छाओं पर मुहर लगानेवाला बताता रहा, आज ये चैनल इन्हें स्वतंत्र शख़्सियत के तौर पर रेखांकित कर रहा है. ऐसा करते हुए या तो कल की इनकी बातें या फिर आज का उनका स्वांग नकली और बनावटी नज़र आने लग जा रहा है.

सवाल है कि कोजी जोन में बैठे, घर-घर तक अपने पूर्व प्रधानमंत्री को असफल, नाकाम, मौन रह जानेवाला व्यक्ति की छवि गढ़ने और फैलाने का काम किसने किया ? कौन सालों से विपक्ष को लोकतंत्र का दुश्मन बताने का काम करता आया है ? किसने कभी उनकी लिखी किताब, आलेख और आर्थिक सिद्धांतो पर लिखे शोध-पत्र की चर्चा नहीं कि जिनसे देश के करोड़ों नागरिक जान पाते कि हमारा प्रधानमंत्री कितना पढ़ा-लिखा विद्वान और अर्थशास्त्री है ? किसने इन्हें कांग्रेस का स्टैंड बाय उम्मीदवार बताया ?

इन सारे सवालों के साथ दर्शक आज यदि न्यूज चैनल देखते हैं तो बेहतर समझ सकेंगे कि मौसम बदलने के साथ हमारे न्यूज चैनल अपनी भाषा और अंदाज़ एकदम से बदल लेते हैं जिसका संबंध सच और झूठ से न होकर निहायत अपने मतलब और स्वार्थ पर जाकर टिक जाना होता है. इनकी चिंता में देश और इसके नागरिक होते ही नहीं.

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