Connect with us

Hi, what are you looking for?

सुख-दुख

निदा साहब के साथ मुहब्बत के जाम और आखिरी शाम

सन 2010 की सर्द शाम की बात है। उस दिन ग्वालियर व्यापार मेल में मुशायरे होना था।मुशायर के लिए ही निदा फ़ाज़ली शहर में थे।हमेशा उनके साथ चाय या कुछ और पीना तय रहता था। मैं उन दिनों नईदुनिया में सम्पादक था।मुशायरा सुनने जाना ही था सो दफ्तर से निकलने की तैयारी में था। अचानक देखता क्या हूँ कि मेरे अज़ीज़ दोस्त और शायर मदनमोहन ‘दानिश’ के साथ निदा फ़ाज़ली साहब दफ्तर में मेरे सामने हैं। अपनी वही जानी पहचानी मुस्कराहट के साथ। उफ़ क्या सादगी थी निदा साहब में।

सन 2010 की सर्द शाम की बात है। उस दिन ग्वालियर व्यापार मेल में मुशायरे होना था।मुशायर के लिए ही निदा फ़ाज़ली शहर में थे।हमेशा उनके साथ चाय या कुछ और पीना तय रहता था। मैं उन दिनों नईदुनिया में सम्पादक था।मुशायरा सुनने जाना ही था सो दफ्तर से निकलने की तैयारी में था। अचानक देखता क्या हूँ कि मेरे अज़ीज़ दोस्त और शायर मदनमोहन ‘दानिश’ के साथ निदा फ़ाज़ली साहब दफ्तर में मेरे सामने हैं। अपनी वही जानी पहचानी मुस्कराहट के साथ। उफ़ क्या सादगी थी निदा साहब में।

मैंने उठ कर उनका इस्तकबाल किया।निदा साहब खूब देर बतियाते रहे। उन दिनों नईदुनिया में हर दिन शाम के वक्त सारे संस्करणों के संपादकों की फोन पर कॉन्फ्रेंस कॉल होती थी। निदा साहब बैठे ही थे तभी कॉन्फ्रेंस कॉल का वक्त हो गया। हेड ऑफिस इंदौर से संपादक जयदीप कर्णिक की घंटी बजी। मैंने जब जयदीप और एम पी छत्तीसगढ़ के सभी संपादकों (भोपाल से Girish Upadhyay, जबलपुर से Vibhuti Sharma, रायपुर से Ravi Bhoi और बिलासपुर से drsunil Dr-Sunil Gupta) को बताया कि निदा साहब इस वक्त मेरे साथ हैं तो सब उनसे बात करने को बेताब हो गए। निदा साहब ने स्पीकर फोन पर सभी सम्पादकों से दुआ सलाम की और जयदीप भाई की गुजारिश पर शे’र भी सुनाये। संपादकों की टेली कॉन्फ्रेंस में ख़बरों के बीच निदा साहब से गुफ़्तुगू एक यादगार लम्हा बन गयी।

Advertisement. Scroll to continue reading.

xxx

Advertisement. Scroll to continue reading.

निदा फ़ाज़ली रुखसत हो गए।अपने वालिद मरहूम से जिस तरह निदा ने कहा कि तुम्हारी कब्र में मैं हूँ तुम मुझमें ज़िंदा हो, उसी तरह वे खुद अपनी कब्र में रहेंगे लेकिन उनके लफ्ज़ हम सब में ज़िंदा रहेंगे। अभी जुमा जुमा दो महीने पहले की ही तो बात है। अपने शहर ग्वाल्हेर में आई टी एम के प्रोग्राम”इबारत” में आये थे।एक शाम पहले होटल सेन्ट्रल पार्क के कमरे में निदा साहब, दोस्त मदनमोहन ‘दानिश’ और मैं गपशप के लिए बैठे।मैंने अपना कविता संग्रह “बसंत के पहले दिन से पहले” उन्हें दिया। दानिश ने उन्हें बताया कि  मेरी किताब में ज्यादातर प्रेम कवितायेँ हैं तो वे हुलस पड़े।

फिर तो निदा साहब ने प्रेम, इश्क, मोहब्बत पर हमें इस तरह सराबोर किया कि हम पर ‘पैमाने’ से ज्यादा उनकी बातों का नशा छाता गया। बाबा फरीद से लेकर परवीन शाकिर तक के हवाले से निदा साहब की ज़ुबानी मैं और दानिश मुहब्बत के दरिया में डूबते उतराते रहे। आज के दौर पर थोड़ा उदास होकर निदा साहब बोले कि अब तो खिड़की तक का रास्ता चटपट तय हो जाता है। पहले खिड़की पर दिखते चेहरे से नज़रें मिलाने में ही न जाने कितना वक्त लगता था। वो कहते कि दुनिया को बचाने के लिए प्रेम को बचाया जाना सबसे ज़रूरी है।

Advertisement. Scroll to continue reading.

आधी रात बाद तक हम निदा साहब को सुनते और गुनते रहे।क्या पता था कि 28 नवम्बर ’15 की उस शाम के जाम हमारे साथ के आखिरी जाम होंगे। ग्वालियर उनका अपना शहर है सो चाहे मेले का मुशायरा हो,इबारत हो या कोई और मौका वे हमेशा आने को तैयार रहते।बीते न जाने कितने बरसों में ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि वे ग्वालियर आएं और हमारी मुलाकात न हो। वे मुझे मोहब्बत से पाठक साहब बुलाते। मंच से हर बार मेरा नाम लेकर एक दो शे’र मेरी नज़र करते। आप बहुत याद आएंगे निदा साहब। खुदा हाफिज। और हां.. “कभी फुरसत मिले तो अपनी गज़लें सुनने चले आना”, यहाँ लाखों मुरीद हैं जिन्हें आपकी सारी गज़लें ज़ुबानी याद हैं।

लेखक डॉ राकेश पाठक डेटलाइन इंडिया के प्रधान संपादक हैं.

Advertisement. Scroll to continue reading.

इसे भी पढ़ें…

यशवंत ने निदा फ़ाज़ली को कुछ इस तरह दी श्रद्धांजलि (देखें वीडियो)

Advertisement. Scroll to continue reading.
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Advertisement

भड़ास को मेल करें : [email protected]

भड़ास के वाट्सअप ग्रुप से जुड़ें- Bhadasi_Group_one

Advertisement

Latest 100 भड़ास

व्हाट्सअप पर भड़ास चैनल से जुड़ें : Bhadas_Channel

वाट्सअप के भड़ासी ग्रुप के सदस्य बनें- Bhadasi_Group

भड़ास की ताकत बनें, ऐसे करें भला- Donate

Advertisement