डॉ राकेश पाठक बने “कर्मवीर” के प्रधान संपादक

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भोपाल। वरिष्ठ पत्रकार व कवि डॉ राकेश पाठक को “कर्मवीर” के ‘प्रधान संपादक’ का दायित्व सौंपा गया है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दादा माखनलाल चतुर्वेदी सन 1920 में प्रारम्भ “कर्मवीर” के संस्थापक संपादक थे। वर्तमान में पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर के पास ‘कर्मवीर’ का सर्वाधिकार है। श्रीधर जी ने ‘कर्मवीर’ का दायित्व डॉ पाठक को सौंपा है। पहले चरण में “कर्मवीर” न्यूज़ पोर्टल/ वेबसाइट के रूप में अगले कुछ दिनों में प्रारम्भ होगा। ‘कर्मवीर’ पत्रिका का प्रकाशन विवेक श्रीधर के संपादन में नियमित हो रहा है। अगले चरण में ‘कर्मवीर’ अख़बार के रूप में पुनः प्रकाशित होगा।

उल्लेखनीय है कि डॉ राकेश पाठक नईदुनिया, नवभारत, नवप्रभात,प्रदेशटुडे जैसे प्रतिष्ठित अखबारों में वर्षों तक संपादक रहे हैं। इसके अलावा न्यूज़ पोर्टल “डेटलाइन इंडिया” के ‘प्रधान संपादक’ रहे। ‘सांध्य समाचार’ से पत्रकारिता शुरू करने वाले डॉ पाठक ने स्वदेश, सांध्यवार्ता, आचरण, लोकगाथा आदि अखबारों में भी काम किया। उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकीं हैं। हाल ही में डॉ पाठक को उनके कविता संग्रह “बसंत के पहले दिन से पहले” के लिए राष्ट्रीय स्तर का “हेमंत स्मृति कविता सम्मान” देने की घोषणा की गई है। इसके अलावा अनेक सम्मान और पुरस्कार उन्हें मिल चुके हैं।

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नेहरू की पहल पर कांग्रेस में आईं थीं राजमाता सिंधिया

डॉ राकेश पाठक

आज पं जवाहरलाल नेहरू का जन्म दिन है। आइये नेहरू के ग्वालियर से सरोकार की पड़ताल करते हैं। दरअसल रियासतों के विलय के बाद जब “मध्य भारत” राज्य बना तो तत्कालीन सिंधिया शासक जीवाजी राव सिंधिया नेहरू जी की ही सम्मति से “राज प्रमुख”(वर्तमान राज्यपाल समान पद) बनाये गए। आज़ादी के बाद के शुरुआती वर्षों में ग्वालियर हिन्दू महासभा का गढ़ था। सबसे पहले सांसद भी हिमस के ही थे। दूसरे आम चुनाव से पहले पं नेहरू के आग्रह पर तत्कालीन महारानी विजयाराजे सिंधिया कांग्रेस में शामिल हुईं और 1957 का लोकसभा चुनाव गुना सीट से लड़ा। सिंधिया राजघराने की लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह पहली आमद थी।उन्होंने हिन्दू महासभा के दिग्गज विष्णुपंत घनश्याम देशपाण्डे को करारी शिकस्त दी।

17 जुलाई 1961 को जीवाजीराव सिंधिया का देहांत हो गया। सं 1962 का आमचुनाव सामने था। राजमाता शोक के कारण चुनाव लड़ने को अनिच्छुक थीं। लेकिन नेहरू के व्यक्तिगत आग्रह पर वे ग्वालियर से लोकसभा चुनाव लड़ीं। अब तक भारतीय जनसंघ का उदय हो चुका था। जनसंघ ने माणिकचंद बाजपेयी को राजमाता के खिलाफ प्रत्याशी बनाया।  इसी चुनाव के मौके पर जवाहरलाल नेहरू ग्वालियर आये। एस ए एफ ग्राउंड पर आमसभा हुई।तब डॉ रघुनाथ राव पापरीकर महापौर थे। इस सभा की जिम्मेदारी उन पर ही थी। नेहरू जी को देखने,सुनने के लिए पूरी गालव नगरी उमड़ पड़ी। मंच पर नेहरू जी के साथ इंदौर की भूतपूर्व महारानी शर्मिष्ठा देवी भी थीं।

राजमाता विजयाराजे शोक के कारण जयविलास महल में ही रहीं और एक दो अवसर के अलावा प्रचार के लिए भी नहीं निकलीं। उन्होंने माणिकचंद बाजपेयी को भारी अंतर से हराया।बाद में बाजपेयी ने राजनीति से नाता तोड़ लिया और प्रखर और सम्मानित पत्रकार के रूप में स्थापित हुए। बताना मुनासिब होगा कि राजमाता के कांग्रेस में प्रवेश के साथ ही इस अंचल में हिन्दू महासभा के सफाया हो गया।कालांतर में द्वारिकप्रसाद मिश्र से विवाद होने पर इंदिरा गांधी के दौर में राजमाता जनसंघ में शामिल हो गईं। नेहरू की आमसभा और उनका करिश्माई व्यक्तित्व लंबे समय लोगों की चर्चायों में दर्ज रहा।

दुर्लभ चित्र- ये तस्वीर SAF ग्राउंड की आमसभा की है जिसमें नेहरू जी के साथ महारानी शर्मिष्ठा देवी और डॉ रघुनाथराव पापरीकर साथ हैं।

लेखक डा. राकेश पाठक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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डॉ राकेश पाठक को हेमंत स्मृति कविता सम्मान

नई दिल्ली। संवेदनशील कवि और वरिष्ठ पत्रकार डॉ राकेश पाठक को  प्रतिष्ठित “हेमंत स्मृति कविता सम्मान” देने  की घोषणा की गई है। हेमंत फाउंडेशन द्वारा स्थापित यह सम्मान उनके कविता संग्रह ” बसंत के पहले दिन से पहले” (दख़ल प्रकाशन से प्रकाशित )के लिए दिया जा रहा है। पुरस्कार समिति के संयोजक वरिष्ठ साहित्यकार भारत भारद्वाज ने यह घोषणा की।

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राकेश जी खामोशी से लेखन करने वाले सशक्त हस्ताक्षर हैं जिनकी कविताओं में शब्द सीमित और भाव असीमित होते हैं। ग्वालियर (मप्र) निवासी डॉ पाठक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ‘नईदुनिया’ , ‘नवभारत,’ ‘नवप्रभात’, ‘प्रदेश टुडे ‘जैसे अखबारों के संपादक और न्यूज़ पोर्टल ‘डेटलाइन इंडिया’ के प्रधान संपादक रहे हैं। उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकीं हैं। हेमंत फाउंडेशन की अध्यक्ष संतोष श्रीवास्तव व सचिव डॉ प्रमिला वर्मा ने बताया कि डॉ राकेश पाठक को यह सम्मान जनवरी 2018 में मुम्बई में आयोजित समारोह में प्रदान किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि डॉ पाठक से पहले  राष्ट्रीय स्तर का यह सम्मान बोधिसत्व, संजय कुंदन,वाज़दा खान,आलोक श्रीवास्तव,हरि मृदुल,लीना मल्होत्रा, एकांत श्रीवास्तव,हरे प्रकाश उपाध्याय, यतीन्द्र मिश्र, कृष्णमोहन झा, रीता दास राम आदि को मिल चुका है।

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मीडिया को गरियाने से पहले मोदी के उपासक पढ़ लें ताजे और पुराने घपलों-घोटालों की यह लिस्ट

जिन मई ’14 से पहले अखबार नईं वेख्या…

सबसे पहले प्रतिष्ठित रचनाकार असगर वज़ाहत Asghar Wajahat साहब से माफ़ी कि उनके कालजयी नाटक “जिन लाहौर नहीं वेख्या” से मिलता जुलता शीर्षक रख रहा हूँ। बात दरअसल ये है कि इस वक्त एक पूरी जमात उठ खड़ी हुयी है जिसने 16 मई 2014 से पहले न अखबार देखे हैं न टीवी का रिमोट हाथ में उठाया था। और इसीलिए यह जमात देश के प्रधानमंत्री और सत्ताधारी पार्टी की आलोचना पर छाती कूटने लगती है। भाई लोग ऐसे कलपते, किकियाते, बिलबिलाते हैं मानो इससे पहले कभी किसी प्रधानमंत्री के खिलाफ एक शब्द भी न लिखा गया हो न बोला गया हो।

इन लोगों को लगता है कि उनके देवतुल्य शिखर पुरुष को “पवित्र” महामानव माना जाये और एक भी सवाल न पूछा जाये। अरे भाइयो भैनो… देश ने खुद अपनी ख़ुशी से प्रधानमंत्री और सरकार को चुना है, कोई देवलोक से अवतार प्रकट नहीं हुआ है। इसलिए जब जब ज़रूरी होगा सवाल भी पूछे जायेंगे , उंगली भी उठेगी। इस कलपती हुयी जमात की जानकारी के लिए बता दिया जाये कि नेहरू से लेकर मनमोहन तक कलमकारों ने कभी किसी को नहीं छोड़ा। ये पत्रकार ही हैं जो सन् 47 से आज तक सब से सवाल करते रहे हैं।पत्रकारिता हमेशा सत्ता का प्रतिपक्ष और जनता के हक़ में रही है। तमाम खामियों के बावज़ूद ऐसी ही रहेगी।यही उसका ईमान है। हां ये हमारा फ़र्ज़ है, जिम्मा है और पेशा भी। “कोऊ नृप होये, हमें तौ सवालयि पूछनें…”

आइये जान लीजिये कुछ बड़े मामले जो पत्रकारिता ही देश दुनिया के सामने लेकर आई~~

नेहरू युग
कृष्ण मेनन का जीप घोटाला
टी टी कृष्णमचारि कांड
सिराजुद्दीन काण्ड
चीन युद्ध में विफलता

शास्त्री युग
प्रताप सिंह कैरों का मामला

इंदिरा युग
अंतुले का प्रतिभा प्रतिष्ठान काण्ड
तानाशाही तौर तरीकों का खुलासा
आपातकाल का घनघोर विरोध

जनता पार्टी युग
मोरारजी को सी आई ए एजेंट बताने वाला कांड
जनता पार्टी की कलह

राजीव युग
बोफोर्स तोप घोटाला
प्रशासनिक नाकामी का खुलासा

नरसिंह राव युग
झामुमो रिश्वत काण्ड

अटल युग
एनरॉन समझौता कांड
रिलायंस प्रमोद महाजन कांड

मनमोहन युग
टू जी घोटाला
कोयला घोटाला
कॉमन वेल्थ घोटाला

ये सब उन लोगों को नहीं मालूम जिन्होंने 16 मई 2014 से पहले न अखबार पढ़े न टीवी देखा। तभी तो आज वे इसलिए बिलख रहे हैं कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ लिखा जा रहा है। सन् 47 से अब तक पत्रकारिता ने हमेशा सत्ता की विसंगतियों पर कलम चलायी लेकिन तब कभी किसी ने पत्रकारिता को देशद्रोही नहीं कहा। तब सरकार का विरोध देश का विरोध नहीं कहलाता था। सिर्फ दो साल में ललितगेट, डीडीसीए, व्यापम, चिक्की घोटालों आदि आदि और विश्वविद्यालयों में असंतोष की खबरों से तिलमिलाए लोग अपने नेता और सत्ता की आलोचना को देशद्रोह बताने पर आमादा हैं। इन लोगों को लगता है कि मीडिया (पहले सिर्फ प्रिंट था अब इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल भी है) उनके महानायक के कामकाज की मीमांसा करके कोई अक्षम्य पाप कर रहा है। वे दिन रात मीडिया को बिकाऊ, देशद्रोही आदि बता कर “कुम्भीपाक नर्क” का श्राप दे रहे हैं।

…तो हे उपासकों, हमारे लिए न पहले कोई प्रधानमंत्री पवित्र गाय था, न आज है और न कल होगा। मोदी से पहले वालों के धत करम भी आपको नानी- दादी ने कहानियों में नहीं सुनाये थे। वो भी हम और हम जैसे कलमघसीट लोग ही खोज कर आपके लिए लाये थे। अगर अपने दिव्य पुरुष की आराधना और फोटो वीडियो मॉर्फिंग से फुरसत मिले तो किसी लायब्रेरी में मई 2014 से पहले का कोई भी अखबार पलट कर देख लेना। पता चल जायेगा कि इस तारीख़ से पहले भी देश में प्रधानमंत्री होता था और कलम उस पर भी ऐसे ही चलती थी जैसी आज चल रही है।

लेखक डॉ राकेश पाठक डेटलाइन इंडिया के प्रधान संपादक हैं. उनसे संपर्क rakeshpathak0077@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


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जेएनयू को टैंकों से कुचलने का सुझाव दौड़ रहा है!

-डॉ राकेश पाठक-

आइये जान लीजिये हम किस तरफ बढ़ रहे हैं। जेएनयू में कुछ अलगाववादियों  के नारों पर देश भर में उफान आया हुआ है। एक पक्ष है जो बिना किसी जाँच पड़ताल , मुकदमा अदालत , सबूत गवाही के नारे लगाने वालों की जीभ काटने , सीधे गोली मारने या फांसी पर लटका देने की मांग कर रहा है।ऐसे लोगों में उन्मादी भीड़ के साथ पूर्व मंत्री और सांसद तक शामिल हैं।सोशल मीडिया ऐसे बयानों और मांगों से अटा पड़ा है।

अब जैसे इतने पर ही तसल्ली नहीं हुयी तो सरहद पर तैनात बंदूकों के मुंह भीतर की ओर मोड़ने की मांग दो दिन से चल रही है। और अब जेएनयू को टैंकों से कुचलने का सुझाव दौड़ रहा है। चीन की राजधानी बीजिंग में “थ्येन आन मन चौक” पर फौजी टैंकों से हज़ारों छात्रों को कुचलने का हवाला दिया जा रहा है। और ये सुझाव बहुत ज़िम्मेदार लोगों का है। पूरा सुझाव उपर स्क्रीन शॉट में है।

कुछ बहुत ही सादा सवाल-

1) क्या चंद देशद्रोहियों की सजा पूरी यूनिवर्सिटी को दी जायेगी?
2) क्या टैंकों से विचार को कुचला जा सकता है?
3) क्या सचमुच ये इतना बड़ा मामला है कि सेना के बेलगाम टैंक हज़ारों बेगुनाह छात्रों को कुचल दिया जाये?

और इन सवालों के जवाब भी दीजिये~

* जम्मू कश्मीर में ऐसे ही नारे हर हफ्ते लग रहे हैं।दशकों से लगते रहे हैं लेकिन अब ज्यादा लगते हैं। तो वहां अब तक कितनी बार टैंक भेजे?
* पिछले बरस वहां की सरकार ने मसर्रत आलम को जेल से छोड़ दिया था। बाहर आते ही उसने बड़ी रैली की। पाक झंडे लहराये। “मेरी जान पाकिस्तान” के नारे ही नहीं लगाये बल्कि चैनलों के कैमरे पर गाल बजाता रहा।बहुत हल्ला मचा तब दुबारा जेल में डाला।भूले तो न होंगे तब किसकी सरकार थी?
क्या तब टैंक भेजे ??
* उत्तर पूर्व के कई राज्यों में दशकों से हिंसक अलगाववादी आंदोलन चल रहे हैं।सरकार बरसों बरस समझौता वार्ताएं चलाती है। अब भी चल रही है। कहाँ कहाँ टैंक से कुचले गए देशद्रोही…? नागालैंड के घोषित विद्रोहियों से इसी सरकार का समझौता होने वाला है। और हां सरकार उनके प्रथक झंडे पर भी राज़ी है।
* हद ये है कि उग्र राष्ट्रवाद के बुखार में तपते लोग ऑपरेशन ब्लू स्टार और हज़रत  बल का हवाला दे रहे हैं। क्या इन उन घटनाओं से इसकी तुलना उचित है?
* देश के आधा दर्जन से ज्यादा राज्यों में नक्सलियों ने सशस्त्र संघर्ष छेड़ रखा है। आज तक किसी सरकार ने न उन पर बम बरसाए न टैंक भेजे।

सबसे ज़रूरी बात-
जिस दिन टैंक बैरकों से निकलेंगे उसके बाद वे आसानी से लौट कर नहीं जायेंगे। वे सिर्फ जेएनयू तक नहीं रुकेंगे। अगले दिन वे बीएचयू पहुंचेंगे और उसके बाद जीवाजी या बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी। वे यहीं नहीं रुकेंगे, किसी दिन आपके घर दफ़्तर को कुचलने आ जायेंगे

हां अनदेखा नहीं किया जा सकता
आज सुबह जब टैंकों की मांग की पहली इत्तला दी तो कुछ सुधिजनों की राय सामने आई कि ऐसी मांगों या बातों को अनदेखा या इग्नोर करना चाहिए।किसे के चाचाजी ने उससे कहा कि इग्नोर करो तो किसे के अब्बू ने। नहीं बिलकुल नहीं, इग्नोर नहीं करना चाहिए। ऐसी उन्मादी बातें बिना पैरों के दौड़तीं हैं और बहुत जल्द समाज की सामूहित चेतना में घर करने लगतीं हैं। स्वतन्त्र चेता लोगों की ज़िम्मेदारी है कि समय पर आगाह करें कि क्या ठीक है क्या नहीं? सिर्फ इग्नोर करने से काम नहीं चलेगा। फिर भी अगर आपको लगता है कि जेएनयू को टैंकों से कुचलना सही है तो आप ऐसा करके देख लीजिये।

बार बार ये लिखना ज़रूरी नहीं है कि JNU में जिन लोगों ने भी देशद्रोही काम किया है उनको माफ़ नहीं किया जा सकता। उनकी सही जगह काल कोठरी ही है।

लेखक डॉ राकेश पाठक डेटलाइन इंडिया के प्रधान सम्पादक हैं.

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भिंडरावाले और गोडसे के कितने पूजने वालों को देशद्रोह में जेल भेजा!

जेएनयू प्रकरण पर कुछ सवाल हैं जो मुंह बाए जवाब मांग रहे हैं। मालूम है कि जिम्मेदार लोग जवाब नहीं देंगे, फिर भी। लेकिन उससे पहले नोट कर लें-

1. देश को बर्बाद करने की कोई भी आवाज़, कोई नारा मंजूर नहीं। जो भी गुनाहगार हो कानून उसे माकूल सजा देगा।
2. कोई माई का लाल या कोई सिरफिरा संगठन न देश के टुकड़े कर सकता है न बर्बाद कर सकता है। जो ऐसी बात भी करेगा वो यकीनन “देशद्रोही” है।
3. किसी नामाकूल से या देशभक्ति के किसी ठेकेदार से कोई सर्टिफिकेट नहीं चाहिए।
4. कोई भी किसी भी मुद्दे पर असहमत है तो ये उसका हक़ है। हां कोई भी। कोई माई का लाल असहमति को “देशद्रोह” कहता है तो ये उसकी समझ है।

आइये अब जेएनयू पर बात कर ली जाये। आज़ाद भारत के इतिहास में आधी रोटी पर दाल लेकर दौड़ पड़ने का ये सबसे जीवंत नज़ारा है। उस पर भी दाल में उन्माद का तड़का लग गया है।

1. जेएनयू में एक संगठन ने एक सभा की जिसका वीडियो एक चैनल के पास आया। हंगामाखेज नारेबाजी में पाकिस्तान ज़िंदाबाद और देश की बर्बादी के सुर सुनाई दे रहे हैं।
2. हल्ला मचा और मचना ही चाहिए।उन्माद के ताप में जलती भीड़ ने पूरे जेएनयू को देशद्रोही बता कर हांका लगाना शुरू कर दिया।
3. दूसरे दिन एक और वीडियो आया जिसमें दूसरा पक्ष पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगा रहा है। अगर पहले वीडियो पर इतना भरोसा है तो इस पर भी कर लीजिये।
4. जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज़ हो जाता है जो कि न आयोजक था न भारत विरोधी नारे लगा रहा था।उसका बाद का भाषण कल से अनकट चल रहा है चैनलों पर सुन लीजिये क्या कह रहा है।
5. जिसने भी भारत की बर्बादी के नारे लगाये उसे पकड़ कर मुकदमा चलाइये लेकिन चार, चालीस या चार सौ के किये के लिए पूरी यूनिवर्सिटी को देशद्रोह का अड्डा किस आधार पर कहा जा सकता है?
6. झूठ का सहारा लेकर आग में घी के लिए हाफिज सईद के फ़र्ज़ी ट्विटर से ट्वीट करवा दिया। हद ये है कि दिल्ली पुलिस ने फ़ौरन आगाह कर दिया कि ये ट्वीट फ़र्ज़ी है। देश भर को अलर्ट भी किया।
7. गृह मंत्री शायद इसी फ़र्ज़ी ट्वीट पर भरोसा कर जेएनयू के पीछे हाफिज का हाथ बता रहे हैं। क्या विडम्बना है।

अब ज़रा कुछ और सवाल-

a) देशभक्ति के रंग में ऊभ-चूभ हो रही पार्टी अभी कल तक इस पीडीपी के साथ कश्मीर में सत्ता में थी जो ऐलानिया अफज़ल की आरती उतारती है। महबूब मुफ़्ती और उनके साथ पूरे कश्मीरी अवाम को भी देशद्रोह के मुक़दमे में बंद कब करेंगे? वहां आये दिन पाकिस्तान का झंडा कुछ ज्यादा ही फहरा रहा है। लेकिन फिर भी हर कश्मीरी देशद्रोही नहीं है न, कहा जाना चाहिए।

b) एक मोहतरमा हैं आसिया अंद्राबी। कश्मीर में दुख्तराने- मिल्लत की मुखिया। अभी बीते साल आसिया ने पाकिस्तान का जश्ने आज़ादी मनाया और मोबाइल से ही पाकिस्तान को तकरीर की। क्या हुआ, क्या कोई मुकदमा दर्ज़ हुआ? आपकी ही सरकार थी वहां और कल अगर महबूब एक जरा सा इशारा कर दें तो आप फिर शपथ लेने को उतावले बैठे हैं। तब भूल जायेंगे ये मोहतरमा भी अफज़ल को शहीद मानतीं हैं?

c) जरनैल सिंह भिंडरावाले का नाम याद है क्या ..! आज़ाद भारत का सबसे खतरनाक विद्रोह करने वाला। सबसे बड़ा देशद्रोही। पता है आपको कि पंजाब में आज भी तमाम लोग उसे पूजते हैं।लोग ही क्यों अब तो पंजाब सरकार ने अपने खजाने से उसके नाम पर स्टेडियम भी बनवा दिया है। तो क्या पूरे पंजाब को देशद्रोही मान लेंगे? कुछ किया क्या? एक भी देशद्रोह का मुकदमा? नहीं ना…। क्योंकि वहां भी आप सरकार में हैं।

d) और वो जो गोडसे की पूजा करते हैं ..! उसकी पिस्तौल की फोटू की आरती उतारते हैं ..! 26 जनवरी को काला दिवस मनाते हैं। कितने लोग जेल भेजे गए बताइये तो…! वो देशद्रोह नहीं है क्या?? आप अफज़ल की फांसी के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हैं उसी सुप्रीम कोर्ट ने गौडसे को फाँसी दी थी तो गौडसे को पूजना देशद्रोह नहीं है..?

अरे भाई ये देशद्रोह का ठप्पा भी आप इतना चीन्ह चीन्ह कर चस्पा करेंगे तो ठीक नहीं है…!

तुरंता न्याय पर आमादा भीड़…

अर्द्ध सत्य की आधी रोटी पर उन्माद की दाल लेकर लपलपाती दौड़ रही भीड़ तुरंता न्याय चाहती है। कोई जाँच नहीं, कोई सुनवाई नहीं ,कोई सबूत गवाही नहीं। बस भीड़ के एक अगुआ ने कह दिया है कि नारे लगाने वालों की जीभ काट ली जाये तो दूसरे ने फ़तवा जारी कर दिया है कि गोली मार दी जाये। बस..! एक बार फिर साफ़ कर दिया जाये कि देश की कीमत पर कोई नारा मंज़ूर नहीं है लेकिन झूठ और फरेब से गढ़े जा रहे किसी भी ज़हरीले जाल में फंस कर उन्मादी होना भी गलत ही है। कोई भी ये न भूले कि तुरंता न्याय करने को बौरा रही भीड़  किसी अफवाह से हरहरा कर जिस दिन आपकी घर की सांकल बजाएगी तब आपकी गुहार सुनने वाला कोई नहीं होगा।

लेखक डॉ राकेश पाठक डेटलाइन इंडिया न्यूज पोर्टल के प्रधान संपादक हैं. उनसे संपर्क rakeshpathak0077@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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निदा साहब के साथ मुहब्बत के जाम और आखिरी शाम

सन 2010 की सर्द शाम की बात है। उस दिन ग्वालियर व्यापार मेल में मुशायरे होना था।मुशायर के लिए ही निदा फ़ाज़ली शहर में थे।हमेशा उनके साथ चाय या कुछ और पीना तय रहता था। मैं उन दिनों नईदुनिया में सम्पादक था।मुशायरा सुनने जाना ही था सो दफ्तर से निकलने की तैयारी में था। अचानक देखता क्या हूँ कि मेरे अज़ीज़ दोस्त और शायर मदनमोहन ‘दानिश’ के साथ निदा फ़ाज़ली साहब दफ्तर में मेरे सामने हैं। अपनी वही जानी पहचानी मुस्कराहट के साथ। उफ़ क्या सादगी थी निदा साहब में।

मैंने उठ कर उनका इस्तकबाल किया।निदा साहब खूब देर बतियाते रहे। उन दिनों नईदुनिया में हर दिन शाम के वक्त सारे संस्करणों के संपादकों की फोन पर कॉन्फ्रेंस कॉल होती थी। निदा साहब बैठे ही थे तभी कॉन्फ्रेंस कॉल का वक्त हो गया। हेड ऑफिस इंदौर से संपादक जयदीप कर्णिक की घंटी बजी। मैंने जब जयदीप और एम पी छत्तीसगढ़ के सभी संपादकों (भोपाल से Girish Upadhyay, जबलपुर से Vibhuti Sharma, रायपुर से Ravi Bhoi और बिलासपुर से drsunil Dr-Sunil Gupta) को बताया कि निदा साहब इस वक्त मेरे साथ हैं तो सब उनसे बात करने को बेताब हो गए। निदा साहब ने स्पीकर फोन पर सभी सम्पादकों से दुआ सलाम की और जयदीप भाई की गुजारिश पर शे’र भी सुनाये। संपादकों की टेली कॉन्फ्रेंस में ख़बरों के बीच निदा साहब से गुफ़्तुगू एक यादगार लम्हा बन गयी।

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निदा फ़ाज़ली रुखसत हो गए।अपने वालिद मरहूम से जिस तरह निदा ने कहा कि तुम्हारी कब्र में मैं हूँ तुम मुझमें ज़िंदा हो, उसी तरह वे खुद अपनी कब्र में रहेंगे लेकिन उनके लफ्ज़ हम सब में ज़िंदा रहेंगे। अभी जुमा जुमा दो महीने पहले की ही तो बात है। अपने शहर ग्वाल्हेर में आई टी एम के प्रोग्राम”इबारत” में आये थे।एक शाम पहले होटल सेन्ट्रल पार्क के कमरे में निदा साहब, दोस्त मदनमोहन ‘दानिश’ और मैं गपशप के लिए बैठे।मैंने अपना कविता संग्रह “बसंत के पहले दिन से पहले” उन्हें दिया। दानिश ने उन्हें बताया कि  मेरी किताब में ज्यादातर प्रेम कवितायेँ हैं तो वे हुलस पड़े।

फिर तो निदा साहब ने प्रेम, इश्क, मोहब्बत पर हमें इस तरह सराबोर किया कि हम पर ‘पैमाने’ से ज्यादा उनकी बातों का नशा छाता गया। बाबा फरीद से लेकर परवीन शाकिर तक के हवाले से निदा साहब की ज़ुबानी मैं और दानिश मुहब्बत के दरिया में डूबते उतराते रहे। आज के दौर पर थोड़ा उदास होकर निदा साहब बोले कि अब तो खिड़की तक का रास्ता चटपट तय हो जाता है। पहले खिड़की पर दिखते चेहरे से नज़रें मिलाने में ही न जाने कितना वक्त लगता था। वो कहते कि दुनिया को बचाने के लिए प्रेम को बचाया जाना सबसे ज़रूरी है।

आधी रात बाद तक हम निदा साहब को सुनते और गुनते रहे।क्या पता था कि 28 नवम्बर ’15 की उस शाम के जाम हमारे साथ के आखिरी जाम होंगे। ग्वालियर उनका अपना शहर है सो चाहे मेले का मुशायरा हो,इबारत हो या कोई और मौका वे हमेशा आने को तैयार रहते।बीते न जाने कितने बरसों में ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि वे ग्वालियर आएं और हमारी मुलाकात न हो। वे मुझे मोहब्बत से पाठक साहब बुलाते। मंच से हर बार मेरा नाम लेकर एक दो शे’र मेरी नज़र करते। आप बहुत याद आएंगे निदा साहब। खुदा हाफिज। और हां.. “कभी फुरसत मिले तो अपनी गज़लें सुनने चले आना”, यहाँ लाखों मुरीद हैं जिन्हें आपकी सारी गज़लें ज़ुबानी याद हैं।

लेखक डॉ राकेश पाठक डेटलाइन इंडिया के प्रधान संपादक हैं.


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