बीजपी लोकसभा में अल्पमत में आ गयी

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डॉ राकेश पाठक
प्रधान संपादक, कर्मवीर

लगातार उपचुनाव हार रही है, अब सहयोगी दल भी छिटक रहे हैं, अगला आम चुनाव आसान नहीं… उत्तर प्रदेश और बिहार की तीन लोकसभा सीटें बीजपी हार गई है। इनमें से दो उसके पास थीं और एक राजद के पास। खास ख़बर ये है कि इन सीटों को गंवाते ही भारतीय जनता पार्टी अकेले अपने दम लोकसभा में सामान्य बहुमत खो बैठी है। गठबंधन के रूप में उसके पास बहुमत फिलहाल बना हुआ है लेकिन सहयोगियों के छिटकना जारी है। ऐसे में अगले साल होने वाले आम चुनाव बीजपी के लिए टेढ़ी खीर साबित होते लग रहे हैं।

बीजपी गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटें हार चुकी है। बिहार की अररिया सीट भी वो राजद से छीन नहीं सकी। ये नतीजे सिर्फ इतना भर नहीं हैं। आंकड़े इसके भीतर छुपे संदेश का खुलासा करते हैं जो कि बीजपी के माथे पर चिंता की लकीरें उभारने वाला है। संख्या का खेल बता रहा है कि 2014 में प्रचंड बहुमत से जीती बीजपी अब अकेले के दम पर लोकसभा में बहुमत खो चुकी है। गठबंधन के दम पर बहुमत बचा हुआ है।

गौरतलब है कि मोदी लहर पर सवार बीजपी को बीते चुनाव में अकेले ही 282 सीटें मिली थीं। लोकसभा में बहुमत के लिए 272 का आंकड़ा चाहिए होता है। तब पार्टी ने अकेले बहुमत होते हुए भी सभी सहयोगी दलों को सरकार में शामिल किया था। एनडीए गठबंधन को कुल 335 सीटें मिली थीं।

सन 2014 के तुरंत बाद हुए दो उपचुनाव बीड और बड़ोदरा बीजपी ने जीते थे। उसके बाद शहडोल और लखीमपुर में जीत दर्ज की। लेकिन बाक़ी अपने कब्जे वाली सीटों पर पार्टी लगातार हार रही है। गुरुदासपुर, अजमेर, अलवर, झाबुआ और आज गोरखपुर और फूलपुर जैसे अपने गढ़ भी नहीं बचा पाई। आज के नतीजों से पहले अकेले बीजपी के सांसदों की संख्या 273 बची थी और आज 271 रह गयी है। अकेले अपने दम पर तो पार्टी अल्पमत में आ गयी है लेकिन सहयोगी दलों की टेक से सरकार को कोई खतरा नहीं है।

उपचुनाव में लगातार हार के अलावा गिनती में कमी गोंदिया भंडारा सीट के सांसद नाना भाऊ महोड़ के संसद से इस्तीफा देने से आई थी। नाना भाऊ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रवैये की आलोचना कर पार्टी भी छोड़ गए थे। गुजरात चुनाव के दौरान वे कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। एनडीए में शामिल सहयोगी दलों को साथ रखने में भी बीजपी को मुश्किल हो रही है। कुछ महीनों शिवसेना कह चुकी है कि वह अगला चुनाव बीजपी से अलग होकर लड़ेगी। और अब हाल ही में तेलगु देशम पार्टी ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया है। उसके मंत्रियों ने सरकार से इस्तीफे भी दे दिए हैं।

फिलहाल लोकसभा में शिवसेना के 18 और तेलगू देशम के 16 सदस्य हैं। अन्य छोटी छोटी कई पार्टीयों का समर्थन भी बीजपी को हासिल है। ऐसे में बीजपी के लिए अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव आसान नहीं लग रहे।

लेखक डॉ राकेश पाठक ‘कर्मवीर’ के प्रधान संपादक हैं. उनसे संपर्क rakeshpathak0077@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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सिंगल ब्रांड रिटेल में 100 फीसदी FDI : क्यों साहेब, तब देश बिक रहा था… अब तो ये देशभक्ति है ना?

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डॉ राकेश पाठक

स्वदेशी के पैरोकार अब कहाँ गायब हैं… अंततः मोदी सरकार ने सिंगल ब्रांड रिटेल में सौ फीसदी सीधे विदेशी निवेश (FDI ) के लिए दरवाज़े खोल कर लाल कालीन बिछा दिए हैं। अब तक इस तरह के निवेश की सीमा 49 फीसदी थी।इस फैसले के बाद “वालमार्ट” जैसी भीमकाय कंपनियां भारत में खुदरा व्यापार में सौ फीसदी निवेश कर धंधा कर सकेंगीं सो भी बेरोकटोक। लेकिन यह फैसला करते वक्त सत्ताधारी पार्टी यह भूल गयी कि वो इसी एफडीआई के विरोध में कैसे धरती आसमान एक कर देती थी । सरकार के मुखिया नरेंद्र दामोदर दास मोदी, वित्त मंत्री अरुण जैटली भूल गए कि कांग्रेस की सरकार में ऐसे निवेश के विरोध में क्या कहते-बोलते थे?

अब पलटी भी ऐसी कि बिना किसी लिहाज़ के खुदरा कारोबार में 100 फीसदी सीधे विदेश निवेश को मंजूरी दे दी है। अब होगा ये कि ‘वालमार्ट’ जैसे रिटेल के अन्तर्राष्ट्रीय दैत्य भारत आकर छोटे कारोबार को निगल जाएंगे और डकार भी न लेंगे। आइये याद कर लीजिए कि 2014 से पहले जब बीजपी सत्ता में नहीं थी तब FDI को लेकर उसकी क्या राय थी। तब बीजपी FDI का फूल फॉर्म बताती थी- Fund For Devlopment of Indian national congress…बीजपी के धरने पर लगा पोस्टर देखिये…

तब मोदी से लेकर तमाम बीजपी नेताओं के बयानों में कहा जाता था कि कांग्रेस पार्टी FDI के जरिये देश को बेच रही है। नरेंद्र मोदी ट्वीट करके तत्कालीन प्रधानमंत्री पर सीधे निशाना लगाते थे..। मोदी ने कहा था- “UPA सरकार विदेशियों की, विदेशियों द्वारा, विदेशियों के लिए है..पता नहीं पीएम क्या कर रहे हैं…छोटे कारोबारियों के शटर डाउन हो जाएंगे ।”

अरुण जेटली ने कसम खायी थी कि ‘आखिरी सांस तक एफडीआई का विरोध करेंगे।’ (ट्वीट्स के स्क्रीन शॉट देखिये)सुषमा स्वराज एफ डी आई विरोधी धरना प्रदर्शनों में भांगड़ा गिद्दा का छोंक डालतीं थीं। वेंकैया नायडू और नितिन गडकरी जैसे सूरमा हाथों में तख्तियां लेकर लहराते थे जिन पर लिखा होता था–“भ्रष्टाचारियों, चोरों का हाथ- एफडीआई के साथ..”। 2014 में सत्ता में आने के बाद मोदी जी और उनके पूरे कुनबे को दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ और वे एफडीआई के पक्ष में साष्टांग दंडवत होने लगे।

साल 2016 में मोदी सरकार ने रक्षा, विमानन, केबल, मोबाइल टीवी आदि आदि में 100 फीसदी विदेशी निवेश (FDI) को मंज़ूरी दे दी थी। देश को याद है कि जब यही सब पिछली सरकार करने वाली थी तब बीजेपी ने कितना हल्ला मचाया था। ससंद ठप्प कर दी जाती थी। पूरे देश में हाहाकार मचाया जाता था कि कांग्रेस/यूपीए की सरकार देश को बेच रही है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके स्वदेशी जागरण मंच जैसे अनुषांगिक संगठन तब छाती पीटते थे लेकिन अब आवाज़ भी गले से नहीं निकलती। जब सरकार ने सेना, विमानन जैसे क्षेत्रों में  सौ फीसदी निवेश को मंजूरी दी थी तब भी इनके मुंह से आवाज़ नहीं निकली थी।

लेखक डॉ राकेश पाठक कर्मवीर के प्रधान संपादक हैं. इनसे संपर्क rakeshpathak0077@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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डॉ राकेश पाठक बने “कर्मवीर” के प्रधान संपादक

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भोपाल। वरिष्ठ पत्रकार व कवि डॉ राकेश पाठक को “कर्मवीर” के ‘प्रधान संपादक’ का दायित्व सौंपा गया है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दादा माखनलाल चतुर्वेदी सन 1920 में प्रारम्भ “कर्मवीर” के संस्थापक संपादक थे। वर्तमान में पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर के पास ‘कर्मवीर’ का सर्वाधिकार है। श्रीधर जी ने ‘कर्मवीर’ का दायित्व डॉ पाठक को सौंपा है। पहले चरण में “कर्मवीर” न्यूज़ पोर्टल/ वेबसाइट के रूप में अगले कुछ दिनों में प्रारम्भ होगा। ‘कर्मवीर’ पत्रिका का प्रकाशन विवेक श्रीधर के संपादन में नियमित हो रहा है। अगले चरण में ‘कर्मवीर’ अख़बार के रूप में पुनः प्रकाशित होगा।

उल्लेखनीय है कि डॉ राकेश पाठक नईदुनिया, नवभारत, नवप्रभात,प्रदेशटुडे जैसे प्रतिष्ठित अखबारों में वर्षों तक संपादक रहे हैं। इसके अलावा न्यूज़ पोर्टल “डेटलाइन इंडिया” के ‘प्रधान संपादक’ रहे। ‘सांध्य समाचार’ से पत्रकारिता शुरू करने वाले डॉ पाठक ने स्वदेश, सांध्यवार्ता, आचरण, लोकगाथा आदि अखबारों में भी काम किया। उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकीं हैं। हाल ही में डॉ पाठक को उनके कविता संग्रह “बसंत के पहले दिन से पहले” के लिए राष्ट्रीय स्तर का “हेमंत स्मृति कविता सम्मान” देने की घोषणा की गई है। इसके अलावा अनेक सम्मान और पुरस्कार उन्हें मिल चुके हैं।

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भाजपा वालों के झूठ की उमर बस चंद मिनट ही है…

डॉ राकेश पाठक

असत्य और अर्ध सत्य की आधी रोटी पर दाल लेकर भागने वाले अब हर दिन लद्द पद्द औंधे मुंह गिर रहे हैं..लेकिन हद ये है कि बाज फिर भी नहीं आते। राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष के लिये नामांकन भरा तो भाई लोगों को पेट में मरोड़ उठी। मध्य प्रदेश में बीजेपी के मीडिया सेल  “जॉइंट मीडिया इंचार्ज” के सर्वेश तिवारी ने तुरंत फोटो शॉप की शरण गही और गांधी की फोटो की जगह किसी मुगल बादशाह की फोटो चैम्प दी। तिवारी ने अपनी फेसबुक वॉल और तमाम व्हाट्सएप्प ग्रुप्स में ये फ़र्ज़ी फोटो पटक दी और सवाल पूछा कि “राहुल गांधी की फोटो में कौन से महापुरुष दृष्टिगोचर हो रहे हैं..?

चंद मिनट में इस फ़र्ज़ी फोटो की कलई खुल गई। जाहिर है राहुल गांधी के नामांकन के समय पीछे किसी मुगल बादशाह की फोटो न थी न हो सकती थी। बीजेपी के इस फोटोशॉपिये सुरमा को अच्छी लानत मलामत सोशल मीडिया पर ही हो गयी। ये कोई पहला मौका नहीं है जबकि इस तरह के झूठ का शीराज़ा थोड़ी ही देर में न बिखर गया हो। अब तो हालात ये हो गयी है कि बीजेपी का आईटी सेल फोटो शॉप , कट पेस्ट का कारनामा करता है तो अगले कुछ मिनट में उसकी बखिया उधड़ जाती है। अगर आप पिछले चार पांच सालों पर नज़र डालें तो आसानी से साफ हो जाएगा कि उनके झूठ की उमर धीरे धीरे कम होती गयी है।

सन 2014 से पहले उनका झूठ कुछ महीनों ज़िंदा रहता था। जैसे नेहरू के गाज़ी खां का वंशज होने वाला मसाला। फिर 2015 में सुभाष चंद बोस के खिलाफ ब्रिटिश पीएम क्लीमेंट एटली को लिखी गई नेहरू की “फ़र्ज़ी” चिट्ठी कुछ घंटे जीवित रह पायी। 2016 में भी उनके परोसे गए झूठ कुछ घंटे से ज्यादा टिक नहीं पाए। और अब 2017 की इस उतरती सांझ में उनके झूठ चंद मिनट में ही दम तोड़ देते हैं। बीजेपी के आईटी सेल के राष्ट्रीय मुखिया अमित मालवीय हाल के दिनों लगभग हर पोस्ट पर चारों खाने चित्त गिरे। “नारियल के जूस” का मामला “आलू से सोने का जुमला” या नेहरू की अपनी सगी बहन को लाड़ करने वाली तस्वीरें अमित मालवीय का झूठ चार पाँच मिनट में ही काल कवलित हो गया।

और तो और प्रधान सेवक भी झूठ की सवारी गांठने में फिसल चुके हैं। अभी चार दिन पहले मोदी जी ने मोरबी की बाढ़ के समय इंदिरा गांधी द्वारा नाक पर रुमाल रखने का आरोप लगाया तो कुछ मिनट में “चित्रलेखा” पत्रिका की पूरी तस्वीर हक़ीक़त बयान करने को आ गयी। साफ दिख रहा था कि RSS कार्यकर्ता और प्रशासन के लोग भी नाक पर कपड़ा बांधे थे। लाशों और भीषण गंदगी के कारण प्रशासन ने बाकायदा निर्देश दिया था कि सब मास्क लगाएं।

ये बहुत थोड़े से नमूने हैं..बाक़ी आप याद कर लीजिए कि पिछले महीनों में इनके कितने झूठ ढेर हो चुके हैं।  दरअसल संघ और बीजेपी ने 2010- 11 के आसपास तमाम झूठ गढ़े और इतिहास से अनभिज्ञ नई पीढ़ी को परोस दिये। “व्हाटसएप्प और फेसबुक विश्वविद्यालय” में पली बढ़ी इस पीढ़ी ने सहज ही इस पर यकीन कर लिया। “सत्तर साल में कुछ नहीं हुआ” जैसे निराधार जुमले पर यकीन करते वक्त उसे यह भी नहीं दिखा कि जिस इंटरनेट और आधुनिक युग में वो जी रही है उस में कुछ ठहर कर सच जानना ज्यादा कठिन नहीं है।

सच ये है कि जब इस झूठ और फर्जीवाड़े की सुनामी आ रही थी तब कांग्रेस और उसके कर्ताधर्ता कम्बल ओढ़ कर घी पी रहे थे। खाये अघाये इन लोगों ने झूठ के खिलाफ कमर नहीं कसी तब समाज के स्वतंत्रचेता लोगों ने कमान अपने हाथ मे ले ली। अब जब आधी लड़ाई साधारण लोग जीत चुके तब जाकर कांग्रेस की नींद टूटी। ये सच है कि दिव्य स्पंदन उर्फ राम्या के कांग्रेस आईटी सेल का मुखिया बनने के बाद सोशल मीडिया पर बीजेपी और संघ को कड़ी चुनौती मिल रही है लेकिन असल पटखनी तो वे लोग दे रहे थे जिनका कांग्रेस से सीधा कोई लेना देना नहीं है। ऐसे लोग बस अपनी मर्ज़ी से फर्जीवाड़े और झूठ के खिलाफ लड़ रहे थे।

आखिर में सवाल उन भले और भोले लोगों से… क्या आपको लगता है कि कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने जा रहा व्यक्ति किसी मुगल बादशाह की तस्वीर अपने पीछे रखवायेगा? अगर आप इस तरह की तस्वीर पर यकीन कर उसे शेयर,फारवर्ड कर रहे थे तो माफ कीजिये झूठ परोसने वालों से ज्यादा मूर्ख आप ख़ुद हैं! वे तो जो हैं सो हइये हैं!

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डॉ राकेश पाठक को हेमंत स्मृति कविता सम्मान

नई दिल्ली। संवेदनशील कवि और वरिष्ठ पत्रकार डॉ राकेश पाठक को  प्रतिष्ठित “हेमंत स्मृति कविता सम्मान” देने  की घोषणा की गई है। हेमंत फाउंडेशन द्वारा स्थापित यह सम्मान उनके कविता संग्रह ” बसंत के पहले दिन से पहले” (दख़ल प्रकाशन से प्रकाशित )के लिए दिया जा रहा है। पुरस्कार समिति के संयोजक वरिष्ठ साहित्यकार भारत भारद्वाज ने यह घोषणा की।

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राकेश जी खामोशी से लेखन करने वाले सशक्त हस्ताक्षर हैं जिनकी कविताओं में शब्द सीमित और भाव असीमित होते हैं। ग्वालियर (मप्र) निवासी डॉ पाठक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ‘नईदुनिया’ , ‘नवभारत,’ ‘नवप्रभात’, ‘प्रदेश टुडे ‘जैसे अखबारों के संपादक और न्यूज़ पोर्टल ‘डेटलाइन इंडिया’ के प्रधान संपादक रहे हैं। उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकीं हैं। हेमंत फाउंडेशन की अध्यक्ष संतोष श्रीवास्तव व सचिव डॉ प्रमिला वर्मा ने बताया कि डॉ राकेश पाठक को यह सम्मान जनवरी 2018 में मुम्बई में आयोजित समारोह में प्रदान किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि डॉ पाठक से पहले  राष्ट्रीय स्तर का यह सम्मान बोधिसत्व, संजय कुंदन,वाज़दा खान,आलोक श्रीवास्तव,हरि मृदुल,लीना मल्होत्रा, एकांत श्रीवास्तव,हरे प्रकाश उपाध्याय, यतीन्द्र मिश्र, कृष्णमोहन झा, रीता दास राम आदि को मिल चुका है।

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मीडिया को गरियाने से पहले मोदी के उपासक पढ़ लें ताजे और पुराने घपलों-घोटालों की यह लिस्ट

जिन मई ’14 से पहले अखबार नईं वेख्या…

सबसे पहले प्रतिष्ठित रचनाकार असगर वज़ाहत Asghar Wajahat साहब से माफ़ी कि उनके कालजयी नाटक “जिन लाहौर नहीं वेख्या” से मिलता जुलता शीर्षक रख रहा हूँ। बात दरअसल ये है कि इस वक्त एक पूरी जमात उठ खड़ी हुयी है जिसने 16 मई 2014 से पहले न अखबार देखे हैं न टीवी का रिमोट हाथ में उठाया था। और इसीलिए यह जमात देश के प्रधानमंत्री और सत्ताधारी पार्टी की आलोचना पर छाती कूटने लगती है। भाई लोग ऐसे कलपते, किकियाते, बिलबिलाते हैं मानो इससे पहले कभी किसी प्रधानमंत्री के खिलाफ एक शब्द भी न लिखा गया हो न बोला गया हो।

इन लोगों को लगता है कि उनके देवतुल्य शिखर पुरुष को “पवित्र” महामानव माना जाये और एक भी सवाल न पूछा जाये। अरे भाइयो भैनो… देश ने खुद अपनी ख़ुशी से प्रधानमंत्री और सरकार को चुना है, कोई देवलोक से अवतार प्रकट नहीं हुआ है। इसलिए जब जब ज़रूरी होगा सवाल भी पूछे जायेंगे , उंगली भी उठेगी। इस कलपती हुयी जमात की जानकारी के लिए बता दिया जाये कि नेहरू से लेकर मनमोहन तक कलमकारों ने कभी किसी को नहीं छोड़ा। ये पत्रकार ही हैं जो सन् 47 से आज तक सब से सवाल करते रहे हैं।पत्रकारिता हमेशा सत्ता का प्रतिपक्ष और जनता के हक़ में रही है। तमाम खामियों के बावज़ूद ऐसी ही रहेगी।यही उसका ईमान है। हां ये हमारा फ़र्ज़ है, जिम्मा है और पेशा भी। “कोऊ नृप होये, हमें तौ सवालयि पूछनें…”

आइये जान लीजिये कुछ बड़े मामले जो पत्रकारिता ही देश दुनिया के सामने लेकर आई~~

नेहरू युग
कृष्ण मेनन का जीप घोटाला
टी टी कृष्णमचारि कांड
सिराजुद्दीन काण्ड
चीन युद्ध में विफलता

शास्त्री युग
प्रताप सिंह कैरों का मामला

इंदिरा युग
अंतुले का प्रतिभा प्रतिष्ठान काण्ड
तानाशाही तौर तरीकों का खुलासा
आपातकाल का घनघोर विरोध

जनता पार्टी युग
मोरारजी को सी आई ए एजेंट बताने वाला कांड
जनता पार्टी की कलह

राजीव युग
बोफोर्स तोप घोटाला
प्रशासनिक नाकामी का खुलासा

नरसिंह राव युग
झामुमो रिश्वत काण्ड

अटल युग
एनरॉन समझौता कांड
रिलायंस प्रमोद महाजन कांड

मनमोहन युग
टू जी घोटाला
कोयला घोटाला
कॉमन वेल्थ घोटाला

ये सब उन लोगों को नहीं मालूम जिन्होंने 16 मई 2014 से पहले न अखबार पढ़े न टीवी देखा। तभी तो आज वे इसलिए बिलख रहे हैं कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ लिखा जा रहा है। सन् 47 से अब तक पत्रकारिता ने हमेशा सत्ता की विसंगतियों पर कलम चलायी लेकिन तब कभी किसी ने पत्रकारिता को देशद्रोही नहीं कहा। तब सरकार का विरोध देश का विरोध नहीं कहलाता था। सिर्फ दो साल में ललितगेट, डीडीसीए, व्यापम, चिक्की घोटालों आदि आदि और विश्वविद्यालयों में असंतोष की खबरों से तिलमिलाए लोग अपने नेता और सत्ता की आलोचना को देशद्रोह बताने पर आमादा हैं। इन लोगों को लगता है कि मीडिया (पहले सिर्फ प्रिंट था अब इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल भी है) उनके महानायक के कामकाज की मीमांसा करके कोई अक्षम्य पाप कर रहा है। वे दिन रात मीडिया को बिकाऊ, देशद्रोही आदि बता कर “कुम्भीपाक नर्क” का श्राप दे रहे हैं।

…तो हे उपासकों, हमारे लिए न पहले कोई प्रधानमंत्री पवित्र गाय था, न आज है और न कल होगा। मोदी से पहले वालों के धत करम भी आपको नानी- दादी ने कहानियों में नहीं सुनाये थे। वो भी हम और हम जैसे कलमघसीट लोग ही खोज कर आपके लिए लाये थे। अगर अपने दिव्य पुरुष की आराधना और फोटो वीडियो मॉर्फिंग से फुरसत मिले तो किसी लायब्रेरी में मई 2014 से पहले का कोई भी अखबार पलट कर देख लेना। पता चल जायेगा कि इस तारीख़ से पहले भी देश में प्रधानमंत्री होता था और कलम उस पर भी ऐसे ही चलती थी जैसी आज चल रही है।

लेखक डॉ राकेश पाठक डेटलाइन इंडिया के प्रधान संपादक हैं. उनसे संपर्क rakeshpathak0077@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


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जेएनयू को टैंकों से कुचलने का सुझाव दौड़ रहा है!

-डॉ राकेश पाठक-

आइये जान लीजिये हम किस तरफ बढ़ रहे हैं। जेएनयू में कुछ अलगाववादियों  के नारों पर देश भर में उफान आया हुआ है। एक पक्ष है जो बिना किसी जाँच पड़ताल , मुकदमा अदालत , सबूत गवाही के नारे लगाने वालों की जीभ काटने , सीधे गोली मारने या फांसी पर लटका देने की मांग कर रहा है।ऐसे लोगों में उन्मादी भीड़ के साथ पूर्व मंत्री और सांसद तक शामिल हैं।सोशल मीडिया ऐसे बयानों और मांगों से अटा पड़ा है।

अब जैसे इतने पर ही तसल्ली नहीं हुयी तो सरहद पर तैनात बंदूकों के मुंह भीतर की ओर मोड़ने की मांग दो दिन से चल रही है। और अब जेएनयू को टैंकों से कुचलने का सुझाव दौड़ रहा है। चीन की राजधानी बीजिंग में “थ्येन आन मन चौक” पर फौजी टैंकों से हज़ारों छात्रों को कुचलने का हवाला दिया जा रहा है। और ये सुझाव बहुत ज़िम्मेदार लोगों का है। पूरा सुझाव उपर स्क्रीन शॉट में है।

कुछ बहुत ही सादा सवाल-

1) क्या चंद देशद्रोहियों की सजा पूरी यूनिवर्सिटी को दी जायेगी?
2) क्या टैंकों से विचार को कुचला जा सकता है?
3) क्या सचमुच ये इतना बड़ा मामला है कि सेना के बेलगाम टैंक हज़ारों बेगुनाह छात्रों को कुचल दिया जाये?

और इन सवालों के जवाब भी दीजिये~

* जम्मू कश्मीर में ऐसे ही नारे हर हफ्ते लग रहे हैं।दशकों से लगते रहे हैं लेकिन अब ज्यादा लगते हैं। तो वहां अब तक कितनी बार टैंक भेजे?
* पिछले बरस वहां की सरकार ने मसर्रत आलम को जेल से छोड़ दिया था। बाहर आते ही उसने बड़ी रैली की। पाक झंडे लहराये। “मेरी जान पाकिस्तान” के नारे ही नहीं लगाये बल्कि चैनलों के कैमरे पर गाल बजाता रहा।बहुत हल्ला मचा तब दुबारा जेल में डाला।भूले तो न होंगे तब किसकी सरकार थी?
क्या तब टैंक भेजे ??
* उत्तर पूर्व के कई राज्यों में दशकों से हिंसक अलगाववादी आंदोलन चल रहे हैं।सरकार बरसों बरस समझौता वार्ताएं चलाती है। अब भी चल रही है। कहाँ कहाँ टैंक से कुचले गए देशद्रोही…? नागालैंड के घोषित विद्रोहियों से इसी सरकार का समझौता होने वाला है। और हां सरकार उनके प्रथक झंडे पर भी राज़ी है।
* हद ये है कि उग्र राष्ट्रवाद के बुखार में तपते लोग ऑपरेशन ब्लू स्टार और हज़रत  बल का हवाला दे रहे हैं। क्या इन उन घटनाओं से इसकी तुलना उचित है?
* देश के आधा दर्जन से ज्यादा राज्यों में नक्सलियों ने सशस्त्र संघर्ष छेड़ रखा है। आज तक किसी सरकार ने न उन पर बम बरसाए न टैंक भेजे।

सबसे ज़रूरी बात-
जिस दिन टैंक बैरकों से निकलेंगे उसके बाद वे आसानी से लौट कर नहीं जायेंगे। वे सिर्फ जेएनयू तक नहीं रुकेंगे। अगले दिन वे बीएचयू पहुंचेंगे और उसके बाद जीवाजी या बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी। वे यहीं नहीं रुकेंगे, किसी दिन आपके घर दफ़्तर को कुचलने आ जायेंगे

हां अनदेखा नहीं किया जा सकता
आज सुबह जब टैंकों की मांग की पहली इत्तला दी तो कुछ सुधिजनों की राय सामने आई कि ऐसी मांगों या बातों को अनदेखा या इग्नोर करना चाहिए।किसे के चाचाजी ने उससे कहा कि इग्नोर करो तो किसे के अब्बू ने। नहीं बिलकुल नहीं, इग्नोर नहीं करना चाहिए। ऐसी उन्मादी बातें बिना पैरों के दौड़तीं हैं और बहुत जल्द समाज की सामूहित चेतना में घर करने लगतीं हैं। स्वतन्त्र चेता लोगों की ज़िम्मेदारी है कि समय पर आगाह करें कि क्या ठीक है क्या नहीं? सिर्फ इग्नोर करने से काम नहीं चलेगा। फिर भी अगर आपको लगता है कि जेएनयू को टैंकों से कुचलना सही है तो आप ऐसा करके देख लीजिये।

बार बार ये लिखना ज़रूरी नहीं है कि JNU में जिन लोगों ने भी देशद्रोही काम किया है उनको माफ़ नहीं किया जा सकता। उनकी सही जगह काल कोठरी ही है।

लेखक डॉ राकेश पाठक डेटलाइन इंडिया के प्रधान सम्पादक हैं.

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भिंडरावाले और गोडसे के कितने पूजने वालों को देशद्रोह में जेल भेजा!

जेएनयू प्रकरण पर कुछ सवाल हैं जो मुंह बाए जवाब मांग रहे हैं। मालूम है कि जिम्मेदार लोग जवाब नहीं देंगे, फिर भी। लेकिन उससे पहले नोट कर लें-

1. देश को बर्बाद करने की कोई भी आवाज़, कोई नारा मंजूर नहीं। जो भी गुनाहगार हो कानून उसे माकूल सजा देगा।
2. कोई माई का लाल या कोई सिरफिरा संगठन न देश के टुकड़े कर सकता है न बर्बाद कर सकता है। जो ऐसी बात भी करेगा वो यकीनन “देशद्रोही” है।
3. किसी नामाकूल से या देशभक्ति के किसी ठेकेदार से कोई सर्टिफिकेट नहीं चाहिए।
4. कोई भी किसी भी मुद्दे पर असहमत है तो ये उसका हक़ है। हां कोई भी। कोई माई का लाल असहमति को “देशद्रोह” कहता है तो ये उसकी समझ है।

आइये अब जेएनयू पर बात कर ली जाये। आज़ाद भारत के इतिहास में आधी रोटी पर दाल लेकर दौड़ पड़ने का ये सबसे जीवंत नज़ारा है। उस पर भी दाल में उन्माद का तड़का लग गया है।

1. जेएनयू में एक संगठन ने एक सभा की जिसका वीडियो एक चैनल के पास आया। हंगामाखेज नारेबाजी में पाकिस्तान ज़िंदाबाद और देश की बर्बादी के सुर सुनाई दे रहे हैं।
2. हल्ला मचा और मचना ही चाहिए।उन्माद के ताप में जलती भीड़ ने पूरे जेएनयू को देशद्रोही बता कर हांका लगाना शुरू कर दिया।
3. दूसरे दिन एक और वीडियो आया जिसमें दूसरा पक्ष पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगा रहा है। अगर पहले वीडियो पर इतना भरोसा है तो इस पर भी कर लीजिये।
4. जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज़ हो जाता है जो कि न आयोजक था न भारत विरोधी नारे लगा रहा था।उसका बाद का भाषण कल से अनकट चल रहा है चैनलों पर सुन लीजिये क्या कह रहा है।
5. जिसने भी भारत की बर्बादी के नारे लगाये उसे पकड़ कर मुकदमा चलाइये लेकिन चार, चालीस या चार सौ के किये के लिए पूरी यूनिवर्सिटी को देशद्रोह का अड्डा किस आधार पर कहा जा सकता है?
6. झूठ का सहारा लेकर आग में घी के लिए हाफिज सईद के फ़र्ज़ी ट्विटर से ट्वीट करवा दिया। हद ये है कि दिल्ली पुलिस ने फ़ौरन आगाह कर दिया कि ये ट्वीट फ़र्ज़ी है। देश भर को अलर्ट भी किया।
7. गृह मंत्री शायद इसी फ़र्ज़ी ट्वीट पर भरोसा कर जेएनयू के पीछे हाफिज का हाथ बता रहे हैं। क्या विडम्बना है।

अब ज़रा कुछ और सवाल-

a) देशभक्ति के रंग में ऊभ-चूभ हो रही पार्टी अभी कल तक इस पीडीपी के साथ कश्मीर में सत्ता में थी जो ऐलानिया अफज़ल की आरती उतारती है। महबूब मुफ़्ती और उनके साथ पूरे कश्मीरी अवाम को भी देशद्रोह के मुक़दमे में बंद कब करेंगे? वहां आये दिन पाकिस्तान का झंडा कुछ ज्यादा ही फहरा रहा है। लेकिन फिर भी हर कश्मीरी देशद्रोही नहीं है न, कहा जाना चाहिए।

b) एक मोहतरमा हैं आसिया अंद्राबी। कश्मीर में दुख्तराने- मिल्लत की मुखिया। अभी बीते साल आसिया ने पाकिस्तान का जश्ने आज़ादी मनाया और मोबाइल से ही पाकिस्तान को तकरीर की। क्या हुआ, क्या कोई मुकदमा दर्ज़ हुआ? आपकी ही सरकार थी वहां और कल अगर महबूब एक जरा सा इशारा कर दें तो आप फिर शपथ लेने को उतावले बैठे हैं। तब भूल जायेंगे ये मोहतरमा भी अफज़ल को शहीद मानतीं हैं?

c) जरनैल सिंह भिंडरावाले का नाम याद है क्या ..! आज़ाद भारत का सबसे खतरनाक विद्रोह करने वाला। सबसे बड़ा देशद्रोही। पता है आपको कि पंजाब में आज भी तमाम लोग उसे पूजते हैं।लोग ही क्यों अब तो पंजाब सरकार ने अपने खजाने से उसके नाम पर स्टेडियम भी बनवा दिया है। तो क्या पूरे पंजाब को देशद्रोही मान लेंगे? कुछ किया क्या? एक भी देशद्रोह का मुकदमा? नहीं ना…। क्योंकि वहां भी आप सरकार में हैं।

d) और वो जो गोडसे की पूजा करते हैं ..! उसकी पिस्तौल की फोटू की आरती उतारते हैं ..! 26 जनवरी को काला दिवस मनाते हैं। कितने लोग जेल भेजे गए बताइये तो…! वो देशद्रोह नहीं है क्या?? आप अफज़ल की फांसी के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हैं उसी सुप्रीम कोर्ट ने गौडसे को फाँसी दी थी तो गौडसे को पूजना देशद्रोह नहीं है..?

अरे भाई ये देशद्रोह का ठप्पा भी आप इतना चीन्ह चीन्ह कर चस्पा करेंगे तो ठीक नहीं है…!

तुरंता न्याय पर आमादा भीड़…

अर्द्ध सत्य की आधी रोटी पर उन्माद की दाल लेकर लपलपाती दौड़ रही भीड़ तुरंता न्याय चाहती है। कोई जाँच नहीं, कोई सुनवाई नहीं ,कोई सबूत गवाही नहीं। बस भीड़ के एक अगुआ ने कह दिया है कि नारे लगाने वालों की जीभ काट ली जाये तो दूसरे ने फ़तवा जारी कर दिया है कि गोली मार दी जाये। बस..! एक बार फिर साफ़ कर दिया जाये कि देश की कीमत पर कोई नारा मंज़ूर नहीं है लेकिन झूठ और फरेब से गढ़े जा रहे किसी भी ज़हरीले जाल में फंस कर उन्मादी होना भी गलत ही है। कोई भी ये न भूले कि तुरंता न्याय करने को बौरा रही भीड़  किसी अफवाह से हरहरा कर जिस दिन आपकी घर की सांकल बजाएगी तब आपकी गुहार सुनने वाला कोई नहीं होगा।

लेखक डॉ राकेश पाठक डेटलाइन इंडिया न्यूज पोर्टल के प्रधान संपादक हैं. उनसे संपर्क rakeshpathak0077@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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निदा साहब के साथ मुहब्बत के जाम और आखिरी शाम

सन 2010 की सर्द शाम की बात है। उस दिन ग्वालियर व्यापार मेल में मुशायरे होना था।मुशायर के लिए ही निदा फ़ाज़ली शहर में थे।हमेशा उनके साथ चाय या कुछ और पीना तय रहता था। मैं उन दिनों नईदुनिया में सम्पादक था।मुशायरा सुनने जाना ही था सो दफ्तर से निकलने की तैयारी में था। अचानक देखता क्या हूँ कि मेरे अज़ीज़ दोस्त और शायर मदनमोहन ‘दानिश’ के साथ निदा फ़ाज़ली साहब दफ्तर में मेरे सामने हैं। अपनी वही जानी पहचानी मुस्कराहट के साथ। उफ़ क्या सादगी थी निदा साहब में।

मैंने उठ कर उनका इस्तकबाल किया।निदा साहब खूब देर बतियाते रहे। उन दिनों नईदुनिया में हर दिन शाम के वक्त सारे संस्करणों के संपादकों की फोन पर कॉन्फ्रेंस कॉल होती थी। निदा साहब बैठे ही थे तभी कॉन्फ्रेंस कॉल का वक्त हो गया। हेड ऑफिस इंदौर से संपादक जयदीप कर्णिक की घंटी बजी। मैंने जब जयदीप और एम पी छत्तीसगढ़ के सभी संपादकों (भोपाल से Girish Upadhyay, जबलपुर से Vibhuti Sharma, रायपुर से Ravi Bhoi और बिलासपुर से drsunil Dr-Sunil Gupta) को बताया कि निदा साहब इस वक्त मेरे साथ हैं तो सब उनसे बात करने को बेताब हो गए। निदा साहब ने स्पीकर फोन पर सभी सम्पादकों से दुआ सलाम की और जयदीप भाई की गुजारिश पर शे’र भी सुनाये। संपादकों की टेली कॉन्फ्रेंस में ख़बरों के बीच निदा साहब से गुफ़्तुगू एक यादगार लम्हा बन गयी।

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निदा फ़ाज़ली रुखसत हो गए।अपने वालिद मरहूम से जिस तरह निदा ने कहा कि तुम्हारी कब्र में मैं हूँ तुम मुझमें ज़िंदा हो, उसी तरह वे खुद अपनी कब्र में रहेंगे लेकिन उनके लफ्ज़ हम सब में ज़िंदा रहेंगे। अभी जुमा जुमा दो महीने पहले की ही तो बात है। अपने शहर ग्वाल्हेर में आई टी एम के प्रोग्राम”इबारत” में आये थे।एक शाम पहले होटल सेन्ट्रल पार्क के कमरे में निदा साहब, दोस्त मदनमोहन ‘दानिश’ और मैं गपशप के लिए बैठे।मैंने अपना कविता संग्रह “बसंत के पहले दिन से पहले” उन्हें दिया। दानिश ने उन्हें बताया कि  मेरी किताब में ज्यादातर प्रेम कवितायेँ हैं तो वे हुलस पड़े।

फिर तो निदा साहब ने प्रेम, इश्क, मोहब्बत पर हमें इस तरह सराबोर किया कि हम पर ‘पैमाने’ से ज्यादा उनकी बातों का नशा छाता गया। बाबा फरीद से लेकर परवीन शाकिर तक के हवाले से निदा साहब की ज़ुबानी मैं और दानिश मुहब्बत के दरिया में डूबते उतराते रहे। आज के दौर पर थोड़ा उदास होकर निदा साहब बोले कि अब तो खिड़की तक का रास्ता चटपट तय हो जाता है। पहले खिड़की पर दिखते चेहरे से नज़रें मिलाने में ही न जाने कितना वक्त लगता था। वो कहते कि दुनिया को बचाने के लिए प्रेम को बचाया जाना सबसे ज़रूरी है।

आधी रात बाद तक हम निदा साहब को सुनते और गुनते रहे।क्या पता था कि 28 नवम्बर ’15 की उस शाम के जाम हमारे साथ के आखिरी जाम होंगे। ग्वालियर उनका अपना शहर है सो चाहे मेले का मुशायरा हो,इबारत हो या कोई और मौका वे हमेशा आने को तैयार रहते।बीते न जाने कितने बरसों में ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि वे ग्वालियर आएं और हमारी मुलाकात न हो। वे मुझे मोहब्बत से पाठक साहब बुलाते। मंच से हर बार मेरा नाम लेकर एक दो शे’र मेरी नज़र करते। आप बहुत याद आएंगे निदा साहब। खुदा हाफिज। और हां.. “कभी फुरसत मिले तो अपनी गज़लें सुनने चले आना”, यहाँ लाखों मुरीद हैं जिन्हें आपकी सारी गज़लें ज़ुबानी याद हैं।

लेखक डॉ राकेश पाठक डेटलाइन इंडिया के प्रधान संपादक हैं.


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