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मृत्यु के दो दशक बाद भी हिंदी का एक लेखक अपनी किताबों के बल पर जिंदा है!

प्रियंका दुबे-

हिन्दी साहित्य के एक बड़े वर्ग को समझ नहीं आता कि निर्मल वर्मा का करें क्या? लेखक की प्रसिद्धि है या स्प्रिंग, जितना दबाओ, उतनी ही बढ़ती है! बहुतों के लिए तो निर्मल जी का लिखा उनके गले में फँसी ऐसी हड्डी है जो न उनसे निगलते बनती है और न ही उगलते. अपनी मृत्यु के तकरीबन दो दशक बाद भी हिन्दी का एक लेखक सिर्फ़ अपनी किताबों के बल पर ज़िंदा है. न कोई ऐसा बड़ा परिवार है जो उन पर लगातार कार्यक्रम करवाता हो, न पढ़ाए गये पीएचडी स्टूडेंट्स की फ़ौज है. न कोई ऐसी institutional legacy ही है.

ऐसा लेखक जिसको सब ने छोड़ दिया और सिर्फ़ पाठकों ने पकड़े रखा. पाठक भी कैसे? मेरे और मेरे बाद आ रही पढ़ने वालों की पूरी क़तार जो उनसें कभी नहीं मिली. मेरी तरह ही ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने उनकी मृत्यु के बाद ही उनका नाम पहली बार सुना पढ़ा. फिर पढ़ना शुरू किया. हममें से किसी को उनसे कोई निजी लाभ है ही नहीं. जो इंसान संसार में ही नहीं है, उससे किसी को क्या लाभ हानि हो सकती है भला? निर्मल को पढ़ने वालों का उनसे कोई संबंध ही नहीं है- सिवाय उनके टेक्स्ट से संबंध के.

अब सोचिए – एक ऐसा लेखक जिसके साथ अपवादों को छोड़कर न तो पारंपरिक आलोचना रही और जिस पर मृत्युपरांत भी लगातार जिस कदर तथाकथित “हमले” होते रहे, उतने शायद ही किसी पर हुए हों. लेकिन फिर भी वह लेखक न सिर्फ़ जीवित है बल्कि हर साल हिंदी में बहुत चाव से पढ़े और सेलिब्रेट किए जाने वाले लेखकों में शुमार है. यहाँ लोगों की किताबें उनके जीवनकाल में आउट ऑफ़ स्टॉक हो जाती हैं. एक निर्मल जी हैं, जिनको प्रतिष्ठित और प्रकाशित करने के लिए प्रकाशकों का उत्साह देखते ही बनता है. चाहे कोई भी प्रकाशक हो, उनके लिए सभी के दिल और दरवाज़े हमेशा खुले रहते हैं.

मैं देखती हूँ, हर बार कुछ सालों में उनकी किताबों के नए कवर दिखाई पड़ जाते हैं. एक से एक सुंदर कवर डिज़ाइन किए जाते हैं. उनकी किताबों के सेट के सेट निकाले जाते हैं. यह सब करवाने निर्मल ख़ुद दूसरी दुनिया से उतरकर नहीं आते. उनका टेक्स्ट अपने ताप से करवाता है. वह तो यह सब कुछ देखने के लिए जीवित भी नहीं हैं. पढ़ने वाले तो मैंने ऐसे ऐसे मुरीद देखे कि क्या देहात,क्या देश क्या विदेश. मैं आज हमारे समय के कम से कम तीन ऐसे अत्यंत प्रतिभाशाली और स्थापित लेखक-पत्रकार-शोधकर्ताओं को जानती हूँ जो निर्मल जी की बायोग्राफी लिखने से लेकर दूसरे शोध कार्य करने को लालायित हैं.

एक दूसरा शख्स, उसने घूमते फिरते एक किताब पढ़ी और इतना प्रभावित हुआ कि अंग्रेज़ी में एक किताब ही लिख दी- लिटरेरी बायोग्राफी ऑफ़ निर्मल वर्मा. हमारे समय में जब लोग एक एक रिव्यू को मरे जाते हैं, पर्सनल मेसेज के स्क्रीनशॉट लगाकर शेयर करते हैं : तब एक बीस साल पहले (तक़रीबन बीस) मर चुके लेखक के सृजन पर लगातार इतना काम होते देखने से उपजने वाली तकलीफ़ समझ में आती है. रोचक यह है कि निर्मल ख़ुद नहीं आते परलोक से उतरकर यह कहने कि मुझे पढ़ो – मुझ पर सौ शब्द लिख दो. लोग ख़ुद उन्हें पढ़ते हैं. उन पर काम करते हैं.

हालाँकि मैं साहित्य के इस सरलीकृत वर्गीकरण को बहुत limiting और suffocating मानती हूँ – लेकिन फिर यह तथ्य है कि “जनवादियों” के रूप में ख़ुद को चिन्हित करने वाले एक बड़े समूह ने लंबे समय तक उनके कथा संसार को “ढहाने” (ढहाना, हमला इत्यादि यह सब हिन्दी साहित्य के टर्म्स हैं जो जिनके लेखकों के लिए इस्तेमाल पर मेरे reservations हैं इसलिए मैं इन्हें quotes में लिखती हूँ) की बहुत कोशिश की. सालों तक करते रहे, कर रहे हैं, करते रहेंगे. उनके जन्मदिन पर नफ़रत प्रदर्शित की, मृत्यु की तारीख़ पर भी घृणा दिखाई. और बीच बीच में भी -जब जब संभव हुआ तब तब उन्हें जी भरकर कोसा.

यहाँ रेखांकित करना महत्वपूर्ण है कि यह बात असहमति की नहीं है, नफ़रत की है. उनके या किसी भी अच्छे लेखक के लिखे से असहमत तो बहुत अच्छी बात है – कोई भी अच्छा लेखक ऐसा ही पाठक चाहेगा जो उससे disagree भी कर सके. डेविड फोस्टर वालेस और क्लेरीस लिस्पेक्टर जैसे दो लेखकों तो मैं जानती ही हूँ जो अपने टेक्स्ट से disagree करने वाले पाठकों को बहुत पसंद करते थे. निर्मल जी के लिखे को पढ़कर भी जितना मुझे समझ में आता है, उससे यही लगता है कि वे ख़ुद भी अपने टेक्स्ट के इर्द गिर्द आ रही असहमतियों का स्वागत ही करते थे. मैं भी उनके टेक्स्ट से बहुत जगह बहुत disagree करती हूँ. समय के साथ यह disagreement बढ़ा भी है.

लेकिन सिर्फ़ असहमति से मन भर जाता तो निर्मल वर्मा ‘फ़ेसबुक एडवेंचर स्पोर्ट’ में तब्दील नहीं हो गए होते. मुझे तो amusing लगता है यह सब कुछ- ट्रैजिकली फ़नी. कैसी कैसी बातें पढ़ी हैं मैंने – अभी तो याद भी नहीं कि कहाँ क्या पढ़ा था. कुछ कुछ जो रेशे स्मृति में हैं उनमें – जी में आता है निर्मल वर्मा पर कुछ लिख कर notifications off करके सो जाऊँ और निर्मल वर्मा की बुराई करने से रीच बढ़ती है जैसे वाक्य भी थे. इस adventure sport में सभी को मज़ा आने लगा है. जैसे ऊब से बचने की कोई दवाई हो बहुत बोर हो रहे हैं, चलो निर्मल वर्मा को कोसते हैं!

ख़ैर. सच यह है कि निर्मल वर्मा को मेरे इस पोस्ट की कोई ज़रूरत नहीं. उन्हें हम में से किसी के लिखे की कोई ज़रूरत नहीं. वे अपनी लिखाई के ताप और अपनी किताबों के कंधों पर शान खड़े हैं. मेरे जैसे फ़ेसबुक पर लिखने या फिर यहाँ एडवेंचर स्पोर्ट खेलने वालों का क्या है, होता है शबओरोज़ तमाशा मेरे आगे.

लेखिका कारवां और बीबीसी वर्ल्ड जैसे संस्थानों में अहम पदों पर कार्यरत रही हैं.

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