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सियासत

नितिन गडकरी को भी हराने की साजिश हुई थी?

कृष्ण पाल सिंह-

भारतीय जनता पार्टी (BJP) में एक बड़ा वर्ग पार्टी के वर्तमान नेतृत्व की नीति रीति को लेकर घुटन महसूस कर रहा है। पार्टी के हमदर्दों की ओर से जिसमें मीडिया की मुख्य धारा की एक बड़ी जमात भी शामिल है इसे नकारने की चाहे जितनी कोशिश करे लेकिन समय-समय पर ऐसा घटनाक्रम सामने आ ही जाता है जिससे पर्दादारी की पूरी कोशिश पर पानी फिर जाये।

केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी (Nitin Gadkari) उन नेताओं में से हैं जो पार्टी के नेतृत्व के सामने एकदम अलग-थलग नजर आते हैं। पिछले दिनों संसद का एक वाकया काफी चर्चाओं में रहा था। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ देर के लिए लोकसभा को कृतार्थ करने के लिए आकर वापस जाने लगे तो पार्टी सांसदों के साथ-साथ सारे मंत्री हाथ जोड़कर उनकी अभ्यर्थना में खड़े हो गये। लेकिन नितिन गडकरी की मुद्रा सबसे अलग दिखी। वे खड़े जरूर हुए लेकिन उन्होंने हाथ नहीं जोड़े। उन्होंने मोदी के गुजरते समय अपने दोनों हाथ पीछे बांध रखे थे। मोदी को अपना चेहरा दिखाने जैसी कोई दिलचस्पी उनमें नहीं दिखी।

मोदी को नजरअंदाज करने के नितिन गडकरी के दुस्साहस का यह कोई पहला मामला नहीं था। वे कई बार यह प्रदर्शित कर चुके हैं कि वे दरबारी की तरह अपने को दिखाना पसंद नहीं करते।

नितिन गडकरी के मंत्रालय के कामकाज की प्रशंसा पक्ष-विपक्ष सभी में होती है। राजनाथ और नितिन गडकरी मोदी मंत्रिमंडल के दो सदस्य ऐसे हैं जिनसे विपक्षी नेताओं के भी सौहार्दपूर्ण संबंध बने हुए हैं। अन्यथा सरकार के लोगों और विपक्ष के नेताओं में संबंधों के मामले में कटुता की सीमाएं पार हो चुकी हैं। नितिन गडकरी का अजातशत्रु होना और उनके काम का सर्व प्रशंसित होना भाजपा के नेतृत्व को कतई नहीं सुहाता। यह कई बार स्पष्ट हो चुका है।

मीडिया में यह खबरे भी उछलती रहती है कि नितिन गडकरी को ही RSS प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उत्तराधिकारी बनाने का निश्चय किये हुए है। जाहिर है कि भाजपा हाईकमान इसके चलते उन्हें शुरू से अपने प्रतिद्वंदी के रूप में देखता है। यह भी एक वजह है जिससे पार्टी नेतृत्व और नितिन गडकरी के बीच संबंध असहज हैं। नितिन गडकरी की आदत है कि जो उन्हें यथार्थ लगता है उसे वे जुबान पर ला ही देते हैं। भले ही इसकी व्याख्या कुछ भी हो जाये। कई बार उनके सहज बयानों में नेतृत्व के लिए बेअदबी का प्रदर्शन तलाश किया गया है। हाल में उन्होंने सरकार को निकम्मा बताने का बयान दिया था। जिसकी इस एंगिल से व्याख्या कर मीडिया के एक वर्ग ने जमकर सनसनी बटोरी थी।

इस सबसे भाजपा का नेतृत्व उन्हें लेकर बहुत सशंकित रहता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में उनकी उम्मीदवारी की घोषणा में जानबूझकर बिलंब किया गया था जिससे पार्टी नेतृत्व का उनके प्रति दुराव खुलकर सामने आ गया था। कहा तो यह जाता है कि पार्टी नेतृत्व उनकी उम्मीदवारी को खत्म करने की फिराक में था लेकिन संघ के डर से यह संभव नही हो पाया। चुनाव प्रचार में भी उनके साथ दुभाति की गई। कोई प्रमुख नेता उनके चुनाव क्षेत्र में सभा करने के लिए नहीं पहुंचा। उन्हें नागपुर में अकेले मोर्चा संभालना पड़ा। किवदंती यह भी है कि उनके चुनाव के बाद उन्हें मलहम लगाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नागपुर पहुंचे थे और उन्होंने नागपुर में रात्रि प्रवास भी किया था जिसमें गडकरी को मुलाकात करने का संदेशा भिजवाया था लेकिन गडकरी ने मना कर दिया था।

इस समय चुनाव आयोग द्वारा भाजपा के पक्ष में धांधलियां किए जाने का मुददा तूल पकड़े हुए है। राहुल गांधी ने बंगलुरू के एक विधानसभा क्षेत्र महादेवपुरम को सैम्पल बनाकर शोधपरक पड़ताल कराई जिसमें 1 लाख 250 फर्जी वोट बढ़ाये जाने के सुबूत पेश करने का दावा उनके द्वारा किया गया। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है और अगर वहां लोकसभा चुनाव के समय मतदाता सूची बनाने में कोई धांधली हुई है तो उसका जिम्मा कांग्रेस का है। भाजपा की ओर से यह दलील पेश की जा रही है जो निश्चित रूप से तार्किक है। लेकिन भाजपा चुनाव आयोग से इसकी जांचकर कर्नाटक की सरकारी मशीनरी को दंडित कराने की मांग क्यों नहीं कर रही। बजाय इसके वह तो चुनाव आयोग के सुर में सुर मिलाकर यह प्रयास कर रही है कि राहुल गांधी ने जो आरोप लगाये हैं उनकी जांच न हो।

बहरहाल, आजाद भारत के इतिहास में हाल के वर्षों में चुनाव आयोग की साख की जो गत बनी है वह कभी नहीं हुई। चुनाव धांधलियों के आरोप लगते थे लेकिन चुनाव आयोग पर इस तरह उंगलियां नहीं उठती थी। इसके बावजूद चुनाव आयोग पारदर्शिता बढ़ाकर अपनी साख की सुरक्षा करने की बजाय ऐसी हरकतें कर रहा है जिससे उसकी विश्वसनीयता रसातल के भी नीचे धंसती जा रही है। राहुल गांधी के तथाकथित खुलासे के बाद चुनाव आयोग ने अपनी बेवसाइट से डिजिटल मतदाता सूची हटाकर स्कैन सूची डाल दी जो ऐसी ही हरकत है।

ऐसा करने के पीछे उसने कोई लॉजिक नहीं दिया लेकिन लोगों को यह दिखाई दे रहा है कि ऐसा इसलिए किया गया है जिससे राहुल गांधी की तरह आगे वे या कोई अन्य मतदाता सूची के आधार पर आसानी से धांधली की खोजबीन का प्रयास न कर सके। इसके पहले मतदान के इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को सार्वजनिक न करने का नियम बनाकर भी उसने जताया था कि वह ऐसी पर्देदारी करना चाहती है जिससे उसकी करतूतें ढंकी रह सकें। इसी तरह उसने मतदान का डाटा केवल 45 दिन ही संरक्षित रखने का जो नियम बनाया है उसका भी बदनीयती के अलावा कोई उददेश्य नहीं हो सकता।

इस आपाधापी के बीच नितिन गडकरी भी आ गये हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव के बाद इंडिया टुडे के लिए राजदीप सरदेसाई को इंटरव्यू दिया था जिसका वीडियो प्रासंगिक होने के कारण अब तेजी से वायरल किया जा रहा है। इसमें वे बता रहे हैं कि उनके निर्वाचन क्षेत्र में ही साढ़े तीन लाख वोट जो उनके थे काट दिये गये। यहां तक कि उनके परिवार के लोगों तक के नाम वोटर लिस्ट से गायब कर दिये गये थे। सौजन्यता के नाते इंटरव्यू के समय गडकरी ने इसके पीछे साजिश का आरोप लगाने से इंकार कर दिया था। लेकिन अगर मतदाता सूचियों में धांधली हो रही है तो ऐसा किसी पूजा-पाठ के लिए तो हो नहीं रहा।

यह विकृतियां निचले स्तर के कर्मचारियों की लापरवाही का भी परिणाम हो सकतीं थीं अगर चुनाव आयोग का रवैया ढीठतापूर्ण न हो। लेकिन चुनाव आयोग खुद ही अपने रवैये से यह साबित कर रहा है कि इसके पीछे उसकी साजिशपूर्ण परियोजना है। इसीलिए चुनाव आयुक्तों की चयन समिति में सरकार के बहुमत की व्यवस्था की बेहयायी की गई है ताकि सरकार को निष्पक्ष अधिकारी की बजाय अपने स्वामी भक्त को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाने की कुंजी हासिल हो सके। एकतरफा चुनाव आयोग तो एक पक्षीय कार्य करेगा ही और चुनाव आयोग ऐसा ही कर रहा है।

विपक्ष के साथ-साथ यह साजिश अपनी पार्टी के भी उन लोगों के लिए हो जिनसे भाजपा का नेतृत्व खतरा महसूस करता हो। स्पाईवेयर पैगासस के मामले में यह बात सामने आ चुकी है कि अगर अमेरिका की अदालत में व्हाटसएप द्वारा पैगासस के खिलाफ विभिन्न देशों की हस्तियों की जासूसी की जो सूची पेश की गई है अगर वह सही है तो मोदी सरकार के बारे में यह बात खुल जाती है कि वह केवल विपक्ष को ही निशाने पर नहीं रखती। उसकी साजिशी परियोजनाएं पार्टी के प्रतिद्वंदियों को भी लक्षित रखी जाती हैं। तब क्या यह माना जाये कि नितिन गडकरी को भी हराने की साजिश हुई थी और इसको फलीभूत करने के लिए ही उनके निर्वाचन क्षेत्र में इतनी बड़ी तादाद में वोट काटे गये थे।

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