लो, लो, सेल्फी लो… लेते रहो, तुम्हें अब कोई प्रेस्टीट्यूट नहीं कहेगा! : ओम थानवी

Om Thanvi : इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक कुछ पत्रकारों ने प्रधानमंत्री के साथ अपनी स्व-छवि एकाधिक बार ली। एंगल जंचा नहीं तो घूम कर दुबारा आ गए। इस पर भीड़ घटाने की गरज से सांसद अनुराग ठाकुर ने कहा कि जो एक बार सेल्फी ले चुके हों, कृपया दुबारा न लें। तब, अनुराग के अनुसार, मोदीजी ने उन्हें टोका – अरे, लेने दो। किसी को न रोको। दुबारा चाहते हैं, दुबारा लो। लो, लो, लो … लेते रहो। तुम्हें अब कोई प्रेस्टीट्यूट नहीं कहेगा!

पीएम के साथ सेल्फियाने वाले पत्रकारों को दाद मिलनी चाहिए। बेशरमी में परदा तो नहीं करते। उनसे बेहतर हैं जो साफ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं।

Sanjaya Kumar Singh : ना खाऊंगा ना खाने दूंगा… सबसे पहले पत्रकारों को औकात बताउंगा। सेल्फी में समेट दूंगा – सबको @#$%^ बनाकर घुमाउंगा। प्रेस कांफ्रेंस करूं, ना करूं, सवाल पूछने लायक नहीं छोड़ूंगा। मीडिया सलाहकार रखूं, ना रखूं, दुम हिलाने वाला बना दूंगा। मुझे दोष ना देना देशवासियों मीडिया को नंगा करके रहूंगा। (प्रधानमंत्री ने जो कहा था उसे भूल गए, जो नहीं कहा था, कर दिखाया। एक सैल्यूट तो बनता है।)

एक तरफ प्रधानमंत्री पत्रकारों के साथ सेल्फी खिंचवा रहे हैं (दरअसल पत्रकारों को धन्य होने का मौका दे रहे हैं) और दूसरी तरफ अरविन्द केजरीवाल लोगों से अपील कर रहे हैं कि दिल्ली में कहीं कूड़ा हो तो उसकी तस्वीर हमें भेजिए – हम उसे साफ करेंगे। निश्चित तारीख तक। Arvind Kejriwal जी 70 में से 67 सीटें मिल गईं तो ऐसे मगन मत रहिए। आगे के चुनाव जीतने का बंदोबस्त भी करना होता है। और काम करने से चुनाव जीते जाते तो कांग्रेस दिल्ली से साफ नहीं हो जाती। कुछ राजनीति सीखिए – भाई जान। कम से कम पत्रकारों का पटाने का कोर्स तो कर लीजिए। लाला तो आपसे पटेंगे नहीं।

Mamta Yadav : बिहार चुनावों की हार के बाद खोया नूर इस तथाकथित सेल्फी पार्टी ने वापस ला दिया। जिस बात ने मोदी के मंसूबों को आसमान तक पहुंचा दिया होगा उस शब्द का नाम है सेल्फ़ी। जिस तरह से दर्जनों पत्रकारों ने मोदी को घेर कर एक के बाद एक सेल्फ़ी खींचनी शुरू की उससे मोदी का ‘खोया हुआ नूर’ दोबारा लौट आया। लेकिन इस सबने मीडिया की गरिमा को कहां पहुंचाया तस्वीरें बताती हैं…?

Mayank Saxena : हर बार, जब सेल्फी कांड होता है, मुख्य धारा की पत्रकारिता छोड़ने पर इतना गर्व महसूस होता है कि बताया नहीं जा सकता…अगर पत्रकार के तौर पर नौकरी में होता, तो कितनी शर्मिंदगी होती, इसका अंदाज़ लगाता हूं और मुस्कुराने लगता हूं…

Vinod Sharma : I’ve known many political leaders but don’t have photos taken with any–except one with Atalji at the Minar-e-Pakistan. That I secured after it got published in several Indian newspapers in 1999. Mercifully, those weren’t the selfie days. It was to some extent the age when self-esteem mattered more than a selfie. I think newpersons scrambling for selfies with leaders and ministers must be restrained by peer groups or by their bosses at places of work. For a journalist has to be an iconoclast, not an idol worshipper.

पत्रकार ओम थानवी, संजय कुमार सिंह, ममता यादव, मयंक सक्सेना और विनोद शर्मा के फेसबुक वॉल से.

भड़ास की खबरें व्हाट्सअप पर पाएं
  • भड़ास तक कोई भी खबर पहुंचाने के लिए इस मेल का इस्तेमाल करें- bhadas4media@gmail.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *