ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है

Dilnawaz Pasha : ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है. भारत में ‘प्रेस्टीट्यूट’ शब्द को स्वीकार कर लिया गया है और एक धड़ा जमकर इसका इस्तेमाल कर रहा है. सरकार ने मंत्रालयों में पत्रकारों की पहुंच कम कर दी है. यहां तक कि प्रधानमंत्री अपनी यात्राओं में पत्रकारों को साथ नहीं ले जा रहे हैं, जैसा कि पहले होता था.

अमरीका में ट्रंप प्रशासन ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वो ‘मीडिया को ही विपक्ष’ बना लेंगे. डोनल्ड ट्रंप कई बार मीडिया संस्थानों के लिए भद्दी भाषा का प्रयोग कर चुके हैं और कई स्थापित चैनलों को फ़र्ज़ी तक कह चुके हैं. ऐसा करके वो अपने एक ख़ास समर्थक वर्ग को ख़ुश भी कर देते हैं.

दुनिया में नया ऑर्डर स्थापित हो रहा है. इसमें पत्रकारों को भी अपनी नई भूमिका तय करनी होगी. जब अपनी बात पहुँचाने के लिए नेताओं के पास ‘सोशल मीडिया’ है तो वो ‘स्थापित मीडिया’ से दूरी बनाने में परहेज़ क्यों करेंगे?

मुझे लगता है कि ऐसे बदलते परिवेश में वो ही पत्रकार कामयाब होंगे और पहचान पाएंगे जो संस्थानों के समकक्ष स्वयं को स्थापित कर लेंगे. ‘बाइट-जर्नलिस्टों’ की जगह ‘विषय विशेषज्ञों’ की पूछ होगी.

जिस दौर में स्थापित मीडिया को विलेन बनाया जा रहा है उस दौर में पत्रकारों के पास ज़मीनी रिपोर्टिंग करके ‘हीरो’ बनने का मौक़ा भी है.

पत्रकार दिलनवाज पाशा की एफबी वॉल से.

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सेल्फी प्रकरण पर जागरण के रिपोर्टर का सवाल सुनते ही आगबबूला हुई बुलंदशहर की डीएम, मां-बहन कह कह के जमकर हड़काया, सुनें यह टेप

बुलंदशहर में एक डीएम हैं. चंद्रकला नाम से. उनके साथ एक लड़के ने सेल्फी ली, बिना उनकी सहमति. इससे नाराज डीएम ने उस युवक को जेल भिजवा दिया. इस प्रकरण पर जब दैनिक जागरण के रिपोर्टर ने डीएम से पूरा घटनाक्रम जानना चाहा, डीएम का पक्ष जानना चाहा तो डीएम साहिबा इस कदर आग बबूला हुईं कि जागरण के रिपोर्टर को उसकी मां बहन का हवाला दे दे कर जमकर हड़काया.

पूरा टेप सुनने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=6L2etDR3Rxk


इस प्रकरण को दूसरा पक्ष जानने के लिए नीचे दिए गए शीर्षक पर क्लिक करें…

जबरन सेल्फी लेने वाले मनचले को जेल भिजवाने वाली डीएम चंद्रकला के पीछे क्यों पड़ा है दैनिक जागरण?

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सेल्फी कांड के बहाने : ”…भाई साब, पत्रकार हो तो ऐसा”!

Abhishek Srivastava :  कुछ महीने पहले इमरजेंसी में लखनऊ जाना हुआ। रास्‍ते में टोल पड़ा तो मैंने झट से रुपया निकाल कर दे दिया। टैक्‍सी ड्राइवर मुझ पर बिगड़ गया। बोला, आप प्रेस के आदमी हैं, कार्ड दिखा देते। मैंने पूछा अगर वो नहीं मानता, तो? वह मानने को तैयार ही नहीं हुआ कि ऐसा भी हो सकता है। आगे के हर टोल पर मैं पैसा देता गया और हर बार उसकी निगाह में गिरता गया। फिर एक दिन की बात है, ट्रेन में बैठा मैं खिड़की से बाहर की एक फोटो खींच रहा था।

एक सज्‍जन से रहा नहीं गया। बोले, आप मीडिया से हैं क्‍या? ऐसे सवाल पर अकसर मैं इनकार कर देता हूं, लेकिन मेरे मुंह से जाने कैसे हां निकल गया। वे चोन्‍हराते हुए बोले, तब तो आप कई नेताओं के साथ घूमते होंगे? मैंने इनकार किया। मिलना तो होता ही होगा? नहीं। फिर वे फिल्‍म सितारों पर आए। मैंने फिर से नहीं कहा। उनके भीतर उम्‍मीद बाकी थी। वे बोले- इसका मतलब आप बड़े-बड़े बिजनेसमैन लोगों के बारे में लिखते हैं! मैंने कहा- बिलकुल नहीं। वे दुखी हो गए। फिर मुझे अपने मोहल्‍ले के एक पत्रकार की कहानी सुनाने लगे कि कैसे उसने एक बार इन्‍हें एक मंत्री से मिलवा कर काम करवा दिया था। अंत में मुझे हिकारत से देखते हुए बोले, ”भाई साब, पत्रकार हो तो ऐसा”!

रोज़ाना ऐसे लोग मिलते हैं। उन्‍हें इससे मतलब नहीं होता कि आप क्‍या लिखते हैं। उनका सारा ज़ोर इस बात पर रहता है कि आप किसे-किसे जानते हैं और क्‍या-क्‍या करवा सकते हैं। लोगों के देखने का तरीका ही ऐसा है। पत्रकार का मतलब इस समाज में एक प्रिविलेज्‍ड प्राणी, ताकतवर व रसूखदार आदमी के तौर पर स्‍थापित होता गया है जो सामान्‍य से बड़े काम करवा सकता हो। पत्रकार से पत्रकारिता का रिश्‍ता लोगों को तभी समझ में आता है जब उसके लिखने से कुछ फंसा हुआ हल हो सके, वरना आपके लिखे का कोई मोल नहीं है।

ये जो मीडियावाले प्रधानमंत्री के साथ फोटो खिंचवाने के लिए मार कर रहे थे, इस लालची-मतलबी समाज के असली नुमाइंदे हैं। मेरे अधिकतर परिचित मीडियाकर्मी ऐसे ही हैं। गाड़ी धुलवाने से लेकर राशन मंगवाने तक और बाहर घूमने तक किसी चीज़ का कोई पैसा नहीं चुकाते। इनका हर काम फ्री में हो जाता है क्‍योंकि बदले में ये भी अपने रसूख का इस्‍तेमाल फंसी हुई चीज़ों को हल करने में करते हैं। रसूख से जीवन आसान होता है। रसूख जितना बढ़ता है, हरामखोरी उतनी बढ़ती है। रसूख बढ़ाने के लिए रीढ़ को गिरवी रखना ज़रूरी होता है। दो साल से लगातार चल रहा दिवाली सेल्‍फी कांड दरअसल रीढ़ गिरवी रखने का एक सचेतन अभ्‍यास है। ऐसा करने में उन्‍हें शर्म महसूस नहीं होती क्‍योंकि वे अपने समाज को अच्‍छे से समझते हैं। यह समाज पेट देखता है, पीठ नहीं।

युवा पत्रकार और मीडिया समीक्षक अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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सेल्फीमार पत्रकारों को आज के टेलीग्राफ अखबार का पहला पन्ना जरूर पढ़ना चाहिए

Sanjaya Kumar Singh : मेरा पसंदीदा अखबार। इसी को पढ़कर पत्रकारिता का चस्का लगा था और जब इसमें अपनी रिपोर्ट छप गई तो लगा अंग्रेजी में भी छप गया। उस समय सभी पत्रिकाओं में कम से कम एक रिपोर्ट छपवा लेने का रिकार्ड बना रहा था। बाद में प्रभाष जी को बताया कि टेलीग्राफ में भी छप चुका हूं तो उन्होंने कहा कि उसकी अंग्रेजी तो हिन्दी जैसी ही (आसान) है। तब समझ में आया था कि घर में स्टेट्समैन आने के बावजूद मुझे टेलीग्राफ क्यों अच्छा लगता था। पर अब भी अच्छा लग रहा है तो उसका कारण कुछ और है। इसके संस्थापक संपादक कांग्रेस से होते हुए भाजपा में पहुंच गए हैं पर अखबार के तेवर लगभग वैसे ही है। सेल्फी पत्रकारों के इस दौर में भी।

टेलीग्राफ के फ्रंट पेज को आप उपर देख रहे हैं. लीड खबर का टेक्स्ट मैटरर यहां दिया जा रहा है:

Q: THIS IS THE MEDIA WE EXPECT WILL ASK TOUGH QUESTIONS OF THIS GOVERNMENT?
— Omar Abdullah, former CM, Jammu & Kashmir

– A: TWO PICTURES ARE WORTH A THOUSAND WORDS

Our Special Correspondent

Journalists mob Prime Minister Narendra Modi for clicking selfies with him during the Diwali Mangal Milan at the BJP headquarters in New Delhi on Saturday. Former Jammu and Kashmir chief minister Omar Abdullah later tweeted: “This is the media we expect will ask tough questions of this government? Great visuals of an undignified selfie circus!!!” (PTI pictures)

New Delhi, Nov. 28: One journalist rested part of a cheek against Narendra Modi’s, aimed his cellphone with a sharpshooter’s concentration and clicked away.

The occasion was a Diwali bash Modi and BJP president Amit Shah hosted at the party headquarters today for journalists.

An indulgent security apparatus made a token show of warding the admirers off now and then as the Prime Minister was pursued by a gaggle of wide-eyed, selfie-seeking journalists for 45 minutes around the circumference of the huge lawn on 9 Ashoka Road.

Modi and Shah spoke briefly from a specially mounted dais that seated ministers Arun Jaitley, M. Venkaiah Naidu and Nitin Gadkari and Ramlal, the BJP general secretary (organisation).

The unstated rule was the audience would not ask questions because it was not intended to be a “media conference”.

Presumably because there was little else to do, some – not all – among the milling crowd of journalists steeled themselves to shoot photographs with the Prime Minister.

Once Modi dismounted and “mingled” with the gathering, out came the mobiles and click went the camera buttons.

Just as one Modi fan, “lucky” enough to thread his way through the crowd and reach close to his object of admiration, readied to click, another would sneak his palm in, put his phone over that of the first one and shoot, leaving his rival fuming. The nifty sleight of hand was pulled off in two or three seconds.

Every five steps the Prime Minister took – with the BJP’s young MP Anurag Thakur and media cell chief Shrikant Sharma in tow – was milestoned by a selfie stopover.

When the selfie perambulation concluded, Modi stopped by for a few seconds to wish journalists he recognised from the years he had spent at the party office as a general secretary.

Many of the selfie-seekers posted their visual trophies on their Twitter and Facebook walls.

For much of the day, the media scramble trended on Twitter in a handle, #ModiMediaGate, that panned journalists for the open adulation.

A Twitterer, Aditi, announced that Modi had launched the “Pradhan Mantri Journalist Selfie Yojana” although the Prime Minister is not known to have played any role in triggering the photo-op rush.

Omar Abdullah, National Conference leader and former Jammu and Kashmir chief minister, was unsparing on the journalists who fell over each other to click the selfies. “This is the media we expect will ask tough questions of this government? Great visuals of an undignified selfie circus!!!”

L.K. Advani, who had famously voiced the opinion that when journalists were asked to “bend” during the Emergency, they “crawled”, was not at the venue to say what he thought of present-day journalists doing the opposite – straining and stretching on their toes – but with the same overawed mindset.

Veteran editor Kuldip Nayar, who was jailed during the Emergency, lamented the fawning on display.

“Modi’s public relationship is better than the others. Otherwise, he does not deserve all this adulation because he has not delivered anything on the ground. Journalists today lack the guts. The establishment does not have to do anything because journalists willingly offer their necks,” Nayar told The Telegraph.

Last year, too, the BJP had hosted a post-Diwali bash at the same place. Modi wore the aura of a victor then and posed for selfies although the shoots were fewer.

Modi said the Diwali do had to be deferred this time because of his packed schedule, adding that if it was not done today, he might have had to wait for Christmas, a festival that never figured on the BJP’s calendar of events. BJP chief Shah wished a great year for the country’s democratic traditions.

The wall between the ruling estates and the fourth estate (journalism) is invisible but a well-established convention in the free world.

When Saddam Hussein was captured in 2003 and Paul Bremer, the then US administrator in Iraq, made the triumphal “We-got-him” announcement, several journalists had risen to their feet and applauded.

Opinion eventually emerged that there was no room for such applause in journalism.

Ishraqat al Sadr, an editor who was among those who cheered, told his side of the story later: “I was remembering all of my friends that he (Saddam) killed, and I was thinking of the nightmares I had for three years that he had me tortured.” After applauding and jeering, al Sadr had wept.

Until George W. Bush came to power, American reporters had taken care not to say “we” for the US while asking questions and preferred a dispassionate “the US” or “the United States”.

Even in media boxes at sporting events – where writers unabashedly support home teams – a cardinal rule is never to applaud or cheer any feat on the ground. Some media organisations are so particular that jobs can be lost for transgressions. Sports Illustrated , the US media franchise , had fired motorsports reporter Tom Bowles in 2011 for cheering the winner of a race.

As Abdullah pointed out today, the scenes of journalists – supposed to be poker-faced professionals not given to displays of emotion while on assignment – competing with one another are certain to make readers and viewers wonder whether the same group can ask the ruling establishment uncomfortable questions.

Already, one of the biting criticisms against the Modi government has been that instead of managing the economy, it is trying to “manage the headlines”.

It was not always so. There was a time in India when stiletto thrusts marked the craft, however high, mighty and noble the target was.

An anecdote about Pothan Joseph, the editor who poked fun at everything under the sun through his column Over a Cup of Tea during the Nehru era, tells a vivid tale.

When Rajendra Prasad, one of the most respected public figures in Independent India, was re-elected as President amid suggestions of manoeuvring, Joseph wrote in his daily column: “Rajen Babu was sitting in his presidential suite, eagerly waiting to give his reluctant consent to continue as President.”

Readers had a good laugh but a badly hurt Rajen Babu wrote a nasty letter to the editor, according to an article in The Hindu newspaper.

Redemption awaits the bearers of selfie sticks if they can wield the professional stiletto with the same finesse and ruthlessness.

The BJP event on Saturday was covered by a reporter who watched the spectacle playing out on an LED TV screen and periodically ducked for cover from the thrusting cameras and selfie sticks.

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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लो, लो, सेल्फी लो… लेते रहो, तुम्हें अब कोई प्रेस्टीट्यूट नहीं कहेगा! : ओम थानवी

Om Thanvi : इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक कुछ पत्रकारों ने प्रधानमंत्री के साथ अपनी स्व-छवि एकाधिक बार ली। एंगल जंचा नहीं तो घूम कर दुबारा आ गए। इस पर भीड़ घटाने की गरज से सांसद अनुराग ठाकुर ने कहा कि जो एक बार सेल्फी ले चुके हों, कृपया दुबारा न लें। तब, अनुराग के अनुसार, मोदीजी ने उन्हें टोका – अरे, लेने दो। किसी को न रोको। दुबारा चाहते हैं, दुबारा लो। लो, लो, लो … लेते रहो। तुम्हें अब कोई प्रेस्टीट्यूट नहीं कहेगा!

पीएम के साथ सेल्फियाने वाले पत्रकारों को दाद मिलनी चाहिए। बेशरमी में परदा तो नहीं करते। उनसे बेहतर हैं जो साफ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं।

Sanjaya Kumar Singh : ना खाऊंगा ना खाने दूंगा… सबसे पहले पत्रकारों को औकात बताउंगा। सेल्फी में समेट दूंगा – सबको @#$%^ बनाकर घुमाउंगा। प्रेस कांफ्रेंस करूं, ना करूं, सवाल पूछने लायक नहीं छोड़ूंगा। मीडिया सलाहकार रखूं, ना रखूं, दुम हिलाने वाला बना दूंगा। मुझे दोष ना देना देशवासियों मीडिया को नंगा करके रहूंगा। (प्रधानमंत्री ने जो कहा था उसे भूल गए, जो नहीं कहा था, कर दिखाया। एक सैल्यूट तो बनता है।)

एक तरफ प्रधानमंत्री पत्रकारों के साथ सेल्फी खिंचवा रहे हैं (दरअसल पत्रकारों को धन्य होने का मौका दे रहे हैं) और दूसरी तरफ अरविन्द केजरीवाल लोगों से अपील कर रहे हैं कि दिल्ली में कहीं कूड़ा हो तो उसकी तस्वीर हमें भेजिए – हम उसे साफ करेंगे। निश्चित तारीख तक। Arvind Kejriwal जी 70 में से 67 सीटें मिल गईं तो ऐसे मगन मत रहिए। आगे के चुनाव जीतने का बंदोबस्त भी करना होता है। और काम करने से चुनाव जीते जाते तो कांग्रेस दिल्ली से साफ नहीं हो जाती। कुछ राजनीति सीखिए – भाई जान। कम से कम पत्रकारों का पटाने का कोर्स तो कर लीजिए। लाला तो आपसे पटेंगे नहीं।

Mamta Yadav : बिहार चुनावों की हार के बाद खोया नूर इस तथाकथित सेल्फी पार्टी ने वापस ला दिया। जिस बात ने मोदी के मंसूबों को आसमान तक पहुंचा दिया होगा उस शब्द का नाम है सेल्फ़ी। जिस तरह से दर्जनों पत्रकारों ने मोदी को घेर कर एक के बाद एक सेल्फ़ी खींचनी शुरू की उससे मोदी का ‘खोया हुआ नूर’ दोबारा लौट आया। लेकिन इस सबने मीडिया की गरिमा को कहां पहुंचाया तस्वीरें बताती हैं…?

Mayank Saxena : हर बार, जब सेल्फी कांड होता है, मुख्य धारा की पत्रकारिता छोड़ने पर इतना गर्व महसूस होता है कि बताया नहीं जा सकता…अगर पत्रकार के तौर पर नौकरी में होता, तो कितनी शर्मिंदगी होती, इसका अंदाज़ लगाता हूं और मुस्कुराने लगता हूं…

Vinod Sharma : I’ve known many political leaders but don’t have photos taken with any–except one with Atalji at the Minar-e-Pakistan. That I secured after it got published in several Indian newspapers in 1999. Mercifully, those weren’t the selfie days. It was to some extent the age when self-esteem mattered more than a selfie. I think newpersons scrambling for selfies with leaders and ministers must be restrained by peer groups or by their bosses at places of work. For a journalist has to be an iconoclast, not an idol worshipper.

पत्रकार ओम थानवी, संजय कुमार सिंह, ममता यादव, मयंक सक्सेना और विनोद शर्मा के फेसबुक वॉल से.

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मोदी‬ को साधुवाद जिन्होंने सेल्फी के लिए धक्कमपेल करते पत्रकारों का ढोंग उजागर किया

Rajender Singh Brar :  ‎प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी‬ को साधुवाद जिन्होंने इन सेल्फीचोर पत्रकारों का ढोंग उजागर किया क्योंकि पिछले एक दशक से ये लोग उनको पानी पी पी कर ‘कोस’ रहे थे और आज उसी ‘महामानव’ के साथ सेल्फी के लिये धक्कमपेल करते दिखाई दिये। घिन आती है यह सोच कर कि यही वो पत्रकार बिरादरी है जिसके कंधों पर सच लिखने और दिखाने की ज़िम्मेदारी है पर भड़वागिरी में लिप्त हैं। मेरा भाजपा के नेतृत्व से भी सवाल है कि ऐसे आयोजनों से क्या साबित करना चाहते हैं? प्रजातान्त्रिक व्यवस्था के लिये तो यही अच्छा है कि प्रेस जनता के सवाल प्रधानमंत्री के सामने रखे और देश का प्रधानमंत्री उनके जबाव देकर उसे आश्वस्त करे। बड़े से बड़े देश का मुखिया भी मीडिया के सवालों के जबाव देने को बाध्य होता है। अपने देश में पता नहीं क्यों, देश का प्रधानमंत्री बनते ही ‘मौन’ हो जाता है। ऐसी चुप्पी से किसी का भला नहीं होने वाला, पब्लिक सब समझती है और उसे जबाव देना भी आता है, बस उपयुक्त समय की तलाश में रहती है।

Harendra Moral :  शर्मनाक ….शर्मनाक ….शर्मनाक। मोदी को सेल्फी पीएम कहने वाली मीडिया और उसके नुमाइंदे आज खुद उनके साथ सेल्फी ‌लेने के लिए मरे जा रहे थे। भाजपा के दिवाली मिलन कार्यक्रम के नाम पर  इकट्ठा हुए देशभर के पत्रकारों और संपादकों में प्रधानमंत्री के साथ जिस तरह फोटो खिंचवाने और हाथ मिलाने की होड़ लगी उसे देखकर ऐसा लग रहा था जैसे गरीबों के मोहल्ले में कोई खैरात बांटने आ गया हो। मीडिया के नुमाइंदों ने बेहयाई की सारी हदें पार कर दी। आलम ये रहा कि कार्यक्रम दिवाली मिलन नहीं मोदी मिलन बनकर रह गया। दिनभर न्यूज चैनलों पर बैठकर मोदी और उनकी नीतियों को गरियाने वाले बड़े बड़े पत्रकार भी मोदी को सामने देखते ही घुटनों पर आ गए। ……सही है हमें भी तुम्हारा वजूद पता चल गया।

आशीष सागर : सेल्फी पत्रकारों कभी मरे किसान के साथ भी सेल्फी ले लिया करो! बाँदा – साल 6 जुलाई 2006 को बाँदा की न्याय पंचायत पडुई सुहाना में किसान किशोरीलाल साहू की आत्महत्या के बाद देश भर में फैला ‘चुल्हा बंदी आन्दोलन’ की आंच अभी अभी ठंडी नही हुई है. किशोरी के बाद से हर साल यहाँ किसान मरते है! उसी सूखे का जश्न मनाते है!…कल जब देश के पत्रकार दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी के साथ सेल्फी ले रहे थे तब इस गाँव का किसान देवीदीन साहू (65 वर्ष) पुत्र रामदयाल साहू ने मुरझाये खेत में सदमे से जान दे दी! ..इस पर केसीसी का यूनियन बैंक से 1 लाख 70 हजार कर्जा था. 17 बीघा का ये किसान एक सिंचित ग्राम पंचायत से है मगर बेपानी है….इस किसान की कोई सेल्फी न ले सका!

फेसबुक से.

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मोदी संग अपनी सेल्फी फेसबुक पर अपलोड करने वाले पत्रकार को यशवंत ने अनफ्रेंड किया

Yashwant Singh : मेरे एफबी फ्रेंड लिस्ट में मौजूद पत्रकार निशांत राय ने पीएम के साथ सेल्फी की दो तस्वीरें अपने एफबी वॉल पर डाली हैं. मैंने उन्हें अनफ्रेंड किया और फिर ये कमेंट किया : ”मैं आपको अनफ्रेंड करता हूं. टीवी पर दिख रहा था कि सेल्फी के लिए लोग मरे जा रहे थे. शेम शेम. एक रचनात्मक दर्प व्यक्तित्व में नहीं हो तो फिर क्या कंटेंट और क्या मार्केटिंग. सब बराबर है. बाकी ये लिखा है आज के सेल्फीमार पत्रकारिता और प्रेस टी ट्यूट पत्रकारों पर. https://www.facebook.com/yashwantbhadas/posts/925675474184193

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Yashwant Singh : एगो अउर मिला है जो हमरे फ्रेंड लिस्ट में है और धक्का मुक्की खा खा के सेल्फियाने के बाद फोटउवा एफबी पर डाल के लंबी चैन की सांस लिहिस है. कहो तो उसको भी बेचैन किया जाए? उन पत्रकार महोदय के मोदी के साथ सेल्फी की सेलफिसनेस पर बतियाते हैं, फोटू सहित. और हां, नई खबर ये है कि जिन निशांत राय ने मोदी के साथ सेल्फी की फोटू डाली थी और हम सोशल मीडिया वाले लोगों ने उनकी ‘खबर’ अपने अंदाज में ली तो वो फोटू डिलीट कर भाग चुके हैं. इसे कहते हैं सोशल मीडिया की ताकत. अरे पत्रकारों, कुछ तो क्रिएटिव इगो, आत्म-अनुशासन, आत्म-संयम रखो जिसकी चर्चा बार बार करते हो कि तुम्हें रेगुलेट न किया जाए, तुम्हें सेल्फ रेगुलेशन आता है. बट कहां सेल्फ रेगुलेशन आज चला गया था जब मोदी ने थोड़ा स्ट्रेटजिकल स्पेस क्या तुम्हें दिया, तुम लोग लगे मोबाइल कपार पर रखकर दौड़ने हांफने पादने भागने. ‪

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ये सेल्फीमार पत्रकार…. इन सबों को शर्म नहीं आती. ये गए थे दिवाली मिलन करने. लेकिन ये चाटुकारिता के चरम पर पहुंच गए. पत्रकारिता भूल चरणचोदन करने लगे…. हाय हाय सेल्फी… हाय हाय हाथ.. हाय हाय सलाम…. हद है ऐसे पत्रकारों पर.. अरे यार.. डीएम एसपी को खुश करने की पत्रकारिता करोगे तो अंतत: पीएम तुम्हें प्रभु ही लगेगा. किस हाथ मुंह से इनके खिलाफ खबर चलाओगे और जनता के पक्षधर कहलाओगे जो मीडिया का धर्म होता है…..

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मेरे मित्र Madan Tiwary ने मुझसे पूछा है: ”क्या सेल्फ़ी लेना, या पार्टी में सम्मान देना अपराध और पक्षपात कहलायेगा? तब तो शादी ब्याह या अन्य फंक्शन में उन्हें नही बुलाना चाहिए जिनसे वैचारिक मतभेद हो? पीएम से मीडिया की कोई निजी अदावत है क्या?’ इस पर मेरा जवाब उनको यूं हैं : ”पंडी जी, पहले तो आप की उलट वाणी को सलाम करता हूं. अब अपनी बात रखना चाहूंगा. लगता है आपने टीवी पर लाइव नहीं देखा. पत्रकार सेल्फी लेने के लिए मरे गिरे जा रहे थे. पीएम के सेक्चुरिटी वाले पसीने पसीने हो रहे थे. मोबाइल मोदी के मुंह में घुसने को बेताब थे. सेक्युरिटी वाले चुपके से पत्रकारों को धकिया के दाएं बाएं कर दे रहे थे. लेकिन दो धकियाए जाएं तो चार दांत चियारे मोबाइल कपार के उपर लादे घुसे जा रहे थे… अब इसके आगे मुझे कुछ नहीं वर्णन करना, सिवाय इसके कि अगर पत्रकार में रचनात्मक दर्प नहीं है तो क्या पत्रकार और क्या मार्केटियर. ये मसला सिर्फ मीडिया के एथिक्स से जुड़ा है. अगर हम पत्रकार खुद को संयमित अनुशासित नहीं रख सकते, ग्लैमर सत्ता आदि देखकर लबलबाने लगते हैं तो ये मीडिया के लिए खतरनाक ट्रेंड है. आप ग्लैमर व सत्ता आदि के चकाचौंध से जब मिचमिचिया जाएंगे तो क्या सोच पाएंगे और क्या लिख पाएंगे जन हित में. फिर तो लेखनी सिवाय तेल लेपन के, कुछ न उगलेगी. पांयलागी.”

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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ये कौन लोग हैं जो पीएम के साथ सेल्फी लेकर अपने जीवन पर फ़क्र महसूस कर रहे हैं?

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ये तो फिल्म है पूरी की पूरी… ‘सेल्फी विद पीएम’… इस पर काम होना चाहिए

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ये तो फिल्म है पूरी की पूरी… ‘सेल्फी विद पीएम’… इस पर काम होना चाहिए

ये तो फिल्म है पूरी की पूरी। ‘सेल्फी विद पीएम।’ इस पर काम होना चाहिए। एक लाइट कॉमेडी फिल्म। पत्रकारों की आपस में तकरार। एडिटर और रिपोर्टर के बीच का फसाद। पहली सेल्फी किसकी? हो सके तो मारम मार। जमकर जूतम पैजार। एसपीजी और यहां तक कि एनएसए पर भी पत्रकारों के ‘सेल्फी जुनून’ का आतंक। एक रात पहले पीएमओ में आपात बैठक। मुद्दा ये कि पीएम को पत्रकारों से महफूज कैसे रखा जाए। पीएम इन डैंजर! इतनी सटकर सेल्फी ली जाएगी तो फिर तो ‘सिक्योरिटी ब्रीच’ हो गया न। आईबी और रॉ का भी इनपुट देना। फिर नार्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक में इसी ‘सेल्फी’ का जलवा।

सेल्फी दिखाकर अधिकारियों को धमकी- ‘गुरू, संभलकर रहो, वरना देख लेओ ई मोबाइल में का है!’ सेल्फी लेने में नाकाम रहने वाले पत्रकार की माशूका का उसे सरेआम तमाचा जड़ देना- ‘नामर्द हो तुम साले, मेरी खातिर एक सेल्फी नही ले पाए। गेट आउट फ्रॉम माय लाइफ। उस कलमुंही रीना के ब्वॉय फ्रेंड को देखो। कितने करीब से सेल्फी ली है। मुझे तब से एटीट्यूड दिखाए जा रही है, साली। डूब मरो तुम।’ उस नाकाम आशिक पत्रकार का डूबने की खातिर बेहद तेजी से आईटीओ से लक्ष्मी नगर के बीच के यमुना ब्रिज की ओर जाना। मगर छलांग लगाने से पहले ही कानों में पड़ती वीआईपी गाड़ियों के काफिले के हूटर की आवाज़। -‘अरे साला, ये तो पीएम का कारकेड है।’ और यमुना के पुल की रेलिंग से ही हाथों में मोबाइल लेकर झटपट में एक और सेल्फी। ‘सेल्फी विद पीएम कारकेड’। ख्वाबों के झरोखों में उभरती पाकिस्तानी गायक अताउल्ला खान की शक्ल। बैकग्राउंड में बजता म्यूज़िक -‘तू नही तो तेरी याद सही’- खुदकुशी का प्रोग्राम कैंसिल। इसी सेल्फी के सहारे माशूका को मनाने की एक कोशिश और।

पीएम की अगली प्रेस मीट के लिए पीएमओ में पहले से ही ‘सेल्फी आवेदनो’ की बाढ़। First come,First serve का सिद्धांत लागू करने के लिए जंतर-मंतर पर आंदोलन। ‘सर, इस बार पहली सेल्फी हमारी ही होनी चाहिए। आपने पिछले दिनो जैसा-जैसा बताया, वैसा ही छापा। अब इतना तो बनता ही है सर’- पत्रकारों का पीएम के मीडिया एडवाइज़र पर हल्ला बोल। पीएम की उस प्रेस मीट में मौजूद कैबिनेट स्तर के दो तीन मंत्रियों की जबरदस्त चिढ़। ‘साला, हममे क्या कमी है, जो हमारे साथ कोई सेल्फी नही लेता।’ अगले दिन से मंत्रियों के पीए के पास ‘स्टैंडिंग इंस्ट्रक्शन’। जो भी पत्रकार इंटरव्यू के लिए आए, उससे साफ बोल दो- ‘पहले सेल्फी ले साथ में, फिर बात करेंगे। चूतिया समझा है क्या हमको? सेल्फी पीएम के साथ और इंटरव्यू हमसे।’

अगर फिल्म को थोड़ा थ्रिलर लुक देना हो तो ‘सेल्फी बम’ के आइडिया का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। कि पाकिस्तान में आईएसआई ने भारतीय पीएम के सेल्फी जुनून को देखते हुए नया आइडिया इज़ाद किया। सेल्फी बम का। लश्कर से जुड़ी हुई दो बेहद ही खूबसूरत हसीनाओं को पत्रकार की शक्ल में नेपाल बार्डर के रास्ते भारत में घुसा दिया गया है। ये दोनो ही सेल्फी के बहाने पीएम के करीब जाने की तैयारी में हैं। मगर किसी सनी देवल टाइप के एनएसजी कमांडों को समय रहते ये खबर मिल जाती है। और फिर शुरू होता है, ‘आपरेशन सेल्फी किलिंग।’ बेहद ही गुप्त, खुफिया आपरेशन। जिसकी डिटेल सिर्फ दो लोगों के पास है। एक इस देश के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर। और दूसरा मैं यानि अभिषेक उपाध्याय। बस अब इससे ज़्यादा नही लिखूंगा। नहीं तो आइडिया चोरी हो जाएगा। बड़ा कॉपीराइट का संकट है इन दिनो 🙂

कई न्यूज चैनलों में काम कर चुके और इन दिनों इंडिया टीवी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत तेजतर्रार पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के फेसबुक वॉल से.

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ये कौन लोग हैं जो पीएम के साथ सेल्फी लेकर अपने जीवन पर फ़क्र महसूस कर रहे हैं?

भईया Yashwant, ये कौन लोग हैं जो पीएम के साथ सेल्फी लेकर अपने जीवन पर फ़क्र महसूस कर रहे हैं। और क्यों ले रहे हैं वो सेल्फी। क्या इसलिए कि ये कोई फोटो अपार्चुनिटी है? या इसलिए कि वो इसे सोशल मीडिया पर चमका सकें? वो अपने रीअल और वर्चुअल मित्रों को इस बात का अहसास दिला सकें कि वो कितने बड़े तीस मार खां हैं? वो उन्हें बता सकें कि उनकी पहुंच कितने ऊपर तक है? उन्हें अहसास दिला सकें कि वो कितने खास हैं?

या फिर इसलिए कि अपने पड़ोसियों पर धाक जमा सकें? या फिर इसलिए कि अपने मां-बाप को अपने पड़ोसियों पर, सिस्टम पर और समाज पर धाक जमाने की एक वजह दे सकें? या फिर इसलिए कि वो लोगों को समझा सकें कि वो डेढ़ सौ करोड़ की आम जनता के बीच रहते जरूर हैं पर वो कितने खास हैं? या फिर इसलिए कि वो इस सेल्फी का इस्तेमाल कई सालों तक अपने आसपास के लोगों, पुलिसवालों, सरकारी अफसरों, बाबूओं या प्रतिष्ठित लोगों को प्रभावित करने, दबाव बनाने, धमकी देने, ब्लैकमेल करने या फिर गलत तरीके से अपना काम करवाने में कर सकें। या फिर इसलिए कि वो अपने से जुड़े तमाम लोगों को अहसास दिला सकें कि वो अपने जाननेवालों, रिश्तेदारों, मित्रों से मिलकर, बातचीत कर, उनके प्रयोजनों में सम्मिलित होकर उन पर कितना बड़ा अहसान करते हैं? या फिर इसलिए कि वो उन तमाम लोगों पर एक किस्म का धौंस जमा सकें जो उन्हें कल तक भाव नहीं देते थे, मुंह नहीं लगाते थे या वरिष्ठ और गरिष्ट पत्रकार के तौर पर रिक्ग्नाइज नहीं करते थे।

या इसलिए कि उनका अपने ही आर्गनाइजेशन में रौब बढ़ जाए, कई दिनों तक हर आदमी की जुबान पर उनका ही जिक्र रहे? या फिर इसलिए कि बड़ी बीट, बड़े अपरेज़ल, बड़े ओहदे, बड़े फॉरेन टूर या फिर बॉस के बड़े चापलूस के लिए स्वाभाविक दावेदारी सिर्फ उनकी हो? बहरहाल, वजह इनमें से जो भी, एक बात तो तय समझो गुरू, तुम्हारी इनमें से कोई भी तमन्ना पूरी नहीं होने वाली क्योंकि तुम्हारे हल्के व्यक्तित्व की ओछी हरकतें हर आदमी ने आज टीवी पर लाइव देखी हैं। वो जानते हैं किस तरह तुम एक हड्डी गिरते ही दुम हिलाते हुए सत्ता से नज़दीकी दिखाने के लिए अपनी शर्म -हया और अपने पेशे की गरिमा सरेआम नीलाम करके आए हो। काश तुम समझ पाते कि तुम ऐसा करते हुए कितने लिजलिजे नज़र आ रहे थे।

शर्म आई तुम्हें देखकर कि प्रधानमंत्री से मिलने की खुशी में तुम इस कदर लहालोट हो रहे थे जैसे तुम किसी अमीर आदमी के यहां रामलाल की भूमिका में हो। मुझे तुम्हारी सेल्फी विद पीएम से कोई दिक्कत नहीं बशर्ते तुम ये ऐलान करो कि अब तुम्हें जर्नलिस्ट बने रहने का कोई शौक नहीं रहा। और हां, अगली बार जब कोई तुम्हें प्रेस्टीट्यूट कहे ना तो प्लीज़ बुरा लगने का ड्रामा मत करना क्योंकि तुम्हें तो मालूम ही है कि तुम खुद अपनी नज़रों में क्या हो! खैर, बधाई कि आज तुम्हारा मनुष्य योनि में पैदा होना सार्थक हो गया। जो महान पत्रकार धक्कामुक्की, रगड़ा-रगड़ी और तमाम बल-बुद्धि का पूरा दुरूपयोग करके भी एक अदद सेल्फी लेने से चूक गए उनसे गहरी सहानुभूति और एक जानकारी, दुनिया में एक चीज़ मौजूद है जो आपकी तकलीफ कम कर सकती है, लोग उसे फोटोशॉप कहते हैं। बेस्ट ऑफ लक!

कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर कार्य कर चुके और इन दिनों खुद का वेंचर संचालित कर रहे प्रतिभावान पत्रकार विवेक सत्य मित्रम के फेसबुक वॉल से.

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फेसबुक अपनी तरफ से कर रहा मेरा प्रचार, मैंने एक पैसा खर्च नहीं किया : बरखा दत्त

बरखा दत्त के स्पांसर्ड फेसबुकी पेज के बारे में भड़ास4मीडिया पर छपी खबर को लेकर ट्विटर पर बरखा दत्त ने अपना बयान ट्वीट के माध्यम से जारी किया. उन्होंने लोगों के सवाल उठाने पर अलग-अलग ट्वीट्स के जरिए जवाब देकर बताया कि उनकी बिना जानकारी के फेसबुक उनके पेज को अपने तरीके से प्रमोट कर रहा है. उन्होंने बताया कि फेसबुक की तरफ से उनके पास फोन आया था जिसमें ट्विटर की तरह एफबी पर भी सक्रिय होने के लिए अनुरोध किया गया. तब मैंने उन्हें कहा कि कोशिश करूंगी. ऐसे में एक भी पैसा देने का सवाल ही नहीं उठता. बिलकुल निराधार खबर भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित हुई है. 

 

बरखा दत्ता का कहना है कि उन्हें बताया गया कि फेसबुक कई पब्लिक पर्सनाल्टीज जिनमें पत्रकारों भी शामिल हैं, को अपनी तरफ से प्रमोट करता है, जैसे राहुल कंवल, शेखर गुप्ता, फिल्म स्टार्स शाहरुख खान, आमिर खान आदि. बरखा दत्त ने अपने फेसबुक पेज पर उनके नाम के नीचे स्पांसर्ड लिखे होने को लेकर उठाए गए सवाल पर भी जवाब दिया. इस संबंध में बरखा दत्त के जितने भी ट्वीट्स हैं, नीचे दिए जा रहे हैं.

barkha dutt ‏@BDUTT

rubbish. I have not paid anyone a single paisa. what are you talking about?

xxx

FB team asked me to be active on FB like on Twitter & I said sure, would try. No question of Money. Rubbish story.

xxx

It’s Facebook’s call  to underline our presence on its medium. I am owed an apology NOW.

xxx

FB promoting our presence – many of us who are journalists. Check it out.

xxx

It is appplicable to ALL public personalities being promoted by them including many journalists. These include, I am told many journos- rahul, Shekhar, me, film stars, SRK, Aamir.

xxx

just asked facebook why it says sponsored. They say Facebook is promoting public personalities.

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पैसे वाली पत्रकार हैं बरखा दत्त, फेसबुक लाइक तक खरीद लेती हैं!

Yashwant Singh : बरखा दत्त इन दिनों फेसबुक पर खूब सक्रिय हो गई हैं. उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर इस बाबत लिखा भी है. साथ ही कई कहानियां किस्से विचार शेयर करना शुरू कर दिया है. बरखा समेत ज्यादातर अंग्रेजी पत्रकारों की प्रिय जगह ट्विटर है. लेकिन सेलेब्रिटी या बड़ा आदमी होने का जो नशा होता है, वह फेसबुक पर भी ले आता है, यह जताने दिखाने बताने के लिए यहां भी मेरे कम प्रशंसक, फैन, फालोअर, लाइकर नहीं हैं. सो, इसी क्रम में अब ताजा ताजा बरखा दत्त फेसबुक पर अवतरित हुई हैं और अपने पेज पर लाइक बढ़ाने के लिए फेसबुक को बाकायदा पैसा दिया है. यही कारण है कि आजकल फेसबुक यूज करने वाले भारतीयों को बरखा दत्त का पेज बिना लाइक किए दिख रहा है. पेज पर Barkha Dutt नाम के ठीक नीचे Sponsored लिखा है.

इस Sponsored लिखे होने का मतलब हमको आपको सबको पता है. फेसबुक को पैसा देकर उसके जरिए जबरन पेज लाइक कराया जाना. सो, लगभग एक लाख लाइक के करीब पहुंचने वाला है बरखा का पेज. 84 हजार से ज्यादा लाइक तो उपरोक्त स्क्रीनशाट में दिख रहा है. अब जब आप ये पढ़ रहे होंगे, हो सकता है लाइक का आंकड़ा काफी आगे निकल गया होगा. अब ये नहीं पता मुझे कि उन्होंने पांच लाख लाइक खरीदने के लिए फेसबुक को पैसा दिया है या सिर्फ दो चार लाख. जो भी हो. हम हिंदी वाले तो इतने पैसे में कई दिन सुकून से खा पी सकते थे, घूमघाम सकते थे, घर परिवार को घुमा सकते थे. छुट्टी लेकर अपने ओरीजनल घर-गांव-देहात जा सकते थे क्योंकि हम हिंदी वाले थोड़ा कम कमाते हैं, इसलिए थोड़ा कम खर्च कर पाते हैं. कम ही हिंदी वाले होंगे जो फेसबुक पेज पर लाइक खरीदते होंगे, हां- दलालों, मालिकों, लायजनरों आदि इत्यादि की आधुनिक कैटगरी को छोड़कर.

फेसबुक पर कुछ रोज पहले अपनी सक्रियता बढ़ाने के दौरान बरखा की लिखी गई वो शुरुआती पोस्ट जिसे फेसबुक को पैसा देकर Sponsored करवाने के बाद लाइक हासिल करने हेतु एफबी के जन-जन तक घुमवाया, ये है: ”प्रभा दत्त (बरखा दत्त की मां) के युद्ध मोर्चे पर रिपोर्टिंग हेतु जाने के अनुरोध को एचटी प्रबंधन ने ठुकरा दिया था”

फिलहाल अभी तक मैंने बरखा दत्त का फेसबुक पेज लाइक नहीं किया है जबकि पिछले कई रोज से फेसबुक बार बार मेरे आगे इस प्रायोजित विज्ञापन को मौलिक तरीके से पेश कर लाइक करने के लिए लपलपाते हुए ललचा रहा है. अगर ये पेज स्पांसर्ड न होता तो शायद मैं लाइक कर लेता, लेकिन खरीदे हुए या बिके हुए, जो कह लीजिए, पेज को लाइक देने का मतलब होता है कि आप फेसबुक की दुकान को पैसा देकर भारतीय मुद्रा को विदेश तो भेज ही रहे हैं, फर्जी तरीके से खुद को नामवर बताने जताने दिखाने के ट्रेंड को भी बढ़ावा दे रहे हैं.

वैसे बहुत सारे हिंदी पट्टी वाले कह सकते हैं कि पैसा बरखा दत्त ने इमानदारी से कमाया है, उसे चाहे वो लाइक खरीदने में खर्च करें या घर में रखकर माचिस मारकर जला दें, आपको जलन कुढ़न खुजन क्यों है? तो भइया, मेरा जवाब भी सुनते जाइए. बरखा दत्त अगर कोई कंपनी होतीं, किसी कंपनी की मालिकन होतीं, कोई कारपोरेट होतीं, कोई पीआर एजेंसी होतीं, कोई प्रोडक्ट होतीं तो उनके प्रचार प्रसार पर मुझे कोई आपत्ति न होती. फेसबुक पर साड़ियों से लेकर योगासन तक के खूब स्पांसर्ड पेज टहलते रहते हैं और हम आप सब जाने-अनजाने उसे लाइक मारकर फेसबुक वाले से लेकर उसके क्लाइंट तक को खुश किया करते हैं.

पर जब कोई पत्रकार ऐसा करता है तो उससे यह अपेक्षा नहीं की जाती. कल को कोई जज साहब लाइक खरीदने लगें तो फिर हो गया काम. जिन चार स्तंभों की हम बात करते हैं, उसमें से प्रत्येक की गरिमा होती है. विशेषकर मीडिया तो ज्यादा जिम्मेदारी वाला या यूं कहिए ज्यादा जनता के करीब खंभा होता है. पर अगर इसी खंभे के लोग कारपोरेट सरीखा व्यवहार करने लगे तो रिलायंस के कस्टमर केयर एक्जीक्यूटिव और हमारे पत्रकारों के बीच फर्क क्या बचेगा. अंतत: जब दोनों का मकसद अपना हित साधन है, अपने कंपनियों का हित साधन है, तो काहे को एक खुद को चौथा खंभा माने और दूसरा देश का कारपोरेट घराना. सोचिए सोचिए. वइसे, पइसा प्रधान इस दौर में सोचने विचारने लिखने का काम भी आजकल पैसे ले देकर ही होते हैं, ऐसे में अगर आप नहीं सोचते हैं तो हम बुरा बिलकुल नहीं मानेंगे. 🙂   

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com


उपरोक्त पोस्ट पर बरखा दत्त ने अपनी तरफ से ट्वीटर पर सफाई दी / जवाब दिया. इस प्रकरण से संबंधित उनके सारे ट्वीट और उनकी सफाई का भड़ास4मीडिया पर प्रमुखता से प्रकाशन किया गया है जिसे आप नीचे दिए गए शीर्षक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं:

फेसबुक अपनी तरफ से कर रहा मेरा प्रचार, मैंने एक पैसा खर्च नहीं किया : बरखा दत्त

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