रवीश कुमार-
ओटी बाबू… हमने सोचा कि सरकारी दफ़्तरों में पाए जाने वाले बाबुओं की यह भी कोई श्रेणी होगी, जिस पर ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत नहीं है। वही पुरानी कहानी चलने वाली है तभी कुछ खटका और मैंने डॉक्टर साहब से कहा कि ओटी बाबू क्या होता है। पटना एयरपोर्ट पर बंगलुरु जा रहे एक डॉक्टर से बात हो रही थी। परिचय होते ही सवाल दाग दिया कि यहीं क्यों नहीं प्रैक्टिस करते हैं, कहां चले जा रहे हैं बंगलुरू तो डॉक्टर साहब का जवाब आता है कि बहुत मन करता है लेकिन ओटी बाबू के नेटवर्क से तंग आकर वापस लौट जाता हूँ। मैं ओटी बाबू से नहीं लड़ सकता। बहुत मुश्किल है सर। ओटी बाबू क्या है?
ऑपरेशन थियेटर में औज़ार वगैरह का रख-रखाव, संक्रमण मुक्त रखना यह सब जिसके जिम्मे होता है, उसे ओटी बाबू कहते हैं। कई साल से ऑपरेशन थियेटर में काम करते करते ओटी बाबू लोग भी ऑपरेशन करने लगा है। उन्हें लगता है कि केवल चीरा लगाना है, मेरुदंड में सुई घोंप कर बेहोश करना है और डॉक्टर हो गए। लेकिन बहुत ऑपरेशन में केस बिगड़ जाता है। तब सब छोड़ कर भाग जाता है। फिर मरीज़ का परिवार उसका बॉडी लेकर इस अस्पताल से उस अस्पताल में चक्कर लगाता रहता है। उसे पता ही नहीं होता कि डॉक्टर ऑपरेशन नहीं किया है, ओटी बाबू किया है। ओटी बाबू लोग भी खुद को डॉक्टर ही कहने लगा है। इन लोगों का गैंग बन गया है। मरीज़ के पीछे दलाल लगा देना, अपने अस्पताल में ले आना और ऑपरेशन करके पैसा कमाना। अगर मैं क्लिनिक खोलने जाऊंगा तो इनका गैंग मुझे तंग कर देगा। तरह-तरह से परेशान करता है सर। मैं नहीं लड़ सकता ओटी बाबू से। हम वहीं ठीक हैं। काम ज़्यादा है। घर से दूर ही हैं लेकिन शांति है। सरकारी हो या प्राइवेट हर अस्पताल में इनका गैंग बन गया है।
यह कोई रिपोर्ट नहीं है। एक बातचीत से निकला प्रसंग है जिस पर ध्यान देना चाहिए और आगे इसकी पड़ताल करनी चाहिए कि इसमें कितनी सच्चाई है। ओटी बाबू लोगों के नेटवर्क की जड़ें कितनी गहरी हैं। अगर इसमें दस प्रतिशत भी सच्चाई है तो चिंता की बात है। आम लोगों की ज़िंदगी से खिलवाड़ हो रहा है। कई बार होता है कि अस्पताल प्रशासन आंखें मूंद लेता है। डॉक्टर लोग भी हथियार डाल देते हैं। राजनेताओं का भी नेक्सस इनसे जुड़ जाता है। उन्हें भी पता नहीं होता कि छोटा-मोटा यह गैंग ख़तरनाक काम करने लग गया है। इसलिए सरकार को भी ओटी बाबू के नेटवर्क की पड़ताल करनी चाहिए।
लिख इसलिए रहा हूँ क्योंकि ख़ुद जाकर इसकी पड़ताल नहीं कर सकता। स्थानीय पत्रकारों को भी यह काम करना चाहिए। देखना चाहिए कि ओटी बाबू का तंत्र सरकारी अस्पतालों के समानांतर कितना विकसित हो चुका है। कोई दस साल पहले एक ज़िले से गुज़र रहा था। साथ चल रहे पत्रकार ने कहा था कि एक सर्जन के साथ काम करते करते उनका सहायक भी यहां ऑपरेशन करने लगा है। खूब कमाता है। बस सारी बातें यहीं ख़त्म हो जाती हैं कि खूब कमाता है लेकिन एक ऑपरेशन भी वो गड़बड़ करता होगा तो पूरा परिवार तबाह हो जाता होगा। बंगलुरू जा रहे डॉक्टर ने यही कहा कि सर हमें पता होता कि अगर ऑपरेशन का अलग सिचुएशन होता है। हर मरीज़ का अलग सिचुएशन होता है। लेकिन जो हमारे साथ रोज़ आपरेशन देखता है वह तो एक ही चीज़ देख रहा है और उसे यह भरोसा हो जाता है कि वह भी यह काम कर सकता है। बहुत बड़ा सरदर्द है।


