रोहित पचौरिया-
कोरोना काल में हमने लाखों रुपए महीने का वेतन पाने वाले कई आईटी इंजीनियरों व अन्य को सब्जी बेचने से लेकर अन्य छोटा-मोटा कार्य कर अपनी रोजी-रोटी चलाते देखा है. लेकिन अब ‘अखबारी दुनिया’ के ‘पेज डिजाइनर/ग्राफिक्स डिजाइनर’ भी अपनी नौकरी से तौबा कर रहे हैं.
इंदौर सहित देश के कई अन्य शहरों से इस तरह की खबरें लगातार आ रही है. कम वेतन, कार्य के दबाव व अन्य कारणों से परेशान ये पेज डिजाइनर अब धीरे-धीरे कर अपनी फिल्ड को ‘बाय-बाय’ कर रहे हैं. इनमें से अधिकांश का एक ही जवाब है – ‘अब वे सुकून का जीवन जीना चाहते हैं…’
वहीं कुछ वेतन का हवाला देकर कहते हैं कि ‘इतना तो हम कोई दूसरा कार्य करके भी कमा लेंगे… और रात भी काली नहीं करनी पड़ेगी…’ इसी तरह कुछ कहते हैं – ‘बहुत हो गया सिंगल… डीसी-टीसी… लीड-बॉटम… अब कुछ और करेंगे..!’
पिछले दिनों कुछ अखबारों में हुई छंटनी या खुद से नौकरी छोड़ने के बाद इनमें से अधिकांश अब दूसरी फिल्ड में ही हाथ आजमा रहे हैं… ‘कोई काम छोटा-बड़ा नहीं होता’ के मंत्र के साथ कुछ ई-रिक्शा या ऑटो लेकर सवारियां ढो रहे हैं, तो कुछ पानी पुरी बेच रहे हैं. इनमें से कुछ का कहना है – ‘अब हम पहले से ज्यादा सुकून में हैं…’
अभी एक बड़ा उदाहरण मुंबई से सामने आया जब ‘कमलेश कामटेकर’ नामक एक बड़े डिजाइनर ने 14 साल की अपनी नौकरी के बाद कहा – ‘भाड़ में जाए ऐसी नौकरी… अब खुद का काम करूंगा…’ और खरीद ली ऑटो रिक्शा… इसके पहले कमलेश जी की नौकरी अभी 2024 में चली गई थी, उन्होंने 4-5 महीने लिंक्डइन सहित अन्य जगह रिज्यूम डाले, लेकिन कहीं मनमुताबिक बात नहीं बनी…
‘अखबारी/मीडियाई दुनिया’ में ऐसे कई उदाहरण अब तेजी से आए दिन सामने आने लगे हैं… वहीं कुछ पेज डिजाइनरों ने अपने वर्तमान कार्य में कटौती करते हुए ‘नई फील्ड’ की ओर भी रुख किया है और वे ‘साइड बिजनेस’ का श्रीगणेश भी कर चुके… कुल मिलाकर कार्य के अत्यधिक दबाव, कम वेतन, गुटबाजी सहित अन्य कारणों के चलते ‘अखबारी दुनिया’ धीरे-धीरे ‘अपने एक से बढ़कर एक धुरंधर डिजाइनर’ खोती जा रही है..!
दूसरी तरफ, इसके ‘साइड इफेक्ट’ भी अखबारों और उनके दफ्तरों में साफ नजर आने भी लगे हैं… अखबारों में जहां ‘क्वालिटी/फिनिशिंग’ आदि का टोटा होने लगा है, तो एक पेज डिजाइनर पर ‘डबल लोड’ भी बढ़ गया… डिजाइनर ढूंढे से नहीं मिल रहे…
कुछ दैनिक अखबारों में ही यह आलम है कि उनके ‘सम्पादक’ लगभग रोजाना ही फोन घुमाकर पेज डिजाइनर मांग रहे हैं… नए युवा इस फिल्ड में आना नहीं चाहते और जो हैं वह अब नौकरी करने के मूड में नहीं… कुछ ‘पेज डिजाइनरों’ ने ‘जॉब वर्क’ सेवा देना भी शुरू कर दी और अब वे अपने स्वयं के घर या ऑफिस से ही अखबार तैयार करके दे रहे हैं…
कई अखबारों ने अपने फीचर पेज से लेकर पूरा अखबार तक ‘ठेके पर’ बनवाना भी शुरू कर दिया है… वहीं कुछ अखबारों में तो पत्रकारों को ही ‘अखबार की डमी’ थमा दी गई और वे खबरों के साथ पेज भी तैयार कर रहे..!
नोट : जो दिखा, वो लिखा… भूल और चूक… लेनी-देनी!
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