सत्यवीर सिंह-
आज के इंडियन एक्सप्रेस में छपी ये ख़बर बहुत दिलचस्प है.
नफ़रत ठेलकर, तेज़ी से अपना राजनीतिक क़द बढ़ाने के प्रयासों के लिए कुख्यात, निशिकांत दुबे ने अपनी शादी की रजत जयंती, अभी पिछले ही हफ़्ते, पहलगांव में बिकुल इसी जगह मनाई, जहाँ 27 बेक़सूर सैलानियों को भून डाला गया. उस समारोह में उनके जैसे ही अनेक लोग ज़श्न मना रहे थे. चारों ओर सुरक्षा के घेरे थे. जबकि कश्मीर में आतंकवाद पिछले हफ़्ते भी ख़त्म ही था!
अगर 4 सुरक्षा कर्मी भी 2000 आम आदमियों को मयस्सर हुए होते तो यह भयानक क़त्लेआम ना होता!!
निशिकांत दुबे की शादी की सालगिरह पर हुई भव्य पार्टी चर्चा में, पहलगाम आतंकी हमले के बाद VIP कार्यक्रमों की सुरक्षा पर उठे सवाल
गुलमर्ग में बीजेपी लोकसभा सांसद निशिकांत दुबे की शादी की 25वीं सालगिरह का जश्न इन दिनों पार्टी के भीतर चर्चा का विषय बना हुआ है। करीब 10 दिन पहले आयोजित इस भव्य समारोह में कई दलों के नेता शामिल हुए थे। हालांकि कार्यक्रम स्थल पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था थी, लेकिन पहलगाम आतंकी हमले के बाद जम्मू-कश्मीर में निजी VIP आयोजनों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पार्टी के भीतर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

उधर, पहलगाम आतंकी हमले और उससे जुड़े घटनाक्रमों ने बीजेपी के संगठनात्मक चुनावों की प्रक्रिया को भी फिलहाल थाम दिया है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, यह सिर्फ इसलिए नहीं हुआ कि नेता व्यस्त हैं, बल्कि हत्याओं की छाया में कोई नई घोषणा या नियुक्ति फिलहाल नहीं की जाएगी।
उत्तर प्रदेश, गुजरात और मध्य प्रदेश जैसे अहम राज्यों में नए प्रदेश अध्यक्षों की नियुक्ति की प्रक्रिया पहले पूरी होनी है, उसके बाद ही नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन की दिशा में औपचारिक कदम बढ़ेंगे। ऐसे में अब पूरे संगठनात्मक पुनर्गठन में देरी तय मानी जा रही है।
मोहम्मद अनस-
निशिकांत दुबे ने अपनी शादी की 25वीं सालगिरह गुलमर्ग के एक बहुत ही महंगे रिजॉर्ट में मनाया। देश भर से नेता पहुंचे। प्राईवेट इवेंट में गृहमंत्रालय ने टाइट सिक्योरिटी का इंतज़ाम किया। सुरक्षा बलों को गेट पर तकवारी के लिए लगाया गया। निशिकांत दुबे जैसे फर्जी डिग्रीधारी भाजपा सांसद के लिए गृहमंत्री अमित शाह ने जैसा इंतज़ाम करवाया क्या वैसी सिक्योरिटी आम हिंदू पर्यटकों को पहलगाम में नहीं दी जा सकती थी। मरे हिंदू, मौज करे निशिकांत दुबे जैसे छुटभैये और बड़बोले नेता। आखिर इस देश में आम हिंदुओं की जान की कीमत, भाजपा को क्यों नहीं समझ आती।
चार सिपाही भी बैसरन घाटी में मौजूद होते तो इतनी बड़ी घटना नहीं होती। केंद्र सरकार ने सर्वदलीय बैठक में सुरक्षा में चूक तो मान ली, लेकिन जो आम हिंदू पर्यटक वहां मारे गए वो तो वापस नहीं आ सकेंगे। निशिकांत दुबे के लिए जब पर्याप्त सुरक्षा मुहैया की जा सकती है तो आम लोगों के लिए क्यों नहीं।


