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इंटरव्यू लेने पहुंचे पत्रकार से छन्नूलाल मिश्रा ने कहा- वापस जाओ और रांची से फोन करके आना!

निराला बिदेसिया-

जिन्हें लगभग हर दिन सुनता हूं, वह पंडित जी इस नश्वर संसार से विदा हुए। पंडित छन्नूलाल जी के देह का अवसान हो गया। उनसे जुड़ी अनेक तो नहीं लेकिन कुछ यादें हैं। अविस्मरणीय। पहली याद कोई दो दशक पहले की है।

तब प्रभात खबर में काम करता था। चार दिनों की छुट्टी लेकर चित्रकूट गया था। जगह इतनी पसंद आई कि एक,दो दिन और रहने का मन किया। मंदाकिनी नदी के तट पर शाम को बैठना अच्छा लगता। लकड़ी के खिलौने देखना, मन मोहता। खबर लहरिया देखने की इच्छा भी थी। रामभद्राचार्य और नानाजी देशमुख के संस्थान में भी जाना बाकी था। दो दिन चित्रकूट में और रहने के लोभ में चार दिन छुट्टी को सोचा।

अखबार में प्रधान संपादक हरिवंश जी को फोन किया। कहा, अगर चार दिन इधर रह जाऊं तो एक आइडिया दिमाग में आया है। प्रभात खबर अखबार स्थापना के पच्चीस साल का उत्सव मनाएगा। क्यों न हम अखबार के 25 साल से जोड़कर देश की 25 विशिष्ट जनों का इंटरव्यू प्रकशित करें। अगर आप कहें तो शुरुआत बनारस से करते हैं। बिस्मिल्लाह खान, किशन जी महाराज और पंडित छन्नूलाल जी का इंटरव्यू करते हुए आते हैं।

हरिवंश जी ने उत्साहवर्धन करते हुए कहा कि यह तो अच्छा प्रस्ताव है। करते हुए आओ। दो चार दिन का समय लगे तो कोई बात नहीं। अब तो निश्चिंत हो गया। बनारसी होने की वजह से पंडित छन्नूलाल, किशन जी और बिस्मिलाह खां के इंटव्यू को लेकर निश्चिंत हो गया कि इनका इंटरव्यू तो चुटकी बजाकर कर लूंगा। ना तैयार होंगे तो जुगाड़ लगा के पहुंच जाऊंगा।

आत्मविश्वास इतना कि एक दिन की बजाय दो दिन चित्रकूट रुक गया कि अब तो बल्ले-बल्ले है। बनारस आया। स्टेशन से उतरकर सिगरा पहुंचा था । संयोग ऐसा कि सिगरा में पंडित छन्नूलाल जी दिख गए उस दिन। झक सफेद कुर्ता पहने हुए। एक हाथ बालों में फेर रहे थे, दूसरे हाथ में बकुली। गया। प्रणाम पाती किया। उनसे कोई जान पहचान न थी, फिर भी बनारसी मिजाज के अनुसार पूरा हाल चाल पूछ लिए। घर परिवार तक का। उनको बताया कि उनसे ही मिलने आया हूं। प्रभात खबर अखबार है, उसमें देश के पच्चीस लोगों का एक-एक पेज में इंटरव्यू छपेगा। उनमें एक आपका नाम हमलोग चाहते हैं।

छन्नूलाल जी प्रसन्न। कार्ड निकाले। बोले इस पते पर शाम साढ़े चार बजे आना। साढ़े चार से छह बजे तक बात करेंगे। फिर मेरा क्लास चलेगा। मन ही मन प्रसन्न हो गया, कि एक तो सेटिंग हो गई। छन्नूलाल जी ने एक ऑटो को हाथ दिया। ऑटो वाले से पूछा कि कितना लोगे गुरुबाग का। वह कुछ बताया। छन्नूलाल जी ने कहा, इतने में तो रिक्शे से चले जाएंगे। हवा पानी लेते हुए। शहर देखते हुए। रिक्शे पर सवार हुए। जुल्फ पर हाथ फेरते निकल गए।

शाम साढ़े चार बजे छन्नूलाल जी के पास जाना था। जहां रुका था, वहां गप्पबाज़ी होने लगी। गप्प बहस में बदल चुका था। छन्नूलाल जी को फोन किया कि आपके पास आ रहा था पर रास्ते में जाम में फंसा हूं। क्या शाम को आऊं? बनारस में एक समय में जाम के नाम पर यह सब राजी खुशी चलता था। छन्नूलाल जी ने कहा, फिर तो बाद में आओ। कल।

अगले दिन निकला। सच में जाम और बाइक भी खराब। फिर फोन किया उन्हें कि आज बाइक खराब हो गई। उन्होंने कहा कि जब ठीक हो जाए, तभी आ जाओ। कभी भी आ जाओ। उनके पास पहुंचा। निर्धारित समय से बहुत देर से। उन्होंने बुलाया। बिठाया। कहा, अब वापस रांची जाओ। रांची से फोन करना। फिर हमलोग डेट, समय तय करेंगे, तब बतियाएंगे। लाख आग्रह किया, काम न आया।

वे बोले, पानी पीयो, शरबत पीयो, पान खाओ, कहो तो खाना बनवाएं पर बात तो तभी होगी, जब तुम अब वापस रांची जाकर, फोन कर के समय लेकर आओगे। ताकि तुम्हें याद तो रहे कि कलाकारों को इतने हल्के में नहीं लेना चाहिए। कलाकार समय की कद्र करते हैं तो पत्रकारों को भी कद्र करनी चाहिए। पत्रकार, कलाकार को हल्के में लेते हैं। मैं कलाकार भी हूं और ऊपर से बनारसी भी। उरुआ टाइप मुंह लटकाकर वापस आया। तब प्रभात खबर में एक कालम लिखता था, घूमते फिरते।

आकर हरिवंश जी को बताया कि किशन महाराज और बिस्मिल्ला खान साहब का तो कर लिया लेकिन छन्नूलाल जी का प्रसंग ऐसा रहा। उन्होंने कहा, यही तो प्रमुख है कि कलाकार की मर्यादा और बनारस की ठसक क्या है, यही लिखो ।लिखा। इंटरव्यू न देने के बहाने बनारसी ठसक, कलाकारों के स्वाभिमान और बतौर पत्रकार अपनी गलती पर।

हालांकि फिर बाद में पंडित छन्नूलाल जी से लंबी बतकही हुई। जब दुबारा इंटरव्यू करने गया तो उन्हें बताया कि आपने बात नहीं की थी तो उसको लिखा था। वे हंसे। प्यार से बोले, बदमाशी करते हो। बाद में एक दफा पटना आए। उनसे मिला। मंच पर जाने से पहले मिला था। देखते ही बोले, क्या हाल। उनको बोले, एक फरमाइश है। सुना दीजिएगा मंच से। बांसुरिया, अब ना बजाओ श्याम। मंच से उन्होंने गाया। बड़े स्नेह से नाम लेकर। मैं मारे खुशी के गीली-गीली छू टाइप गिलगिला गया।

फिर एक बार संगीत समीक्षक और हिंदुस्तानी संगीत के अध्येता पद्मश्री गजेन्द्र बाबू के पास इंटरव्यू करने गया। उन्होंने कहा कि छन्नूलाल गाते कम, बोलते ज्यादा है। गजेन्द्र बाबू का वह इंटरव्यू तहलका में छपा। पंडित छन्नूलाल जी को उसकी कॉपी भेजी। पूछा, क्या कहना है आपका? पंडित जी ने कहा, गजेन्द्र बाबू विद्वान लोग हैं। पर, हम तो विद्वानों के लिए, समीक्षकों के लिए गाते नहीं। संगीत के अज्ञानियों के लिए भी गाते हैं।

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