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सुख-दुख

मीडिया में जातिवाद का शिकार बने एक पत्रकार की दास्तान, पढ़ें

हेमराज सिंह चौहान-

ज के दिन दिल्ली आए मुझे पूरे 18 साल हो गए हैं. यानि दिल्ली में समय गुज़ारे एक वयस्क की उम्र हो जाने के बराबर समय हो गया है. मीडिया में करियर बनाने के लिए जब यहाँ कदम रखे थे यक़ीन मानिए एक जुनून के साथ आया था जो पता नहीं क्यों अब धीरे धीरे ख़त्म हो गया है. शायद इसकी वजह एक ऐसी जगह से आना जहां सब कुछ आसान लगता था. लेकिन आने के बाद दूसरा पहलू भी देखा.

अब जीवन से ज़्यादा उम्मीद नहीं है क्योंकि अनुभव बहुत कड़वा है. लोग दलित, पिछड़े और मुसलमान होने की वजह से खुद को कमतर आंकते हैं या कहते हैं कि मौक़े नहीं मिले. लेकिन मैं एक ख़स होने के नाते इसे झेल रहा हूं. उत्तराखंड में राजपूत होने के नाते भले ही हमें प्रिविलेज मिले हों लेकिन दिल्ली में आते ही हमें आदिवासी जैसा ही समझा जाता है. हमारी क्षमता और योग्यता को नज़रअंदाज़ किया जाता है वरना यक़ीन से कह सकता हूं जितना मैंने मेहनत की है और जितना मुझे समझ है उस आधार पर मैं एक बेहतर जगह पर ज़रूर होता.

लेकिन जैसा मैंने कहा कि अब मेरे अंदर डर बैठ गया है. रोजी-रोटी का परिवार चलाने का. मैं न एक अच्छा बेटा बन पाया, न एक काबिल पति और ना ही एक ज़िम्मेदार पिता. जब आपकी सारी योग्यताएँ आपकी नौकरी और सैलरी से तय की जाती हैं. तो आपकी हालत और गंभीर हो जाती है. इन दोनों मोर्चों पर मैं बहुत बुरी तरह से फेल हुआ हूँ.

शायद पिता जी एक सरकारी सेवा से रिटायर्ड नहीं हुए होते या फिर मेरी ज़िंदगी में कुछ ऐसे दोस्त नहीं होते जिन्हें अपने से ज़्यादा मेरी फ़्रिक है तो मैं शायद ये पोस्ट लिखने के काबिल नहीं होता.

वैसे बता दूँ कि मेरी नौकरी आज से 18 साल पहले लग गई होती अगर भ्रष्टाचार सरकारी नौकरी में नहीं होता. मेरी उम्र के लोग मेरी इस बात की तस्दीक़ कर सकते हैं जिन्होंने मेरे साथ साल 2006 की शुरुआत में कॉन्स्टेबल की भर्ती दी थी. मेरी उम्र 19 साल से कम थी, मेरा फ़िज़िकल 100 में से 92 नंबर का था. लिखित परीक्षा 80 नंबर की थी वो भी मैंने पास कर ली थी. यानि 50 नंबर तो आए ही होंगे. 20 नंबर का इंटरव्यू होता था तो 10 तो मान ही लीजिए. पिता जी एलआईयू विभाग में थे तो मेरिट लिस्ट का उन्हें भी भान होगा ही. बस वो पैसों के लिए कह नहीं पाए और मेरा सिलेक्शन नहीं हो पाया.

दीपक ज्योति घिल्डियाल उस समय एसएसपी अल्मो़ड़ा हुआ करते थे. उनके चर्चे उस दौर के लोग जानते ही होंगे. अगर पारदर्शी व्यवस्था होती तो मैं आज उत्तराखंड पुलिस का मुलाजिम होता. कॉन्स्टेबल न बन पाने के बाद दिल्ली आ गया. यहाँ मॉस कम्यूनिकेशन करने लगा ताकि उन लोगों की आवाज़ बनूँगा जो ऐसे सिस्टम का शिकार होते हैं लेकिन क्या पता था जिस जगह आ रहा हूँ वो और भी ज़्यादा दाग़दार है. यहाँ आपके टैलेंट की जगह आप किस राज्य से आते हैं, आपकी जाति क्या है?आपका सर्किल क्या है ये मायने रखता है.

मैं विनोद कापड़ी सर का ज़िंदगी भर एहसानमंद रहूंगा कि उन्होंने मुझे मौक़ा दिया इंडिया टीवी में काम करने का. शायद वो यहाँ लंबे समय तक रहते तो मैं अपनी रिपोर्टिंग की ख्वाहिश उन्हें बताता लेकिन वो जल्द छोड़कर चले गए. फिर क़मर वहीद नक़वी सर आए लेकिन वो भी छोड़कर चले गए जल्द ही. लेकिन इन दो लोगों से मुझे काफ़ी कुछ सीखने को मिला. अपने जर्नलिज़्म के करियर में आज तक कुल 8 संस्थान बदल चुका हूँ जो मीडिया में काम करने वाले सामान्य जगह से आने वाले शख़्स के लिए काफ़ी होते है.

टीवी न्यूज़ मीडिया को छोड़कर नेशनल दस्तक जैसे छोटे यूट्यूब चैनल में बहुत कम सैलरी में गया लेकिन क्या पता था कि वहां सबसे ज़्यादा जातिवाद है. इसके बाद डिजिटल मीडिया में आया. राजस्थान पत्रिका का डिजिटल वेंचर कैच हिंदी पूरे एक साल सँभाला. फिर एडिटरजी में क़रीब 10 महीने इवनिंग शिफ़्ट संभाली. रोहित विश्वकर्मा सर का भी हमेशा ऋणी रहूंगा कि मुझ पर भरोसा दिखाया. कुल मिलाकर जब मौक़े मिले तो ईमानदारी से निभाए. मेरे साथ काम करने वाले इस पर मुहर लगा सकते हैं.

मेरा मानना है कि दिल्ली में रहना है तो एक सम्मानजनक नौकरी होनी चाहिए वरना आपके यहां रहने का कोई मतलब नहीं है और आपकी कोई वैल्यू नहीं है. मैं किसी को दोष नहीं दे रहा हूं. शायद कमियाँ मेरे भीतर ही हैं कि मैंने एक पत्रकार को अपने अंदर ज़िंदा रखा है. लगता है कि मुझे ही इस शहर को पहचानना नहीं आया लेकिन कोई गिला शिकवा नहीं. अपने चुने रास्ते पर अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होती है. वो लड़ रहा हूँ बस अब दिल्ली में मन नहीं लगता है. पहले इससे बेहतर शहर दूसरा नहीं लगता था. अब रोज़ चुभता है यहाँ रहना.

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