रंगनाथ सिंह-
बी-टीम वादी पत्रकारिता –
कश्मीर के वर्चस्वशाली दलों ने कई नए दलों के खिलाफ यह प्रचार किया कि वे बीजेपी की बी-टीम हैं। राजनीतिक दलों द्वारा एक-दूसरे पर ऐसे आरोप लगाना स्वाभाविक है। दुख की बात ये है कि दिल्ली की मीडिया ने भी वर्चस्वशाली दलों के नमक का हक अदा करने के लिए इस नरेटिव को हवा देने में पूरी मदद की।
जैसे, एक सम्मानित अखबार ने इसी आशय की बड़ी से हेडिंग छाप दी। पूरा लेख पढ़ने के बाद पाठक को पता चलेगा कि लिखने वाला मूलतः एक प्रमुख दल का पदाधिकारी है। सारे डेटा कहते हैं कि 50 प्रतिशत से ज्यादा पाठक 50 प्रतिशत से ज्यादा खबर नहीं पढ़ते। आखिरी लाइन के बाद तक पढ़ने वालों को छोड़कर बाकियों को यह नहीं पता चला होगा कि लेखक मूलतः एक पार्टी का आदमी है इसलिए वह अपने सम्भावित राइवल को बी-टीम बताकर निपटा रहा है।
इसी तरह असदुद्दीन ओवौसी के निपटाने के लिए भी बी-टीम वाला वाला फार्मूला ही आजमाया जाता है। यह ठीक बात है कि केवल मुस्लिम वोट के आधार पर संसद में वह कोई जगह नहीं बना सकते और मुसलमानों के लिए यह बेहतर है कि वह उस दल को वोट दें जिसे वो ज्यादा मजबूत समझते हैं। मगर यह बात ऐसे भी समझायी जा सकती है, इसके लिए बी-टीम वाला फार्मूला लगाने की जरूरत नहीं है। नेता तो नेता, कई स्वनामधन्य पत्रकार भी यही करते नजर आते हैं।
इसी तरह आम आदमी पार्टी को भी बीजेपी की बी-टीम बताया गया। मगर चुनाव जीतने के बाद उसने सबसे पहले कांग्रेस से हाथ मिला लिया! दिल्ली विधानसभा में भाजपा को आम आदमी पार्टी लगातार हरा रही है जिससे बीजेपी की किरकिरी होती है मगर उसे बी टीम बताने वाले अब दूसरों को बीजेपी की बी टीम बताने में लग गये हैं।
मेरा ख्याल है कि खुद को गम्भीर पत्रकार समझने वालों को नख-शिख तुलना के आधार पर बी-टीम सी-टीम जैसी बचकानी हरकतें बन्द कर देनी चाहिए। अब इससे ज्यादातर यही पता चलता है कि पत्रकार किस कोटे से राशन उठा रहा है। मसलन, बीजेपी की बीट टीम के विशेषज्ञ पत्रकार यह नहीं बता पाते कि कांग्रेस की बी-टीम कौन है, सपा की बी-टीम कौन है, राजद की बी-टीम कौन है! यदि पत्रकार किसी नए दल के प्रति पूर्वाग्रह रोपने का काम कर रहा है तो उसे वस्तुनिष्ठ तो कतई नहीं माना जा सकता है।
राजनीति सत्ता साधने की सम्भावनाओं का खेल है। राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले लोग कभी दूसरों के लिए नहीं खेलते। क्या किसी ने सोचा था कि कभी उद्धव ठाकरे कांग्रेस या एनसीपी के टीम में होंगे! ऐसे ही चार और उदाहरण दिये जा सकते हैं। राजनीति का मूल स्वभाव है कि प्यादा भी वजीर बनने की ख्वाहिश रखकर ही हर चाल चलता है। कुछ सफल होते हैं, ज्यादातर विफल। आज इतना ही। शेष, कल।
‘पूरा नाम’ वादी सम्पादक-
कई चीजों को हम सामान्य समझते हैं मगर कई बार ऐसा होता नहीं है। किसी का पूरा नाम पूछना कई मामलों में सामान्य हो सकता है। मसलन, मोबाइल नम्बर सेव करना हो तो मैं भी पूरा नाम पूछता था क्योंकि पहले नाम से समान नाम वालों में अंतर करना मुश्किल था। बाद में इसका समाधान मैंने ये निकाला कि जिस व्यक्ति से जिस संस्था या व्यक्ति के कारण परिचय हो, उसका सेकेण्ड नेम की तरह प्रयोग करने लगा। मगर एक “पूरा नाम” वाद ऐसा है जिससे कई नौजवान पीड़ित दिखते हैं। खासकर मीडिया की नौकरियों में इंटरव्यू देते समय।
अव्वल तो पूरा नाम वही होता है जो प्रमाणपत्र पर लिखा हो। मीडिया में काम कर रहे कुछ नौजवान पत्रकारों ने बताया कि उनके पूरे नाम से काम नहीं बना तो उनके पिता जी का नाम पूछा गया। राहत की बात ये है कि अभी तक मुझे कोई ऐसा नहीं मिला है जिसके पिता जी से बात न बनने पर दादा जी का नाम पूछा गया हो!
हिन्दी मीडिया की यह बड़ी विफलता है कि प्रतिभाशाली नौजवानों को इस तरह के अनुभवों से गुजरना पड़ता है। इन नौजवानों की पीड़ा मीडिया में वर्चस्वशाली जातियों से आने वाले कई सम्पादकों को शरीर पर मक्खी बैठने जितनी भी प्रभावित नहीं करतीं!
हिन्दी मीडिया की सारी प्रगतिशीलता दो प्लेट बिरयानी और मुगलाई चिकन ऑर्डर करने, चार उर्दू शेर पढ़ने और अकबर पादशाह की तारीफ में कसीदे पढ़ने तक ही सीमित है। वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मण्डल ने कुछ समय पहले एक गौरतलब बात लिखी कि हिन्दुओं की प्रभुत्वशाली जातियों अन्य हिन्दू जातियों के मुकाबले शेख-सैय्यद-पठान के साथ ज्यादा सहज महसूस करती हैं! उच्च वर्गीय एकता के इतर भी इसमें कोई और कोण है तो, इसपर विचार करने की जरूरत है। इसमें कोई जातीय कोण हो या न हो, मगर इतना जरूर है कि हमारे देश में प्रगतिशीलता का बेंचमार्क यही है जिसे उच्च वर्गीय समानता का सहारा भी मिल जाता है और व्यक्ति प्रगतिशील का तमगा पा जाता है।
भारत में प्रगतिशीलता के झण्डाबरदार पार्टी के लोगों में भी जातिगत संयोग इतने ज्यादा घटित होते हैं कि यकीन नहीं होता कि वे इतने मासूम हैं! कुछ लोग तो मासूमियत के हिमालय पर चढ़कर कहते हैं कि हमने अपने न्यूजरूम में जातिवाद कभी नहीं देखा! ऐसे लोगों को इसका जवाब देना चाहिए कि उन्होंने अपने न्यूजरूम में अपनी जाति से अलग कितने लोगों को देखा है! तब नहीं देखा तो अब याद कर लें कि कितने थे!
कुछ लोग अपवादों और अल्पप्रचलन को गिनाकर बहुप्रचलन को छिपाने का प्रयास करते हैं। ऐसे लोग मूलतः तर्कदोष के पीड़ित होते हैं। कोई भी सामान्यीकरण 100 में 51 से परिणाम के आधार पर किया जाता है। बहुत संवेदनशील मसला हो तो 100 में से 75 परिणाम सामान्यीकरण के लिए काफी होते हैं। मसलन कोई कहे कि मनुष्य के दो पैरे होते हैं, तो बीच में कोई तर्कदोष पीड़ित कहे बबलू और टपलू के तो एक ही पैर है! ऐसे लोगों का तर्कदूषित प्रवचन सच को ढँक नहीं सकते।
यह दुखद है कि 2024 में भी उच्च शिक्षा या मीडिया जैसे बौद्धिक पेशों में भी नौजवानों के मन में यह भावना हमारे समय से ज्यादा गहरी हो चुकी है कि “बस जाति चलती है!” ‘पूरा नाम’ वादी समाज को इसपर ध्यान देना चाहिए।


