विनोद अग्निहोत्री-
पत्रकारिता पाठ्यक्रम के प्रवेशार्थियों के एक साक्षात्कार में बड़ी निराशा हुई कि स्नातक परास्नातक पास छात्र छात्राएँ मीडिया में तो आना चाहते हैं लेकिन उन्हें देश के मूर्द्धन्य संपादकों राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी, एस पी सिंह, कुलदीप नैयर, अरुण शौरी आदि में एक का भी नाम तक नहीं पता है।
गोविन्द प्रताप सिंह-
सर, ये समस्या इसलिए है, क्योंकि आजकल छात्र चकाचौंध वाली मीडिया के एंकर को देखते हैं। उन्हें लगता है, डिग्री लेते ही दुनिया बदल जाएगी और फिर करोड़ों का पैकेज मिलेगा।
नरेंद्र दुबे-
निश्चित रूप से निराशाजनक बात है। एक पक्ष यह भी है कि हमारे आज के अखबार भी कभी संस्मरण रुप में ही सही इन विभूतियों पर कोई चर्चा नहीं करते। नयी पीढ़ी को इस विरासत से अवगत कराने का दायित्व भी हमारा है।
योगेश त्यागी-
सर ये लोग mic ID को पकड़ना ही पत्रकारिता समझ बैठे हैं गलती इनकी नहीं.. मेरे साथ 45 छात्र थे उनमें से मैं एक मात्र था जो राजनीति में रुचि लेता था..बाकी कहते थे क्लास का समय खराब कराते हो हमारा नुकसान होता है तुम्हारे चक्कर में.
अमन नामरा-
ऐसे शीर्ष पत्रकारों के नाम जानकर इस अग्निवीर नुमा नए-नवेले युवाओं को हासिल भी क्या होना है. न तो वैसी पत्रकारिता जाननी है, न ही करनी है. जैसी करनी है वैसी सीख रहे हैं, जो कुछ बाकी है, चैनल और अखबार सिखा ही देंगे. सत्ता की आंख में देखकर तेवर वाली पत्रकारिता अब लुप्तप्राय है.
अशोक किंकर-
रट्टू तोता शिक्षा व्यवस्था।
पत्रकारिता के अधिकांश संस्थानों को तथाकथित पत्रकार चला रहे हैं। तो आगे क्या उम्मीद करें। देश के दो प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में किसी के द्वारा लगभग 800 इंटरव्यू छपे और उसे उस समय के बीजेपी के राष्ट्रीय व दिल्ली अध्यक्ष का नाम न पता हो ऐसा भी देखा है।
सुनील के मिश्रा-
गलगोटिया यूनिवर्सिटी तो सड़क पर दिख गई। विगत वर्षो में बेसिक शिक्षा का स्तर इतना गिरा है कि वो कल्पना से परे है। लचर बेस को एक यूनिवर्सिटी कितना भी उठाने की कोशिश करे नही उठा सकती है। धंधा फले फूले बस ये मोटिव बचा है। छात्र ही क्यों शिक्षकों को इनके बारे में नहीं पता होगा.
कपिल सिंह यादव-
सर प्रभाष जोशी, सुरेंद्र प्रताप सिंह, कुलदीप नय्यर, अरुण शौरी साहब का नाम सुना है बस. वर्तमान मे जो पत्रकार मुझे सबसे ज्यादा प्रभवित करते है प्रभु चावला, राहुल श्रीवास्तव, विनोद अग्निहोत्री, संतोष सिंह जी.


