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भारतीय पत्रकारिता में “पिशाचों” की एंट्री!

Shams Ur Rehman Alavi-

पत्रकारिता के पिशाच, जर्नलिज्म का मृत्यु काल.. इससे ज्यादा खतरनाक क्राइम हो सकता है! नीचे ये खबर देख रहे हैं, ऐसे लोगों के लिए और ऐसी हैवानियत के बाद भी हेडलाइन में उनके लिए न दरिंदे छपेगा न नराधम, आरोपी पकड़ लिए गए हैं मगर उनकी फोटो नहीं छपेगी, अगले दिन न फॉलो अप और न कोई एडिटोरियल।

मगर दूसरे केस में जहां कुछ प्रूव नहीं, कोई मौत नहीं उस में आरोपी के नाम हेडलाइन में आ जाते हैं, आरोपी या संदिग्ध के फोटो छपते हैं, नाम इस तरह लिखे जाते हैं कि धर्मों और समाजों में नफरत फैला दी जाएं।

पत्रकारिता में अगर दो तीन लोग भी ऐसे जहरीले कीटाणु आ गए जो खबर को weaponize करने लगते हैं और उसमें धर्म खोज कर फिर उसको दस दिन लगातार छापते हैं, जिससे शहर और प्रदेश में नफरत फैले, तो पूरे समाज की बर्बादी तय है, मध्य प्रदेश में ऐसे तीन चार लोग पत्रकारिता में इंटर हो गए हैं, जो खबर में आरोपी और विक्टिम का धर्म देखते हैं और उस हिसाब से पैनिक क्रिएट करते हैं और समाज में दो बड़े धर्मों के बीच नफरत फैलाते हैं।

अपने अंदर आ चुकी इस गंदगी की पहचान हमें ही करना है, जो लोग पत्रकारिता की आड़ में शहर का माहौल खराब करते हैं, और सांप्रदायिकता फैलाते हैं, तो ऐसे लोगों को पहचानना, नाम उजागर करना, उनको आइडेंटिफाई करना और देश और समाज को बचाना हमारी जिम्मेदारी है।

प्रदेश और शहर के हर शख्स और उसके ब्रेन को डैमेज करने, उसके आईक्यू को कम करने और शहर से नफरत करने वाले, हर दिन communalize, sensationalize करने और इस देश को इंटरनल डैमेज करने वाले क्रिमिनल माइंड लोग जो पत्रकारिता में आ गए हैं, इनको रोकना और इनके इरादे समझना किस का काम है?

इंडियन जर्नलिज्म के इस घिनौने पहलू को जिसमें पत्रकार इंसान नहीं है वह पिशाच बन कर खून की बू सूंघता हुआ खबर को इस अंदाज में लिखता है कि हेडलाइन और न्यूज की वजह से समाज में लोग एक दूसरे के दुश्मन बनें, रिपोर्टिंग का कोई नॉर्म फॉलो न करते हुए, हेडलाइन में चालाकी से आखिर में ‘!’ या ‘?’ लगा कर, खेल किए जाएं।

…और क्राइम को ऑब्जेक्टिवली रिपोर्ट न करके, रिपोर्ट में आप अपनी कुंठा और नफरत उड़ेल दें और अखबार के स्टाफ में चंद दिन के लिए घुसने का मौका मिलने की वजह से एजेंडा चलाएंगे और इस देश और इस शहर और इस इलाके जिसने आपको रोटी दी, उसके लोगों को शब्दों के weaponization से टारगेट कर लड़ाएंगे, तो आपकी बहुत बड़ी गलतफहमी है।

इग्नोर एक लेवल तक किया जाता है, जब गिनती की काली भेड़ें समझती हैं कि वह सबको बेवकूफ बना लेंगी, तो उनको समझ लेना चाहिए, कि इग्नोर करने वाली लाइन उन्होंने क्रास कर दी है।

No photo of the accused, no names in headlines and no use of words like demons or devils for accused. The reason is clear.

In Hindi journalism, news is weaponized and published on the basis of certain factors.

Out of 100 cases, if they get one case that has an interfaith incident, then even if no cruelty or any death, names are in headlines and photos published, everything is done to create outrage.

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