
प्रभाकर मणि तिवारी-
पत्रकारिता में ब्राह्मणों का वर्चस्व है. संपादक अपनी टीम में ज्यादातर इसी जाति के लोगों को रखते हैं और मलाई भी इसी तबके के पत्रकारों को मिलती रही है, ऐसी धारणा किसी और ने नहीं, बल्कि पत्रकार बिरादरी के लोगों ने ही बनाई है. शायद होता भी हो. लेकिन मेरा अनुभव इससे एकदम अलग है. करीब 35 साल तक अखबारों की नौकरी के दौरान आधे से ज्यादा समय तक मेरे संपादक ब्राह्मण ही रहे. लेकिन मुझे याद नहीं आता कि किसी ने ब्राह्मणवाद की नीति के तहत मुझे कोई ऐसा लाभ पहुंचाया हो जिसका मैं हकदार नहीं था. इसके उलट न तो प्रमोशन मिला और न ही कोई बड़ा पद. वह तो नौकरी स्थायी थी. दूसरा कोई हिंदी अखबार होता तो वह भी कब की चली गई होती.
उल्टे गैर-ब्राह्मणों ने ही इस लंबी यात्रा में थोड़ी-बहुत मदद की. सिलीगुड़ी और गुवाहाटी में मेरी पहली और दूसरी नौकरी में संपादक/मालिक क्रमशः जैन और बनिया थे. उसके बाद वर्ष 1991 में जिन राम बहादुर राय ने जनसत्ता के कोलकाता संस्करण में बुलाया वो भी ब्राह्मण नहीं थे. कोलकाता में स्थानीय संपादक श्याम सुंदर आचार्य ब्राह्मण थे. करीब नौ साल वो संपादक रहे. इस दौरान दिल्ली में प्रधान और कार्यकारी संपादक प्रभाष जोशी से लेकर राहुल देव और अच्युतानंद मिश्र तक बदलते रहे. श्याम आचार्य के बाद शंभूनाथ शुक्ल कोलकाता संस्करण के संपादक बने. वो मुझे गुवाहाटी से चीफ रिपोर्टर बनाने का भरोसा देकर कोलकाता ले आए. तब तक दिल्ली में ओम थानवी कार्यकारी संपादक की भूमिका में आ चुके थे. दिल्ली में प्रबंधन की उदासीनता के कारण प्रमोशन में तो कामयाब नहीं हुए. लेकिन परिवहन भत्ते के तौर पर शंभूनाथ जी ने एक हजार रुपए जरूर बढ़वा दिए थे. हालांकि बाद में एक ब्राह्मण मैनेजर ने ही उस पर भी लीपापोती कर दी.
दरअसल, कुछ महीने बाद जब तमाम रिपोर्टरों का परिवहन भत्ता छह सौ रुपए महीना बढ़ाने का फैसला हुआ तो उसमें मेरा नाम नहीं था. इस तरह मेरी बढ़त महज चार सौ रुपए रह गई. शंभूनाथ शुक्ल दो साल के भीतर ही जनसत्ता छोड़ कर अमर उजाला की संपादकी के लिए कानपुर चले गए. तब उन्होंने मुझे भी ऑफर दिया था. लेकिन मैं पारिवारिक वजहों से कोलकाता नहीं छोड़ना चाहता था.
वैसे, शंभूनाथ जी के संपादक रहते यहां जिन दो विद्वान पत्रकारों में पीठ पीछे उनसे मेरी चुगली की होड़ लगी रहती थी वो भी ब्राह्मण ही थे. वह तो अच्छी बात यह थी कि वेतन आयोग के तहत नौकरी स्थायी थी. वरना उन दोनों ने नौकरी लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. यहां मुझे शिकायत उन दोनों से नहीं, बल्कि उससे है जो ब्राह्मणवाद का आरोप लगाते रहे हैं.
ओम थानवी दिल्ली में सबसे लंबे समय तक कार्यकारी संपादक रहे. लेकिन उस दौरान भी कोलकाता संस्करण में कोई प्रमोशन नहीं हुआ. वैसे, थानवी जी की सबसे अच्छी बात यह थी कि वो अगर प्रमोशन नहीं करा सके तो टोका-टोकी भी नहीं करते थे. कभी-कभार कोलकाता आने पर भी बाकी संपादकों की तरह मीन-मेख निकालना उनकी आदत में शुमार नहीं था.
दरअसल, प्रबंधन कोलकाता संस्करण को शुरू से सौतेला मानता था. कोलकाता में जनसत्ता से होने वाली कमाई इंडियन एक्सप्रेस के संस्करण पर बेतहाशा खर्च हो रही थी. लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा था. वर्ष 2002 में शंभूनाथ जी के इस्तीफे के कुछ दिनों बाद हमारे बीच के शैलेंद्र श्रीवास्तव पहले प्रभारी और फिर कोलकाता संस्करण के संपादक बने. रिपोर्टिंग में एक अन्य पत्रकार कृष्ण कुमार साह (अब स्वर्गीय) के रहने के बावजूद पेज वन की तमाम प्रमुख खबरों की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर ही थी. वह चाहे दिल्ली के लिए गपशप कॉलम लिखना हो या संपादकीय पेज के लिए लेख, सब कुछ मैं ही करता रहा. चापलूसी कभी सीखी ही नहीं तो आगे बढ़ना मुश्किल ही था. इसी अकेले गुण के कारण कई ऐसे लोगों को भी संपादक बनते देखा है जिनको अब तक ढंग से लिखना नहीं आता.
थानवी जी के रिटायर होने के बाद भी दिल्ली में कमान एक ब्राह्मण संपादक ने ही संभाली. उनकी जितनी कम चर्चा की जाए, उतना ही बेहतर. उनके रहते आपसी संवाद खत्म हो गया था. स्थानीय संपादक से संवाद भी उनके पीए ही करते थे. तो हम जैसे कर्मचारियों को कौन पूछता है? खैर, जनसत्ता की 28 साल लंबी नौकरी की ऐसी कई खट्टी-मीठी यादें हैं.



हरेंद्र शुक्ला
September 7, 2024 at 9:32 pm
शानदार संस्मरण सर
हर हर महादेव