विनय मौर्या-
बनारस में जब पुलिस की ट्रांसफर पोस्टिंग लिस्ट निकलती है तो एक-एक नामों को बड़े गौर से पढ़ता हूँ। वजह यह कि 2015 बैच के कई छोटे भाई सब-इंस्पेक्टर थानेदारी की अहर्ता में हैं। मगर कुछ “जात” तो कुछ “जुगाड़” से न जुड़े होने के कारण अभी थानेदारी से वंचित हैं। कल लिस्ट देखा तो सबका ट्रांसफर गैर जनपद हो गया है। मन दुखित हो गया। मगर कर भी क्या सकते हैं।
खैर, स्पष्ट कर दूं कि पुलिस विभाग में जात और जुगाड़ के अनुसार प्राईम पोस्टिंग मने थानेदारी मिलती है। अगर इस सरकार में यादव हो तो सरकारी अछूत हो। अगर यादव नहीं भी हो सवर्ण भी हो तो जुगाड़ यानी सत्ताधारी विधायक मंत्री का अनडू पकड़कर लटकने की आदत नहीं है तो भी थानेदारी दूर की कौड़ी है।
सच तो यह है कि पुलिस विभाग में सबसे ज्यादा जातिवाद है। और इस जातिवाद का पोषण करते है। वह आईपीएस जिनके ऊपर अपने अधीनस्थों से भेदभाव न करने और समानता का भाव रखने की जिम्मेदारी होती है।
मगर कुछ कुंठित पुलिस अधिकारी कामकाज के अनुसार नहीं जाति के अनुसार पोस्टिंग देते हैं। और ऐसे ही अधिकारी पुलिस विभाग में जातिगत वैमनस्यता बढ़ाते हैं।
जातिवाद के शिकार तो दो चार हमारे इंस्पेक्टर मित्र ही हुए हैं। 5 साल पहले हमारे एक इंस्पेक्टर मित्र जो जाति के क्षत्रिय हैं। मगर किसी विधायक मंत्री का फेल्लहर नहीं तौलते। यहीं क्राईम ब्रांच में पदस्थ थे। उस वक्त यह कमिश्नरेट नही हुआ था। कप्तान था “कुलबोरनी” एकदिन शाम को हम दोनों कार से जा रहे थें। अचानक से पीआरओ का फोन आया कप्तान साहब ने बंगले पर बुलाया है। दरअसल रामनगर थाना उस वक्त खाली था। उसपर पोस्टिंग की बात थी। गाड़ी में वर्दी थी मित्र तुरन्त वर्दी चढ़ायें औऱ बंगले पर पहुँच गये। यह उनका पहली बार बुलावा नहीं था। बाहर आयें तो पूछा कि क्या हुआ वो बोलें लगता है हो जाएगा। मगर उसी दिन बाहर से बनारस ज्वॉइन किये एक स्वजातीय इंस्पेक्टर को कुलबोरनी ने रामनगर थाने पर पोस्ट कर दिया। मुझे याद है उस वक्त बनारस के अधिकांश 90 फीसदी थाने पर उसके स्वजातीय ही पोस्ट थे। अंततः उन्हें बनारस से पड़ोसी जिले में तबादला कराकर जाना पड़ा। वहां वह थानेदार पोस्ट रहें। दो कप्तान तो ठीक रहें। मगर तीसरा आ गया दलित कप्तान फिर वह लगा जाति-जाति खेलने अंततः जब वह उत्पीड़न पर उतारू हो गया तो वहां से भी वह दूसरे जनपद चले गयें।
ठीक ऐसा ही मेरे एक दलित इंस्पेक्टर मित्र के साथ पड़ोसी जनपद के क्षत्रिय कप्तान ने अनायास उत्पीड़न करने लगा। तमाम उत्पीड़न के हथकंडो को अपनाने के बाद जब मन नही भरा तो दण्डित कर दिया।
देवरिया में कई जगह कोतवाल रहे मेरे छोटे भाई से चिढ़कर तत्कालीन कप्तान “ट्रीपति मीच्र” उनकी नौकरी खाने के ही फ़िराक में लग गया था। वह भी ट्रांसफर कराके दूसरे जनपद न गये होते तो उनको घेरकर वह बर्खास्त करा देता।
पुलिस विभाग में जाति के बजाय परफार्मेंस पब्लिक डीलिंग अपराध के अनुसंधान पर पोस्टिंग मिलने लगे तो एक दरोगाओं इंस्पेक्टरों का मनोबल बढ़ेगा और अपराध का ग्राफ भी गिरेगा। क्योंकि तब पुलिसकर्मी जात जुगाड़ की बजाय काम पर ध्यान देंगे।



manish
June 20, 2024 at 8:03 pm
पिछले सरकार में थानेदार केवल यादव बनते थे .और आम लोगों की सुनते भी नहीं थे उद्दंड थे सारे एक थानेदार ऊपर से शिवपाल चचा के भतीजे समझ
लीजिए क्या करते थे.. इनलोगों के कारणों से अखिलेश यादव हारे थे …