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उत्तर प्रदेश

मथुरा प्रकरण : योगी-राज में यूपी पुलिस न्याय कैसे देती है? पढ़ें

श्याम मीरा सिंह-

उत्तर प्रदेश के डिप्टी बृजेश पाठक द्वारा मथुरा का मामला संज्ञान लेने के बाद और उप मुख्यमंत्री द्वारा मथुरा SSP एंड CMO को कॉल करने के बाद भी मथुरा एसएसपी (Ssp Mathura) अपराधी दरोगा को बचाने में पूरी दम लगा रहे हैं। इस खबर को मुझे स्वयं SSP ने भेजा है ये जिसमें लिखा है कि मेडिको-लीगल रिपोर्ट में मारपीट की पुष्टि नहीं हुई। जबकि मुझे डिप्टी CM जी के हस्तक्षेप के बाद प्राप्त हुई मेडिको-लीगल रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि पीड़ित किसान के अंडकोशों पर लाठी-डंडे जैसे ब्लंट एंड हार्ड ऑब्जेक्ट से चोट की गई है।

ये मेडिको रिपोर्ट अपराध के 3 दिन बाद की है। इसमें साफ़ साफ़ लिखा है कि पीड़ित के वृषणकोश पर तीन दिन पुरानी चोट हैं। लेकिन SSP मथुरा- श्लोक कुमार इसे हर्निया और कभी हाइड्रोशील की बीमारी साबित करने में लगे हैं। कोई भी सर्जन या डॉक्टर ये पढ़कर बता सकता है कि मेडिको-लीगल रिपोर्ट में क्या लिखा है, मगर SSP साहब पता नहीं क्यों अपराधी दरोगा को संरक्षण देने के लिए झूठ पे झूठ का साम्राज्य खड़ा कर रहे हैं।

इंट्रेस्टिंगली दैनिक जागरण की इस ख़बर में लिखा है कि पुलिस ने कहा है कि वो आरोपी पर ही मुक़दमा करने का सोच रही है क्योंकि पीड़ित ने झूठ बोला है कि दरोग़ा ने उसे पीटा है। वाह वाह मतलब ग़ज़ब ही है देश में।

पहले यूपी पुलिस (मथुरा) ने अपने सार्वजनिक स्टेटमेंट में कहा कि युवक को चौकी बुलाया गया, युवक जब चौकी आया तो कहने लगा मुझे दर्द हो रहा है हाइड्रोसिल की बीमारी है। इसके बाद मथुरा पुलिस ने युवक का इलाज कराया। ऐसी मोहब्बत भरी कहानी पर भला कौन फ़िदा ना? जब इन कहानियों को स्वर्ग में बैठे- हरिशंकर परसाई और राग दरबारी के श्रीलाल शुक्ल पढ़ते होंगे तो क्या सोचते होंगे?

पहले तो युवक को इसलिए पीटा गया क्योंकि उसने पुलिस की रिश्वत की शिकायत सीएम योगी के पोर्टल पर कर दी थी। इसके बाद तीन दिन तक पीड़ित किसान का मेडिकल नहीं होने दिया। पीड़ित ने SSP मथुरा को 28 जुलाई के दिन ही दरोगा की गुंडई का शिकायत पत्र दे दिया था। लेकिन इसके बाद भी ना पीड़ित द्वारा की FIR दर्ज की गई और ना ही तीन दिन तक मेडिको-लीगल रिपोर्ट बनने दी गई। जबकि पुलिस का काम है कि वो तत्काल ही मेडिको-रिपोर बनवाए।

पुलिस से जितना मेडिकल लेट हो सकता था उतना लेट करने की कोशिश की। ताकि पीड़ित के घाव भर जाएँ और घूसखोर दरोगा को बचा लिया जाए। तीन दिन बाद जब मामला सोशल मीडिया पर उठा तब SSP साहब ने पहली बार बयान दिया। और कहा कि जाँच में पाया गया है कि मारपीट नहीं हुई। ऐसा थाने की जाँच में पाया गया है। पुलिस की थाने लेवल की जाँच जिसमें कह दिया गया कि कोई मारपीट नहीं हुई। उसमें ना मेडिको-लीगल रिपोर्ट का जिक्र रहा और ना अन्य चीजों का। बस चौकी इंचार्ज के बयान को ही सर्वोपरि मानकर जाँच कर दी गई कि दरोगा ने मारपीट नहीं की, क्योंकि दरोगा जी का ऐसा कहना है।

तीन दिन बाद जब सोशल मीडिया पर मामला उठा तब पहली बार पीड़ित किसान का मेडिको-लीगल रिपोर्ट तैयार करवाया गया। लेकिन ये मेडिको-रिपोर्ट किसी से शेयर नहीं की गई। मैंने इस रिपोर्ट को बार बार माँगा लेकिन SSP श्लोक कुमार और जाँच अधिकारी SSP रूरल मुझे फ़ोन पर ये ही कहते रहे- कि कोई चोट नहीं लगी। कुछ नहीं हुआ।

एसएसपी श्लोक कुमार ने कहा कि ये तो पीड़ित के इकतरफ़ा बयान हैं। जबकि पीड़ित की वीडियोज सोशल मीडिया पर वायरल हैं जिनमें उसके अंडकोष को देखा जा सकता है कि वहाँ पर गंभीर चोट मारी गई है। इसमें भी SSP मुझे ये बातें तब कह रहे थे जब इंटरनली मेडिको-लीगल रिपोर्ट आ चुकी थी। जिसमें इन चोटों के मात्र तीन दिन पुराने होने की बात थी यानी घटना वाले दिन की। फिर भी SSP श्लोक कुमार कहते रहे कि अरे कोई चोट नहीं लगी। ये बात वे सार्वजनिक तौर पर बयान में भी कहे। और मुझे कॉल पर भी बार बार बस यही कहा कि कोई मारपीट नहीं हुई। किसान को तो हायड्रोसिल है। अच्छा हुआ उन्होंने ये नहीं कहा कि युवक पागल भी है, आँखों से अंधा भी है।

सोशल मीडिया के बाद 1 अगस्त को ये मामला डिप्टी CM ब्रजेश पाठक जी के पास पहुँचा। डिप्टी CM ने तुरंत इस मामले को संज्ञान में लिया और SSP-CMO को कॉल किए। तब जाकर पहली बार मुझे मेडिको-लीगल देखने को मिली। जिसमें साफ़ साफ़ पुष्टि है कि पीड़ित को लाठी-डंडों से पीटा गया है। उसके अंडकोषों पर गंभीर चोट हैं। मेडिको रिपोर्ट कहती है कि ये चोटें घटना वाले दिन की ही हैं। हालांकि ये रिपोर्ट भी अभी अधूरी है। इसमें सर्जन का ओपिनियन मांगा गया है। लेकिन सर्जन का ओपिनियन क्या है ये इस मेडिको-लीगल में नहीं है। ऐसा जानबूझकर किया जा रहा है। ताकि चोटों की प्रकृति की गंभीरता को सामान्य दिखाया जा सके और रिश्वतखोर दारोग़ा को बचा लिया जाए।

सोचिए जब ये मामला इतना हाईलाइट है, जब इसमें डिप्टी CM ने भी हस्तक्षेप कर लिया उसके बाद भी SSP मथुरा- श्लोक कुमार रिश्वतखोर दरोगा को बचा रहे हैं। बाकी मामलों का तो होता ही क्या होगा? शर्मनाक, ये न्याय और कानून की खुली हत्या है। ये न्याय की खुली लूट है। जो ख़ुद क़ानून के कथित रखवालों द्वारा की जा रही है। जिन्हें हमारे आपके टैक्स के पैसे पर हमारी रक्षा के लिए रखा जाता है। इस रिश्वतखोर और बाबूशाई वाले सिस्टम में न्याय पाना बहुत मुश्किल है।

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