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सियासत

तमिलनाडु को हिला देने वाले पोलाची रेप कांड के सभी 9 दुर्दांत आरोपियों को आजीवन कारावास, पत्रकारों को मिली थीं धमकियां

जे पी सिंह-

वर्ष 2019 में तमिलनाडु की राजनीति हिला देने वाले और जनता को पूरे राज्य में आन्दोलन के लिए सड़क पर उतरने के लिए विवश करने वाले पोलाची यौन उत्पीड़न मामले में कोयंबटूर की महिला अदालत ने छह साल की मशक्कत के बाद सभी नौ आरोपियों को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। न्यायाधीश आर नंदिनी देवी ने अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष की दलीलों के बाद मंगलवार दोपहर सजा सुनाई। न्यायाधीश आर नंदिनी देवी ने सजा सुनाते हुए आठ पीड़िताओं को 85 लाख रुपये का मुआवजा दिए जाने का आदेश दिया।

नौ लोगों को आपराधिक साजिश, यौन उत्पीड़न, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार और जबरन वसूली समेत कई आरोपों में दोषी पाया गया। 2019 के आम चुनावों से कुछ हफ्ते पहले सामने आई इस घटना के कारण तमिलनाडु की तत्कालीन सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक निष्क्रियता और आरोपियों से संबंधों के आरोप लगने के कारण राजनीतिक रूप से घिर गई थी। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) ने तमिलनाडु में लोकसभा चुनाव 2019 में जबरदस्त सफलता हासिल की। द्रमुक ने राज्य की 39 सीटों में से 37 पर जीत दर्ज की। ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (अन्नाद्रमुक) को केवल 1 ही सीट से संतोष करना पड़ा।

दोषी ठहराए गए व्यक्तियों में के थिरुनावुक्कारासु, एन सबरीराजन उर्फ रिशवंत, एम सतीश, टी वसंतकुमार, आर मणिवन्नन, हारोनिमस पॉल, पी बाबू उर्फ बाइक बाबू, के अरुलानंदम और एम अरुणकुमार शामिल थे। सभी की उम्र 30 से 39 वर्ष के बीच है। अरुलानंथम ‘ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम’ (अन्नाद्रमुक) का पूर्व पदाधिकारी है। उसे अपराध में संलिप्तता के कारण पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था।

ये सभी 2019 में गिरफ्तारी के बाद से सलेम सेंट्रल जेल में बंद थे। इन सभी को कार्यवाही के लिए सलेम सेंट्रल जेल से भारी सुरक्षा के बीच अदालत में लाया गया था। प्रत्येक पर भारतीय दंड संहिता की धारा 376डी (सामूहिक बलात्कार) और 376(2)(एन) (एक ही महिला का बार-बार बलात्कार) सहित कठोर प्रावधानों के तहत आरोप लगाए गए हैं, जिनमें से दोनों में न्यूनतम 20 साल की सजा है, जिसे संभवतः आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है।

अभियोजन पक्ष ने कठोरतम सजा की मांग करते हुए कहा कि अपराध “गंभीर और सुनियोजित तरीके से अंजाम दिए गए थे।” आठ पीड़ितों ने गवाही दी, जिसका समर्थन कुल 48 गवाहों ने किया। जांच में जबरदस्ती, यौन हिंसा और ब्लैकमेल का एक परेशान करने वाला पैटर्न सामने आया था। शुरुआती पुलिस जांच को तुरंत सीबी-सीआईडी को सौंप दिया गया और बाद में जनता के आक्रोश के बाद सीबीआई को सौंप दिया गया।

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के विशेष लोक अभियोजक सुरेंद्र मोहन ने संवाददाताओं से कहा कि सभी नौ आरोपियों पर तत्कालीन भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 376 डी (सामूहिक बलात्कार) एवं 376 (2) (एन) (एक ही महिला से बार-बार बलात्कार) के तहत आरोप लगाए गए थे और अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया तथा उन्हें ‘‘मौत तक आजीवन कारावास’’ की सजा दी, जैसा कि सीबीआई ने अनुरोध किया था।

उन्होंने बताया कि दोषी व्यक्तियों को आजीवन कारावास की एक से पांच तक अलग-अलग सजा सुनाई गईं। थिरुनावुकारसु को आजीवन कारावास की सबसे अधिक पांच सजा सुनाई गईं। अदालत ने आरोपियों को तीन से 10 साल तक के कारावास की अन्य अलग-अलग सजा भी सुनाई।

कोयंबटूर की महिला अदालत की विशेष लोक अभियोजक जिशा के अनुसार, इस संवेदनशील मामले में एक भी गवाह नहीं मुकरा और पीड़िताओं की पहचान गुप्त रखी गई। मुकदमे के दौरान लगभग आठ पीड़िताओं ने गवाही दी थी। सभी आरोपियों पर 2016 से 2018 के बीच हुई घटनाओं को लेकर ब्लैकमेल, आपराधिक साजिश, यौन उत्पीड़न, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार और जबरन वसूली समेत कई आरोप लगाए गए थे। अधिकतर पीड़िताएं कॉलेज छात्राएं थीं और यह घटना 2019 में तब सामने आई जब एक पीड़िता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। गिरफ्तार लोगों पर अपने कुछ कृत्यों के वीडियो बनाने का भी आरोप लगाया गया।

राज्य की राजधानी चेन्नई से लगभग 550 किलोमीटर दूर पश्चिमी तमिलनाडु के इस शहर में हुई इस घटना से राज्य में आक्रोश फैल गया था। शुरुआत में मामले की जांच स्थानीय पुलिस ने की लेकिन बाद में इसे अपराध जांच विभाग की अपराध शाखा (CB-CID) को सौंप दिया गया। मामले को 2019 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दिया गया।

दरअसल छह साल पहले, कोयंबटूर के एक खूबसूरत ग्रामीण शहर पोलाची के नौ लोगों को, जहाँ कई फ़िल्में फ़िल्माई गई हैं, 2016 और 2018 के बीच युवा लड़कियों और महिलाओं को ब्लैकमेल करने, यौन उत्पीड़न करने और वीडियोग्राफी करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था। गिरफ़्तारी के बाद से ही जेल में बंद नौ लोगों पर कई अपराधों के लिए मुकदमा चलाया गया है, जिसमें आपराधिक साज़िश, यौन उत्पीड़न, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार और एक ही महिला पर बार-बार बलात्कार करना शामिल है।

24 फरवरी, 2019 को एक कॉलेज छात्रा ने पोलाची ईस्ट पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसमें आरोप लगाया गया कि 12 दिन पहले पोलाची के पास चलती कार में चार लोगों ने उसका यौन शोषण किया। 19 वर्षीय छात्रा उन युवाओं के समूह के खिलाफ बोलने वाली पहली पीड़िता थी, जो कथित तौर पर 2016 से महिलाओं को बहला-फुसलाकर उनका यौन शोषण कर रहे थे। अपराधियों ने यौन कृत्यों को फिल्माया, जिसका इस्तेमाल उन्होंने बाद में आगे के यौन शोषण के लिए किया। 2019 में तमिलनाडु के पोलाची में एक गैंग ने कई महिलाओं को यौन उत्पीड़न और ब्लैकमेल का शिकार बनाया, जिसमें कम से कम 200 पीड़ित होने की आशंका है।

पुलिस ने जांच शुरू की और आरोपियों के मोबाइल फोन और लैपटॉप की जांच की। उन उपकरणों में उन्होंने जो देखा वह चौंकाने वाला था। अधिकारियों को कोई संदेह नहीं था कि कॉलेज की छात्रा की शिकायत सिर्फ हिमशैल का टुकड़ा थी। गैजेट्स में पीड़ितों के कई वीडियो क्लिप थे – छात्रों से लेकर विवाहित महिलाओं तक – जिनका उन्होंने विभिन्न स्थानों पर यौन उत्पीड़न किया था। इनमें से अधिकांश खौफनाक अपराध पोलाची के पास चिन्नाप्पलायम में एक आरोपी के. थिरुनावुक्कारारू के फार्महाउस पर हुए थे। मामले की गंभीरता को भांपते हुए 12 मार्च, 2019 को राज्य सरकार ने क्राइम ब्रांच-सीआईडी को जांच शुरू करने का निर्देश दिया। आखिरकार, आक्रोश के बीच तत्कालीन एडप्पादी के. पलानीस्वामी सरकार ने मामले को केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को स्थानांतरित कर दिया।

केंद्रीय एजेंसी ने एन. सबरीराजन, उर्फ रिश्वंत, के. थिरुनावुक्कारसु (34), एम. सतीश (33), टी. वसंतकुमार (30), आर. मणि उर्फ मणिवन्नन (32), पी. बाबू (33), टी. हारोनिमस पॉल (32), के. अरुलानाथम (39) और एम. अरुणकुमार को मामले में आरोपी बनाया। यह पाया गया कि सबरीराजन मुख्य अपराधी था, जिसने शिकायतकर्ता सहित लड़कियों और महिलाओं को फुसलाया। शिकायतकर्ता के अनुसार उल्लंघन का पहला कृत्य 12 फरवरी, 2019 को धारापुरम रोड पर एक कार में हुआ। उन्होंने इस कृत्य को फिल्माया, उसकी सोने की चेन लूट ली और उसे एक सुनसान जगह पर छोड़ दिया। लड़की ने अपने परिवार को तभी सूचित किया जब आरोपियों ने वीडियो लीक करने की धमकी देकर उससे यौन संबंध बनाने की मांग की। सबरीराजन के लैपटॉप और थिरुनावुक्कारासु के मोबाइल फोन पर यौन उत्पीड़न के कई वीडियो मिले। इनके आधार पर पुलिस और सीबीआई ने अन्य आरोपियों और पीड़ितों की पहचान की।

इस मामले ने राजनीतिक विवाद को भी जन्म दिया क्योंकि अरुलानन्थम एआईएडीएमके पोलाची शहर के छात्र विंग के सचिव थे। गिरफ्तारी के एक दिन बाद ही उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया था। एक अन्य युवक, ‘बार’ नागराज, जो कॉलेज के छात्र के भाई पर हमले से संबंधित मामले में शामिल था, एआईएडीएमके से जुड़े युवा संगठन अम्मा पेरावई का स्थानीय सचिव था। विपक्षी दलों ने इस मामले में एआईएडीएमके के एक स्थानीय बड़े नेता को भी जोड़ने की कोशिश की थी।

जांच से पता चला कि आरोपियों ने मध्यम वर्ग और निम्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि की युवा लड़कियों और महिलाओं को निशाना बनाया। हालांकि आरोपियों पर कई महिलाओं का यौन उत्पीड़न और शोषण करने का संदेह है, लेकिन उनमें से केवल आठ ने उनके खिलाफ गवाही दी। जांच को उस समय कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा जब तत्कालीन कोयंबटूर जिला पुलिस अधीक्षक आर. पंडियाराजन ने मीडिया ब्रीफिंग के दौरान शिकायतकर्ता का नाम उजागर किया। ऐसा माना जाता है कि कुछ पीड़ितों ने अपनी पहचान सार्वजनिक होने के डर से जांच से दूर रहना चुना।

मद्रास उच्च न्यायालय के निर्देश के आधार पर, मामले की सुनवाई के लिए कोयंबटूर के संयुक्त न्यायालय परिसर में एक विशेष न्यायालय कक्ष की सुविधा बनाई गई थी, ताकि मामले की सुनवाई और सुनवाई के दौरान पीड़ितों की पहचान की रक्षा की जा सके। अदालत में एकतरफा शीशे से बने चैंबर ने मामले की सुनवाई और सुनवाई के दौरान अन्य लोगों को पीड़ितों को देखने से रोका। उन्हें अत्यंत सावधानी से अदालत में लाया गया, जबकि आरोपियों को ज़्यादातर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए पेश किया गया।

14 फरवरी, 2023 को शुरू हुए मामले की पूरी सुनवाई के दौरान गवाह संरक्षण योजना, 2018 के प्रावधानों का सख्ती से पालन किया गया। आरोपपत्र और अन्य दस्तावेजों से पीड़ितों के नाम हटा दिए गए और अदालत ने मामले में 40 से ज़्यादा गवाहों से पूछताछ की।

यह मामला 200 से अधिक दस्तावेजों और 400 से ज्यादा इलेक्ट्रॉनिक सबूतों पर आधारित था। इन सबूतों में फोरेंसिक रूप से प्रमाणित वीडियो फुटेज भी शामिल थे। उन्होंने कहा कि डिजिटल सबूतों से समर्थित पीड़ितों की गवाही इस मामले में निर्णायक साबित हुई। सभी गवाहों ने मजबूती से बयान दिया और कोई भी गवाह मुकरा नहीं। गवाह संरक्षण अधिनियम के तहत पीड़ितों की पहचान और सुरक्षा सुनिश्चित की गई थी। हालांकि, केवल आठ पीड़ितों ने ही औपचारिक रूप से शिकायत दर्ज कराई, जो समाज में मौजूद कलंक और प्रतिशोध के डर को उजागर करता है।

पोलाची मामला एक संगठित यौन शोषण गिरोह के घृणित तौर-तरीकों को सामने लाया। 2016 से 2018 के बीच कम से कम आठ महिलाओं को, जिनमें एक कॉलेज छात्रा भी शामिल थी, पहले फंसाया गया, फिर उनके साथ दुष्कर्म कर वीडियो बनाया गया। बाद में उन वीडियो का इस्तेमाल कर उन्हें ब्लैकमेल किया गया और बार-बार शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया।

यह मामला सिर्फ एक आपराधिक मामला नहीं रहा, बल्कि यह लैंगिक हिंसा के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता की कसौटी बन गया। महिला अधिकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पूरी प्रक्रिया पर करीबी नजर रखी और जवाबदेही की मांग की। उस समय सत्ता में रही एआईएडीएमके सरकार को एफआईआर दर्ज करने में देरी और मामले को दबाने की कथित कोशिशों को लेकर आलोचना झेलनी पड़ी। हालांकि, पार्टी ने इन आरोपों से इनकार किया।

जांच से पता चला कि यह गैंग कम से कम 2013 से सक्रिय थी और इसने नकली फेसबुक प्रोफाइल का उपयोग करके महिलाओं को दोस्त बनाया। ये महिलाएं, जिनमें ज्यादातर मध्यम और निम्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि की थीं, को एकांत स्थानों जैसे के. थिरुनावुक्कारसु के फार्महाउस या होटलों में ले जाया जाता था, जहां उनके साथ बलात्कार किया जाता था और वीडियो बनाए जाते थे। इन वीडियो का उपयोग पीड़िताओं को यौन संबंधों या पैसे के लिए ब्लैकमेल करने के लिए किया जाता था। अनुमान है कि गैंग ने कम से कम 200 महिलाओं को निशाना बनाया, हालांकि कुछ रिपोर्ट्स में 275 लड़कियों और 1,100 वीडियो का जिक्र है। पीड़ितों में कॉलेज और स्कूल की शिक्षिकाएं, डॉक्टर, और तमिलनाडु के विभिन्न हिस्सों जैसे कोयम्बटूर, चेन्नई, और सलेम की छात्राएं शामिल थीं।

मार्च 2019 में, तमिलनाडु भर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। चेन्नई में 300 छात्रों, तिरुवन्नमलई में 250 छात्रों, कोयम्बटूर में वकीलों, तिरुनेलवेली में सिद्ध चिकित्सा के छात्रों, वेल्लोर में 300 छात्रों, और पुडुक्कोट्टई में मानव श्रृंखला ने हिस्सा लिया। द्रमुक की महिला विंग की अध्यक्ष कनिमोझी सहित विपक्षी नेताओं पर बिना अनुमति प्रदर्शन करने के लिए मुकदमा दर्ज किया गया।पिछले तीन वर्षों में पोलाची में 18-23 वर्ष की 58 महिलाओं ने आत्महत्या की, जिन्हें गैंग की गतिविधियों से जोड़ा गया।एक गुमनाम पीड़िता ने दावा किया कि एक लड़की की फार्महाउस में सामूहिक बलात्कार के बाद मृत्यु हो गई और उसका शव वहीं दफनाया गया।

मीडिया और धमकियां: पत्रकारों, जैसे नक्कीरन के संपादक राजगोपाल, को धमकियां मिलीं और उनके खिलाफ पुलिस कार्रवाई की गई। पीड़िता के भाई पर भी हमला हुआ।

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