प्रदीप सौरभ-
कई दिन से सोच रहा हूं कि ये बात साझा करूं या नहीं। साझा किए बिना दिल मान नहीं रहा है। बीते वर्ष रामगढ़ प्रवास के दौरान मैं चुप्पी साध गया था। लेकिन एक घुटन अंदर बनी रही लंबे समय तक। मैं पहाड़ में जब भी प्रवास करने आता हूं, तो दोस्त दुश्मन पूछते हैं कि किसी प्रोजेक्ट पर काम कर रहे है क्या? कोई नया उपन्यास पढ़ने के लिए मिलने वाला है क्या? पहाड़ पर गए हैं तो कुछ खास लिख रहे होंगे। वगैरह वगैरह।
ये ठीक है कि मैं एक लेखक हूं। अतीत में पांच उपन्यास लिख चुका हूं। पाठकों का उन्हें भरपूर प्यार मिला। दूसरी भाषाओं में भी उनके अनुवाद हुए। लेखक की अपनी एक निजी जिंदगी और मुसीबतें भी होती हैं। उससे हमेशा लिखने का आग्रह करना उचित नहीं है।
हर लेखक अपने रचनाकर्म के प्रति सचेत रहता है। रचनात्मकता को कई तरह अभिव्यक्त किया जा सकता है। मसलन फोटोग्राफी, ब्लॉगिंग, कुकिंग आदि करके। वैसे भी मैं पहाड़ों के एकांत में रहकर लिखने वाला लेखक हूं भी नहीं। इसे मैं चोचलों के अलावा कुछ नहीं मानता हूं।
अगर ऐसा ही होता तो तीन वर्ष मैं शिमला में भी रहा हूं। वहाँ भी एक लाइन नहीं लिखी, सिवाय पत्रकारीय लेखन के अलावा। लेखन के लिए हर लेखक के अपने-अपने दबाव होते हैं। कहानी अगर पक गई है तो मैं व्यस्तता में भी समय चुरा कर लिख लेता हूं। नौकरी करते हुए ही मैंने सारे उपन्यास लिखे।
वैसे भी अगर आपके पास कहने लिखने के लिए कुछ नया नहीं है तो काहे का लिखना। दोहराव आपके लेखक को मार देता है।
कहने-लिखने का दबाव था तो एक वर्ष में दो उपन्यास लिख दिए थे-मुन्नी मोबाइल औऱ तीसरी ताली। फिर एक-एक दो-दो साल के अंतराल में देश भीतर देश, और सिर्फ तितली, ब्लाइंड स्ट्रीट आ गए थे।
हर लेखक के पास कहानियां होती हैं, लेकिन उनको कहने के लिए उसकी तैयारी नहीं होती है। मैं इस तरह की नौटंकी नहीं करता हूं कि मुझे समय नहीं मिल रहा है। वैसे भी कहानी पक जाए तो लिखने या लैपटॉप में उसे उतारने में मुझे सिर्फ तीस बत्तीस दिन ही लगते हैं।
तो दोस्तों फिलहाल अपने पास लेखन के लिए अभी तैयारी नहीं है। इसलिए लिख नहीं पा रहा हूं। पहाड़ में तो मैं अपने और अपनी अम्मा के स्वास्थ्य लाभ के लिए आता हूं। समय अपने पास भरपूर है, लेकिन मैं तैयार नहीं हूं।
कुछ दोस्त दुश्मन दबी जुबान में कह चुके हैं कि मैं चूक गया हूं। शायद यही हो। लेकिन मेरा लेखक अभी मरा नहीं है। अंदर से बेचैन रहता है। कई कहानियां कई वर्षों से जेहन में हैं, लेकिन लिख नहीं पा रहा हूं। शायद अभी पूरी तैयारी नहीं है। हर साल एक किताब, दो किताब वाले दबाव में मैं नहीं रहता। फालतू की प्रचारबाजी औऱ गुटबाजी में भी अपन हैं नहीं। समय की कोई कमी नहीं है, जब कहानी लिखने लायक हो जाएगी तो कितनी ही व्यस्तता हो, समय चुरा कर उपन्यास लिख ही दूंगा। नहीं लिख पाया तो कोई बात नहीं।
मेरे न लिखने से हिंदी साहित्य दरिद्र तो हो नहीं जाएगा, जैसा सुबह से शाम तक सेमिनार, पुरस्कार आदि का जुगाड़ करने वाले कुछ लेखकों को लगता है…


