रंगनाथ सिंह-
साहित्य, संगीत, कला विहीन लोग भी अब यह बात जान चुके हैं कि दुनिया में एक बहुत बड़ी कूरियर सर्विस चल रही है जिसका मूल काम है डेमोक्रेसी डिलीवर करना। डेमोक्रेसी डिलीवर करने से पहले यही कूरियर सर्विस मीडिया डिलीवर करती है क्योंकि इंग्लिश पब्लिक स्फीयिर का कंट्रोल उसके पास रहा है। इंग्लिश से मीडिया कंट्रोल होता था, इंटरनेट से सोशल मीडिया कंट्रोल होता है। अमेरिकी विचारक थॉमस सोल का एक जुमला मेरी नजर से गुजरा है, जिसका देसी अनुवाद आगे दे रहा हूँ।
“समस्या ये नहीं है कि पप्पू पढ़ नहीं सकता। समस्या ये नहीं है कि पप्पू सोच नहीं सकता। समस्या ये है कि पप्पू को पता ही नहीं है कि सोचना क्या होता है। वह अपनी चाहतों को अपने विचार समझता है।” जाहिर है कि यहाँ पप्पू से आशय किसी नेता से नहीं है बल्कि उस जनता से है जिसे बचपन में टीचर के सामने “जॉनी जॉनी यस पापा” जोर-जोर से बोलकर पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। थॉमस सोल ने जॉनी का नाम लिया है जिसका हिन्दीकरण करते हुए मैंने पप्पू लिखा है। उम्मीद है कि माता-पिता ने जिनका नाम पप्पू रखा है वे लोग दिल पर नहीं लेंगे। जब इंग्लिश लोक में जॉनी बदनाम हो चुका है तो हिन्दी लोक में भी किसी न किसी को उसके भावानुवाद के रूप में बदनाम होना होगा!
इस कूरियर सर्विस वाले की तीसरी विशेषज्ञता है कि वह डेमोक्रेसी और मीडिया के साथ मिलिट्री डिलीवर करने में भी महारत रखता है। कूरियर सर्विस की अचूक सेवा का सुफल समझिए कि आज कोई पप्पू ही होगा जिसके अन्दर यह भ्रम बचा होगा कि हमारे दायें पड़ोसी देश में डेमोक्रेसी बची है। मुल्क के सबसे मशहूर नेता को जिस तरह क्रश किया गया है और उसके बाद उस नेता के मददगार आर्मी नेटवर्क को अब क्रश किया जा रहा है, उससे रहा-सहा पर्दा भी फट गया है और अब साफ दिख रहा है कि कूरियर सर्विस ने दुनिया की नजर में अपनी इज्जत बचाने के लिए चुनाव का कर्मकाण्ड कराने का आदेश दे रखा है वरना देश तो फौज चला रही है और फौज को कौन चला रहा है, राम जानें!
शायद कुछ लोगों को याद होगा कि काफी पहले मैंने लिखा था कि हालिया इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि इमरान खान के मुद्दे पर पाकिस्तानी सेना दो फाड़ होती दिख रही है। जाहिर है, उस दूसरी फाड़ का ऑपरेशन अभी हमारे पड़ोस में चल रहा है। जाहिर है कि वह दूसरा फाड़ सेना के अन्दर पहले भी था लेकिन इस बार वह अपनी औकात से ज्यादा बढ़ गया तो ऑपरेट करके उसे हटाना पड़ रहा है।
सच कहूँ तो मुझे नहीं लगा था कि इमरान खान को काबू करना इतना आसान होगा। खासकर 9 मई 2023 को इमरान जी की गिरफ्तारी के बाद जिस तरह जनता सड़क पर उतर गयी थी, उसे देखते हुए लगा था कि फौज को उनके संग समझौता करना पड़ेगा। ऐसा नहीं हुआ। उल्टा हुआ। 9 मई को जनभावना की अभिव्यक्ति की तरह नहीं बल्कि फौज के प्रताप के खिलाफ बगावत की तरह देखा गया। या यह कह लें कि कहीं न कहीं फौज अवाम को यह समझाने में सफल रही कि फौज नहीं रहेगी तो पाकिस्तान नहीं रहेगा।
फौज का यह कहना कुछ हद तक सही है कि वह नहीं रहेगी तो अखण्ड पाकिस्तान नहीं बचेगा लेकिन पाक फौज मेरे जैसे पड़ोसियों को यह नहीं समझा पा रही है क्या केवल फौज के दम पर पाकिस्तान बच पाएगा! कब तक? फौज जिस काम के लिए बनी है उसपर फोकस करने के बजाय जिसके लिए वो नहीं बनी है, उन इलाकों (“रियल एस्टेट और पॉलिटिक्स”) में घुसकर वह क्या कर रही है? ये मेरे नहीं एक वरिष्ठ पाकिस्तानी महिला पत्रकार के शब्द हैं कि जिनके अनुसार उनकी फौज आजकल इन दो इलाकों में ज्यादा गश्त करती है! एक हाईकोर्ट जज की जिन्दगी दूभर हो गयी जिस दिन उन्होंने एक फौजी संस्था को सरकारी जमीन पर से कब्जा खाली करने का आदेश दे दिया था।
फौज यह नहीं समझ रही है कि फौजों का इतिहास रहा है कि बड़ी से बड़ी फौज को हराने वाली फौज पैदा हो जाती है। जिन फौजों का जनता का इमोशनल सपोर्ट प्राप्त नहीं होता है, उनका हश्र और बुरा होता है। आखिर कब तक फौज और कूरियर सर्विस वाले अंकल सैम के दम पर पाकिस्तान अखण्ड रहेगा! अंकल सैम कूरियर सर्विस का नाम मैं यूँ ही नहीं उछाल रहा हूँ। अजीब संयोग है कि इमरान खान के भी बुरे दिन भी उस दिन से ही शुरू हुए थे जिस दिन उन्होंने अंकल सैम के किसी भतीजे को नाराज कर दिया था। यह मेरा नहीं, खुद इमरान जी का कहना है।
सच कहूँ तो ताजा घटनाक्रम के बाद मैं किंकर्तव्यविमूढ़ महसूस कर रहा हूँ। अब यह लगने लगा है कि जिस तरह पाकिस्तान के चुनाव को लोकतंत्र समझने वालों को मैंने पप्पू कहा उसी तरह अब लग रहा है कि यह समझना भी पप्पू 2.0 होना है कि पाकिस्तान को फौज चला रही है! इमरान खान का अपराध क्या है जो उन्हें और उनके बाद उनके सपोर्ट में विकसित हो चुके पूरे नेटवर्क को सार्वजनिक रूप से कुचला जा रहा है! फौज चाहती तो यह काम अन्दरखाने भी कर सकती थी। उसे इसमें महारत हासिल है। एक पाकिस्तानी पत्रकार ने बताया कि पाकिस्तानी सेना के प्रमुख ने आईएसआई के पूर्व प्रमुख फैज हामिद पर कार्रवाई करने से पहले अपने नौ कोर कमाण्डर के साथ मीटिंग की थी और सबकी रजामन्दी के बाद ही कार्रवाई शुरू की गयी।
लोकप्रिय नेता इमरान खान का प्रसंग अभी अंजाम को पहुँचा नहीं कि हमारे दूसरे पड़ोस में डेमोक्रेसी डिलीवर हो गयी। वहाँ तो पाकिस्तान से भी लेटेस्ट वर्जन की डेमोक्रेसी आयी है। पाकिस्तानी में सबसे बड़ी पार्टी को अलोकतांत्रिक बताकर दूसरी, तीसरी और चौथी बड़ी पार्टी के कुनबे की गोद में डेमोक्रेसी जा गिरी! आप चाहें तो इसे गोदी डेमोक्रेसी कह सकते हैं। बांग्लादेश में मामला इससे आगे चला गया। वहाँ आखिरकार डेमोक्रेसी उन दलों की गोद में गिरी जिन्होंने धांधली की आशंका से चुनाव में हिस्सा नहीं लिया था!
जो आरक्षण सत्ताधारी दल ने 2018 में हटा दिया था, उस आरक्षण को बहाल करने के लिए कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ता किस्म के सज्जनों ने 2021 में अदालत में याचिका दायर की। एक जुलाई 2024 को हाईकोर्ट ने आरक्षण दुबारा लागू कर दिया। सरकार भागकर सुप्रीम कोर्ट गयी। 16 जुलाई को फैसले पर रोक लग गयी लेकिन “जागरूक छात्र” इतने नाराज हो गये थे कि बेचारों ने 15 अगस्त के शुभ दिन तक देश का तख्ता पलट दिया! मणिपुर याद आ गया ना! एक फैसले से आग लग गयी! एक जज, एक कोर्ट ने 10 साल से शान्त प्रदेश को अशान्त कर दिया और उस अशान्ति का सारा ठीकरा राजनीतिक नेतृत्व पर आ गया! मुझे लग रहा है कि मणिपुर बीटा टेस्ट था। अंकल सैम को भी पता है कि मणिपुर इतनी हैसियत नहीं रखता कि भारत को पाकिस्तान या बांग्लादेश बना सके लेकिन उन्होंने भविष्य के लिए मोडस ऑपरेंडी को टेस्ट किया होगा कि भारत के विपक्षी दल और जनता का लेवल अभी क्या चल रहा है! क्या ढाका यूनिवर्सिटी में भी कोई गंगा ढाबा है!
बांग्लादेश में पिछली सरकार के सारे बड़े चेहरे कुर्सी से उतारे जा चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को भी कुर्सी छोड़नी पड़ी लेकिन अभी तक सेना प्रमुख ने इस्तीफा नहीं दिया है जबकि उनकी नियुक्ति सीधे तौर पर शेख हसीना ने की थी! कल ही मैंने पढ़ा कि तख्तापलट से पहले जब सेना प्रमुख एक कार्यक्रम में गये थे तो वहाँ एक नौजवान अफसर ने उन्हें कुरान का एक कोटेशन बताया और दूसरी महिला अफसर ने बताया कि कैसे उसकी सहेली या बहन बता रही थी कि छात्र बहुत नाराज हैं! खबर पढ़कर ऐसा लगा जैसे बस उन दोनों की बात सुनकर ही सेना प्रमुख का दिल मोम की तरह पिघल गया! उनकी आँखें खुल गईं और उन्होंने वह करने का फैसला किया जो उन्होंने अब कर दिया है! जैसा भोला अखबार उतने भोले सेना प्रमुख, उतनी भोली जनता! पिछली सरकार के सभी महानुभावों ने त्यागपत्र दे दिया मगर सेना प्रमुख देश सेवा में अब तक लगे हुए हैं! मानना पड़ेगा कि अंकल सैम की पैठ पूर्वी बंगाल के सिस्टम में भी बहुत ज्यादा गहरी है! मेरी सलाह है कि अब स्थिति नियंत्रण में है तो सेना प्रमुख का इस्तीफा लेकर लाज-हया का पर्दा पड़े रहने देना चाहिए!
दुनिया भर के आतंकवादी, अपराधी और हत्यारे तानाशाह जब अपने देश से भागते हैं तो कहाँ जाते हैं, यह दुनिया जानती है। मगर जब एक हसीना की बारी आयी तो दुनिया के सबसे बड़े मानवाधिकार संरक्षक देशों ने शरण नहीं दी! एक ने तो कह दिया कि हमारे यहाँ ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। दूसरे ने कह दिया कि वो तो चीन की बेस्ट फ्रेंड है! मरहूम मिर्जा गालिब याद आ गये, इस सादगी पर कौन न मर जाए ये खुदा, लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं!
पता नहीं उर्दू शायर हिन्दी कवियों की तरह इंटरनेशनल पॉलिटिक्स, इकोनॉमिक्स और वारफेयर के एक्सपर्ट होते हैं या नहीं! गालिब शायरी की गली में मोहब्बत की दुकान चलाते थे लेकिन उन्होंने देख लिया था कि कुछ युद्ध बिना तलवार के जीते जा सकते हैं! और सामने गालिब जैसा शायर मिजाज हो तो और आराम से जीते जा सकते हैं। दारा शिकोह हो या अवध के नवाज वाजिद अली शाह, देवी सरस्वती की इनपर कृपा थी। देवी लक्ष्मी की भी इनपर कृपा थी लेकिन इन लोगों ने देवी दुर्गा से कृपा प्राप्त करने में चूक कर दी और जब सामने असली तलवार आयी तो ये खुदा को प्यारे हो गये। ये अलग बात है कि ब्रिटिश औरंगजेब जितने क्रूर नहीं थे इसलिए वाजिद अली शाह का हश्र दारा शिकोह की तुलना में कम दर्दनाक हुआ।
ऐसा लग रहा है कि अब बांग्लादेश में भी पाकिस्तान मॉडल चलेगा। फौज की छतरी की नीचे डेमोक्रेसी के FOOL खिलेंगे। नवाज को हटाना होगा तो इमरान आ जाएगा, इमरान को हटाना होगा तो शाहबाज आ जाएगा और जरदारी तो हर देश में पाये जाते हैं, पूर्वी बंगाल या पश्चिमी बंगाल में उनकी कमी नहीं होगी!
जिन लोगों को गंगा ढाबे से पोस्ट-ग्रेजुएट होने का सौभाग्य नहीं मिला है, उनकी सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि उन्हें ऐसे बड़े मसलों के 100 प्रतिशत तथ्य पता नहीं चलते। सच कहूँ तो जेएनयू का गंगा ढाबा ही एकमात्र ऐसी जगह है जहाँ अंतरराष्ट्रीय मसलों के 100 प्रतिशत तथ्य चाय-बीड़ी पीने आते हैं। ताजा घटनाक्रम को देखते हुए लग रहा है कि हम जैसों को लाहौर और ढाका के अन्दरखाने के बारे में 10 प्रतिशत जानकारी भी नहीं मिल रही है। अच्छी बात ये है कि पाकिस्तान का इलीट लिबरल मीडिया भारत के इलीट लिबरल मीडिया जैसा पप्पू नहीं है इसलिए वहाँ के लिबरल इलीट पत्रकार बहुत सी बातें बाहर निकालकर ले आते हैं जिन्हें मैं 10 प्रतिशत तथ्य कह रहा हूँ।
लाहौर हो या ढाका या दिल्ली, महज 10-20 प्रतिशत जानकारी के संग उसके बारे में ठोस समझ बना पाना दुष्कर है। इतनी जानकारी से इतना ही पता चलता है कि कुछ चल रहा है, कुछ जल रहा है, कुछ बदल रहा है, हम तक पहुँच रही हल्की आंच हम तक पहुंच रही हल्की आवाज, हमारे पैरों के नीचे जमीन में हो रहा हल्का कम्पन इशारा कर रहे हैं कि हमसे दूर मगर ज्यादा दूर नहीं, कुछ बड़ा चल रहा है, कुछ बड़ा जल रहा है, कछ बड़ा हिल रहा है।
जब देश की कमान इंदिरा गांधी के हाथ में थी तो वह बार-बार विदेशी ताकतों का नाम लेती थीं। यह भी सच है कि बाद में इंदिरा जी विदेशी ताकतों के डर का इस्तेमाल घर के अन्दर करने लगी थीं लेकिन यह भी सच है कि उनकी बात में सत्य ज्यादा था और दिठौना कम था क्योंकि प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें 100 प्रतिशत तो नहीं मगर 75 प्रतिशत तथ्य पता चलते रहे होंगे। क्या अभय मुद्रा में जीने वालों को इसका अहसास है कि वे विदेशी ताकतें कौन हैं जिनका भयादोहन उनकी दादी किया करती थीं! या वे अभी शिव बारात में भांग पी कर नागिन डांस करने में मगन हैं!
संयोग देखिए कि कई दशकों बाद स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने विदेशी ताकतों को याद किया। कई दशकों से भारत के प्रधानमंत्रियों के सपने में आने वाली ये विदेशी ताकतें कौन हैं, क्या चाहती हैं, अपनी चाहतों को पूरा करने के लिए क्या हरकतें कर रही हैं, आगे उनका इरादा क्या है! यह पहले हुक्मरान को समझने की जरूरत है और उसके बाद उसे अवाम को समझाने की जरूरत है क्योंकि पड़ोसी देशों का हाल देखकर लगने लगा है कि फौज को ग्रूम किया जा सकता है, मानवाधिकार कार्यकर्ता को ग्रूम किया जा सकता है, मीडिया को ग्रूम किया जा सकता है, न्यायपालिका को ग्रूम किया जा सकता है, अफसरों को ग्रूम किया जा सकता है, और इंटेलिजेंसिया, मीडिया और सोशलमीडिया पर कंट्रोल हो तो उसे यूज करके अवाम के एक पप्पू वर्ग को कन्फ्यूज किया जा सकता है!
अवाम के पप्पू वर्ग को छोटी गंगा बोलकर नाले में कुदाना बहुत मुश्किल काम नहीं है। सवाल ये है कि यह पप्पू वर्ग कितना बड़ा है। इंग्लिश विद्वानों ने शोध करके बताया है कि अगर किसी देश की 3.5 प्रतिशत आबादी पप्पू बनकर उनके रिमोट कमाण्ड के अनुसार सड़क पर उतराने लायक हो चुकी है और सत्ता की बिसात पर बिछे हुए मोहरे सही जगह पर मौजूद हों तो किसी भी देश में तख्तापलट किया जा सकता है। इस रणनीति का आधिकारिक नाम भूल जाए, सरल भाषा में इसे सैण्डविच स्ट्रैटजी समझिए। भारत के लिहाज से कहें तो आपको करीब 6-7 करोड़ लोगों को सड़क पर उतारना होगा, एक याचिका अदालत में पहले से चल रही होगी, एक जागृत जज अचानक से एक फैसला दे देगा जनता नाराज हो जाएगी और टीवी पर हेडलाइन चलेगी कि पूरे देश की जनता सड़क पर उतर आयी है!
इंग्लिश जबान वह इलीट वर्ग तैयार करती है जो ऐसे मौकों पर तख्तापलट में घोड़े ऊँट, हाथी की तरह चलते हैं, प्यादे सड़क पर उतरते हैं और खतरे में वजीर और राजा की जान पड़ जाती है! बांग्लादेश में तो काले मोहरों से खेलने वाला वजीर भी गोरा निकला और काले राजा को शह देकर मात कर गया! जो लोग भी शतरंज खेलते हैं वो जानते होंगे कि सफेद को पहली चाल चलने का मौका मिलता है और सामने तगड़ा खिलाड़ी हो तो पहली चाल गेम को सफेद की तरफ झुकाए रखती है, जबतक की काला अपनी होशियारी से उस फर्स्ट मूवर एडवांटेज को न्यूट्रल न कर दे! मगर काला तब सारे अवसर खो देता है जब वह नहीं देख पाता कि उसके मोहरों में भी कुछ काले दिखने वाले मोहरे मूलतः सफेद के लिए खेल रहे हैं! ऐसे रंग चढ़े मोहरे आखिरी दम तक नियम से खेलते हैं लेकिन एण्ड गेम के चक्रव्यूह में वो रंग उतारकर पलटी मार लेते हैं। क्या आपको मीर जाफर याद आ गया!
इंग्लिश, इंटरनेट और सोशलमीडिया ने सफेद को पहले से बहुत ज्यादा ताकतवर बना दिया है। यह कुछ वैसा है जैसे सफेद को पहली तीन चाल चलने की छूट मिल जाए और उसके बाद काले को जवाबी चाल चलने का मौका मिले! ऐसा नहीं है कि मैं बस बातें बना रहा हूँ। तख्तापलट से प्रसन्न पूर्वी बंगाल के एक महात्मा ने खुद बताया है कि इंटरनेट छात्रों का हथियार बन गया था! कोई भी आतंकी पकड़ा जाता है तो यह देखा जाता है कि उसके पास किस कंट्री का बना हथियार बरामद हुआ है। इंटरनेट अगर हथियार बन गया था तो पप्पू वर्ग को यह सोचना चाहिए कि यह नया हथियार किस देश में बना है! अगर तुर्की मेड या चीन मेड या पाकिस्तान मेड बन्दूक पकडे़ जाने का कुछ मतलब होता है तो क्या इन नए जमाने के नए हथियारों के मेकर कंट्री के नाम से पूरे घटनाक्रम में कोई मतलब नहीं निकलता है!
वो कौन आदमी है जो यह तय करता है कि इंटरनेट सर्च के टॉप रिजल्ट क्या होंगे, किस पोस्ट की रीच कम होनी चाहिए और किसकी रीच ज्यादा होनी चाहिए! चुनाव से पहले खास तरह के इन्फ्लूएंसरों की रीच में कई गुना की उछाल कैसे आ गयी थी! क्या जनता में उस वर्ग के लिए कई गुना ज्यादा प्रेम उमड़ रहा था! फिर मोहब्बत की दुकान का सामान दो अंकों में ही क्यों सिमट कर रह गया!
याद रखें कि ऊपरवाला बन्दा मेरी या आपकी पोस्ट की रीच नहीं तय कर रहा है बल्कि वह यह तय कर रहा है कि कौन से विचार किन लोगों तक पहुँचने चाहिए, कितने लोगों तक पहुँचने चाहिए! या किनके विचार जनता तक बिल्कुल नहीं पहुँचने चाहिए! अभी कुछ दिन पहले एक बहुत मशहूर अमेरिकी विचारक को इस मंच के मालिक ने यहाँ से ब्लॉक कर दिया! कुछ साल पहले एक दूसरे मंच के मालिक ने अमेरिका के राष्ट्रपति को ब्लॉक कर दिया था! जाहिर है कि इन लोगों की वजह से लाल निशान से ऊपर पानी बहने लगा होगा! रीच सेंसर करने भर से मामला नियंत्रित नहीं हुआ होगा! इसलिए ब्लॉक करना पड़ा होगा! अब आप ये न कह दीजिएगा कि मोहब्बत भरे दिलों के बीच ब्लाका-ब्लाकी चलता रहता है! अगर आप ऐसा कहेंगे तो मैं आपको पप्पू कहूँगा!
गालिब दुकानदार नहीं थे सिपहसालारों के वंशज थे और उसपर गर्व भी करते थे इसीलिए वह पकड़ पाए कि वो लड़ तो रहा है लेकिन उसके हाथ में तलवार नहीं है! और सच कहें तो मॉडर्न वायरफेयर गालिब के जमाने से 170 साल आगे बढ़ चुका है। अब वो पहले से ज्यादा शातिर हो चुका है। अब एक के हाथ में असल तलवार है और सामने वाले को उसने गत्ते की तलवार पकड़ा दी है जिसका रंग-रूप, आकार-प्रकार सब असली जैसा है लेकिन नतीजा हम सबको पता है!
आपको याद होगा कि मैंने काफी पहले इमरान खान को तालिबान खान कहे जाने पर लिखा था। यह सच है कि इमरान खान ने इस्लाम की तलवार से इस दुश्मन का मुकबला करने का प्रयास किया था। इसकी वजह से हम जैसों को भी लगा था कि कप्तान तो हमारी मौत का सामान जुटा रहा है! लेकिन अब लग रहा है कि कप्तान जब डूबने लगा तो उसने तिनका पकड़ने का प्रयास किया! मूल बात है वह खुदमुख्तारी जो कप्तान में थी और वह उसे बचाने के लिए कुछ अदृश्य तलवार वालों से लड़ रहा था! मुसीबत में सभी को भगवान याद आते हैं तो कप्तान को इस्लाम याद आता था तो कौन सी नई बात हो गयी! काश कि कप्तान ने इकबाल के बजाय अकबर इलाहाबादी पर गौर फरमाया होता जिन्होंने कहा था, “खींचो न कमानों को न तलवार निकालो जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो” तो उनका अंजाम शायद कुछ और होता।
वह कौन सी तोप है जिसका मुकाबला तलवार से मुमकिन नहीं है मगर अखबार से मुमकिन है! जाहिर है कि कवि मुकाबले में है लेकिन उसके पास विकल्प केवल दो हैं तलवार और अखबार यानी तोप सामने वाले के पास है, उसके पास नहीं है! यही वो जीनियस है जो बांग्लादेश के जज साहब में नहीं था मगर इलाहाबाद के जज साहब अकबर इलाहाबादी में था। उन्होंने समझ लिया था कि इस तोप के मुकाबले तलवार निकालने का मतलब है, भगवान को प्यारा होना! आप चाहें जितनी बहादुरी से लड़ें आपके खेत होते ही आपकी आवाम कटी फसल की तरह जमीन पर बिखरी पड़ी होगी! अखबार का मतलब है विचार। विचार का मतलब है वह समझ कि हमारे सामने कौन सी तोप है, वह तोप कैसे काम करती है, उसे कौन चला रहा है और वह चाहता क्या है!
ऊपर मैंने महाकवि इकबाल को याद किया है। उसकी कुछ वजह है। अगर शायरी के मेयार पर तौला जाए तो इकबाल का वजन अकबर से बहुत ऊपर होगा। जैसा कि कुछ विद्वान कहते हैं कि औरंगजेब की सत्ता का वजन उसके लकड़दादा अकबर की सत्ता से ज्यादा था! मगर जिस तरह राजनीतिक समझ का वजन शायरी से नहीं तौला जा सकता उसी तरह राजनीतिक समझ का वजन महज भौगोलिक प्रसार से नहीं समझा जा सकता। दारा शिकोह और वाजिद अली शाह ने राजनीति में साहित्य, कला एवं दर्शन जितनी समझ दिखायी होती तो आज वे हमारे बीच जिन्दा होते! औरंगजेब ने अकबर जितनी राजनीतिक समझ दिखायी होती तो उसके मरते ही गुरकानी सल्तनत बिलाने नहीं लगती! उसकी भी अगली तीन पीढ़ियाँ राजा की तरह राज करतीं, न कि औरंगजेब की अगली तीन पीढ़ियों जैसे बेचारों की तरह!
इकबाल को पता था कि “मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा” मगर उनके अन्दर का आला दर्जे का शायर राजनीति में पड़कर काले-गोरे की बिसात पर बुरी तरह मात खा गया। इस नासमझी के चलते खुद इकबाल पाकिस्तान के रूहानी पिता जरूर बन गये मगर क्या उनकी रूह हमें बता सकती है कि आज पाकिस्तान का हकीकी पिता कौन है! मैं पूछता हूँ- ये तीसरा आदमी कौन है? मेरे देश की संसद मौन है!


