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साहित्य

उदय प्रकाश के बाद कहानी में ऐसा संतुलन साधने वाला पहला लेखक लगा प्रवीण कुमार!

प्रभात रंजन-

समकालीन लेखकों में कहानी विधा को जिस खूबी के साथ प्रवीण कुमार ने साधा है वैसा मुझे दूसरा लेखक नहीं दिखता। वैसे तो उनकी शुरुआती कहानी ‘छबीला रंगबाज़ का शहर’ से ही मैं उनका मुरीद हूँ। लेकिन अभी हाल में हंस में प्रकाशित उनकी कहानी ‘लाल कलकत्ता’ को पढ़ने के बाद यह महसूस हुआ कि कथाकार के रूप में प्रवीण ने अपना परिष्कार किया है।

लाल कलकत्ता नाम से यह मत समझ लीजिएगा कि कहानी का कोई संबंध कलकत्ता के वामपन्थ से है। असल में यह 1946 में कलकत्ता में हुए दंगों की पृष्ठभूमि की कहानी है जो चोरों को लेकर है और जिसे सुनाने वाला भी एक चोर ही है।

इतिहास, क़िस्सागोई, विचार सबका ऐसा संतुलन इस कहानी में है कि मत पूछिए। उदय प्रकाश के बाद कहानी में ऐसा संतुलन साधने वाला पहला लेखक लगा मुझे प्रवीण कुमार। अगर आपको मेरा कहना अधिक लग रहा हो तो ख़ुद कहानी पढ़िए। कहानी बहुत लंबी है लेकिन रोचकता से भरपूर है।

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