प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में अब कुछ नहीं बचा है, प्रतिरोध बैठक से लौटे अभिषेक श्रीवास्तव की ये रिपोर्ट पढ़िए

-अभिषेक श्रीवास्तव-

पत्रकारों पर हमले के खिलाफ प्रेस क्लब-DIGIPUB की सभा से लौटकर…

दो दिन पहले ही सीमा आज़ाद जी ने पूछा था कि बलिया में पत्रकारों की गिरफ़्तारी पर क्या हमें बोलना नहीं चाहिए। मैंने कहा कि बलिया में आंदोलन तो चल ही रहा है और हमारा बोलना भी बनता है, लेकिन दिल्ली में हस्तक्षेप का उपयुक्त आरगुमेंट और तरीका सोचा जाना जरूरी है।

यह बात दिल्ली में बीते कुछ वर्षों के दौरान पत्रकार संगठनों की सामूहिक निष्क्रियता और प्रेस क्लब के पतन के प्रत्यक्ष अनुभव के चलते मैंने कही थी। फिर कल अचानक जब सूचना मिली कि प्रेस क्लब और डिजीपब (डिजिटल मीडिया संस्थानों और पत्रकारों का साझा संगठन) संयुक्त रूप से एक सभा 6 अप्रैल को करने जा रहे हैं, तो जिज्ञासा हुई। चूंकि मैं दोनों का औपचारिक सदस्य हूँ, लिहाजा जिम्मेदारी के साथ इसकी सूचना मैंने जारी की। वैसे मन तो नहीं था जाने का क्योंकि वक्ताओं के नाम से ही हताशा हो गयी थी, फिर भी देखने चला गया कि क्या कुछ पकता है।

पैनल में हिंदी के नाम पर इकलौते वक्ता उमाकांत लखेड़ा थे, जो क्लब के अध्यक्ष होने के नाते वहाँ के आयोजनों में शामिलबाजा की भूमिका में रखे जाने को अभिशप्त हैं वरना वो बिना सोचे जो बोलते हैं उससे क्लब की गरिमा हर बार थोड़ी और तार होती है। वो तो हर बार जयशंकर गुप्त जी आकर थोड़ी इज्जत बचा लेते हैं, जैसा आज हुआ।

रोहिणी सिंह आखिरी वक्त में विदड्रॉ कर गयीं। पैनल पर शेष तीन वक्ताओं में एक क्विन्ट, एक न्यूजलॉन्ड्री और एक कारवां से थे। जाहिर है, यह डिजीपब की संस्थापक तिकड़ी थी जिसमें सवाल ही नहीं उठता कि कोई अखबारी जीव हो। एक और बात तय है कि दो दिन पहले यदि बुराड़ी की हिंदू महापंचायत में डिजिटल पत्रकारों पर हमला नहीं हुआ होता तो इस सभा का किसी को खयाल भी नहीं आया होता।

कार्यक्रम का न्योता और उसी साइज़ में छपा अतिलघु बैनर इसकी पुष्टि कर रहे थे जिस पर लिखा था: “Intimidation, Attack and Harassment of Journalists from New Delhi to Ballia”- मने यहाँ भी दिल्ली पहले, बलिया बाद में। अकेले बलिया या अमर उजाला के नाम पर ये सभा संभव नहीं थी। दिल्ली की घटना बलिया का बहाना बन गयी। अगर वाकई बलिया से सरोकार था, तो हिंदी के अखबारी पत्रकारों को बुलाना और बोलवाना बनता था, जो नहीं हुआ।

बहरहाल, एक कागज अंत में बांटा गया। उस पर Resolution शीर्षक से चार बिन्दु लिखे हैं (तस्वीर देखें)।

शुरुआती तीन बिंदुओं में कोई संकल्प जैसी बात नहीं है, बल्कि विश्लेषण आधारित निष्कर्ष हैं। तीनों का संदर्भ दिल्ली के मीडिया संस्थानों पर छापे, बुराड़ी की घटना और पत्रकारों की सरकारी मान्यता का मामला है।

केवल चौथा बिन्दु कायदे से अंग्रेजी का Resolution कहा जा सकता है, जो बेहद सामान्य बात है। पूरे फ़र्रे से बलिया नदारद है। इस सभा से बेशक यह शिकायत रहेगी कि इन्हें हिंदी अखबार के पत्रकार क्यों नहीं मिले अपनी बात रखने के लिए, लेकिन इससे भी बुनियादी शिकायत यह होनी चाहिए कि इन्होंने अपने इस दिल्ली-केंद्रित यज्ञ में बलिया के नाम पर एक समिधा देकर जिम्मेदारी की खानापूर्ति कर डाली।

इससे कहीं गहरी शिकायत इस बात की है कि Resolution यानि संकल्प के अर्थ का इन्होंने अनर्थ कर दिया। इससे ये समझ में आता है कि दिल्ली के पत्रकार और उनके संगठन चाहे हिंदीभाषी हों या अंग्रेजीभाषी, सब के सब प्रतिकार और प्रतिरोध का पूरा व्याकरण भुला चुके हैं। एक सभा के बाद जारी किया जाने वाला सामान्य पर्चा तक लिखने का शऊर सब भूल चुके हैं।

संस्कार यह है कि जब किसी सभा में कोई संकल्प लिया जाता है तो सबको पढ़ के उसे सुनाया जाता है और हामी भरवाई जाती है। यहाँ करीब सौ सवा सौ की उपस्थिति में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। कागज का ढेर चाय की मेज पर चुनने के लिए रख दिया गया, गोया प्रेस विज्ञप्ति हो।

आज प्रेस क्लब की सभा में बोलने वाले क्या बोले और क्यों बोले, ये सुनने वाले नहीं जान सके। सब ऐसे बोले जैसे मुंह के भीतर जुबान सिली पड़ी हो। सुनने वाले भी आपस में गप करते रहे क्योंकि कोई वक्ता ऐसा नहीं था जो खुद को सुनने के लिए लोगों को मजबूर कर पाता। ऐसे तमाम छोटे-बड़े पत्रकार थे वहां हिंदी पट्टी के जिन्हें बुलाया जा सकता था, लेकिन अफसोस कि आयोजक उन्हें जानते ही नहीं हैं।

मेला उठने के बाद चारों तरफ नजर घुमा कर देखने पर युवा डिजिटल पत्रकारों की जो नयी उगी जमात नजर आ रही थी, उसका हमारी पीढ़ी या हमसे पहले वाली पीढ़ी से या फिर प्रतिरोध की संस्कृति से कोई कनेक्ट ही नहीं था। था भी तो बस इतना कि किसी बड़े पत्रकार के पास आकर बोलना- सर नमस्ते, मैं आपको बहुत पढ़ता/देखता हूँ। ऐसे आयोजन दिल्ली में लंबे समय से फोन नंबर आदान-प्रदान करने का माध्यम रहे हैं, अब भी वही हाल है। बल्कि, थोड़ा और बुरा। और अफसोसनाक। और शर्मिंदगी भरा।

ज्यादातर साथी जो उम्मीद से गए थे, प्रोग्राम के तुरंत बाद निकल लिए। क्लब में अब कुछ बचा नहीं है कि वहाँ रुका जाए। चार साल पहले प्रेस क्लब की कमेटी में निर्वाचित होने के बाद मैंने जितनी चिट्ठियाँ लिखीं, जितना प्रतिवाद किया और आशंकाएं जताईं, सब सच हो चुकी हैं। क्लब की निर्वाचित सरकार भले लोकतान्त्रिक दिखती हो लेकिन क्लब के परिवेश पर अलोकतांत्रिक लोगों का मुकम्मल कब्जा हो चुका है।

मुझे लगता है कि पत्रकारों के लिए दिल्ली का ये आखिरी अड्डा अब नहीं बच रहा। जो बचा है, बलिया, गाजीपुर, मऊ, बनारस में ही बचा है। वो भी कब तक, देखने की बात है। अजय भाई चलते-चलते कह रहे थे कि हम लोगों को कुछ पहल करनी चाहिए। मैं शाम से इसी पर सोच रहा हूँ कि बीस साल से पहल एक समस्या क्यों बनी हुई है दिल्ली में। और हर पहल के विकल्प में किसी और पहल की जरूरत क्यों महसूस होने लगती है दिल्ली में। किसी को कुछ सूझे तो बतावे।



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