नई दिल्ली। भारत में पत्रकारों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की एक नई रिपोर्ट ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। क्लूनी फाउंडेशन फॉर जस्टिस, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली और कोलंबिया लॉ स्कूल के ह्यूमन राइट्स इंस्टीट्यूट द्वारा संयुक्त रूप से तैयार की गई इस रिपोर्ट में बताया गया है कि पत्रकारों को न्यायिक प्रक्रिया के ज़रिए लंबे समय तक प्रताड़ित किया जा रहा है — जिससे यह प्रक्रिया स्वयं उनके लिए एक तरह की सज़ा बन जाती है।
‘प्रेसिंग चार्जेस’ शीर्षक से प्रकाशित इस अध्ययन में बताया गया है कि 244 मामलों में से 65% से अधिक अब तक भी लंबित हैं, यानी 30 अक्टूबर, 2023 तक इनका कोई अंतिम निपटारा नहीं हुआ। वहीं, 40% मामलों में अब तक पुलिस जांच भी पूरी नहीं हुई थी। सिर्फ 6% मामलों में ही पत्रकारों को दोषी ठहराया गया या बरी किया गया।
छोटे शहरों और कस्बों में काम करने वाले पत्रकार इस प्रक्रिया से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, छोटे इलाकों में पत्रकारों की गिरफ्तारी की दर 58% रही, जबकि महानगरों में यह आंकड़ा केवल 24% रहा। इसके अलावा, बड़े शहरों में काम करने वाले पत्रकारों को 65% मामलों में अंतरिम राहत मिली, जबकि छोटे शहरों में यह राहत केवल 3% पत्रकारों को ही मिल सकी।
भाषाई और भौगोलिक असमानता भी एक बड़ी बाधा बन रही है। हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में काम करने वाले पत्रकारों को अंग्रेज़ी पत्रकारों की तुलना में अधिक कानूनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट से मिलने वाली राहत की पहुंच भी दिल्ली केंद्रित होने के कारण सीमित हो जाती है।
अध्ययन के लिए 48 पत्रकारों से बातचीत की गई, जिसमें सामने आया कि:
- 58% पत्रकारों ने आर्थिक तंगी की बात कही,
- 56% ने मानसिक तनाव और भय जताया,
- 73% का निजी जीवन प्रभावित हुआ,
- और 56% पत्रकारों के करियर पर इसका नकारात्मक असर पड़ा।
रिपोर्ट में एक पत्रकार के हवाले से लिखा गया, “मेरी गिरफ्तारी के बाद मेरे छोटे बच्चे बुरी तरह डर गए थे। ऐसे मुकदमे एक व्यक्ति को नहीं, पूरे परिवार को तोड़कर रख देते हैं। अंततः ये आपको घुटनों पर ला देते हैं।”
नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली के प्रोफेसर अनूप सुरेंद्रनाथ ने रिपोर्ट को संविधानिक दृष्टि से बेहद अहम बताया। उन्होंने कहा कि यह दस्तावेज़ बताता है कि कैसे आपराधिक कानूनों के ज़रिए प्रेस की स्वतंत्रता को दबाया जा रहा है।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि 2024 में लागू हुई भारतीय दंड संहिता (बीएनएस) में भी अस्पष्ट कानूनों को लेकर कोई विशेष सुधार नहीं किया गया है। उल्टा, एक नया प्रावधान — धारा 195(1)(d) — जोड़ा गया है, जो ‘भारत की संप्रभुता, एकता, अखंडता या सुरक्षा को खतरे में डालने वाली झूठी या भ्रामक सूचना’ को अपराध घोषित करता है।
निष्कर्ष में रिपोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारत में पत्रकारिता करना एक जोखिम भरा काम बन चुका है। अब न केवल पेशेवर पत्रकार, बल्कि ह्विसिलब्लोअर और सिटीजन जर्नलिस्ट्स भी कानूनी जोखिम के दायरे में हैं।
यह रिपोर्ट न केवल प्रेस की आज़ादी पर मंडराते खतरों को रेखांकित करती है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के भविष्य पर भी गहरे सवाल खड़े करती है।
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