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प्रिंट मीडिया के सर्कुलेशन में पिछले 10 वर्षों में 37 फीसदी की वृद्धि

पिछले 10 सालों में प्रिंट मीडिया के सर्कुलेशन में 37 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। डिजिटल मीडिया से मिल रही चुनौतियों के बीच प्रिंट लगातार वृद्धि की ओर अग्रसर है। ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (एबीसी) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, 2006 में प्रिंट मीडिया का सर्कुलेशन 3.91 करोड़ का था, जो 2016 में बढ़कर 6.28 करोड़ हो गया। इस दौरान प्रकाशन केंद्रों की संख्या भी 659 से बढ़कर 910 हो गई है।

पिछले 10 सालों में प्रिंट मीडिया के सर्कुलेशन में 37 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। डिजिटल मीडिया से मिल रही चुनौतियों के बीच प्रिंट लगातार वृद्धि की ओर अग्रसर है। ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (एबीसी) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, 2006 में प्रिंट मीडिया का सर्कुलेशन 3.91 करोड़ का था, जो 2016 में बढ़कर 6.28 करोड़ हो गया। इस दौरान प्रकाशन केंद्रों की संख्या भी 659 से बढ़कर 910 हो गई है।

जुलाई-दिसंबर, 2016 के दौरान टाइम्स ऑफ इंडिया की 31,84,727 कॉपियां बिकीं। एबीसी ने छोटे शहरों में होने वाली वृद्धि के चलते प्रिंट मीडिया का भविष्य सुरक्षित बताया लेकिन समय के साथ इसमें बदलाव की गुंजाइश की संभावना से भी इनकार नहीं किया। 2006 से 2016 के बीच हिंदी मीडिया सबसे तेजी से बढ़ा। यह 8.76 प्रतिशत सीएजीआर (कंपाउंड वार्षिक वृद्धि दर) की दर से सबसे आगे रहा। तेलुगू मीडिया दूसरे नंबर पर रहा। अंग्रेजी मीडिया 2.87 सीएजीआर की दर से बढ़ा।

प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री 2021 तक 7.3 प्रतिशत सीएजीआर की दर से वृद्धि के साथ 431 बिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है। तब तक पूरी मीडिया इंडस्ट्री के 2,419 बिलियन तक पहुंचने की उम्मीद जताई जा रही है। विज्ञापन रेवेन्यू भी 2021 तक बढ़कर 296 बिलियन का हो जाएगा, जो पूरे मीडिया के 1096 बिलियन के संभावित रेवेन्यू का 27 प्रतिशत हिस्सा होगा। प्रिंट मीडिया की पिछले कुछ साल में भारत में हुई वृद्धि विश्व के किसी भी अन्य मार्केट की तुलना में अधिक है। 2015 में भारतीय बाजार सर्कुलेशन के लिहाज से 12 प्रतिशत की दर से बढ़ा। वहीं यूके, यूएसए समेत अन्य विदेशी बाजारों में गिरावट देखने को मिली।

दैनिक भास्कर की प्रतियों में 150% का इजाफा

इन दस सालों में दैनिक भास्कर की प्रतियां 150 फीसदी बढ़ी हैं। 2006 में इसका आंकड़ा 15 लाख 27 हजार 551 था, जो 2016 में बढ़कर 38 लाख 13 हजार 271 हो गया। यह जानकारी ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन्स (एबीसी) की रिपोर्ट में सामने आई है। एबीसी एक स्वतंत्र संस्था है जो प्रकाशनों की प्रसार संख्या का हर छह महीने में ऑडिट कर उन्हें प्रमाणित करती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाओं में पेड न्यूजपेपर्स की प्रसार संख्या में 2 से 12 फीसदी तक गिरावट का रुख है। अकेले भारत में पेड न्यूजपेपर्स की संख्या 12% की रफ्तार से बढ़ रही है। जापान, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया में जहां पेड न्यूजपेपर्स की संख्या तीन साल से जस की तस बनी हुई है। वहीं भारत में यह लगातार दो अंक में बढ़ रही है। 2013 में यह 5,767 थी जो 2014 में 16.70% बढ़कर 6,730 हो गई। वहीं 2015 में इनकी संख्या में 16.95% का इजाफा हुआ और इनकी संख्या बढ़कर 7,871 हो गई।

अखबारों की बिक्री में सर्वाधिक इजाफा देश के उत्तरी क्षेत्र में

अखबारों की बिक्री में सर्वाधिक इजाफा देश के उत्तरी क्षेत्र में दर्ज किया गया है। यह 7.83 फीसद है। जबकि सबसे कम 2.63 फीसद की बढ़त पूर्वी क्षेत्र में देखी गई है। पूरे देश में यह वृद्धि दर 4.87 प्रतिशत की रही। जाहिर है, उत्तर भारत में हिंदी समाचारपत्रों व पत्रिकाओं का ही बोल-बाला है। इसलिए 8.76 फीसद के साथ सर्वाधिक बढ़त भी हिंदी में ही दर्ज की गई है। इसमें भी प्रसार संख्या के अनुसार शीर्ष 10 समाचार पत्रों में चार हिंदी के ही हैं। लंबे समय से तीसरे स्थान पर चल रहे एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक को हटा दिया जाए तो शीर्ष पांच में से चार समाचारपत्र हिंदी के हैं, जिनमें दैनिक जागरण शीर्ष पर है।

डिजिटल मीडिया का दायरा बढ़ रहा है

एबीसी मानती है कि डिजिटल मीडिया का दायरा बढ़ रहा है। समाचारपत्रों के इंटरनेट संस्करण भी लोकप्रिय हो रहे हैं। एबीसी के अनुसार, सुबह समाचारपत्रों के जरिये एक बार खबरें परोसने के बाद दिन में ताजी खबरें पाठकों तक पहुंचाने के लिए डिजिटल मीडिया एक अच्छा माध्यम बनकर उभरा है। लेकिन इससे प्रिंट मीडिया के लिए निकट भविष्य में कोई खतरा नजर नहीं आता। एबीसी का मानना है कि डिजिटल मीडिया के क्षेत्रों में काम कर रहे बड़े मीडिया घरानों के साथ-साथ अन्य माध्यमों को नियंत्रित करने के लिए एबीसी की तर्ज पर एक संस्था की जरूरत है। इस बारे में सरकार भी विचार कर रही है और एबीसी भी। दो-तीन माह में इसके परिणाम सामने आ सकते हैं।

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