पेजव्यू बढ़ाने के लिए देवर-भाभी, भाई-बहन, बाप-बेटी जिनको भी साथ लिटाना पड़े, लिटा दो!

गूगल एनालिटिक्स पर अच्छा पेजव्यू देखने के लिए सभी न्यूज़ वेबसाइटों में होड़ मची रहती है। जब सामान्य तौर पर अच्छा पेजव्यू नहीं आता तो डिजिटल टीम के छोटे कर्मचारियों पर दवाब बनाया जाता है। उन्हें ट्रैफिक लाने के लिए खबरों से इतर कुछ उट-पतांग की ख़बरों को परोसने के लिए कहा जाता है। उन …

एबीपी न्यूज के डिजिटल विंग को तैमूर और उसकी मम्मी से बहुत प्यार है!

आजकल पत्रकारिता पूरी तरह हास्यकारिता में तब्दील हो चुकी है. एबीपी न्यूज वाले अपने डिजिटिल विंग पर जिन लोगों को बिठाए हैं, उन्हें भले बीजेपी न लिखना आता हो (देखें स्क्रीनशाट जिसमें शीर्षक में ही ‘बीजेपी’ की जगह ‘बेजेपी’ लिखा हुआ है) पर वे तैमूर और उनकी मम्मी से जुड़ी कोई भी खबर छापने से …

भारत के मीडिया घराने अब पत्रकारों की बजाय मैनेजरों के हाथों में हैं!

योगी आदित्‍यनाथ ने बजरंग बली को लोकदेवता, वनवासी, गिरवासी, दलित और वंचित भी बताया, लेकिन मीडिया को बेचे जाने लायक ‘माल’ केवल ‘दलित’ शब्‍द में नजर आया…. इसके बाद शुरू हो गई पीसीआर से इस खबर और शब्‍द पर ‘खेलने’ की तैयारी… लखनऊ। क्‍या भारत का शीर्ष मीडिया पत्रकारों की बजाय मैनेजरों के हाथ में …

हिट्स-लाइक के लिए अश्लीलता पर उतारू पत्रिका ग्रुप का पोर्टल, देखें ये हेडिंग और फोटो

एक दौर था जब लोग पत्रकारों के ईमानदार होने और निष्पक्ष पत्रकारिता के शानदार प्रयोगों के उदारहण दिया करते थे। बदलते समय के साथ साथ लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया का भी स्वरूप और लेखन बदल गया है। अब पत्रकारिता के नाम पर बड़े बैनर के वेब पोर्टल तक ज्यादा से ज्यादा हिट्स और लाइक के चक्कर में अश्लीलता परोसने में जरा भी गुरेज नहीं कर रहे हैं।

डिजिटल मीडिया को श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम के दायरे में लाने की तैयारी!

Reetu Kalsi : श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम 1955 की धारा 6 के तहत काम के समय का प्रावधान है। चार सप्ताहों में 144 घंटों से ज्यादा काम नहीं लिया जा सकता। सात दिन में एक दिन (24 घंटे) का विश्राम। वैसे धारा 7 के तहत काम के घंटों का प्रावधान संपादक पर लागू नहीं होता। लेकिन श्रमजीवी पत्रकारों से दिन की पारी में 6 घंटे से ज्यादा व रात्रि की पारी में साढ़े पांच घंटे से ज्यादा काम नहीं लिया जा सकता। दिन में चार घंटे में एक घंटे का विश्राम व रात्रि में तीन घंटे में आधे घंटे का विश्राम दिया जायेगा। पता नहीं यह अधिनियम कहां पर लागू है! सुनने में आया है कुछ मीडिया कंपनियां पत्रकारों से 9 घंटे काम लेने लगी हैं।

प्रिंट मीडिया के सर्कुलेशन में पिछले 10 वर्षों में 37 फीसदी की वृद्धि

पिछले 10 सालों में प्रिंट मीडिया के सर्कुलेशन में 37 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। डिजिटल मीडिया से मिल रही चुनौतियों के बीच प्रिंट लगातार वृद्धि की ओर अग्रसर है। ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (एबीसी) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, 2006 में प्रिंट मीडिया का सर्कुलेशन 3.91 करोड़ का था, जो 2016 में बढ़कर 6.28 करोड़ हो गया। इस दौरान प्रकाशन केंद्रों की संख्या भी 659 से बढ़कर 910 हो गई है।

मालिक के मरने पर सारे तनखइया पत्रकार मिलकर आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं!

किसी अखबार का मालिक मर जाए तो सब पत्रकार मिलकर उसकी आत्मा की शांति की प्रार्थना करते हैं… तनखइया पत्रकार की मजबूरियां आप क्या जानें साहब… है तो कड़वा सच… मालिक की मौत की खबर से अख़बार रंग दिए जाते हैं और अगर अख़बार कर्मचारी-पत्रकार की मौत हो तो दो अलफ़ाज़ की श्रद्धांजलि भी उनके अख़बार में नहीं छापी जाती… अख़बार वाले का कोई कार्यक्रम हो, प्रेस की कोई बैठक हो तो जनाब अख़बार से खबर गायब रहती है…..

पेशेवर लठैत बन चुका है मीडिया

बड़े-बुजुर्ग अक्सर कहते हैं कि अंग्रेज तो चले गए लेकिन चाय छोड़ गये। इसी तरह सामंतवाद समाप्त हो गया लेकिन लठैत छोड़ गया है। ये लठैत अपने सामंत के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे। आज भी लठैत हैं। बड़े-बुजुर्गों का कहना है कि, मीडिया से बड़ा लठैत कौन है। हालांकि तब (1988 के आस पास) मुझे भी खराब लगता था। अब भी खराब लगता है जब मीडिया को बिकाऊ, बाजारू या दलाल कहा जाता है। माना कि देश की आजादी में मीडिया का योगदान सबसे अधिक नहीं तो सबसे कम भी नहीं था। तब अखबार से जुड़ने का मतलब आजादी की लड़ाई से जुड़ना होता था। अब देश आजाद है। मीडिया की भूमिका भी बदल गई। पहले मिशन था अब व्यवसाय हो गया है। पहले साहित्यकार व समाजसेवक अखबार निकालते थे अब बिल्डर और शराब व्यवसायी (भी) अखबार निकाल रहे हैं।

ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है

Dilnawaz Pasha : ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है. भारत में ‘प्रेस्टीट्यूट’ शब्द को स्वीकार कर लिया गया है और एक धड़ा जमकर इसका इस्तेमाल कर रहा है. सरकार ने मंत्रालयों में पत्रकारों की पहुंच कम कर दी है. यहां तक कि प्रधानमंत्री अपनी यात्राओं में पत्रकारों को साथ नहीं ले जा रहे हैं, जैसा कि पहले होता था.

कृपाशंकर के SarajhanLive.com की लांचिंग अनिल चमड़िया के हाथों हुई

झमाझम बारिश के बावजूद हिंदी न्यूज़ पोर्टल www.sarajhanlive.com की लॉन्चिंग इंडिया गेट पर सोमवार की शाम सम्पन्न हुई। पोर्टल की लॉन्चिंग करते हुए हिंदी के वरिष्ठ जुझारू पत्रकार अनिल चमड़िया ने कहा कि वेबसाइट की दुनिया बहुत बड़ी है और इसका सरोकार काफी लम्बा-चौड़ा है। आने वाले वक़्त में इसकी जरुरत ज्यादा महसूस की जाएगी। वेबसाइट दृष्टि और मेहनत का खेल है, जिसने इस सूत्र को जाना, वह मीर।

मोदी और केजरी स्टाइल का ‘आदर्श’ मीडिया… जो पक्ष में लिखे-बोले वही सच्चा पत्रकार!

: मीडिया समझ ले, सत्ता ही है पूर्ण लोकतंत्र और पूर्ण स्वराज! : मौजूदा दौर में मीडिया हर धंधे का सिरमौर है। चाहे वह धंधा सियासत ही क्यों न हो। सत्ता जब जनता के भरोसे पर चूकने लगे तो उसे भरोसा प्रचार के भोंपू तंत्र पर होता है। प्रचार का भोंपू तंत्र कभी एक राह नहीं देखता। वह ललचाता है। डराता है। साथ खड़े होने को कहता है। साथ खड़े होकर सहलाता है और सिय़ासत की उन तमाम चालों को भी चलता है, जिससे समाज में यह संदेश जाये कि जनता तो हर पांच बरस के बाद सत्ता बदल सकती है। लेकिन मीडिया को कौन बदलेगा? तो अगर मीडिया की इतनी ही साख है तो वह भी चुनाव लड़ ले… राजनीतिक सत्ता से जनता के बीच दो-दो हाथ कर ले… जो जीतेगा, उसी की जनता मानेगी!

अमर उजाला डॉट कॉम में लिखी जाती है घटिया खबर की इतनी घटिया कॉपी!

हिंदी न्यूज वेबसाइट्स में पहले नवभारत टाइम्स और उसके बाद भास्कर डॉट कॉम ने अश्लील और बेहूदे कंटेट्स की सारी हदें पार कर जिस तरह पेजव्यूज के कारोबार में सफलता के झंडे गाड़ दिए, उसने अन्य न्यूज वेबसाइट्स को तेजी से आगे बढ़ने का आसान रास्ता दिखाया और इसे फॉलो करने में सबसे आगे रहा है, अमर उजाला डॉट कॉम। सबसे ज्यादा दुखद बात यह है कि अमर उजाला डॉट कॉम में पेजव्यूज के चक्कर में मां-बेटे या भाई-बहन से जुड़े रेप या सेक्स की खबरों को भी चटखारेदार हेडलाइन से लगाया जाता है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़ें। ताजा उदाहरण अमर उजाला डॉट कॉम के एक खबर का है जो भाई-बहन के पवित्र त्योहार रक्षाबंधन के मौके पर पब्लिश की गई।