हिट्स-लाइक के लिए अश्लीलता पर उतारू पत्रिका ग्रुप का पोर्टल, देखें ये हेडिंग और फोटो

एक दौर था जब लोग पत्रकारों के ईमानदार होने और निष्पक्ष पत्रकारिता के शानदार प्रयोगों के उदारहण दिया करते थे। बदलते समय के साथ साथ लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया का भी स्वरूप और लेखन बदल गया है। अब पत्रकारिता के नाम पर बड़े बैनर के वेब पोर्टल तक ज्यादा से ज्यादा हिट्स और लाइक के चक्कर में अश्लीलता परोसने में जरा भी गुरेज नहीं कर रहे हैं।

कई बड़ी फिल्मों में मीडिया पार्टनर रहने वाले पत्रिका के वेब वेंचर ने कामुक और कामवासना की एक कहानी लिख दी। यह कहानी भाई-बहन के रिश्ते को लेकर लिखा गया है। क्या अब पाठक खबर की जगह ऐसी सेक्स स्टोरी पढ़ेंगे? उस पर भी खबर लिखने वाले रिपोर्टर ने स्टोरी की हैडिंग भी बड़ी ‘खूबसूरती’ से सोचने के बाद दी है, जिस पर संपादक जी ने अपनी मोहर लगाई होगी। साथ ही इस खबर के साथ जिस काल्पनिक तस्वीर का प्रयोग किया गया है, वह भी सेमी पोर्न से कम नहीं है.

लखनऊ से अक्षय कुमार की रिपोर्ट.

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डिजिटल मीडिया को श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम के दायरे में लाने की तैयारी!

Reetu Kalsi : श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम 1955 की धारा 6 के तहत काम के समय का प्रावधान है। चार सप्ताहों में 144 घंटों से ज्यादा काम नहीं लिया जा सकता। सात दिन में एक दिन (24 घंटे) का विश्राम। वैसे धारा 7 के तहत काम के घंटों का प्रावधान संपादक पर लागू नहीं होता। लेकिन श्रमजीवी पत्रकारों से दिन की पारी में 6 घंटे से ज्यादा व रात्रि की पारी में साढ़े पांच घंटे से ज्यादा काम नहीं लिया जा सकता। दिन में चार घंटे में एक घंटे का विश्राम व रात्रि में तीन घंटे में आधे घंटे का विश्राम दिया जायेगा। पता नहीं यह अधिनियम कहां पर लागू है! सुनने में आया है कुछ मीडिया कंपनियां पत्रकारों से 9 घंटे काम लेने लगी हैं।

मूल खबर ये है…

श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम के दायरे में डिजिटल मीडिया को भी लाएगी केंद्र सरकार

नई दिल्ली : पत्रकारों को लेकर केंद्र सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाने शुरू कर दिए है। केंद्र इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया पत्रकारों को भी श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम के दायरे में लाने के लिए प्रयत्न कर रहा हैं। केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो एनडीए सरकार श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम में संशोधन करेगी ताकि इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया को भी इसके दायरे में लाया जा सके। उन्होंने कहा, ‘हम श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम के तहत डिजिटल मीडिया समेत सभी इलेक्ट्रॉनिक चैनलों को लाने के लिए कदम उठा रहे हैं। अगर जरूरत पड़ी तो हम अधिनियम में संशोधन करेंगे।

दत्तात्रेय ने बताया कि इस प्रस्ताव को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को भेज दिया गया है जिससे इस पर टिप्पणी मिल सके। कोच्चि में दत्तात्रेय बीजेपी एर्णाकुलम लोकसभा क्षेत्र के नेतृत्व सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए गए थे। श्रमजीवी पत्रकार कानून, 1955 के अनुसार श्रमजीवी पत्रकार वह है जिसका मुख्य व्यवसाय पत्रकारिता हो और वह किसी समाचारपत्र में या उसके सम्बन्ध में पत्रकार की हैसियत से नौकरी करता हो। इसके तहत एडिटर, कंटेंट राइटर , न्यूज एडिटर, सब-एडिटर, फीचर लेखक, कॉपी टेस्टर, रिपोर्टर, कौरेसपोंडेंट, कार्टूनिस्ट, संचार फोटोग्राफर और प्रूफरीडर आते हैं। अदालतों के फैसलों के अनुसार पत्रों में काम करने वाले उर्दू-फारसी के कातिब, रेखा-चित्रकार और संदर्भ-सहायक भी श्रमजीवी पत्रकार हैं। कई पत्रों के लिए तथा अंशकालिक कार्य करने वाला पत्रकार भी श्रमजीवी पत्रकार है। इस कानून से पहले पत्रकारों के काम के घंटे, शर्तों, भत्ते और मुआवजे का कोई निर्धारण नहीं था। हालांकि अभी यह कानून सिर्फ समाचार पत्रों और प्रिंट मीडिया के क्षेत्र में ही लागू है। इलेक्ट्रोनिक और डिजिटल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण लंबे समय से मीडिया के इन क्षेत्रों को भी श्रमजीवी पत्रकार कानून, 1955 के तहत लाने की मांग की जाती रही है।

पंजाब की पत्रकार रीतू कलसी की एफबी वॉल से.

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प्रिंट मीडिया के सर्कुलेशन में पिछले 10 वर्षों में 37 फीसदी की वृद्धि

पिछले 10 सालों में प्रिंट मीडिया के सर्कुलेशन में 37 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। डिजिटल मीडिया से मिल रही चुनौतियों के बीच प्रिंट लगातार वृद्धि की ओर अग्रसर है। ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (एबीसी) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, 2006 में प्रिंट मीडिया का सर्कुलेशन 3.91 करोड़ का था, जो 2016 में बढ़कर 6.28 करोड़ हो गया। इस दौरान प्रकाशन केंद्रों की संख्या भी 659 से बढ़कर 910 हो गई है।

जुलाई-दिसंबर, 2016 के दौरान टाइम्स ऑफ इंडिया की 31,84,727 कॉपियां बिकीं। एबीसी ने छोटे शहरों में होने वाली वृद्धि के चलते प्रिंट मीडिया का भविष्य सुरक्षित बताया लेकिन समय के साथ इसमें बदलाव की गुंजाइश की संभावना से भी इनकार नहीं किया। 2006 से 2016 के बीच हिंदी मीडिया सबसे तेजी से बढ़ा। यह 8.76 प्रतिशत सीएजीआर (कंपाउंड वार्षिक वृद्धि दर) की दर से सबसे आगे रहा। तेलुगू मीडिया दूसरे नंबर पर रहा। अंग्रेजी मीडिया 2.87 सीएजीआर की दर से बढ़ा।

प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री 2021 तक 7.3 प्रतिशत सीएजीआर की दर से वृद्धि के साथ 431 बिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है। तब तक पूरी मीडिया इंडस्ट्री के 2,419 बिलियन तक पहुंचने की उम्मीद जताई जा रही है। विज्ञापन रेवेन्यू भी 2021 तक बढ़कर 296 बिलियन का हो जाएगा, जो पूरे मीडिया के 1096 बिलियन के संभावित रेवेन्यू का 27 प्रतिशत हिस्सा होगा। प्रिंट मीडिया की पिछले कुछ साल में भारत में हुई वृद्धि विश्व के किसी भी अन्य मार्केट की तुलना में अधिक है। 2015 में भारतीय बाजार सर्कुलेशन के लिहाज से 12 प्रतिशत की दर से बढ़ा। वहीं यूके, यूएसए समेत अन्य विदेशी बाजारों में गिरावट देखने को मिली।

दैनिक भास्कर की प्रतियों में 150% का इजाफा

इन दस सालों में दैनिक भास्कर की प्रतियां 150 फीसदी बढ़ी हैं। 2006 में इसका आंकड़ा 15 लाख 27 हजार 551 था, जो 2016 में बढ़कर 38 लाख 13 हजार 271 हो गया। यह जानकारी ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन्स (एबीसी) की रिपोर्ट में सामने आई है। एबीसी एक स्वतंत्र संस्था है जो प्रकाशनों की प्रसार संख्या का हर छह महीने में ऑडिट कर उन्हें प्रमाणित करती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाओं में पेड न्यूजपेपर्स की प्रसार संख्या में 2 से 12 फीसदी तक गिरावट का रुख है। अकेले भारत में पेड न्यूजपेपर्स की संख्या 12% की रफ्तार से बढ़ रही है। जापान, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया में जहां पेड न्यूजपेपर्स की संख्या तीन साल से जस की तस बनी हुई है। वहीं भारत में यह लगातार दो अंक में बढ़ रही है। 2013 में यह 5,767 थी जो 2014 में 16.70% बढ़कर 6,730 हो गई। वहीं 2015 में इनकी संख्या में 16.95% का इजाफा हुआ और इनकी संख्या बढ़कर 7,871 हो गई।

अखबारों की बिक्री में सर्वाधिक इजाफा देश के उत्तरी क्षेत्र में

अखबारों की बिक्री में सर्वाधिक इजाफा देश के उत्तरी क्षेत्र में दर्ज किया गया है। यह 7.83 फीसद है। जबकि सबसे कम 2.63 फीसद की बढ़त पूर्वी क्षेत्र में देखी गई है। पूरे देश में यह वृद्धि दर 4.87 प्रतिशत की रही। जाहिर है, उत्तर भारत में हिंदी समाचारपत्रों व पत्रिकाओं का ही बोल-बाला है। इसलिए 8.76 फीसद के साथ सर्वाधिक बढ़त भी हिंदी में ही दर्ज की गई है। इसमें भी प्रसार संख्या के अनुसार शीर्ष 10 समाचार पत्रों में चार हिंदी के ही हैं। लंबे समय से तीसरे स्थान पर चल रहे एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक को हटा दिया जाए तो शीर्ष पांच में से चार समाचारपत्र हिंदी के हैं, जिनमें दैनिक जागरण शीर्ष पर है।

डिजिटल मीडिया का दायरा बढ़ रहा है

एबीसी मानती है कि डिजिटल मीडिया का दायरा बढ़ रहा है। समाचारपत्रों के इंटरनेट संस्करण भी लोकप्रिय हो रहे हैं। एबीसी के अनुसार, सुबह समाचारपत्रों के जरिये एक बार खबरें परोसने के बाद दिन में ताजी खबरें पाठकों तक पहुंचाने के लिए डिजिटल मीडिया एक अच्छा माध्यम बनकर उभरा है। लेकिन इससे प्रिंट मीडिया के लिए निकट भविष्य में कोई खतरा नजर नहीं आता। एबीसी का मानना है कि डिजिटल मीडिया के क्षेत्रों में काम कर रहे बड़े मीडिया घरानों के साथ-साथ अन्य माध्यमों को नियंत्रित करने के लिए एबीसी की तर्ज पर एक संस्था की जरूरत है। इस बारे में सरकार भी विचार कर रही है और एबीसी भी। दो-तीन माह में इसके परिणाम सामने आ सकते हैं।

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मालिक के मरने पर सारे तनखइया पत्रकार मिलकर आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं!

किसी अखबार का मालिक मर जाए तो सब पत्रकार मिलकर उसकी आत्मा की शांति की प्रार्थना करते हैं… तनखइया पत्रकार की मजबूरियां आप क्या जानें साहब… है तो कड़वा सच… मालिक की मौत की खबर से अख़बार रंग दिए जाते हैं और अगर अख़बार कर्मचारी-पत्रकार की मौत हो तो दो अलफ़ाज़ की श्रद्धांजलि भी उनके अख़बार में नहीं छापी जाती… अख़बार वाले का कोई कार्यक्रम हो, प्रेस की कोई बैठक हो तो जनाब अख़बार से खबर गायब रहती है…..

अव्वल तो अख़बार में काम करने वाले बेचारे हैं तो पत्रकार… लेकिन वोह किसी विज्ञापन एजेंसी, किसी कम्प्यूटर एजेंसी, किसी प्रिंटिंग एजेंसी, किसी लेबर सप्लायर के यहां, कार्यरत कमर्चारी बताये जाते है… ऐसे में यह सब मुमकिन भी नहीं… क्या मजीठिया, क्या दूसरे आयोग… सब बेकार हैं… सारी रिपोर्ट बेकार है भाई…. अख़बार एक रोशनी, अख़बार का मालिक एक रोशनी, लेकिन अख़बार कर्मचारी पत्रकार हो चाहे जो भी हो, एक दिया, जिसके तले, अँधेरा है.

और, इसकी वजह सिर्फ आपसी फूट, सर फुटव्वल, संगठनों पर दारु भाइयों का क़ब्ज़ा, प्रेस क्लबों में शराब के शौक़ीनों का जमावड़ा है, जो सिर्फ अपनी बात करते हैं. पत्रकारों को उनके कल्याण, उनके उत्थान, उनके लिए संघर्ष, बड़े अखबारों के क्रूर प्रबंधन से उन्हें न्याय दिलवाने की बात चाहे राष्ट्रीय स्तर पर हो, चाहे राज्य स्तर पर हो, चाहे क्षेत्रीय स्तर पर हो, किसी भी संगठन ने एक संगठित और व्यवस्थित आंदोलन के रूप में आवाज नहीं उठाई है…

पत्रकार संजय तिवारी और अख्तर खान अकेला की एफबी वॉल से.

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पेशेवर लठैत बन चुका है मीडिया

बड़े-बुजुर्ग अक्सर कहते हैं कि अंग्रेज तो चले गए लेकिन चाय छोड़ गये। इसी तरह सामंतवाद समाप्त हो गया लेकिन लठैत छोड़ गया है। ये लठैत अपने सामंत के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे। आज भी लठैत हैं। बड़े-बुजुर्गों का कहना है कि, मीडिया से बड़ा लठैत कौन है। हालांकि तब (1988 के आस पास) मुझे भी खराब लगता था। अब भी खराब लगता है जब मीडिया को बिकाऊ, बाजारू या दलाल कहा जाता है। माना कि देश की आजादी में मीडिया का योगदान सबसे अधिक नहीं तो सबसे कम भी नहीं था। तब अखबार से जुड़ने का मतलब आजादी की लड़ाई से जुड़ना होता था। अब देश आजाद है। मीडिया की भूमिका भी बदल गई। पहले मिशन था अब व्यवसाय हो गया है। पहले साहित्यकार व समाजसेवक अखबार निकालते थे अब बिल्डर और शराब व्यवसायी (भी) अखबार निकाल रहे हैं।

अखबार मालिक ही नहीं मालिक का एजेंट संपादक भी यही सवाल दाग देता है कि अखबार निकालने में करोड़ों खर्च होते हैं कोई करोड़ों रुपए समाजसेवा पर क्यों खर्च करेगा। बस यही से शुरू होता है खेल। पहले विज्ञापन के नाम पर या आड़ में होता था अब पेड न्यूज जैसी तमाम चीजें शामिल हो गई है। इन्ही तमाम चीजों में एक है लठैती। मीडिया धीरे-धीरे ही सही पेशेवर लठैत होता जा रहा है। एक कहावत है कि,” पूत के पांव हमेशा पालने में ही नहीं रहते”। विज्ञापन के मायाजाल से ही इसने केंचुल बदलना शुरू किया। पाठकों को सूचना देना, गरीबों-मजलूमों की आवाज बनने के बजाए मालिकों, नेताओं की ढाल बनने लगा। अब यह ढाल वार रोकने तक ही सीमित नहीं वह प्रहार भी करने लगा। यह प्रहार गरीब निरीह जनता के लिए नहीं मालिकों और नेताओं के लिए होने लगी। यानी मीडिया लठैत हो गया। सामंतयुगीन व्यवस्था में लठैत अपने मालिक के लिए ” कुछ भी” करने को तैयार रहते थे वो भी सेवाभाव से। आज मीडिया भी तैयार रहता है सेवाभाव से। आज का मीडिया लाठी लिये मालिक के धंधों को हांकता रहता है।

आज एक नया शब्द सुनने को मिल रहा है वह है कारपोरेट मीडिया। अब ये काँपोरेट मीडिया क्या है अपुन अभी तक नहीं समझ पाये हैं। जब बड़े घराने मीडिया के “धंधे” में आये तो मोटामोटी एक ही बात भेजे में घुसेड़ी जाती थी कि, ये अपने अन्य धंधों की रक्षा के लिए अखबार (तब टीवी चैनल नहीं थे) निकालते हैं। अपने अन्य धंधों के होने वाले मुनाफे का कुछ प्रतिशत अखबार को दे दें तो वह चाहे घाटे में रहे या फायदे में कोई फर्क नहीं पड़ता था। अब बिड़ला के हिंदुस्तान अखबार को ही ले लें। बिड़ला जी के पचासों धंधे थे उसके मुनाफे से कुछ फीसद अखबार को दे दिया तो अखबार चाहे जैसे चले कोई फर्क नहीं पड़ता चाहे घाटे में ही रहे। लेकिन अब ऐसा नहीं है क्योंकि बंटवारे के बाद एक पारिवारिक सदस्य को सिर्फ अखबार ही मिला है।

बात लठैत की। हाल के चुनावों व उसके मीडिया की भूमिका किसी लठैत से कम नहीं रही। लठैत की सबसे बड़ी खूबी यह भी होती है कि वह अपने मालिक के इशारों को अच्छी तरह से समझता है। मीडिया भी समझने लगा है। मसलन कब उसे किसे कितना महत्व देना है। किसकी रैली, रोड शो या जनसभा को कितना कवर करना है। बसपा का एक नारा था, ”जिसकी जितनी आबादी, उतनी उसकी हिस्सेदारी”। मीडिया भी पार्टी प्रचारकों की लाइव कवरेज भी कुछ इसी आधार पर करता रहा। भाजपा का सबसे ज्यादा, बाकी में कांग्रेस, सपा और बसपा ही होते थे जबकि चुनाव में आरएलडी, जेडयू, राजद, यूकेडी, अकाली और वामपंथी भी थे। नेताओं के साथ विशेष कवरेज भी विशेष तक ही सीमित रही। गोया अन्य दलों के प्रमुख गाजर-मूली हैं।

ये तो रही चुनाव के आगे-पीछे की कवरेज। उसके बाद भी मीडिया की भूमिका लठैत की ही होती है। वह कौन सा अखबार और चैनल है जो अपने मालिक के खिलाफ एक लाइन भी लिख दे। दैनिक जागरण में नरेंद्र मोहन के खिलाफ कभी एक लाइन छपा है। राष्ट्रीय सहारा के सहारा श्री लखनऊ में गिरफ्तार हुए किसी संस्करण में एक लाइन खबर नहीं थी, क्यों। क्योंकि लठैत कि यह भी खूबी होती है कि वह मालिक के आगे शीश नवाये रखता है। मालिक तो मालिक के करीबी के खिलाफ भी तब तक खबर नहीं छपती जब तक की वह बुरी तरह से फंस न जाए। रामदेव के करीबी बाल कृष्ण फर्जी डिग्री के मामले में देहरादून में गिरफ्तार हुए। राष्ट्रीय सहारा के अन्य  संस्करण की जाने दीजिए देहरादून में भी एक लाइन खबर नहीं छपी। हां इंदौर से रामदेव का खंडन हर अंक के पहले पेज पर छपा। (अखबार की फाइल गवाह है)

यही लठैत कभी भी विज्ञापन देने वाले पर तब तक खबर नहीं लिखते जब तक वह बुरी तरह से घिर न जाए या मालिक हरी झंडी न दे दे। विज्ञापन देने वाले इनके लिए पार्टी होते हैं। आजकल एक नया रिवाज शुरू हो गया है। स्क्रीन पर एक ही नेता की दो-दो फोटो वो भी एक साथ। मसलन, विज्ञापन की जगह एल बैंड के रूप में आदित्य नाथ और समाचार में भी वो भी एक ही समय में। आने वाले दिनों में दांये-बांये, ऊपर नीचे भी हो सकती है। अखबार का मास्टहेड एक ही दिन तीन-तीन होता है यानी  पहले पेज की तरह तीन तो कभी चार पेजों पर अखबार का नाम होता है।

यह भी एक तरह से मीडिया की लठैती ही है। कभी मीडिया की लाठी कमजोरों के लिए, उत्पीड़ितों के लिए उठती थी अब किसके लिए उठती है और क्यों उठती है सब जान गये हैं। भाजपा से राज्यसभा की शोभा बढ़ाने वाले जी मीडिया के मालिक सुभाष चंद्रा के खिलाफ जीटीवी की लाठी जीटीवी के लठैत उठा सकते हैं क्या?

अरुण श्रीवास्तव
07017748031
08881544420

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ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है

Dilnawaz Pasha : ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है. भारत में ‘प्रेस्टीट्यूट’ शब्द को स्वीकार कर लिया गया है और एक धड़ा जमकर इसका इस्तेमाल कर रहा है. सरकार ने मंत्रालयों में पत्रकारों की पहुंच कम कर दी है. यहां तक कि प्रधानमंत्री अपनी यात्राओं में पत्रकारों को साथ नहीं ले जा रहे हैं, जैसा कि पहले होता था.

अमरीका में ट्रंप प्रशासन ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वो ‘मीडिया को ही विपक्ष’ बना लेंगे. डोनल्ड ट्रंप कई बार मीडिया संस्थानों के लिए भद्दी भाषा का प्रयोग कर चुके हैं और कई स्थापित चैनलों को फ़र्ज़ी तक कह चुके हैं. ऐसा करके वो अपने एक ख़ास समर्थक वर्ग को ख़ुश भी कर देते हैं.

दुनिया में नया ऑर्डर स्थापित हो रहा है. इसमें पत्रकारों को भी अपनी नई भूमिका तय करनी होगी. जब अपनी बात पहुँचाने के लिए नेताओं के पास ‘सोशल मीडिया’ है तो वो ‘स्थापित मीडिया’ से दूरी बनाने में परहेज़ क्यों करेंगे?

मुझे लगता है कि ऐसे बदलते परिवेश में वो ही पत्रकार कामयाब होंगे और पहचान पाएंगे जो संस्थानों के समकक्ष स्वयं को स्थापित कर लेंगे. ‘बाइट-जर्नलिस्टों’ की जगह ‘विषय विशेषज्ञों’ की पूछ होगी.

जिस दौर में स्थापित मीडिया को विलेन बनाया जा रहा है उस दौर में पत्रकारों के पास ज़मीनी रिपोर्टिंग करके ‘हीरो’ बनने का मौक़ा भी है.

पत्रकार दिलनवाज पाशा की एफबी वॉल से.

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कृपाशंकर के SarajhanLive.com की लांचिंग अनिल चमड़िया के हाथों हुई

झमाझम बारिश के बावजूद हिंदी न्यूज़ पोर्टल www.sarajhanlive.com की लॉन्चिंग इंडिया गेट पर सोमवार की शाम सम्पन्न हुई। पोर्टल की लॉन्चिंग करते हुए हिंदी के वरिष्ठ जुझारू पत्रकार अनिल चमड़िया ने कहा कि वेबसाइट की दुनिया बहुत बड़ी है और इसका सरोकार काफी लम्बा-चौड़ा है। आने वाले वक़्त में इसकी जरुरत ज्यादा महसूस की जाएगी। वेबसाइट दृष्टि और मेहनत का खेल है, जिसने इस सूत्र को जाना, वह मीर।

इस अवसर पर पोर्टल के प्रधान संपादक कृपाशंकर ने फरमाया कि अँधेरे के खिलाफ, रौशनी की जंग के साथ यह पोर्टल सातो दिन, 24 घंटे खड़ा रहेगा। इतना ही नहीं, नवंबर में युवाओं के लिए एक अन्य वेबसाइट लांच करने की घोषणा की गई। लॉन्चिंग के समय वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश अखिल, विनोद विप्लव, कृष्ण मोहन झा, पंकज पाण्डेय, डॉ वाज़दा खान, मीनू जोशी, अभिनव रंजन, राघवेन्द्र शुक्ल, मोहन कुमार आदि बारिश और लॉन्चिंग का मजा लेते रहे।

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मोदी और केजरी स्टाइल का ‘आदर्श’ मीडिया… जो पक्ष में लिखे-बोले वही सच्चा पत्रकार!

: मीडिया समझ ले, सत्ता ही है पूर्ण लोकतंत्र और पूर्ण स्वराज! : मौजूदा दौर में मीडिया हर धंधे का सिरमौर है। चाहे वह धंधा सियासत ही क्यों न हो। सत्ता जब जनता के भरोसे पर चूकने लगे तो उसे भरोसा प्रचार के भोंपू तंत्र पर होता है। प्रचार का भोंपू तंत्र कभी एक राह नहीं देखता। वह ललचाता है। डराता है। साथ खड़े होने को कहता है। साथ खड़े होकर सहलाता है और सिय़ासत की उन तमाम चालों को भी चलता है, जिससे समाज में यह संदेश जाये कि जनता तो हर पांच बरस के बाद सत्ता बदल सकती है। लेकिन मीडिया को कौन बदलेगा? तो अगर मीडिया की इतनी ही साख है तो वह भी चुनाव लड़ ले… राजनीतिक सत्ता से जनता के बीच दो-दो हाथ कर ले… जो जीतेगा, उसी की जनता मानेगी!

इस अंदाज को 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी ने कहना चाहा। मोदी सरकार ने अपनाना चाहा। इसी राह को केजरीवाल सरकार कहना चाहती है। अपनाना चाहती है। और, पन्नों को पलटें तो मनमोहन सरकार में भी आखिरी दिनों यही गुमान आ गया था जब वह खुले तौर पर अन्ना आंदोलन के वक्त यह कहने से नहीं चूक रही थी कि चुनाव लड़कर देख लीजिये। अभी हम जीते हैं तो जनता ने हमें वोट दिया है, तो हमारी सुनिये। सिर्फ हम ही सही हैं। हम ही सच कह रहे हैं। क्योंकि जनता को लेकर हम ही जमींदार हैं। यही है पूर्ण ताकत का गुमान। यानी लोकतंत्र के पहरुये के तौर पर अगर कोई भी स्तंभ सत्ता के खिलाफ नजर आयेगा तो सत्ता ही कभी न्याय करेगी तो कभी कार्यपालिका, कभी विधायिका तो कभी मीडिया बन कर अपनी पूर्ण ताकत का एहसास कराने से नहीं चूकेगी। ध्यान दें तो बेहद महीन लकीर समाज के बीच हर संस्थान में संस्थानों के ही अंतर्विरोध की खिंच रही है।

दिल्ली सरकार का कहना है, मानना है कि केन्द्र सरकार उसे ढहाने पर लगी है। बिहार में लालू यादव को इस पर खुली आपत्ति है कि ओवैसी बिहार चुनाव लड़ने आ कैसे गये। नौकरशाही सत्ता की पसंद नापसंदी के बीच जा खड़ी हुई है। केन्द्र में तो खुले तौर पर नौकरशाह पसंद किये जाते हैं या ठिकाने लगा दिये जाते हैं लेकिन राज्यो के हालात भी पसंद के नौकरशाहों को साथ रखने और नापसंद के नौकरशाहों को हाशिये पर ढकेल देने का हो चला है। पुलिसिया मिजाज कैसे किसी सत्ता के लिये काम कर सकता है और ना करे तो कैसे उसे बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है, यह मुबंई पुलिस कमिश्नर मारिया के तबादले और तबादले की वजह बताने के बाद उसी वजह को नयी नियुक्ति के साथ खारिज करने के तरीको ने बदला दिया। क्योंकि मारिया जिस पद के लाय़क थे वह कमिश्नर का पद नहीं था और जिस पद से लाकर जिसे कमिश्नर बनाया गया वह कमिश्नर बनते ही उसी पद के हो गये, जिसके लिये मारिया को हटाया गया। यानी संस्थानों की गरिमा चाहे गिरे लेकिन सत्ता गरिमा गिराकर ही अपने अनुकूल कैसे बना लेती है, इसका खुला चेहरा पीएमओ और सचिवों को लेकर मोदी मॉडल पर अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक की रिपोर्ट बताती है तो यूपी सरकार के नियुक्ति प्रकरण पर इलाहबाद हाईकोर्ट की रोक भी खुला अंदेशा देती है कि राजनीतिक सत्ता पूर्ण ताकत के लिये कैसे मचल रही है। और, इन सभी पर निगरानी अगर स्वच्छंद तौर पत्रकारिता करने लगे तो पहले उसे मीडिया हाउस के अंतर्विरोध तले ध्वस्त किया गया। और फिर मीडिया को मुनाफे के खेल में खड़ा कर बांटने सिलसिला शुरू हुआ। असर इसी का है कि कुछ खास संपादक-रिपोर्टरो के साथ प्रधानमंत्री को डिनर पसंद है और कुछ खास पत्रकारों को दिल्ली सरकार में कई जगह नियुक्त कर सुविधाओं की पोटली केजरीवाल सरकार को खोलना पसंद है।

इसी तर्ज पर क्या यूपी क्या बिहार हर जगह ‘निगाहों में भी मीडिया को और निशाने पर भी मीडिया को’ लेने का खुला खेल हर जगह चलता रहा है। तो क्या यह मान लिया जाये कि मीडिया समूहों ने अपनी गरिमा खत्म कर ली है या फिर मुनाफे की भागमभाग में सत्ता ही एकमात्र ठौर हर मीडिया संस्थान का हो चला है। इसलिये जो सत्ता कहे उसके अनुकूल या प्रतिकूल जनता के खिलाफ चले जाना है या फिर सत्ता मीडिया के इसी मुनाफे के खेल का लाभ उठाकर सबकुछ अपने अनुकूल चाहती है। और वह यह बर्दाश्त नहीं कर पाती कि कोई उस पर निगरानी रखे कि सत्ता का रास्ता सही है या नहीं। इतना ही नहीं सत्ता मुद्दों को लेकर जो परिभाषा गढ़ता है उस परिभाषा पर अंगुली उठाना भी सत्ता बर्दाश्त नहीं कर पा रही है। हिन्दू राष्ट्र भारत कैसे हो सकता है, कहा गया तो सत्ता के माध्यमों ने तुरंत आपको राष्ट्रविरोधी करार दे दिया। अब आप वक्त निकालिये और लड़ते रहिये हिन्दू राष्ट्र को परिभाषित करने में।

इसी के समानांतर कोई दूसरा मीडिया समूह बताने आ जायेगा कि हिन्दू राष्ट्र तो भारतीय रगों में दौड़ता है। अब दो तथ्य ही मीडिया ने परिभाषित किये। जो सत्ता के अनुकूल, उसे सत्ता के तमाम प्रचार तंत्र ने पत्रकारिता करार दिया बाकियों को राष्ट्र विरोधी। इसी तर्ज पर किसी ने विकास का जिक्र किया तो किसी ने ईमानदारी का। अब विकास का मतलब दो जून की रोटी के बाद वाई फाई और बुलेट ट्रेन होगा या बुलेट ट्रेन और डिजिटल इंडिया ही। तो मीडिया इस पर भी बंट गई। जो सत्ता के साथ खड़ा, वह देश-हित में सोचता है। जो दो जून की रोटी का सवाल खड़ा करता है, वह बिका हुआ है। किसी पत्रकार ने सवाल खड़ा कर दिया कि सौ स्मार्ट सिटी तो छोडिये सिर्फ एक स्मार्ट सिटी बनाकर तो बताईये कि कैसी होगी स्मार्ट सिटी। तो झटके में उसे कांग्रेसी करार दिया गया। किसी ने गांव के बदतर होते हालात का जिक्र किया तो सत्ता ने भोंपू तंत्र बजाकर बताया कि कैसे मीडिया आधुनिक विकास को समझ नहीं पाता। और जब संघ परिवार ने गांव की फिक्र की तो झटके में स्मार्ट गांव का भी जिक्र सरकारी तौर पर हो गया।

इसी लकीर को ईमानदारी के राग के साथ दिल्ली में केजरीवाल सरकार बन गयी तो किसी पत्रकार ने सवाल उठाया कि जनलोकपाल से चले थे लेकिन आपका अपना लोकपाल कहां है तो उस मीडिया समूह को या निरे अकेले पत्रकार को ही अपने विरोधियो से मिला बताकर खारिज कर दिया गया। पांच साल केजरीवाल का नारा लगाने वाली प्रचार कंपनी पायोनियर पब्लिसिटी को ही सत्ता में आने के बाद प्रचार के करोड़ों के ठेके बिना टेंडर निकाले क्यों दे दिये जाते हैं। इसका जिक्र करना भी विरोधियो के हाथों में बिका हुआ करार दिया जाता है। जैन बिल्डर्स को लेकर जब दिल्ली सरकार से तार जोड़ने का कोई प्रयास करता है तो उसे बीजेपी का प्रवक्ता करार देने में भी देर नहीं लगायी जाती। और, इसी दौर में मुनाफे के लिये कोई मीडिया संस्थान सरकार से गलबिहयां करता है या फिर सत्ता नजदीक जाता है कि किसी एक मीडिया संस्थान से गलबहियां कर उससे पत्रकारो के बीच अपनी साख बनाये रखी जाती है तो बकायदा मंच पर बैठकर केजरीवाल यह कहने से नहीं हिचकते कि हम तो आपके साझीदार हैं।

यानी कैसे मीडिया को खारिज कर और पत्रकारों की साख पर हमला कर उसे सत्ता के आगे नतमस्तक किया जाये, यह खेल सत्ता के लिये ऐसा सुहावना हो गया है जिससे लगने यही लगा है कि सत्ता के लिये मीडिया की कैडर है। मीडिया ही मुद्दा है। मीडिया ही सियासी ताकत है और मीडिया ही दुश्मन है। यानी तकनीक के आसरे जन जन तक अगर मीडिया पहुंच सकती है और सत्ता पाने के बाद कोई राजनीतिक पार्टी एयर कंडिशन्ड कमरों से बाहर निकल नहीं सकती तो फिर कार्यकर्ता का काम तो मीडिया बखूबी कर सकती है। और मीडिया का मतलब भी अगर मुनाफा है या कहें कमाई है और सत्ता अलग अलग माध्यमों से यह कमाई कराने में सक्षम है तो फिर दिल्ली में डेंगू हो या प्याज। देश में गांव की बदहाली हो या खाली एकाउंट का झुनझुना लिये 18 करोड़ लोग। या फिर किसी भी प्रदेश में चंद हथेलियों में सिमटता समूचा लाभ हो, उसकी रिपोर्ट करने निकलेगा कौन सा पत्रकार या कौन सा मीडिया समूह चाहेगा कि सत्ता की जड़ों को परखा जाये।

पत्रकारों को ग्राउंड जीरो पर रिपोर्ट करने भेजा जाये तो क्या मौजूदा वक्त एक ऐसे नेक्सस में बंध गया है, जहां सत्ता में आकर सत्ता में बने रहने के लिये लोकतंत्र को ही खत्म कर जनता को यह एहसास कराना है कि लोकतंत्र तो राजनीतिक सत्ता में बसता है। क्योंकि हर पांच बरस बाद जनता वोट से चाहे तो सत्ता बदल सकती है। लेकिन वोटिंग ना तो नौकरशाही को लेकर होती है ना ही न्याय पालिका को लेकर ना ही देश के संवैधानिक संस्थानों को लेकर और ना ही मीडिया को लेकर। तो आखिरी लाइन उन पत्रकारों को धमकी देकर हर सत्ताधारी अपने अपने दायरे में यह कहने से नहीं चूकता की हमें तो जनता ने चुना है। आप सही हैं तो चुनाव लड़ लीजिये। और फिर मीडिया से कोई केजरीवाल की तर्ज पर निकले और कहे कि हम तो राजनीति के कीचड़ में कूदेंगे तभी राजनीति साफ होगी। और जनता को लगेगा कि वाकई यही मौजूदा दौर का अमिताभ बच्चन है। बस हवा उस दिशा में बह जायेगी। यानी लोकतंत्र ताक पर और तानाशाही का नायाब लोकतंत्र सतह पर।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी जाने-माने पत्रकार हैं और आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.


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अमर उजाला डॉट कॉम में लिखी जाती है घटिया खबर की इतनी घटिया कॉपी!

हिंदी न्यूज वेबसाइट्स में पहले नवभारत टाइम्स और उसके बाद भास्कर डॉट कॉम ने अश्लील और बेहूदे कंटेट्स की सारी हदें पार कर जिस तरह पेजव्यूज के कारोबार में सफलता के झंडे गाड़ दिए, उसने अन्य न्यूज वेबसाइट्स को तेजी से आगे बढ़ने का आसान रास्ता दिखाया और इसे फॉलो करने में सबसे आगे रहा है, अमर उजाला डॉट कॉम। सबसे ज्यादा दुखद बात यह है कि अमर उजाला डॉट कॉम में पेजव्यूज के चक्कर में मां-बेटे या भाई-बहन से जुड़े रेप या सेक्स की खबरों को भी चटखारेदार हेडलाइन से लगाया जाता है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़ें। ताजा उदाहरण अमर उजाला डॉट कॉम के एक खबर का है जो भाई-बहन के पवित्र त्योहार रक्षाबंधन के मौके पर पब्लिश की गई।

जितनी घटिया खबर है, उससे भी ज्यादा घटिया इसकी कॉपी। इस खबर को पढ़कर आपको पता लग जाएगा कि हिंदी वेब पत्रकारिता में कितनी ज्यादा गिरावट आई है? इसके लिए कौन कसूरवार है…संपादक या पाठक। ये आप तय करें। इस खबर को चार पार्ट में प्रकाशित किया गया है, काल्पनिक तस्वीरों के साथ ताकि क्लिक और पेज व्यूज बढ़े। नीचे अमर उजाला डाट काम से कापी करके पूरी खबर दे रहे हैं… खुद पढ़िए और देखिए कि किस तरह ये धंधेबाज मीडिया घराने प्रिंट और टीवी के बाद अब वेब मीडिया में भी गंदगी फैलाने लगे हैं…

15 साल के भाई ने 13 साल की सगी बहन को किया प्रेगनेंट

टीम डिजिटल

मंगलवार, 12 अगस्त 2014

अमर उजाला, दिल्ली

हमने अभी कल ही राखी मनाई और आज ही एक ऐसी खबर आई जिसने भाई-बहन के रिश्ते को तार-तार कर दिया। डेली मेल के मुताबिक आयरलैंड के बेलफास्ट में रहने वाले एक 15 साल के लड़के ने अपनी ही 13 साल की बहन को प्रेगनेंट कर दिया।

बेहद हैरान कर देनी वाली इस खबर में लड़की न सिर्फ प्रेगनेंट हुई बल्कि उसने बच्चे को भी पैदा किया।

चूंकि ऐसे केस में बच्चों का नाम सार्वजनिक करना ठीक नहीं, इसलिए मामला ही जान लेना काफी होगा।

माना जा रहा है‌ कि साल ये लड़की ने 13 साल होने तक का जीवन बड़े ही तनाव और ऊंच-नीच से होकर गुजरा।

13 साल की इस किशोर लड़की ने एक लड़के को जन्म दिया। मामला बेलफास्ट के कोर्ट में जा पहुंचा। इस मामले में कोर्ट ने अपना फैसला अब सुनाया है।

ये घटना साल 2012 की है। अब किशोर लड़की की उम्र 16 साल की है। लेकिन अकेली लड़की अब भी बच्चे को संभालने के लिहाज से छोटी है।

जांच के दौरान पहले तो लड़के का भाई खुद को बच्चे का पिता नहीं मान रहा था, लेकिन डीएनए और पे‌टर्निटी टेस्‍ट ने सब दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया।

लड़का कोर्ट की प्रोसीडिंग में कहीं भी नहीं था। वो कोर्ट में कहीं भी नहीं था।

इसके बाद कोर्ट ने लड़की को अभी भी मानसिक तौर पर छोटा होने और फैसला ना ले पाने योग्य समझते हुए बच्चे को किसी मां-बाप को गोद देने की बात कही और उसकी कस्टडी ली।

कोर्ट ने लड़की को भी केयर होम के हवाले करते हुए उसकी देख-भाल करने के आदेश दिए हैं।

आपको बता दें कि हाल ही में एक केस ऐसा और भी आया था जहां सात साल से शादी शुदा दंपति को पता चला कि असल में वो भाई-बहन हैं।

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