अपनी शामों को मीडिया के खंडहर से निकाल लाइये : रवीश कुमार

Ravish Kumar : अपनी शामों को मीडिया के खंडहर से निकाल लाइये…. 21 नवंबर को कैरवान (carvan) पत्रिका ने जज बीएच लोया की मौत पर सवाल उठाने वाली रिपोर्ट छापी थी। उसके बाद से 14 जनवरी तक इस पत्रिका ने कुल दस रिपोर्ट छापे हैं। हर रिपोर्ट में संदर्भ है, दस्तावेज़ हैं और बयान हैं। जब पहली बार जज लोया की करीबी बहन ने सवाल उठाया था और वीडियो बयान जारी किया था तब सरकार की तरफ से बहादुर बनने वाले गोदी मीडिया चुप रह गया।

जज लोया के दोस्त इसे सुनियोजित हत्या मान रहे हैं। अनुज लोया ने जब 2015 में जांच की मांग की थी और जान को ख़तरा बताया था तब गोदी मीडिया के एंकर सवाल पूछना या चीखना चिल्लाना भूल गए। वो जानते थे कि उस स्टोरी को हाथ लगाते तो हुज़ूर थाली से रोटी हटा लेते। आप एक दर्शक और पाठक के रूप में मीडिया के डर और दुस्साहस को ठीक से समझिए। यह एक दिन आपके जीवन को प्रभावित करने वाला है। साहस तो है ही नहीं इस मीडिया में। कैरवान पर सारी रिपोर्ट हिन्दी में है। 27 दिसंबर की रिपोर्ट पढ़ सकते हैं।

29 नवंबर 2017 को टाइम्स आफ इंडिया में ख़बर छपती है कि अनुज लोया ने बांबे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से मिलकर बताया था कि उसे अब किसी पर शक नहीं है। तब उसी दिन इन एंकरों को चीखना चिल्लाना चाहिए था मगर सब चुप रहे। क्योंकि चीखते चिल्लाते तब सवालों की बातें ताज़ा थीं। लोग उनके सवालों को पत्रिका के सवालों से मिलाने लगते। अब जब रिपोर्ट पुरानी हो चुकी है, अनुज लोया के बयान को लेकर चैनल हमलावार हो गए हैं। क्योंकि अब आपको याद नहीं है कि क्या क्या सवाल उठे थे।

मीडिया की यही रणनीति है। जब भी हुज़ूर को तक़लीफ़ वाली रिपोर्ट छपती है वह उस वक्त चुप हो जाता है। भूल जाता है। जैसे ही कोई ऐसी बात आती है जिससे रिपोर्ट कमज़ोर लगती है, लौट कर हमलावार हो जाता है। इस प्रक्रिया में आम आदमी कमजोर हो रहा है। गोदी मीडिया गुंडा मीडिया होता जा रहा है।

14 जनवरी को बयान जारी कर चले जाने के बाद गोदी मीडिया को हिम्मत आ गई है। वो अब उन सौ पचास लोगों को रगेद रहा है जो इस सवाल को उठा रहे थे जैसे वही सौ लोग इस देश का जनमत तय करते हों। इस प्रक्रिया में भी आप देखेंगे या पढ़ेंगे तो मीडिया यह नहीं बताएगा कि कैरवान ने अपनी दस रिपोर्ट के दौरान क्या सवाल उठाए। कम से कम गोदी मीडिया फिर से जज लोया की बहन का ही बयान चला देता ताकि पता तो चलता कि बुआ क्या कह रही थीं और भतीजा क्या कह रहा है।

क्यों किसी को जांच से डर लगता है? इसमें किसी एंकर की क्या दिलचस्पी हो सकती है? एक जज की मौत हुई है। सिर्फ एक पिता की नहीं। वैसे जांच का भी नतीजा आप जानते हैं इस मुल्क में क्या होता है।

अब अगर गोदी मीडिया सक्रिय हो ही गया है तो सोहराबुद्दीन मामले में आज के इंडियन एक्सप्रेस में दस नंबर पेज पर नीचे किसी कोने में ख़बर छपी है। जिस तरह लोया का मामला सुर्ख़ियों में हैं, उस हिसाब से इस ख़बर को पहले पन्ने पर जगह मिल सकती थी। सीबीआई ने सोमवार को बांबे हाईकोर्ट में कहा कि वह सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में बरी किए गए तीन आई पी एस अफसरों के ख़िलाफ़ अपील नहीं करेगी। इसे लेकर गोदी मीडिया के एंकर आक्रामक अंग्रेज़ी वाले सवालों के साथ ट्विट कर सकते थे। वंज़ारा को नोटिस नहीं पहुंच रहा है क्योंकि उनका पता नहीं चल रहा है। अदालत ने सीबीआई से कहा है कि वंज़ारा को पता लगाएं। एंकर चीख चिल्ला सकते हैं। चाहें तो।

आपको क्यों लग रहा है कि आपके के साथ ऐसा नहीं होगा? क्या आपने विवेक के तमाम दरवाज़े बंद कर दिए हैं? क्या आप इसी भारत का सपना देखते हैं जिसका तिरंगा तो आसमान में लहराता दिखे मगर उसके नीचे उसका मीडिया सवालों से बेईमानी करता हुआ सर झुका ले। संस्थाएं ढहती हैं तो आम आदमी कमज़ोर होता है। आपके लिए इंसाफ़ का रास्ता लंबा हो जाता है और दरवाज़ा बंद हो जाता है।

आप सरकार को पसंद कर सकते हैं लेकिन क्या आपकी वफ़ादारी इस मीडिया से भी है, जो खड़े होकर तन कर सवाल नहीं पूछ सकता है। कम से कम तिरंगे का इतना तो मान रख लेता है कि हुज़ूर के सामने सीना ठोंक कर सलाम बज़ा देते। दुनिया देखती कि न्यूज़ एंकरों को सलामी देनी आती है। आपको पता है न कि सलाम सर झुका के भी किया जाता है और उस सलाम का क्या मतलब होता है? क्या आप भीतर से इतना खोखला भारत चाहेंगे? न्यूज़ एंकर सर झुकाकर, नज़रें चुरा कर सत्ता की सलामी बजा रहे हैं।

आईटी सेल वाले गाली देकर चले जाएंगे मगर उन्हें भी मेरी बात सोचने लायक लगेगी। मुझे पता है। जब सत्ता एक दिन उन्हें छोड़ देगी तो वो मेरी बातों को याद कर रोएंगे। लोकतंत्र तमाशा नहीं है कि रात को मजमा लगाकर फ़रमाइशी गीतों का कार्यक्रम सुन रहे हैं। भारत की शामों को इतना दाग़दार मत होने दीजिए। घर लौट कर जानने और समझने की शाम होती है न कि जयकारे की।

पत्रकारिता के सारे नियम ध्वस्त कर दिए गए हैं। जो हुज़ूर की गोद में हैं उनके लिए कोई नियम नहीं है। वे इस खंडहर में भी बादशाह की ज़िंदगी जी रहे हैं। खंडहर की दीवार पर कार से लेकर साबुन तक के विज्ञापन टंगे हैं। जीवन बीमा भी प्रायोजक है, उस मुर्दाघर का जहां पत्रकारिता की लाश रखी है।

आप इस खंडहर को सरकार समझ बैठे हैं। आपको लगता है कि हम सरकार का बचाव कर रहे हैं जबकि यह खंडहर मीडिया का है। इतना तो फ़र्क समझिए। आपकी आवाज़ न सुनाई दे इसलिए वो अपना वॉल्यूम बढ़ा देते हैं।

जो इस खंडहर में कुछ कर रहे हैं, उन पर उन्हीं ध्वस्त नियमों के पत्थर उठा कर मारे जा रहे हैं। इस खंडहर में चलना मुश्किल होता जा रहा है। नियमों का इतना असंतुलन है कि आप हुज़ूर का लोटा उठाकर ही दिशा के लिए जा सकते हैं वरना उनके लठैत घेर कर मार देंगे। इस खंडहर में कब कौन सा पत्थर पांव में चुभता है, कब कौन सा पत्थर सर पर गिरता है, हिसाब करना मुश्किल हो गया है।

एनडीटीवी के चर्चित पत्रकार और एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सच के बजाय झूठ परोसने लगे अखबार!

डॉ. सुभाष गुप्ता

कल शाम न्यूज 24 चैनल पर घूमर पर डांस करते बच्चों पर करणी सेना के लोगों के हमले की खबर देख रहा था। खबर पूरी होते- होते मन खिन्न हो उठा। कल कुछ अखबार पढ़कर भी ऐसा ही हुआ। न्यूज चैनल और अखबार दरअसल हमारी नया जानने की मानसिक जरूरत पूरी करने का एक अहम जरिया हैं। इन्हीं के जरिये हमें ताजातरीन सूचनाएं मिलती हैं, लेकिन अब अखबार से लेकर न्यूज चैनल तक बहुत से ऐसे लोग पहुंच गए हैं, जो या तो काम के इतने दबाव में हैं कि सही और गलत का फैसला करने की स्थिति में ही नहीं बचे हैं। या फिर सही और गलत को निर्णय करना उनकी क्षमता से बाहर है। खबर को सच माना जाता है, लेकिन अब कई बार पूरी खबर पढ़ने या देखने के बाद लगता है कि ये खबर तो सच हो ही नहीं सकती। ये आंशिक सच हो सकती है या फिर निरा झूठ।

सबसे पहले बात न्यूज 24 चैनल की। आज शाम इस चैनल पर प्रसारित घूमर डांस से नाराज करणी सेना के लोगों के हमले की खबर की बात करता हूं। इस खबर के इंट्रो में बताया गया है कि करणी सेना के लोगों के स्कूल पर हमले में पांच बच्चे घायल हो गये। ये कुछ अटपटा लगा क्योंकि आज सुबह अखबारों में यह खबर आ चुकी थी। अखबारों में छपा था कि स्कूल में एक बच्ची के घूमर पर डांस करने के कुछ देर बाद इन लोगों ने वहां पहुंच कर तोड़फोड़ की। चैनल पर इस खबर के बीच उसी स्कूल के प्रिंसीपल की बाइट भी चल रही थी।

प्रिंसीपल बता रहे थे कि एक बच्चे के चोट आई है। स्कूल में तोड़फोड़ के लिए नाम लेकर करणी सेना को जिम्मेदार ठहराने वाले प्रधानाचार्य ने घायलों की संख्या गलत बताई है या चैनल के रिपोर्टर ने गलत रिपोर्ट कर दिया?  ये सवाल बहुत पीछे छूटता हुआ सा लगता है क्योंकि ये खबर जिस बाइट पर आधारित है, वही बाइट,  खबर के सच से टकरा रही है।

देहरादून में दो कारों की मामूली सी टक्कर के बाद एक युवा इंजीनियर भूपेश की सीने में पेंचकस घोंसकर हत्या कर दी जाती है। 15 जनवरी के अखबारों में यह खबर सुर्खियों में छपी है। अमर उजाला में खबर पढ़कर पता चलता है कि जिस युवक की हत्या हुई है, वह अपने दो दोस्तों के साथ कार से जा रहा था। मामूली टक्कर के बाद झगड़ा हुआ और ट्रांसपोर्टर ने पेंचकस से भूपेश के दिल के पास वार कर दिया गया। इसके बाद भूपेश के साथी उसे तड़पता छोड़कर घटनास्थल से भाग गए।

इसी दिन दैनिक जागरण में इस खबर को दूसरे ढंग से प्रकाशित किया गया है। जागरण में छपा है कि भूपेश के शरीर में कोई हरकत न होते देखकर आरोपी भागने लगा, तो भूपेश के दोस्तों ने उसे पकड़ लिया। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर हमलावर को हिरासत में लिया और भूपेश को अस्पताल पहुंचाया।

जागरण के दूसरे अखबार आईनेक्स्ट में इस खबर के तथ्य कुछ और अलग हैं। आई नेक्स्ट ने छापा है कि अचेत अवस्था में भूपेश को उसके दोस्त रात ही अस्पताल ले गए। फरार होने का प्रयास कर रहे आरोपी को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। आई नेक्सट ने लिखा है कि भूपेश ने देहरादून के एक विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग की थी, जबकि अमर उजाला, हिंदुस्तान और जागरण ने लिखा है कि भूपेश ने पिथौरागढ़ से इंजीनियरिंग की थी।

एक ही घटना के ये एक दूसरे से विपरीत तथ्य किसी भी तरह सही नहीं हो सकते। प्रमुख अखबारों के दफ्तरों से एक किलोमीटर से भी कम फासले पर यह हत्या हुई है। पाठकों को किस अखबार ने सच परोसा है और किस अखबार ने झूठी और काल्पनिक बातों को सच के मुलम्मे में लपेट का खबर के रूप में परोस दिया ? यह एक ऐसा सवाल है जो दरअसल आज के अखबारों और उनके पत्रकारों की कार्य शैली और कार्य के प्रति ईमानदारी पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

अखबारों के शब्द और शैलियां अलग-अगल हो सकती हैं। खबरों का प्रस्तुतिकरण भी अलग हो सकता है। हैडिंग, इंट्रो और न्यूज की बॉडी अलग हो सकती हैं। तथ्य कम या ज्यादा हो सकते हैं, लेकिन तथ्य एक दूसरे के विपरीत नहीं हो सकते।

आजकल जिस तरह तथ्य एक दूसरे के उलट नजर आ रहे हैं, यह स्थिति अखबारों पर पाठकों के उस विश्वास के लिए खतरनाक हो सकती है, जिस पर अखबारों का अस्तित्व टिका हुआ है। लोग अखबारों पर भरोसा करना ही छोड़ देंगे, तो पोस्टरों और अखबारों में अन्तर ही कहां बचेगा?

लेखक डॉ. सुभाष गुप्ता 26 वर्ष तक प्रमुख अखबारों और न्यूज चैनलों में सक्रिय पत्रकारिता करने के बाद अब एक विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के प्रोफेसर हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

तीन बड़े अखबार लाखों-करोड़ों की स्कीम चलाकर पेपर बेचने की होड़ में जुटे

अखबारों से जनहित गायब, स्कीम से लुभा रहे पाठकों को… अखबारों की गिरती साख ने अखबारों तथा पत्रकारों को किस हद तक पहुंचा दिया है इसकी बानगी है अखबारों में पाठकों के लिए चलाई जा रही लाखों की स्कीम। खुद के नंबर वन होने का दावा करने वाले तीन प्रमुख अखबारों से जनहित के मुद्दे नदारद हैं। इससे प्रमुख बड़े अखबार लगातार जनता का विश्वास खोते जा रहे हैं। लोगों की दिलचस्पी बनाए रखने के लिए तीनों ही अखबारों में लाखों-करोड़ों की योजनाएं चलाकर अखबार बेचने की होड़ मची हुई है।

सबसे पहले दैनिक जागरण ने स्कीम लांच की तथा पाठकों को कूपन चिपकाकर लकी ड्रा में षामिल होने का निमंत्रण दिया। दैनिक जागरण ने अपनी स्कीम लांच करने में षहरों में ढोल नगाड़ों के साथ रैली तक निकाली। इस कार्य में जागरण के प्रसार सहित संपादकीय व विज्ञापन के प्रतिनिधियों को बाजार में झोंका गया। अमर उजाला तथा हिंदुस्तान अखबार ने भी पाठकों के लिए स्कीम चलाकर अखबार बेचने का नायाब तरीका खोजा है।

दरअसल यह मीडिया तथा अखबारों के गिरावट का दौर है। कारपोरेट का दबाव अखबारों तथा इलेंक्ट्रानिक मीडिया पर साफ दिख रहा है। जनहित के मुद्दे जब मीडिया से गायब होंगे तो लोगों की दिलचस्पी बढ़ाने के लिए इसी तरह की योजनाओं को बाजार में झोंकना पड़ेगा। दरअसल अखबार एक प्रोडक्ट हो गया है तथा पाठक महज एक ग्राहक बनकर रह गया है। जिसे अखबार के मालिकान अपना प्रोडक्ट बेच रहे हैं। इस बेरहम बाजार में पाठक को कंटेंट से आकर्शित करने अथवा जोड़े रखने की बजाय लाखों करोड़ों की योजनाओं से लुभाया जा रहा है। इन आकर्षक योजनाओं के बीच पाठक की हालत यह है कि वह कंटेंट की तुलना करने की बजाय तीनों अखबारों की योजनाओं की आपस में तुलना करते हुए बड़े ईनाम का इंतजार कर रहा है।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मोदी राज में अखबार सरकारी तोता बन गए और न्यूज चैनल चमचा!

Priyabhanshu Ranjan : अगले लोकसभा चुनाव की तैयारियों में अभी से जुटे अमित शाह 95 दिन का देशव्यापी दौरा कर रहे हैं। भाजपा नेतृत्व अगले 100 दिनों का एक्शन प्लान तैयार कर चुका है और सख्ती से उस पर अमल भी कर रहा है। केंद्रीय मंत्री मीडिया को लगातार इंटरव्यू देकर मोदी सरकार के तीन साल की अपनी झूठी-सच्ची “उपलब्धियां” गिना रहे हैं । देश का एक बड़ा तबका उनकी बातें सुन भी रहा है। लेकिन विपक्ष, मीडिया और सोशल मीडिया क्या कर रहा?

विपक्ष सो रहा है। राहुल गांधी को करीब एक हफ्ते बाद झारखंड की घटना पर ट्वीट करने का आइडिया आया। न्यूज चैनल कभी “पंचायत…”, कभी “एजेंडा…” और कभी “…एडिटर्स राउंड टेबल” आयोजित कर किसी तरह 24 घंटे का चैनल चला रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस को छोड़कर बाकी सारे अखबार सरकारी तोता बन बैठे हैं। न्यूज पोर्टलों में दि वायर को छोड़ दें तो बाकी को सेक्स और मोदी की तारीफ भरी खबरों से ही फुरसत नहीं है। सोशल मीडिया पर हम जैसे लोग यज्ञ-हवन और परेश रावल के ट्वीट में उलझे हुए हैं! ऐसा विपक्ष, ऐसी मीडिया और ऐसी खाई-अघाई जनता हो तो मोदी सरकार को और क्या चाहिए?

Arun Maheshwari : इससे अधिक चापलूसी क्या हो सकती है! प्रधानमंत्री ने पिछले तीन साल में दुनिया के कई देशों की यात्राएँ की, नेताओं से दोस्ती से लेकर विभिन्न समुदायों के लोगों से दोस्ती के कई नाटक खेलें। अभी टीवी के चैनलों पर विदेश नीति के कुछ ‘विशेषज्ञ’ प्रधानमंत्री की इन शैलानियों की तरह की यात्राओं को ही उनकी विदेश नीति की बड़ी सफलता बता रहे थे। एक चैनल पर सुन रहा था कि भारत के किसी प्रधानमंत्री ने नेपाल की यात्रा नहीं की, जो नरेन्द्र मोदी ने की। नरेन्द्र मोदी पाकिस्तान में नवाज़ शरीफ़ के घर पर शादी में पहुंच गये, जो किसी ने नहीं किया। और, श्रीलंका में बौद्धों के सम्मेलन में जाकर उन्होंने श्रीलंका के सिंहली लोगों के दिल को जीत लिया।

कोई यह सवाल नहीं कर रहा था कि इन महान यात्राओं के बाद ही ऐसा क्या हुआ कि नेपाल से और पाकिस्तान से रिश्तों में भारी गिरावट आ गई? इसी प्रकार चीन की पहल पर वन बेल्ट वन रोड के शिखर सम्मेलन में बिना किसी वाजिब वजह के भारत के न जाने पर भी कोई सवाल नहीं कर रहा था, जबकि उसमें दुनिया के ढेर सारे देशों के राष्ट्राध्यक्ष तक शामिल हुए थे। विदेश नीति के मसले पर मोदी सरकार की प्रशंसा से बड़ी चापलूसी भी क्या मुमकिन है? एंकर महरूफ रजा थे, अन्यों में शेषाद्रि चारी थे।

पत्रकार द्वय प्रियभांशु रंजन और अरुण माहेश्वरी की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

प्रिंट मीडिया के सर्कुलेशन में पिछले 10 वर्षों में 37 फीसदी की वृद्धि

पिछले 10 सालों में प्रिंट मीडिया के सर्कुलेशन में 37 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। डिजिटल मीडिया से मिल रही चुनौतियों के बीच प्रिंट लगातार वृद्धि की ओर अग्रसर है। ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (एबीसी) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, 2006 में प्रिंट मीडिया का सर्कुलेशन 3.91 करोड़ का था, जो 2016 में बढ़कर 6.28 करोड़ हो गया। इस दौरान प्रकाशन केंद्रों की संख्या भी 659 से बढ़कर 910 हो गई है।

जुलाई-दिसंबर, 2016 के दौरान टाइम्स ऑफ इंडिया की 31,84,727 कॉपियां बिकीं। एबीसी ने छोटे शहरों में होने वाली वृद्धि के चलते प्रिंट मीडिया का भविष्य सुरक्षित बताया लेकिन समय के साथ इसमें बदलाव की गुंजाइश की संभावना से भी इनकार नहीं किया। 2006 से 2016 के बीच हिंदी मीडिया सबसे तेजी से बढ़ा। यह 8.76 प्रतिशत सीएजीआर (कंपाउंड वार्षिक वृद्धि दर) की दर से सबसे आगे रहा। तेलुगू मीडिया दूसरे नंबर पर रहा। अंग्रेजी मीडिया 2.87 सीएजीआर की दर से बढ़ा।

प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री 2021 तक 7.3 प्रतिशत सीएजीआर की दर से वृद्धि के साथ 431 बिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है। तब तक पूरी मीडिया इंडस्ट्री के 2,419 बिलियन तक पहुंचने की उम्मीद जताई जा रही है। विज्ञापन रेवेन्यू भी 2021 तक बढ़कर 296 बिलियन का हो जाएगा, जो पूरे मीडिया के 1096 बिलियन के संभावित रेवेन्यू का 27 प्रतिशत हिस्सा होगा। प्रिंट मीडिया की पिछले कुछ साल में भारत में हुई वृद्धि विश्व के किसी भी अन्य मार्केट की तुलना में अधिक है। 2015 में भारतीय बाजार सर्कुलेशन के लिहाज से 12 प्रतिशत की दर से बढ़ा। वहीं यूके, यूएसए समेत अन्य विदेशी बाजारों में गिरावट देखने को मिली।

दैनिक भास्कर की प्रतियों में 150% का इजाफा

इन दस सालों में दैनिक भास्कर की प्रतियां 150 फीसदी बढ़ी हैं। 2006 में इसका आंकड़ा 15 लाख 27 हजार 551 था, जो 2016 में बढ़कर 38 लाख 13 हजार 271 हो गया। यह जानकारी ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन्स (एबीसी) की रिपोर्ट में सामने आई है। एबीसी एक स्वतंत्र संस्था है जो प्रकाशनों की प्रसार संख्या का हर छह महीने में ऑडिट कर उन्हें प्रमाणित करती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाओं में पेड न्यूजपेपर्स की प्रसार संख्या में 2 से 12 फीसदी तक गिरावट का रुख है। अकेले भारत में पेड न्यूजपेपर्स की संख्या 12% की रफ्तार से बढ़ रही है। जापान, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया में जहां पेड न्यूजपेपर्स की संख्या तीन साल से जस की तस बनी हुई है। वहीं भारत में यह लगातार दो अंक में बढ़ रही है। 2013 में यह 5,767 थी जो 2014 में 16.70% बढ़कर 6,730 हो गई। वहीं 2015 में इनकी संख्या में 16.95% का इजाफा हुआ और इनकी संख्या बढ़कर 7,871 हो गई।

अखबारों की बिक्री में सर्वाधिक इजाफा देश के उत्तरी क्षेत्र में

अखबारों की बिक्री में सर्वाधिक इजाफा देश के उत्तरी क्षेत्र में दर्ज किया गया है। यह 7.83 फीसद है। जबकि सबसे कम 2.63 फीसद की बढ़त पूर्वी क्षेत्र में देखी गई है। पूरे देश में यह वृद्धि दर 4.87 प्रतिशत की रही। जाहिर है, उत्तर भारत में हिंदी समाचारपत्रों व पत्रिकाओं का ही बोल-बाला है। इसलिए 8.76 फीसद के साथ सर्वाधिक बढ़त भी हिंदी में ही दर्ज की गई है। इसमें भी प्रसार संख्या के अनुसार शीर्ष 10 समाचार पत्रों में चार हिंदी के ही हैं। लंबे समय से तीसरे स्थान पर चल रहे एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक को हटा दिया जाए तो शीर्ष पांच में से चार समाचारपत्र हिंदी के हैं, जिनमें दैनिक जागरण शीर्ष पर है।

डिजिटल मीडिया का दायरा बढ़ रहा है

एबीसी मानती है कि डिजिटल मीडिया का दायरा बढ़ रहा है। समाचारपत्रों के इंटरनेट संस्करण भी लोकप्रिय हो रहे हैं। एबीसी के अनुसार, सुबह समाचारपत्रों के जरिये एक बार खबरें परोसने के बाद दिन में ताजी खबरें पाठकों तक पहुंचाने के लिए डिजिटल मीडिया एक अच्छा माध्यम बनकर उभरा है। लेकिन इससे प्रिंट मीडिया के लिए निकट भविष्य में कोई खतरा नजर नहीं आता। एबीसी का मानना है कि डिजिटल मीडिया के क्षेत्रों में काम कर रहे बड़े मीडिया घरानों के साथ-साथ अन्य माध्यमों को नियंत्रित करने के लिए एबीसी की तर्ज पर एक संस्था की जरूरत है। इस बारे में सरकार भी विचार कर रही है और एबीसी भी। दो-तीन माह में इसके परिणाम सामने आ सकते हैं।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अपने कसबे फलोदी पहुंचे ओम थानवी ने अखबारों की बदलती तासीर पर की यह टिप्पणी

अपने क़सबे फलोदी (राजस्थान) आया हुआ हूँ। 47 डिग्री की रेगिस्तान की गरमी मुझे यहाँ उतना नहीं झुलसाती जितना अख़बारों की बदलती तासीर। अजीबोग़रीब हिंदूकरण हो रहा है। जैसे देश में बाक़ी समाज हों ही नहीं। एक बड़े इलाक़े की ख़बरों के लिए तय पन्ने पर (आजकल पन्ने इसी तरह बँटे होते हैं) आज एक अख़बार में हर एक “ख़बर” किसी-न-किसी हिंदू मंदिर की गतिविधि – मूर्तियों की प्राणप्रतिष्ठा, कलश की स्थापना, दान-पुण्य – या संतों के प्रवचनों से  लकदक है। वह पूरा का पूरा पन्ना (पृष्ठ नौ) एक ही धर्म की श्रद्धा में/से अँटा पड़ा है।

देश का ‘पाकिस्तानीकरण’ (अख़बार के आज के ही अंक में मित्रवर जयप्रकाश चौकसे की टिप्पणी में प्रयुक्त आशंका) किए जाने में मीडिया की यह नई ‘ग्रासरूट’ सक्रियता भी क्या कम भूमिका निभा रही है? धर्म (और उनके लिए धर्म का मतलब हिंदू धर्म है या कथित ‘राष्ट्रधर्म’) को जगह देना हिंदी अख़बारों जाने कैसी मजबूरी बन गया है। पहले भी देते थे। अब तो बाढ़ आ जाती है। अठारह साल पहले जब दिल्ली में जनसत्ता का काम सम्भाला, सबसे पहले “धर्म-संस्कृति” पन्ना बंद किया था। मुट्ठीभर पन्नों में संस्कृति के नाम पर सिर्फ़ हिंदू धर्म का पन्ना किस काम का। पर आज दुनिया के इतना आगे निकल आने पर भी हमारे यहाँ, जहाँ/तहाँ, अख़बारों में अलग-अलग पन्नों पर संस्कृति की कुछ वैसी ही संकीर्ण समझ फैली है – फैलाई जा रही है।

लेखक ओम थानवी देश के जाने माने पत्रकार हैं और जनसत्ता अखबार के संपादक रहे हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: